Saturday, 31 May 2025

आज ३१ मई २०२५ को महारानी अहिल्याबाई होळकर की तीनसौवीं जयंती है ---

आज ३१ मई २०२५ को अङ्ग्रेज़ी तिथि के अनुसार सत्य-सनातन हिन्दू-धर्म की महान उद्धारकर्ता, भगवान शिव की मानस-पुत्री, पुण्यश्लोका महारानी अहिल्याबाई होळकर की तीनसौवीं जयंती है (जन्म : ३१ मई १७२५. मृत्यु १३ अगस्त १७९५) (राज्यकालावधी १७६७ - १७९५ई.) उस कालखंड में वे सत्य-सनातन हिन्दू-धर्म की महान उद्धारकर्ता थीं। उन्होने इंदौर नगर की स्थापना की व वहीं से मालवा पर शासन किया।

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काशी का वर्तमान विश्वनाथ मंदिर, गया का विष्णुपद मंदिर, सोमनाथ के भग्नावशेषों के समीप दूसरा सोमनाथ मंदिर, पूरे देश में सैंकड़ों घाटों, गोचर-भूमियों, और मंदिरों के पुनरोद्धार का महान कार्य उन्होंने किया। वे हजारों साधु-संतों और तपस्वी ब्राह्मणों के लिए माता के समान थीं। अपने राज्य में निःशुल्क शिक्षा के लिये अनेक गुरुकुलों की व्यवस्था की। उन्होने वह कर दिखाया जो अन्य पराक्रमी हिन्दू शासक न कर सके।
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उनके श्वसुर महाराजा मल्हार राव होल्कर अपनी मराठा सेना के साथ ज्ञानवापी को मुक्त कराने के लिये काशी आये थे। लेकिन वहाँ के (मुगलों से आतंकित) लोग हाथ जोड़कर खड़े हो गये और कहा कि आप तो ज्ञानवापी को मुक्त करा कर बापस महाराष्ट्र चले जाओगे, लेकिन मुगलों की सेना बापस आकर हमें जान से मार देगी। बड़े दुखी मन से महाराजा मल्हारराव बापस लौट गये।
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लेकिन उनकी पुत्रवधू महारानी अहिल्याबाई वहाँ अपनी सेना के साथ गयीं और ज्ञानवापी के बिलकुल पास में ही भगवान विश्वनाथ का नया मंदिर बनवाकर और प्राण-प्रतिष्ठा करवा कर ही लौटीं। मंदिर के शिखर पर जो सोना चढ़ा हुआ हुआ है वह पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह जी ने भेजा था।
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महारानी अहिल्या बाई होल्कर पर मैं तीन-चार विस्तृत लेख लिख चुका हूँ। अधिक लिखूंगा तो पुनरावृति दोष होगा। इसलिए और नहीं लिख रहा। सभी को नमन !! महारानी अहिल्याबाई को नमन !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२५

गर्मी का आनंद लेते हुए स्वयं को सारे संचित व प्रारब्ध कर्मों से मुक्त करें ---

  गर्मी का आनंद लेते हुए स्वयं को सारे संचित व प्रारब्ध कर्मों से मुक्त करें

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आजकल गर्मी खूब पड़ रही है। गर्मी का आनंद लें। रात्री को जल्दी सोने का अभ्यास कीजिये। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अपने घर की छत पर या बाहर खुले में भगवान का खूब ध्यान या नामजप करें। इतना आनंद आयेगा, इतना आनंद आयेगा जो अवर्णनीय है। फिर स्वच्छ हवा में घूमें।
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अधिक बोलने से और अधिक विचारों से मन चंचल होता है। वाणी और मन के मौन का अभ्यास करें। जितना आवश्यक है उतना ही बोलें। जप योग के निरंतर अभ्यास से अनावश्यक विचारों का शमन होता है। मन में अनावश्यक विचार न आने दें। सारे विचारों का समर्पण परमात्मा के चिंतन में कर दें। परमात्मा के ध्यान में महा-मौन की अनुभूति होती है। जब महा-मौन की अनुभूति हो, तब उस महा-मौन में ही रहने का अभ्यास करें। स्वयं को परमात्मा को समर्पित कर दें। परमात्मा की अनुभूतियाँ होंगी तब आप आनंद से भर जाओगे।
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सब कुछ भगवान का है। अपने सारे कर्म भी भगवान को समर्पित कर दें। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं ---
"यत्करोषि यदश्नासि यज्‍जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्‍व मदर्पणम्॥"
"शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥" (९:२७-२८)
अर्थात् - "हे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ भोजन करता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे। इस प्रकार मेरे अर्पण करने से कर्मबन्धन से और शुभ (विहित) और अशुभ (निषिद्ध) सम्पूर्ण कर्मों के फलोंसे तू मुक्त हो जायगा। ऐसे अपने-सहित सब कुछ मेरे अर्पण करनेवाला और सबसे सर्वथा मुक्त हुआ तू मुझे ही प्राप्त हो जायेगा॥
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और क्या चाहिये ? सब कुछ तो यहाँ भगवान ने हमें दे दिया है। हर समय स्वयं निमित्त मात्र बनकर परमात्मा का चिंतन करो, और परमात्मा को समर्पित हो जाओ।
कृपा शंकर
३१ मई २०१९

गर्मी के मौसम की सकारात्मकता ---

 गर्मी के मौसम की सकारात्मकता ---

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आजकल भयंकर गर्मी से लोग त्रस्त हैं| लू लगने से हजारों लोग मरे हैं|
पर गर्मी का एक आनंद भी है जो पूरा उठाना चाहिए|
जो लोग लू लगने से मरे हैं वे लू से नहीं मरे हैं बल्कि सावधानी नहीं बरतने से मरे हैं| लू का सबसे अधिक प्रकोप राजस्थान के मारवाड़ में और वहाँ भी विशेषकर शेखावाटी क्षेत्र में होता है, पर लू से यहाँ कोई मरता नहीं है क्योंकि सबको सावधानी बरतनी आती है|
मौसम में परिवर्तन के कारण अब की बार लू का सर्वाधिक प्रकोप आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना में हुआ जहाँ दो हज़ार से अधिक लोग मरे हैं|
जब बाहर का तापमान सामान्य से तीन-चार डिग्री सेल्सियस या अधिक होता है तब उसके प्रभाव से जो गर्म हवा चलती है उसे 'लू' कहते हैं| शुष्क जलवायू में तो यह बहुत घातक होती है|
जहाँ तक हो सके धूप में बाहर ना निकलें| यदि निकलना ही पड़े तो सिर को मोटे सूती कपडे से अच्छी तरह ढक लें| छाते का भी प्रयोग करें| गर्म हवा से देह को बचाएं| सफ़ेद सूती वस्त्र पहिनें| नंगे पाँव गर्म भूमि पर न चलें| घर से बाहर लिकलने से पूर्व खूब पानी पीकर चलें| प्यास लगते ही खूब पानी पीएँ| अनावश्यक बाहर खुले में ना रहें|
इस मौसम में छाछ, बील का शरबत, नीबुपानी, कच्चे आम का पना और तरबूज का सेवन बहुत लाभदायक और मजेदार भी होता है| प्याज भी दवा का काम करता है| राजस्थान और हरयाणा में छाछ और बाजरे के आटे से एक विशेष विधि से एक पेय बनाते हैं जिसे 'राबड़ी' कहते हैं| यह राबड़ी पीने से लू और गर्मी से रक्षा होती है|
किसी को लू लग जाना एक मेडिकल आपत्काल होता है| तुरंत उपचार न मिलने से मृत्यु हो सकती है| इसलिए सभी को इसका प्राथमिक उपचार सीख लेना चाहिए|
जितनी लू चलती है, खरबूजा उतना ही मीठा होता है| आजकल लू चल रही है तो खरबूजे भी बहुत मीठे आ रहे हैं| दूध और आम के रस को मिलाकर एक पेय 'अमरस' बनाया जाता है जिसको ठंडा कर के रात्रि में पीने का आनंद अमृततुल्य है|
इस गर्मी के मौसम में प्रातःकाल चार बजे से साढ़े पाँच बजे तक बाहर खुले में बैठकर भगवान का ध्यान या नामजप करना चाहिए| इतना आनंद आयेगा जो अवर्णनीय है| साढ़े पाँच से साढ़े छः बजे तक किसी बगीचे मे या बाहर कहीं शुद्ध हवा में लम्बे लम्बे साँस लेते हुए घूमना चाहिए|
जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए| हर क्षण का आनंद लें| सुख और दुःख एक मानसिक अवस्था मात्र है| खूब प्रसन्न रहें और जीवन को आनंदमय बना लें|
जय सियाराम | ॐ शिव | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
३१ मई २०१५

महारानी अहिल्याबाई की २९४ वीं जयंती ---

भगवान शिव की मानसपुत्री महारानी अहिल्याबाई होलकर (३१ मई १७२५ - १३ अगस्त १७९५) की आज २९४ वीं जयंती है| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है| व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विकटतम कष्ट और प्रतिकूलताओं के पश्चात् भी इन्होने महानतम कार्य किये, जिनकी तुलना नहीं की जा सकती| इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी| इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे| इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए| अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की मृत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थी और राज्य संभाला| अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया| अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया| राजधानी इंदौर उन्हीं की बसाई हुई नगरी है| जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर दिया और उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन कल्याण के व्रत का पालन करती रही| उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया|
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सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की| वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से बने| हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू लोग इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे| सैंकड़ों असहाय लोगों और साधू संतों को अन्न वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी| पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएँ, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए| नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं| महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना| अमरकंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया| परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएँ कीं| ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की| वहाँ प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था|
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यहाँ दो शब्द उनके श्वसुर मल्हार राव के बारे में भी लिखना उचित रहेगा|
छत्रपति शिवाजी के पोते साहू जी ने एक चित्तपावन ब्राह्मण बालाजी बाजीराव (प्रथम) को पेशवा नियुक्त किया| बालाजी बाजीराव वेश बदल कर बिना सुरक्षा व्यवस्था के तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े| मार्ग के एक गाँव में उनको मुगलों के जासूसों ने पहचान लिया और उनकी हत्या के लिए बीस मुग़ल सैनिक पीछे लगा दिए| मल्हार राव ने कुछ भैंसे पाल रखीं थीं और उस गाँव में दूध बेच कर गुजारा करते थे| वे मुग़ल जासूस भी उन्हीं से दूध खरीदते थे| उनकी आपसी बातचीत से मल्हार राव को सब बातें स्पष्ट हो गईं| उनकी देशभक्ति जागृत हो गयी और चुपके से उनहोंने पेशवा को ढूंढकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी| यही नहीं पेशवा को एक संकरी घाटी में से सुरक्षित निकाल कर भेज दिया और उनकी तलवार खुद लेकर उन बीस मुगलों को रोकने खड़े हो गए| उस तंग घाटी से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति निकल सकता था| ज्यों ही कोई मुग़ल सैनिक बाहर निकलता, मल्हार राव की तलवार उसे यमलोक पहुंचा देती| उन्होंने पाँच मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया| इसे देख बाकी पंद्रह मुग़ल सैनिक गाली देते हुए बापस लौट गए| उन्होंने मल्हार राव के घर को आग लगा दी, उसके बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी व भैंसों को हाँक कर ले गए|
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मल्हार राव, पेशवा बाजीराव के दाहिने हाथ बन कर उनके साथ हर युद्ध में रहे| समय के साथ बाजीराव विश्व के सफलतम व महानतम सेनानायक बने| बाजीराव ने लगातार ४२ युद्ध लड़े और कभी पराजय का मुंह नहीं देखा| उनकी लू लगने से असमय मृत्यु नहीं होती तो भारत का इतिहास ही अलग होता और वे पूरे भारत के शासक होते| पेशवाओं ने वर्तमान इंदौर क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी|
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हमें गर्व है ऐसी शासिका पर| दुर्भाग्य से भारत में धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ऐसे महान व्यक्तियों के इतिहास को नहीं पढाया जाता| भारत के अच्छे दिन भी लौटेंगे| इस लेख को लिखने के पीछे यही स्पष्ट करना था की यदि ह्रदय में भक्ति और श्रद्धा हो तो व्यक्ति कैसी भी मुसीबतों का सामना कर जीवन में सफल हो सकता है| इति|
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ॐ स्वस्ति ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर बावलिया
३१ मई २०१९

भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठे, व सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो|

 भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठे, व सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो| हमें न तोअपने अहंकार को तृप्त करने के लिए कोई आधिभौतिक उपलब्धि चाहिए, न ही हमें किसी व्यक्ति को प्रभावित कर उस से वाहवाही लूटनी है चाहे वह संसार की दृष्टि में कितना भी बड़ा व्यक्ति हो|

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वर्तमान युग में मनुष्य की सोच और उसका चिंतन इतना अधिक गिर गया है कि वह सिर्फ दूसरों की या तो हँसी ही उड़ा सकता है, या विरोध और बदनाम ही कर सकता है| किसी से भलाई की उम्मीद नहीं रही है|
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हमारा लक्ष्य भारत को एक आध्यात्मिक हिन्दू राष्ट्र बनाना है जहाँ की राजनीति सनातन धर्म हो| आध्यात्मिक उपासना/साधना से दैवीय शक्तियों को जागृत कर उन्हीं की सहायता लेंगे| किसी मनुष्य से कोई अपेक्षा और आशा नहीं है| सारी प्रेरणा और शक्ति प्रत्यक्ष परमात्मा से ही लेंगे| पूर्वजन्मों के गुरु आशीर्वाद दे रहे हैं, वही पर्याप्त है|
हरिः ॐ तत्सत् !!
३१ मई २०२०

महारानी अहिल्याबाई होल्कर की २९५ वीं जयंती ---

 भारत की एक महान मातृशक्ति और भगवान शिव की मानस पुत्री प्रातःस्मरणीया परम-शिवभक्त महारानी अहिल्याबाई होलकर (३१ मई १७२५ - १३ अगस्त १७९५) को नमन जिन का आज ३१ मई को जन्म हुआ था| हमारा दुर्भाग्य है कि धर्मनिरपेक्षता और हिन्दुद्रोह के कारण इनका इतिहास नहीं पढ़ाया जाता| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है|

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व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विकटतम कष्ट और प्रतिकूलताओं के पश्चात् भी इन्होने इतने महान कार्य किये जिनकी तुलना नहीं की जा सकती| वर्तमान इंदौर नगर की स्थापना इन्होने ही की थी| इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी| इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे| इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए| अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की मृत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थी और राज्य संभाला| अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया| अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया| जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर दिया और उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन कल्याण के व्रत का पालन करती रही| उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया|
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इन्होने सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की| वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से बने| हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू लोग इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे| सेंकडों असहाय लोगों और साधू-संतों को अन्न-वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी| पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए| नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं| महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना| अमर कंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया| परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएं कीं| ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की| वहाँ प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के पार्थिव शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था| बद्रीनाथ तीर्थ के मार्ग में बहुत बड़ी भूमि खरीद कर उसे गायों के चरने के लिए छोड़ दिया| उस गाँव का नाम ही अहिल्याबाई गोचर पड़ गया|
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यहाँ दो शब्द उनके श्वसुर मल्हार राव के बारे में भी लिखना उचित रहेगा|
छत्रपति शिवाजी के पोते साहू जी ने एक चित्तपावन ब्राह्मण बालाजी बाजीराव (प्रथम) को पेशवा नियुक्त किया| बालाजी बाजीराव वेश बदल कर बिना सुरक्षा व्यवस्था के तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े| मार्ग के एक गाँव में उनको मुगलों के जासूसों ने पहचान लिया और उनकी हत्या के लिए बीस मुग़ल सैनिक पीछे लगा दिए| मल्हार राव ने कुछ भैंसे पाल रखीं थीं और उस गाँव में दूध बेच कर गुजारा करते थे| वे मुग़ल जासूस भी उन्हीं से दूध खरीदते थे| उनकी आपसी बातचीत से मल्हार राव को सब बातें स्पष्ट हो गईं| उनकी देशभक्ति जागृत हो गयी और चुपके से उनहोंने पेशवा को ढूंढकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी| यही नहीं पेशवा को एक संकरी घाटी में से सुरक्षित निकाल कर भेज दिया और उनकी तलवार खुद लेकर उन बीस मुगलों को रोकने खड़े हो गए| उस तंग घाटी से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति निकल सकता था| ज्यों ही कोई मुग़ल सैनिक बाहर निकलता, मल्हार राव की तलवार उसे यमलोक पहुंचा देती| उन्होंने पांच मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया| इसे देख बाकी पंद्रह मुग़ल सैनिक गाली देते हुए बापस लौट गए| उन्होंने मल्हार राव के घर को आग लगा दी, उसके बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी व भैंसों को हाँक कर ले गए| मल्हार राव, पेशवा बाजीराव के दाहिने हाथ बन कर उनके साथ हर युद्ध में रहे| समय के साथ बाजीराव विश्व के सफलतम सेनानायक बने| उन्होंने अनेक युद्ध लड़े और कभी पराजित नहीं हुए| वे महानतम हिन्दू सेनानायकों में से एक थे| उन्होंने कभी पराजय का मुंह नहीं देखा| उनकी लू लगने से असमय मृत्यु नहीं होती तो भारत का इतिहास ही अलग होता| पेशवाओं ने वर्त्तमान इंदौर क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी| हमें गर्व है ऐसी शासिका पर|
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय महादेव महादेव महादेव !!
३१ मई २०२०

हिंदुओं में होने वाले विवाह समारोहों के बारे में मेरे कुछ विचार हैं जिन्हें सराहते तो सब हैं पर पालन कोई नहीं करता :---

(१) दिवा लग्न हों यानि सूरज की रोशनी में विवाह हों ताकि जेनेरेटर और बिजली का फालतू खर्चा बचे, और रात्रि को लोग चैन से सो सकें| बैंड बाजा और नाच-कूद लड़के वाले अपने घर पर करें, कन्या पक्ष के यहाँ नहीं| .

(२) बारात में दस-पंद्रह से अधिक बाराती न हों| कन्या पक्ष पर वर पक्ष के अधिक से अधिक दस-पंद्रह लोगों को भोजन कराने की ज़िम्मेदारी हो|
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(3) हर विवाह की रजिस्ट्री हो| दहेज के हर सामान की और नकद दिये हुए रुपयों की वीडियो रिकॉर्डिंग हो और विवाह की रजिस्ट्री मे इसका उल्लेख हो ताकि कन्या पक्ष बाद मे निरपराध वर पक्ष पर झूठे मुकदमे न कर सके| आजकल महिला अत्याचार और दहेज के लगभग सारे मामले झूठे होते हैं| ऐसी परिस्थिति ही पैदा न हो कि झूठी मुकदमेबाजी हो| . आगे से स्थायी रूप से विवाह समारोहों में भी अधिकतम २२ व्यक्तियों की ही अनुमति का नियम बन जाये तो पूरे समाज का बहुत अधिक कल्याण हो जाएगा। ११ व्यक्ति कन्या पक्ष के और ११ व्यक्ति वर पक्ष के, बस इतना ही बहुत है, इस से अधिक किसी भी परिस्थिति में नहीं। कन्या का विवाह करते करते उसके माँ-बाप की कमर टूट जाती है, और वर पक्ष का लालच कभी कम नहीं होता।

३१ मई 2020