Monday, 21 June 2021

समय का सबसे बढ़िया उपयोग क्या हो सकता है? ---

 समय का सबसे बढ़िया उपयोग क्या हो सकता है? ---

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कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है| मन में हर समय निरर्थक विचार आते रहते हैं, यह अवसाद-ग्रस्तता का मुख्य कारण है| इस मामले में मैंने देखा है कि जो लोग आस्तिक और भक्त हैं उन्हें यह टाइम-पास वाली समस्या नहीं है, वे स्वयं को अपने मानसिक जप से इतना अधिक व्यस्त रखते हैं कि उनके मन में कोई फालतू विचार ही नहीं आता| मुझे जीवन में कुछ ऐसे भक्त भी मिले हैं जो अपने इष्ट देवी/देवता के बीज-मंत्र की जब तक एक-सौ मालायें नहीं फेर लेते तब तक स्वयं को कोई भोजन नहीं देते| कुछ संप्रदायों में उनके बहुत लंबे गुरु-मंत्र की सौलह मालायें एक दिन में फेरना अनिवार्य हैं| अतः वे दिन-रात इसी में लगे ही रहते हैं|
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जो सत्यनिष्ठ भक्त होते हैं वे तो अपने मन को कभी खाली रहने नहीं देते, हर समय अपने इष्ट देवी/देवता के मंत्र का मानसिक जप करते ही रहते हैं| सोते-जागते हर समय मानसिक रूप से उनके अपने गुरुमंत्र का जाप चलता ही रहता है| ऐसे लोग कभी अवसाद-ग्रस्त नहीं होते और आत्म-हत्या जैसा घटिया विचार तो उनके दिमाग में आता ही नहीं है| भगवान का भक्त कभी आत्म-हत्या नहीं करता| कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी आस्था से सारे दुःख-कष्ट-पीड़ाएँ सहन कर लेता है|
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||"
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भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को यज्ञों में जप-यज्ञ बताया है| अतः हर समय निरंतर सांसारिक काम के साथ-साथ यह जप-यज्ञ चलता रहे| इस से मन को बड़ा आनंद मिलेगा| कहा जाता है कि जप यज्ञ अत्यन्त कठिन एवं गुरूमुखगम्य है| पर श्रद्धा और विश्वास हो तो हम निष्काम भाव से मंत्र जप कर सकते हैं| भगवान श्रीकृष्ण से बड़ा कोई अन्य गुरु नहीं है| अतः सिर्फ उन की ही सुनेंगे|
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्| यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः||१०:२५||"
अर्थात् -- महर्षियोंमें भृगु और वाणियों-(शब्दों-) में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ| सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ|
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सभी को शुभ कामनायें और नमन !! हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२०

Friday, 18 June 2021

जब भी भगवान का स्मरण होता है ---

जब भी भगवान का स्मरण होता है, तब स्वतः ही मन इतना अधिक शांत, प्रेममय व आनंदमय हो जाता है कि उस स्थिति से बाहर आने का मन ही नहीं करता| लेकिन भगवान की माया अति प्रबल है जो विक्षेप उत्पन्न कर ही देती है|

एक न एक दिन तो करुणावश भगवान भी अपना अनुग्रह कर के अपनी माया के आवरण व विक्षेप से मुक्त कर ही देंगे| आज नहीं तो कल यह होना ही है, अतः कोई चिंता नहीं है| भगवान का काम ही है अनुग्रह करना| वे नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? अन्य कोई विकल्प भी नहीं है| सारे तो वे ही हैं, और सब कुछ भी वे ही हैं|
भक्ति और श्रद्धा-विश्वास से सत्यनिष्ठापूर्वक भगवान के ध्यान से शरणागति व समर्पण का भाव उत्पन्न होता है, और चित्त समभाव में अधिष्ठित होने लगता है| उस समय इतनी अधिक शांति मिलती है कि किसी भी तरह की शब्द रचना बड़ी दुरूह हो जाती है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ जून २०२०

Monday, 14 June 2021

फेसबुक के अनुभव ---

 फेसबुक के अनुभव .....

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फेसबुक पर आज से दो-चार वर्ष पहिले बहुत अच्छे-अच्छे गंभीर लेखक और पाठक हुआ करते थे| अब तो नगण्य हैं| मैं जुलाई २०११ में फेसबुक पर आया तब हिन्दी में लिखने का बिल्कुल भी अभ्यास नहीं था| फेसबुक पर ही कुछ साधु-संतों ने मुझे हिन्दी में लेख लिखने की प्रेरणा दी और खूब प्रोत्साहन दिया| उस समय मुझे हिन्दी के अधिक शब्दों का ज्ञान नहीं था| मैंने अपने हिन्दी के शब्दकोष को बढ़ाया और हिन्दी में लिखना आरंभ किया तो इतना मजा आया कि फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा| बहुत गंभीर आध्यात्मिक विषयों पर भी सहज रूप से लिखने लगा| शुरू-शुरू में कुछ भूलें हुईं पर किसी ने बुरा नहीं माना और खूब प्रोत्साहन दिया|
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सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि फेसबुक पर ही देश के अनेक विद्वानों, संतों और भक्तों से परिचय हुआ, जो अन्यथा नहीं हो सकता था| कुछ समूहों में धर्म और ज्ञान-विज्ञान पर खूब चर्चाएँ हुआ करती थीं, जिनसे बहुत कुछ सीखा| मैं सभी के नाम तो नहीं लिख सकता, पर दो-तीन नाम अवश्य लिखूँगा जिनसे परिचय फेसबुक पर ही हुआ था|
सबसे पहिला परिचय आचार्य सियारामदास नैयायिक से हुआ| उन्होने मुझे हिन्दी में लिखने की प्रेरणा दी और उनके व कुछ अन्य संतों के आशीर्वाद से मुझे लिखने में कभी कोई कठिनाई नहीं हुई| वे रामानंदी वैष्णव संप्रदाय के बहुत बड़े आचार्य हैं|
दंडी स्वामी मृगेंद्र सरस्वती (सर्वज्ञ शंकरेंद्र) के आशीर्वाद से मुझे वेदान्त का व्यवहारिक ज्ञान हुआ| वेदान्त पर साहित्य तो खूब पढ़ा था पर कभी कोई प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं हुई थी| कई अनुत्तरित प्रश्न थे| उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और उनकी उपस्थिति मात्र से ही मुझे कई दिव्य अनुभूतियाँ हुईं जिनसे वेदान्त का व्यवहारिक ज्ञान हुआ और सारे संशय दूर हुए| वे एक सिद्ध पुरुष हैं|
भुवनेश्वर के श्री अरुण उपाध्याय जैसे अलौकिक विलक्षण परम विद्वान से परिचय तो फेसबुक पर ही हुआ था और दो बार उनसे मिलने का सौभाग्य भी मिला| वे चलते-फिरते ज्ञान के भंडार हैं| उनके जैसा कोई अन्य विद्वान मुझे आज तक नहीं मिला| वे पूर्व जन्म के कोई सिद्ध पुरुष हैं जिनका ज्ञान कई जन्मों का है|
भक्तों में इंदौर के स्वर्गीय श्री हेमंत मिश्र उच्च कोटि के शिवभक्त थे| वे समय समय पर बड़े-बड़े विशाल यज्ञ करवाया करते थे जिन में करोड़ों रुपयों का खर्च हुआ करता था| दो बार उनके साथ हवन करने का अवसर मुझे भी मिला है|
इंदौर के ही डॉ. सुमित शुक्ल और उनकी धर्मपत्नी डॉ.(श्रीमती) सुधि शुक्ल दोनों ही विलक्षण व्यक्तित्व के धनी और परम भक्त हैं| उनसे मेरा बहुत अच्छा प्रेम है|
और भी अनेक दिव्य विभूतियाँ हैं जिनसे परिचय फेसबुक पर ही हुया था| कुछ से मिलना भी हुआ और कुछ से नहीं| वे सब मेरे हृदय में हैं और उन्हें मेरे हृदय का पूर्ण प्रेम समर्पित है|
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क्रिया और वेदान्त की साधना से मुझे अनेक लाभ हुए हैं| अपनी कमियों का पता चला है जिनमें से कुछ तो दूर हुई हैं, और बाकी बची हुई भी दूर हो जाएंगी| सबसे बड़ी उपलब्धि तो यह हुई है कि कोई भी मुझसे दूर नहीं है| मैं अब किसी के अभाव को अनुभूत नहीं करता| परमात्मा में सभी मेरे साथ एक हैं| सारा ब्रह्मांड मेरा घर है और सारी सृष्टि मेरा परिवार| मैं सभी के साथ एक हूँ| कोई भी मुझसे पृथक नहीं है| क्रियायोग की साधना से प्राण-तत्व व आकाश-तत्व का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है, और कूटस्थ-चैतन्य में स्थिति होती है| परमशिव का बोध भी बुद्धि से नहीं, ध्यान की अनुभूतियों से ही होता है|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन| ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१५ जून २०२०
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पुनश्च :--- प्रयागराज के स्वर्गीय पं. मिथिलेश द्विवेदी जी को भी मैं कभी नहीं भूल सकता| वे बड़ी प्रेरणात्मक बातें कहते थे और कभी निराश नहीं होने दिया| एक ही अफसोस रहा कि कभी उनसे मिलने का संयोग नहीं हुआ| उन्होंने अपनी हिन्दी भाषा में लिखी एक पुस्तक मुझे भेंट में दी थीं जो उच्च कोटि की साहित्यिक कृति है| वे एक भक्त और साहित्यकार थे| उर्दू भाषा पर भी उनका बहुत अच्छा अधिकार था| देवनागरी लिपि में लिखा उर्दू का एक लेख भी उन्होनें मुझे नेट पर ही भेजा था जिस से पता चला कि वे उर्दू के भी विद्वान थे| वे चाहे भौतिक देह में न हों पर मेरे हृदय में हैं|
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ओड़ीशा के ही भक्त श्री सोमदत्त शर्मा है जिनसे कई बार चलभाष पर ही सत्संग होता है|

शरणागति और समर्पण का मार्ग ही श्रेष्ठतम है ---

 शरणागति और समर्पण का मार्ग ही श्रेष्ठतम है .....

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वर्तमान काल में आध्यात्मिक योग-साधना के लिए भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताया हुआ शरणागति व समर्पण का मार्ग ही सर्वसुलभ और सर्वश्रेष्ठ है| इसमें कर्म, भक्ति और ज्ञान .... तीनों ही आ जाते है| यदि प्रबल बौद्धिक जिज्ञासा और समझने की क्षमता है तो उपनिषदों का स्वाध्याय कीजिये| जहाँ परमप्रेम और स्वभाविक अभीप्सा हैं, वहीं शरणागति द्वारा समर्पण की संभावना है| किसी भी तरह की आकांक्षा, कामना या अपेक्षा तुरंत भटका देगी|
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वर्तमान समय में पातंजलि ऋषि के नाम पर हठयोग के जो आसन-प्राणायाम आदि सिखाये जाते हैं, वे हठयोग के हैं, जिनका वर्णन पातंजलि योग-दर्शन में कहीं भी नहीं है| अतः उनके लिए पातंजलि ऋषि का नाम लेना असत्य का प्रचार और गलत बात है| हठयोग के आचार्य तो गुरु गोरखनाथ और घेरण्ड मुनि हैं|
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हठयोग के तीन ग्रंथ हैं .... (१) शिव संहिता, (२) घेरण्ड संहिता (३) हठयोग प्रदीपिका|
शिव-संहिता और हठयोग-प्रदीपिका ..... नाथ संप्रदाय के ग्रंथ हैं| शिव-संहिता के रचयिता गुरु मत्स्येंद्रनाथ को माना जाता है जो गोरखनाथ के गुरु थे| हठयोगप्रदीपिका के रचयिता गुरु गोरखनाथ के शिष्य स्वात्मारामनाथ को माना जाता है|
घेरंड-संहिता के रचयिता घेरंड मुनि हैं| यह ज्ञान उन्होने अपने शिष्य चंड कपाली को दिया था|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार योग का अर्थ है ....
"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय| सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते||२:४८||"
अर्थात् हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो| यह समभाव ही योग कहलाता है||
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आचार्य शंकर के अनुसार हमें जीवन का हर कार्य केवल ईश्वर के लिये करना चाहिए| यह भावना भी नहीं होनी चाहिए कि "ईश्वर मुझपर प्रसन्न हों"| इस आशारूप आसक्ति को भी छोड़ कर, फलतृष्णारहित कर्म किये जाने पर अन्तःकरण की शुद्धि से उत्पन्न होने वाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है, और उससे विपरीत (ज्ञानप्राप्ति का न होना) असिद्धि है| ऐसी सिद्धि और असिद्धि में भी सम होकर, अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म करना चाहिए| यही जो सिद्धि और असिद्धि में समत्व है इसीको योग कहते हैं।
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तंत्र शास्त्रों के अनुसार योग साधना का उद्देश्य परम शिवभाव को प्राप्त करना है|
भगवान वासुदेव को नमन !!
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"वसुदेव सुतं देवं, कंस चाणूर मर्दनं| देवकी परमानन्दं, कृष्णं वन्दे जगत्गुरुम्||"
"वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात् | पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् || पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात् | कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ जून २०२०

Sunday, 13 June 2021

सत्य सनातन धर्म और भारतवर्ष की सदा विजय हो ---

 सत्य सनातन धर्म और भारतवर्ष की सदा विजय हो ---

परमात्मा की सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारत भूमि में हुई है, इसलिए सत्य सनातन हिन्दू धर्म -- भारत की अस्मिता है। परमात्मा को स्वयं में व्यक्त करने की अभीप्सा, और तदानुरूप सदाचरण -- सनातन हिन्दू धर्म है.
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जो भी व्यक्ति -- आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल और पुनर्जन्म को मानता हो, व भगवान से अहैतुकी पूर्ण प्रेम करता हो, वह हिन्दू है; चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में रहता हो, या कहीं भी किसी भी परिवार में उसने जन्म लिया हो. हिन्दू कभी पतित नहीं हो सकता.
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प्रश्न (१): भारत की एकमात्र समस्या और समाधान क्या है? प्रश्न (२): हमें भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती? .

 प्रश्न (१): भारत की एकमात्र समस्या और समाधान क्या है? प्रश्न (२): हमें भगवान की प्राप्ति क्यों नहीं होती?

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उत्तर (१): मेरी दृष्टि में भारत की एकमात्र और वास्तविक समस्या -- "राष्ट्रीय चरित्र" का अभाव है। अन्य सारी समस्याएँ सतही हैं, उनमें गहराई नहीं है। "राष्ट्रीय चरित्र" तभी आयेगा जब हमारे में सत्य के प्रति निष्ठा और समर्पण होगा। तभी हम चरित्रवान होंगे। इस के लिये दोष किसको दें? -- इसके लिए "धर्म-निरपेक्षता" की आड़ में बनाई हुई हमारी गलत शिक्षा-पद्धति और संस्कारहीन परिवारों से मिले गलत संस्कार ही उत्तरदायी हैं। देश की असली संपत्ति और गौरव उसके चरित्रवान सत्यनिष्ठ नागरिक हैं, जिनका निर्माण नहीं हो पा रहा है। कठोर प्रयासपूर्वक हमें भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था पुनर्स्थापित करनी होगी। यही एकमात्र उपाय है। मेरी दृष्टि में अन्य कोई उपाय नहीं है।
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उत्तर (२). हमें भगवान की प्राप्ति नहीं होती, और आध्यात्मिक मार्ग पर हम सफल नहीं होते। इसका एकमात्र कारण --- "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है। अन्य कोई कारण नहीं है। बाकी सब झूठे बहाने हैं। हम झूठ बोल कर स्वयं को ही धोखा देते हैं। परमात्मा "सत्य" यानि सत्यनारायण हैं। असत्य बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है, और दग्ध वाणी से किये हुए मंत्रजाप व प्रार्थनाएँ निष्फल होती हैं। वास्तव में हमने भगवान को कभी चाहा ही नहीं। चाहते तो "मन्त्र वा साधयामि शरीरं वा पातयामि" यानि या तो मुझे भगवान ही मिलेंगे या प्राण ही जाएँगे; इस भाव से साधना करके अब तक भगवान को पा लिया होता। हमने कभी सत्यनिष्ठा से प्रयास ही नहीं किया। ज्ञान और अनन्य भक्ति की बातें वे ही समझ सकते हैं, जिनमें सतोगुण प्रधान है। जिनमें रजोगुण प्रधान है, उन्हें कर्मयोग ही समझ में आ सकता है, उस से अधिक कुछ नहीं। जिनमें तमोगुण प्रधान है, वे सकाम भक्ति से अधिक और कुछ नहीं समझ सकते। उनके लिये भगवान एक साधन, और संसार साध्य है। इन तीनों गुणों से परे तो दो लाख में कोई एक महान आत्मा होती है। हमें सदा निरंतर इस तरह के प्रयास करते रहने चाहियें कि हम तमोगुण से ऊपर उठ कर रजोगुण को प्राप्त हों, और रजोगुण से भी ऊपर उठकर सतोगुण को प्राप्त हों। दीर्घ साधना के पश्चात हम गुणातीत होने में भी सफल होंगे।
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अब और कुछ लिखने को रहा ही नहीं है। आप सब बुद्धिमान हैं। मेरे जैसे अनाड़ी की बातों को पढ़ा, इसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ।
आप सब को सादर नमन !! ॐ तत्सत् !! 🔥🌹🙏🕉🕉🕉🙏🌹🔥
कृपा शंकर
१४ जून २०२१

आध्यात्मिक मार्ग पर हमारी विफलताओं का एकमात्र कारण .... "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है|

 आध्यात्मिक मार्ग पर हमारी विफलताओं का एकमात्र कारण .... "सत्यनिष्ठा का अभाव" (Lack of Integrity and Sincerity) है|

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अन्य कोई कारण नहीं है| बाकी सब झूठे बहाने हैं| हम झूठ बोल कर स्वयं को ही धोखा देते हैं| परमात्मा "सत्य" यानि सत्यनारायण हैं| असत्य बोलने से वाणी दग्ध हो जाती है, और दग्ध वाणी से किये हुए मंत्रजाप व प्रार्थनाएँ निष्फल होती हैं|
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वास्तव में हमने भगवान को कभी चाहा ही नहीं| चाहते तो "मन्त्र वा साधयामि शरीरं वा पातयामि" यानि या तो मुझे भगवान ही मिलेंगे या प्राण ही जाएँगे, इस भाव से साधना करके अब तक भगवान को पा लिया होता| हमने कभी सत्यनिष्ठा से प्रयास ही नहीं किया|
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सत्यनिष्ठा को ही भगवान श्रीकृष्ण ने "अव्यभिचारिणी भक्ति" कहा है| उन्होने "अनन्य-अव्यभिचारिणी भक्ति", "एकांतवास" और "कुसङ्गत्याग" पर ज़ोर दिया है....
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी| विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि||१३:११||"
अर्थात अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि ||
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अब और कुछ लिखने को रहा ही नहीं है| आप सब बुद्धिमान हैं| मेरे जैसे अनाड़ी की बातों को पढ़ा इसके लिए आभारी हूँ| आप सब को सादर नमन| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
१४ जून २०२०