Monday, 21 April 2025

मेरी उलटी खोपड़ी में भगवान ने एक दीपक जला रखा है ---

 

मेरी उलटी खोपड़ी में भगवान ने एक दीपक जला रखा है ---
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मुझे अब कहीं कोई दीपक जलाने की आवश्यकता नहीं रही है। भगवान ने ही मेरी उल्टी खोपड़ी में एक दीपक जला रखा है, जो बिना किसी ईंधन और बत्ती के निरंतर जलता रहता है। वह जलता ही नहीं है, बल्कि उसमें से भगवान की वाणी भी प्रणव रूप में निरंतर निःसृत होती रहती है। उस दीपक के प्रकाश में मैं पूरी समष्टि के साथ एक हूँ। मेरे से अन्य कोई नहीं है। मेरी खोपड़ी एक उल्टे कुएं की तरह गगन में लटकी हुई है। जिस भी साधक को वह चिराग दिखाई देता है, वह धन्य है।
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उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग।
तिसमें जरै चिराग, बिना रोगन बिन बाती |
छह ऋतु बारह मास, रहत जरतें दिन राती ||
सतगुरु मिला जो होय, ताहि की नजर में आवै |
बिन सतगुरु कोउ होर, नहीं वाको दर्शावै ||
निकसै एक आवाज, चिराग की जोतिन्हि माँही |
जाय समाधी सुनै, और कोउ सुनता नांही ||
पलटू जो कोई सुनै, ताके पूरे भाग |
उलटा कुआँ गगन में, तिसमें जरै चिराग ||
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पानी का कुआँ तो सीधा होता है पर यह उलटा कुआँ हमारी खोपड़ी है जिसका मुँह नीचे की ओर खुलता है। उस कुएँ में हमारी आत्मा यानि हमारी चैतन्यता का नित्य निवास है| उसमें दिखाई देने वाली अखंड ज्योति -- ज्योतिर्मय ब्रह्म है, उसमें से निकलने वाली ध्वनि -- अनाहत नादब्रह्म है| यही राम नाम की ध्वनी है|
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'कूटस्थ' में इनके साथ एकाकार होकर और फिर इनसे भी परे जाकर जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त होती है| इसका रहस्य समझाने के लिए परमात्मा श्रोत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सदगुरुओं के रूप में अवतरित होते हैं| यह चैतन्य का दीपक ही हमें जीवित रखता है, इसके बुझ जाने पर देह मृत हो जाती है| बाहर हम जो दीपक जलाते हैं वे इसी कूटस्थ ज्योति के प्रतीक मात्र हैं| बाहर के घंटा, घड़ियाल, टाली और शंख आदि की ध्वनी उसी कूटस्थ अनाहत नाद की ही प्रतीक हैं| ह्रदय में गहन भक्ति और अभीप्सा ही हमें राम से मिलाती हैं| ब्रह्म के दो स्वरुप हैं| पहला है "शब्द ब्रह्म" और दूसरा है "ज्योतिर्मय ब्रह्म"| दोनों एक दूसरे के पूरक हैं| आज्ञा चक्र में नियमित रूप से ध्यान लगाने से ही ज्योतिर्मय और शब्द ब्रह्म की अनुभूति होती है|
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प्रिय निजात्मगण, आप सब की भावनाओं को नमन और मेरे लेख पढने के लिए आप सब का अत्यंत आभार| आप सब सदा सुखी एवं सम्पन्न रहें| आप की कीर्ति और यश सदा अमर रहे| आप सब इसी जन्म में परमात्मा को उपलब्ध हों।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ अप्रेल २०२३

भगवान हैं, यही भगवान के होने का प्रमाण है ---

 भगवान हैं, यही भगवान के होने का प्रमाण है ---

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भगवान "हैं"। यह "हैं" शब्द ही प्रमाण है भगवान के होने का। वे इसी समय, हर समय, यहीं पर, और सर्वत्र हैं। मेरी श्रद्धा और विश्वास कभी भी भगवान को मुझसे दूर नहीं होने देंगे। जिनमें श्रद्धा और विश्वास नहीं है, उन्हें भगवान की अनुभूति कभी भी नहीं हो सकती।
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रामचरितमानस के मंगलाचरण में कहा गया है --
"भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्॥२॥"
अर्थात् - श्रद्धा-विश्वास के रूप में भवानी-शंकर की वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धों को भी ईश्वर के दर्शन नहीं होते।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
"अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४:४०॥"
"योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४:४१॥"
अर्थात् - "श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है॥"
"अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख॥"
"जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं॥"
He who is full of faith attains wisdom, and he too who can control his senses, having attained that wisdom, he shall ere long attain Supreme Peace.
But the ignorant man, who has no faith, and the skeptic are lost. Neither in this world nor elsewhere is there any happiness in store for him who always doubts.
But the man who has renounced his action for meditation, who has cleft his doubt in twain by the sword of wisdom, who remains always enthroned in his Self, is not bound by his acts.
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वास्तव में जो कुछ भी हम प्राप्त करना चाहते हैं या होना चाहते हैं, उसे हमारी श्रद्धा और विश्वास ही प्रदान करते हैं। परमात्मा की कृपा भी हमारे ऊपर तभी होती है जब हमारे में श्रद्धा और विश्वास होते हैं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ अप्रेल २०२३

गुरु वंदना जो नित्य हमें करनी चाहिए ---

 गुरु वंदना जो नित्य हमें करनी चाहिए ---

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"ॐ गं गणपतये नमः॥ श्रीगुरवे नमः॥ श्रीपरमगुरवे नमः॥ श्रीपरात्परगुरवे नमः॥
श्रीपरमेष्ठिगुरवे नमः॥ श्रीपरमात्मने नमः॥"
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥"
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"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुरवे नमः॥"
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इस से आगे अपनी अपनी गुरु-परंपरा के अनुसार करे। पूजा श्रीगुरु की "चरण पादुका" की होती है, गुरु के देह की नहीं।
उपरोक्त लिखी गुरु-वंदना तो न्यूनतम और अनिवार्य है, जिसका विस्तार भी किया जा सकता है।
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ॐ तत्सत् ॥
२२ अप्रेल २०२४

हमारी भक्ति -- श्रद्धा और विश्वास के साथ-साथ अनन्य और अव्यभिचारिणी हो ---

हमारी भक्ति -- श्रद्धा और विश्वास के साथ-साथ अनन्य और अव्यभिचारिणी हो
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भगवान से भगवान के अतिरिक्त अन्य कुछ भी मांगना व्यभिचार है। कुछ पाने के उद्देश्य से की गई भक्ति व्यभिचारिणी है। हमारी भक्ति में व्यभिचार न होकर बिना शर्त पूर्ण समर्पण हो। ॐ ॐ ॐ !!
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वास्तव में जो कुछ भी हम प्राप्त करना चाहते हैं या होना चाहते हैं, उसे हमारी श्रद्धा और विश्वास ही प्रदान करते हैं। परमात्मा की कृपा भी हमारे ऊपर तभी होती है जब हमारे में श्रद्धा और विश्वास होते हैं। जिनमें श्रद्धा और विश्वास नहीं है, उन्हें भगवान की अनुभूति कभी भी नहीं हो सकती।
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रामचरितमानस के मंगलाचरण में कहा गया है --
"भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्॥"
अर्थात् - श्रद्धा-विश्वास के रूप में भवानी-शंकर की वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धों को भी ईश्वर के दर्शन नहीं होते।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥४:३९॥"
"अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४:४०॥"
"योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४:४१॥"

अर्थात् - "श्रद्धावान्, तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है॥"
"अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है, (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है, न परलोक और न सुख॥"
"जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है, ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं, ऐसे आत्मवान् पुरुष को, हे धनंजय ! कर्म नहीं बांधते हैं॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ अप्रेल २०२४ .
पुनश्च: --- आजकल मेरी रुचि एक ही विषय में सीमित हो गयी है, वह है "परमात्मा से परमप्रेम।" अन्य सब और से रुचि हट रही है। अतः किसी की भी अपेक्षाओं पर मैं खरा नहीं उतर सकता। परमात्मा की निजी अवधारणा भी मेरी स्पष्ट है जो किसी के साथ साझा नहीं कर सकता। अब तक जो सीखा है वह पर्याप्त है। मेरा मार्ग ज्योतिर्मय और स्पष्ट है, कोई संशय नहीं है। गुरु और परमात्मा भी मेरे साथ एक हैं। आप सब के साथ मैं एक हूँ। कृपया मुझ से कोई अपेक्षा न रखे। मेरा समर्पण परमात्मा के प्रति ही है। आप सब को नमन !!

उलटी खोपड़ी में जल रहे दीपक का निरंतर सदा ध्यान करो ---

 उलटी खोपड़ी में जल रहे दीपक का निरंतर सदा ध्यान करो ---

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हम सब की उलटी खोपड़ी में भगवान ने एक दीपक जला रखा है। उस दीपक के प्रकाश का ही ध्यान करो जो बिना किसी ईंधन और बत्ती के निरंतर जलता रहता है। वह जलता ही नहीं है, बल्कि उसमें से भगवान की वाणी भी निरंतर निःसृत होती रहती है। जिस किसी भी मुमुक्षु को वह दीपक दिखाई देता है, वह धन्य है।
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पानी का कुआँ तो सीधा होता है पर यह उलटा कुआँ हमारी खोपड़ी है जिसका मुँह नीचे की ओर खुलता है। उस कुएँ में हमारी आत्मा यानि हमारी चैतन्यता का नित्य निवास है। उसमें दिखाई देने वाली अखंड ज्योति -- ज्योतिर्मय ब्रह्म है, उसमें से निकलने वाली ध्वनि -- अनाहत नादब्रह्म है। यही राम नाम की ध्वनी है। उस दीपक के प्रकाश और ध्वनि की चेतना में निरंतर रहें। आगे के सारे द्वार खुल जायेंगे, सारा अंधकार दूर हो जायेगा।
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आप सब की कीर्ति और यश सदा अमर रहे। आप सब सदा सुखी एवं सम्पन्न रहें। आप सब इसी जन्म में परमात्मा को उपलब्ध हों।
ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२२ अप्रेल २०२४

Sunday, 20 April 2025

इस अक्षय-तृतीया से मेरी उपासना तेलधारा की तरह अक्षय अखंड हो ---

 इस अक्षय-तृतीया से मेरी उपासना तेलधारा की तरह अक्षय अखंड हो ---

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मैं एक एकांकी पुष्प हूँ, जो इस मरुभूमि में परमात्मा की महिमा को व्यक्त कर रहा हूँ। मेरे आसपास सूक्ष्म जगत के अनेक असुर भी हैं, और देवता भी। आपको उनकी अनुभूति नहीं होती, लेकिन मुझे होती है। उनमें से कोई भी मेरा शुभ-चिंतक नहीं है। मेरी रक्षा भगवान ही कर रहे हैं। दुर्बलता के कुछ क्षणों में अवसर मिलते ही आसुरी शक्तियाँ मुझ पर हावी होकर मेरा बहुत अधिक अहित कर जाती हैं, और कर भी रही हैं। यह बात मैं ही जानता हूँ, किसी को कह भी नहीं सकता, क्योंकि कोई समझेगा भी नहीं।
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मुझे उन देवों व असुरों से कोई सरोकार नहीं है। ये देवता भी आध्यात्मिक मार्ग में बाधक हैं। एकमात्र सहायक हैं तो सिर्फ गुरु रूप में परमात्मा हैं। वे ही धक्का मारकर या बलात् उठाकर मुझे परमात्मा के अनंत अथाह अमृत-कुंड में डुबो देंगे। यदि उपकरण ही बनना है तो भगवान का बनूँगा, न कि देवताओं या असुरों का। भगवान अपने भक्तों की रक्षा देवताओं से भी करते हैं।
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मेरी दृष्टि सदा सीधी सामने परमात्मा की ओर ही रहे। इधर उधर कहीं भी झाँक कर न देखे। मेरे चैतन्य में परमात्मा का ध्यान निरंतर तेलधारा की तरह अक्षय-अखंड बना रहे। उस धारा की निरंतरता बनी रहे, वही मेरी रक्षा कर रही है। उस धारा के टूटते ही ये असुर मुझ पर टूट पड़ेंगे। मुझे उनका शिकार नहीं बनना है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ अप्रेल २०२३

Saturday, 19 April 2025

उम्मीद अभी बाकी है, मेरे जैसे अधम की भी सदगति हो सकती है ---

 उम्मीद अभी बाकी है, मेरे जैसे अधम की भी सदगति हो सकती है। अब निराश होने या चिंता की कोई बात नहीं है ---

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भगवान कहते हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
"अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥९:३०॥"
"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥"
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अर्थात् - "मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥"
"यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है॥"
"हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता॥"
२० अप्रेल २०२३