Saturday, 15 August 2026

आत्मज्ञान ही स्वतन्त्रता और परमधर्म है ...

हमारा "स्व" परमात्मा, और "तंत्र" उसकी व्यवस्था है| आत्म-साक्षात्कार यानि आत्मज्ञान ही स्वतन्त्रता है, और परमात्मा से पृथकता ही परतंत्रता है| परमात्मा से पृथकता का कारण है ... राग-द्वेष, अहंकार, लोभ, भय और क्रोध; अन्यथा परमात्मा तो नित्यप्राप्त है| आत्मज्ञान का बोध स्थितप्रज्ञता में होता है| भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं ...

"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः| वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते||२:५६||"
अर्थात् दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता, सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है, जिसके मन से राग, भय, और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है||
आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं ...
दुःख तीन प्रकार के होते हैं ... "आध्यात्मिक", "आधिभौतिक" और "आधिदैविक"| इन दुःखों से जिनका मन उद्विग्न यानि क्षुभित नहीं होता उसे "अनुद्विग्नमना" कहते हैं| सुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा यानि तृष्णा नष्ट हो गयी है (ईंधन डालने से जैसे अग्नि बढ़ती है वैसे ही सुख के साथ साथ जिसकी लालसा नहीं बढ़ती) वह "विगतस्पृह" कहलाता है| राग, द्वेष और अहंकार से मुक्ति वीतरागता है| जो वीतराग है और जिसके भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, वह "वीतरागभयक्रोध" कहलाता है| ऐसे गुणोंसे युक्त जब कोई हो जाता है तब वह "स्थितधी" यानी "स्थितप्रज्ञ" और मुनि या संन्यासी कहलाता है|
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सब प्रकार के मायावी बंधनों और पाशों से मुक्त होकर ही हम स्वतंत्र हो सकते हैं| स्वतन्त्रता भीतर है, बाहर नहीं| हमारे बिना भी यह संसार चलता रहेगा| हमारे जीवन का उद्देश्य परमात्मा को उपलब्ध होना है, न कि उसकी रचना को| हमारे प्रभु किस बात से प्रसन्न होते हैं, वही महत्वपूर्ण है, न कि अन्य कुछ| आत्मा की पूर्णता के द्वारा ही बाह्य परिवेश को पूर्ण बनाया जा सकता है| परमात्मा उपयोगितावाद की कोई उपयोगी वस्तु नहीं है| हम अपना परम प्रेम परमात्मा को देंगे तो हमारी रक्षा भी होगी, और मार्गदर्शन भी प्राप्त होगा|
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हमारी कैसी स्थिति है? ... एक अस्पताल में भर्ती रोगी "स्वास्थ्य दिवस" मनाते थे| स्वस्थ होने का झंडा फहरा कर सब एक दुसरे को स्वस्थ होने का अभिनंदन और बधाई देते थे| डॉक्टर उनका उपचार नहीं कर सकते थे क्योंकि डॉक्टर स्वयं बीमार थे और स्वस्थ होने व स्वस्थ करने का नाटक करते थे| मरीजों को बिना दवा दिए ही बोलते थे कि तुम तो अब स्वस्थ हो, देखो अपना स्वस्थ होने का झंडा फहर रहा है| यही स्थिति हमारी है|
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ अगस्त २०२०

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