सारा जगत ब्रह्ममय यानि प्राण और ऊर्जा का स्पंदन है, जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है। सारी सृष्टि ही परमशिव है। भगवान विष्णु स्वयं ही यह विश्व बन गए हैं। सारी सृष्टि विभिन्न आवृतियों पर ऊर्जा का स्पंदन है, जो प्राण से चैतन्य है। वह अनंत विस्तार और उससे भी परे ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में परमशिव हैं, वे ही मेरे उपास्य हैं। "सियाराम मय सब जग जानी करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी॥" "ॐ विश्वं विष्णु:-वषट्कारो भूत-भव्य-भवत- प्रभुः।"
Saturday, 31 May 2025
सारा जगत ब्रह्ममय यानि प्राण और ऊर्जा का स्पंदन है, जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है।
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"ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥"
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२२
अहिल्याबाई होल्कर की २९७वीं जयंती
आज पुण्यश्लोका, प्रातःस्मरणीया, एक महानतम भारतीय नारी योद्धा व शासिका, भगवान शिव की मानसपुत्री, इंदौर नगर जी स्थापिका, मालवा की महारानी, अहिल्याबाई होल्कर की २९७वीं जयंती है। इनका जन्म ३१ मई १७२५ को महाराष्ट्र के चांडी (वर्तमान अहमदनगर) गांव में हुआ था। इन्होने विपरीततम परिस्थितियों में महानतम कार्य किए। इनका यश और कीर्ति सदा अमर रहेंगे।
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इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी। इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे। इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए। अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की म्रत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थीं, और राज्य संभाला। अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया।
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अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया। राजधानी इंदौर उन्हीं की बसाई हुई नगरी है। जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन-कल्याण के व्रत का पालन करती रही। उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया।
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अहिल्याबाई ने सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की। वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से पुनर्निर्मित हुए। हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे। सेंकडों असहाय लोगों और साधू-संतों को अन्न वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी। पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए। नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं। महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना। अमरकंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया। परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएं कीं। ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की। वहां प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था। बदरीनाथ के मार्ग में एक गाँव आता है जिसका नाम गोचर है। वहाँ की भूमि को खरीद कर उन्होंने गायों के चरने के लिए छोड़ दिया।
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पेशवा बाजीराव ने मालवा क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था, जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी। हमें गर्व है ऐसी महान शासिका पर। इति॥ ॐ नमः शिवाय !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२२
एक दुर्धर्ष आध्यात्मिक शक्ति -- भारत के उत्थान में कार्यरत हो चुकी है, जिसे रोकने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं है।
मेरी जागृत अंतश्चेतना और अंतःप्रभा मुझे बार-बार आश्वस्त कर रही हैं कि एक दुर्धर्ष आध्यात्मिक शक्ति -- भारत के उत्थान में कार्यरत हो चुकी है, जिसे रोकने का सामर्थ्य किसी में भी नहीं है।
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असत्य और अंधकार की शक्तियों का पराभव, धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण सुनिश्चित हैं। गुरुकृपा से मुझे पूरा मार्गदर्शन मिल रहा है, जिसका अनुसरण मुझे ही करना है।
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अनंत मंगलमय शुभ कामनाएँ !! ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
३१ मई २०२३
संयमित मन मनुष्य का मित्र है, और स्वेच्छाचारी मन उसका शत्रु। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें।
संयमित मन मनुष्य का मित्र है, और स्वेच्छाचारी मन उसका शत्रु। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें। मन को निरंतर परमात्मा में स्थिर कर के रखें।
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हमारे जीवन में हमारा सब से बड़ा संघर्ष और युद्ध हमारी अपनी स्वयं की चेतना के भीतर होता है। इसके लिए हमें अपने बच्चों को और स्वयं को भी प्रशिक्षित करना होगा। बच्चों को डरा-धमका कर न रखें। हरेक बालक में कम से कम इतना तो साहस विकसित करें की वह बिना किसी भय के अपने मन की बात अपने माँ-बाप को, अपने से बड़ों को, और अपने अध्यापकों को कह सके।
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हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारा अपना स्वयं का भय है, जिस के साथ हमारा सबसे बड़ा युद्ध होता है। कभी कभी हम अपने स्वयं के परम शत्रु बन जाते हैं, इससे बड़ा शत्रु अन्य कोई भी नहीं है। स्वयं के सबसे अच्छे मित्र बनें, और स्वयं पर सबसे अधिक विश्वास करें।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इस विषय को बहुत अच्छी तरह से समझाया है। भगवान कहते हैं --
"उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥६:५॥"
"बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥६:६॥"
"जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥६:७॥"
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हमें अपने भाग्य यानि कर्मफल पर आश्रित न होकर कर्तव्य कर्म करने चाहियें। मनुष्य को अपने द्वारा अपना स्वयं का उद्धार करना चाहिये क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है, और आत्मा (मनुष्य स्वयं) ही आत्मा का (अपना) शत्रु है। जिसने आत्मा (इंद्रियों,आदि) को आत्मा के द्वारा जीत लिया है, उस पुरुष का आत्मा उसका मित्र होता है, परन्तु अजितेन्द्रिय के लिए आत्मा शत्रु के समान स्थित होता है। शीत-उष्ण, सुख-दु:ख तथा मान-अपमान में जो प्रशान्त रहता है, ऐसे जितात्मा पुरुष के लिये परमात्मा नित्य-प्राप्त है।
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ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२४
Thursday, 29 May 2025
हम भगवान के साथ एक हैं
हम भगवान के साथ एक हैं
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भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, न तो कोई उनका प्रिय है और न अप्रिय। लेकिन जो उनको प्रेम से भजते हैं, भगवान उनमें हैं, और वे भी भगवान में हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् - मैं समस्त भूतों में सम हूँ, न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय, परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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वे सभी प्राणियों के प्रति समान हैं। उनका न तो कोई द्वेष्य है और न कोई प्रिय। वे अग्नि के समान हैं। जैसे अग्नि अपने से दूर रहने वाले प्राणियों के शीत का निवारण नहीं करता, पास आने वालों का ही करता है, वैसे ही वे भक्तों पर अनुग्रह करते हैं। भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है, और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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भगवान कहते हैं --
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
अर्थात् - जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं॥
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जो सर्वात्मभाव में है वह भगवान के साथ एक है।
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ मई २०२४
जो सर्वात्मभाव में है वह परमात्मा के साथ एक है ---
जो सर्वात्मभाव में है वह परमात्मा के साथ एक है ---
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पता नहीं क्यों, मुझे आज का दिन बहुत अधिक शुभ लगता है। आज का दिन बहुत अधिक शुभ है, क्योंकि आज प्रातः जब मैं सो कर उठा, तब एक अति अति दुर्लभ दिव्य चेतना में था जो सामान्य नहीं है। ऐसी अनुभूतियाँ बहुत दुर्लभ होती हैं, जो जीवन में कभी कभी ही होती है। इन अनुभूतियों का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि ये शब्दों से परे होती हैं। एक बात स्पष्ट है कि भगवान हमें भूलते नहीं हैं, हम ही उनको कभी कभी भूल जाते हैं। वे स्वयं ही फिर हमें याद कर लेते हैं।
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भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, न तो कोई उनका प्रिय है और न कोई अप्रिय। लेकिन जो उनको प्रेम से भजते हैं, भगवान उनमें हैं, और वे भी भगवान में हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्||९:२९॥"
अर्थात् - मैं समस्त भूतों में सम हूँ, न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय, परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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भगवान सभी प्राणियों के प्रति समान हैं| उनका न तो कोई द्वेष्य है और न कोई प्रिय है| वे अग्नि के समान है .... जैसे अग्नि अपने से दूर रहने वाले प्राणियों के शीत का निवारण नहीं करता, पास आने वालों का ही करता है, वैसे ही वे भक्तों पर अनुग्रह करते हैं|
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भगवान ने कहा है .....
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है, और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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जो सर्वात्मभाव में है वह भगवान के साथ एक है।
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ मई २०२४
मृत्यु शाश्वत सत्य नहीं, जीवन ही शाश्वत सत्य है। हे मृत्यु, तेरी विजय और तेरा दंश कहाँ है? तुम्हारा अस्तित्व मिथ्या है ---
मृत्यु नहीं, जीवन ही शाश्वत सत्य है। हे मृत्यु, तेरी विजय और तेरा दंश कहाँ है? तुम्हारा अस्तित्व मिथ्या है।
.भौतिक व मानसिक चेतना में मुझे चारों ओर से मृत्यु ने घेर रखा है। यह मैं स्पष्ट देख रहा कि मृत्यु मेरे सिर पर मंडरा रही है, लेकिन मैं निर्भय हूँ, क्योंकि गुरुकृपा से मृत्यु से पार जाने का मार्ग भी दृष्टि गोचर हो रहा है, जिसके अंत में स्वयं भगवान श्रीहरिः बिराजमान हैं। उस मार्ग का पथिक होने के सिवाय अन्य कोई दूसरा विकल्प नहीं है। एक दिन ये भौतिक, सूक्ष्म, और कारण शरीर, व अपनी तन्मात्राओं सहित ये सारी इंद्रियाँ, और अंतःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) नष्ट हो जाएँगे, लेकिन एक शाश्वत दिव्य चेतना सदा बनी रहेगी, जो में स्वयं हूँ। मृत्यु मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
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भौतिक-शरीर तो एक आधार है। वास्तविक चेतना सूक्ष्म-शरीर में होती है। यह भौतिक संसार -- तमोगुण व रजोगुण से चल रहा है। सतोगुण तो उनमें एक संतुलन बनाये रखता है। इस संसार में जिनके हृदय में स्वयं नारायण यानि भगवान विष्णु का निवास है, वे ही श्रीमान हैं, क्योंकि नारायण ने अपने हृदय में श्री को रखा हुआ है।
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जिनके हृदय में नारायण का निवास है, श्री का अनुग्रह/कृपा उन्हीं पर होती है। अपने हृदय मंदिर में नारायण को सदा बिराजित रखें। इसी मंगलमय शुभ कामना के साथ आप सब के हृदय में नारायण को नमन !!
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२९ मई २०२३
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