बारह दिन बाद आने वाली गुरु-पूर्णिमा की अभी से तैयारी नित्य-नियमित साधना द्वारा करें
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मैं सोशियल मीडिया से कम से कम एक माह का विश्राम ले रहा हूँ। स्वास्थ्य संबंधी कुछ व्यक्तिगत समस्याएँ हैं, जिन को साझा नहीं कर सकता।
२१ जुलाई २०२४ को आने वाली गुरु-पूर्णिमा से पहिले, और बाद के कुछ दिनों तक मैं उपलब्ध नहीं रहूँगा। इसलिए बारह दिनों पहिले ही गुरु-पूर्णिमा की मंगलमय शुभ कामनायें प्रेषित कर रहा हूँ।
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भगवान वेदव्यास के जन्मदिवस पर जिसे हम "गुरु पूर्णिमा" के रूप में मनाते हैं, गुरु महाराज को और गुरु-परंपरा को नमन !!
मेरे लिए भगवान ही गुरु हैं, और भगवान ही यह चेला है। दोनों में कोई भेद नहीं है। भगवान के साथ हम दोनों एक हैं। मैं फिर कहता हूँ कि गुरु महाराज, मैं और भगवान -- हम तीनों एक हैं। हमारे बीच मे कोई भेद नहीं है। यह गुरुकृपा का फल है। भगवान स्वयं मेरे योग-क्षेम का वहन कर रहे हैं, अतः कहीं किसी से मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करता। मैं पूरी तरह स्वतंत्र और ईश्वर पर निर्भर हूँ।
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भगवान के अनंत ज्योतिर्मय रूप का ही ध्यान किया जाता है। गुरु महाराज की प्रतीकात्मक चरण-पादुका (खड़ाऊँ) की ही पूजा की जाती है, उनके देह की या देह के चित्र की भी नहीं। जिस का मुझे पता है वह ही दूसरों को बता सकता हूँ। इससे अधिक का मुझे ज्ञान नहीं है। कोई संशय है तो अपने पारिवारिक स्थानीय पण्डितजी से पूजा करवाएँ। मेरे ऊपर कोई दोषारोपण न करें, और मुझे कोई सुझाव भी न दें। जैसे काली कंबल पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता, वैसे ही मुझ पर भी अब किसी के उपदेश काम नहीं करते।
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पूजा और ध्यान से पूर्व, कुछ ऊर्जादायी व्यायाम, महामुद्रा, प्राणायाम और प्रार्थना कर लें। ऊनी कंबल या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर के बैठें। मेरुदण्ड उन्नत, और ठुड्डी भूमि के समानांतर रहे। ठुड्डी का भूमि के समानान्तर रहना अति अति आवश्यक है, अन्यथा ध्यान नहीं लगेगा। जब भी थकान लगे तब दो-तीन बार महामुद्रा का अभ्यास कर, शरीर को तनाव-ग्रस्त कर के फिर शिथिल कर लें। थकान मिट जायेगी। स्वयं की और आसपास के वातावरण की पवित्रता का ध्यान रखें। खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा में पद्मासन, या सिद्धासन लगाकर ही ध्यान करें। इसका अभ्यास करना पड़ता है। ध्यान से पूर्व छोटी सी पूजा कर लें।
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ॐ गं गणपतये नमः॥ श्रीगुरवे नमः॥ श्रीपरमगुरवे नमः॥ श्रीपरात्परगुरवे नमः॥
श्रीपरमेष्ठिगुरवे नमः॥ श्रीपरमात्मने नमः॥"
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"ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम्
भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥"
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"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुरवे नमः॥"
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गुरु महाराज की प्रतीकात्मक "चरण पादुका" (खड़ाऊँ) की विधि-विधान से पूजा करें, और खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा में पद्मासन या सिद्धासन लगाकर यथासंभव अधिकाधिक समय तक भगवान श्रीकृष्ण के अनंत सर्वव्यापी ज्योतिर्मय रूप का ध्यान हंसःयोग (अजपा-जप) और नादानुसंधान के साथ करें। तीनों बंध (मूलबंध, उड्डीयानबंध और जलंधरबंध) लगाकर बाह्य-कुंभक में मणिपुर चक्र पर, और शरीर को शिथिल कर भीतरी कुंभक में नाभि पर मानसिक रूप से ओंकार का जप -- एक बहुत प्रभावशाली प्राणायाम है, जो साधक की चेतना को उन्नत बना देता है। योनीमुद्रा आदि का अभ्यास, और विश्व-कल्याण की प्रार्थना करें। श्रीमद्भगवद्गीता के निम्न मंत्रों से समापन करें --
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च
नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
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समापन के बाद में जब तक संतुष्टि न मिले, तब तक भगवान का खूब ध्यान करें। उन्हें अपनी स्मृति में हर समय रखें। जब भी समय मिले भगवान का स्मरण, चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान करें। गीता में भगवान कहते हैं --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
अर्थात् -- इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे॥
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् -- हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
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मेरी अपनी आस्था है कि हर घर में नित्य शिवपूजा और गीतापाठ अवश्य होना चाहिए। गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का अर्थ समझते हुए नित्य पाठ करना चाहिए। भगवान शिव देवाधिदेव हैं, उनकी पूजा से सभी देवताओं की पूजा हो जाती है।
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जो नित्य वेदपाठ करना चाहते हैं, उनके लिए महात्माओं के मुख से सुना है कि --
"पुरुष-सूक्त" का नित्य पाठ वेदपाठ ही है। यदि समय मिले तो पुरुष-सूक्त के साथ साथ -- श्री-सूक्त, रुद्र-सूक्त, सूर्य-सूक्त का पाठ और स्वस्तिवाचन भी करें।
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जिनका उपनयन यानि यज्ञोपवीत संस्कार हो चुका है, उन्हें नित्य कम से कम दस (१० की संख्या में) बार गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए। अधिकतम की कोई सीमा नहीं है। गायत्री जप का अधिकार उन्हें ही है जिनका उपनयन संस्कार (जनेऊ) हो चुका है, अन्यों को नहीं। जो गायत्री जप करते हैं, वे सावित्री का जप भी कर सकते हैं, जो बहुत अधिक प्रभावशाली है। गायत्री का जप तीन व्याहृतियों के साथ होता है, और सावित्री का जप सात व्याहृतियों के साथ होता है। इसके साथ क्रिया भी की जा सकती है जो अत्यंत गोपनीय विषय है। यह सामने वाले की पात्रता देखकर ही बताई जा सकती है।
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सभी श्रद्धालुओं को मेरा प्रणाम !! नित्य संध्या करें, और गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताई हुई ब्राह्मी-स्थिति में रहने का अभ्यास करें। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
०८ जुलाई २०२४
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