Wednesday, 8 July 2026

सिर्फ शास्त्रों के स्वाध्याय, और संत-महात्माओं के प्रवचन आदि सुनने मात्र से ही भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती ---

 सिर्फ शास्त्रों के स्वाध्याय, और संत-महात्माओं के प्रवचन आदि सुनने मात्र से ही भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती ---

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जो कुछ भी हम स्वाध्याय करते हैं, उसका चिंतन, मनन और निदिध्यासन भी अति आवश्यक है। इससे भी आगे भगवान की उपासना यानि ध्यान-साधना बहुत अधिक आवश्यक है। ध्यान साधना के लिए भी एक स्वस्थ शरीर, और हठयोग की कुछ क्रियाओं जैसे -- आसन, प्राणायाम, महामुद्रा, त्रिबंध, खेचरी या नभोमुद्रा, कुंडलिनी-जागरण, चक्रभेद, नादश्रवण, योनिमुद्रा, आदि का अभ्यास, ब्रह्मचर्य, और सबसे अधिक महत्वपूर्ण -- किसी ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य सदगुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है। ये हरिःकृपा से ही प्राप्त होते हैं।
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जिनका सतोगुण प्रधान है, वे ही ज्ञान और भक्ति की बातें समझ सकते हैं। जिनका रजोगुण प्रधान है वे सिर्फ कर्मयोग को ही समझ सकते हैं। जिनका तमोगुण प्रधान है, वे बाहरी सकाम पूजा-पाठ आदि से अधिक कुछ भी नहीं समझ सकते। गीता में भगवान श्रीकृष्ण तो हमें त्रिगुणातीत होने का आदेश देते हैं --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत, निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित, और आत्मवान् बनो॥
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आज के युग में जटिलताएँ इतनी प्रबल हैं कि हमें निज विवेक के प्रकाश में यह विचार करना पड़ता है कि जिन परिस्थितियों में हम हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ हम क्या कर सकते हैं। आज की परिस्थितियों में मेरे विचार से --
(१) भगवान का गहनतम स्मरण हम हर समय निरंतर करें।
(२) मेरा व्यक्तिगत मत है कि द्विकाल संध्या, शिवपूजा और गीतापाठ हर घर में नित्य होना चाहिए।
(३) अपनी अपनी गुरु-परंपरानुसार पूरी सत्यनिष्ठा से साधना करें।
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जो हो सकता है वह भी, और जो नहीं हो सकता वह भी, भगवान को समर्पित कर दें। इस युग में इतना ही बहुत है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण है -- भगवान को अपना सर्वस्व समर्पण।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
८ जुलाई २०२३

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