गुरु रूप ब्रह्म को नमन, जो स्वयं मेरे इस सहस्त्रारचक्र में अपने ज्योतिर्मय रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने अपने चरण कमलों में मुझ निराश्रय को आश्रय दे दिया है। मेरा सम्पूर्ण समर्पण उनके चरण कमलों में है। सारी महिमा उन्हीं की है। एकमात्र कर्ता वे ही हैं। वे इस सृष्टि की अनंतता में, और उससे परे भी हैं। उनसे पृथक मेरा कोई अस्तित्व नहीं है।
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मेरे हृदय में जो प्रचंड अग्नि जल रही है, वह तो निरंतर प्रज्ज्वलित ही रहेगी। यह देह रहे या न रहे, अब इसका कोई महत्व नहीं रहा है। परमात्मा का स्मरण करते करते यदि मरना भी पड़े तो वह इस नारकीय सांसारिक जीवन जीने से तो अच्छा ही होगा।
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ॐ तत्सत्॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
८ जुलाई २०२३
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