Thursday, 30 April 2026

साकार और निराकार परमात्मा की साधना में क्या भेद है ?

 साकार और निराकार परमात्मा की साधना में क्या भेद हैं? मुझे तो आज तक कोई भेद कहीं नहीं दिखाई दिया। वास्तव में निराकार कुछ है ही नहीं। जिस की भी सृष्टि हुई है, उसका कुछ न कुछ आकार है ही, चाहे वह शब्द रूप में हो या प्रकाश रूप में। कुछ लोग अपने गुरु को सच्चा गुरु बताते हैं और दूसरों के गुरु को झूठा गुरु। बड़ी विचित्र बात है! उनके लिए गुरु मनुष्य है या तत्व? स्वयं को वे लोग यह शरीर मानते हैं। उन सब को दूर से ही प्रणाम !! निराकार का अर्थ होता है -- "सारे आकार जिसके हों, वह निराकार है।" मैं मूर्ति-पूजा का भी समर्थक हूँ, और साकार साधना का भी। इस सृष्टि में कुछ भी निराकार नहीं है। सारे आकार परमात्मा के हैं, वे इन आकारों में भी, और इन से परे भी हैं।

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! "ॐ तत्सत् !! कृपा शंकर ३० अप्रेल २०२३

Wednesday, 29 April 2026

शिवो भूत्वा शिवं यजेत् --- यह जीवन अब मुक्तावस्था में निरंतर ब्राह्मी-स्थिति में ही रहे।

 शिवो भूत्वा शिवं यजेत् ---

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यह जीवन अब मुक्तावस्था में निरंतर ब्राह्मी-स्थिति में ही रहे। मैं नित्यमुक्त, बड़ी सत्यनिष्ठा से, अपने हृदय की बात कह रहा हूँ। जिन की समझ में आये उन का मंगल हो, और जिन की समझ में न आये उन का भी मंगल हो।
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बाल्यकाल से ही मैं एक गहन जिज्ञासु रहा हूँ जो अति उत्सुकता से अपने आसपास के घटनाक्रम का बहुत गहराई से अवलोकन करता है। जीवन में ऊँच-नीच, न्याय-अन्याय, और अच्छा-बुरा सब कुछ बहुत अधिक देखा है, और उससे बहुत कुछ सीखा भी है। मेरे भी अपने आदर्श हैं, और अपनी स्वयं की विचारधारा भी है। लेकिन मैं अपने चारों ओर छाई हुई असत्य और अंधकार की शक्तियों से बहुत ही अधिक पीड़ित रहा हूँ। उन्होंने मुझे बहुत अधिक दुःख दिया है। इनके पीछे क्या रहस्य है? मुझे नहीं पता। पिछले जन्मों के कर्मफल रहे होंगे। जीवन के इस संध्याकाल में अब कोई कामना या आकांक्षा नहीं रही है। अवशिष्ट जीवन में जो भी सर्वश्रेष्ठ हो सकता है, उसी की उपासना में यह जीवन व्यतीत हो जाये, ताकि जो भी हो वह मंगलमय हो।
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एक अभीप्सा है -- अव्यक्त को व्यक्त करने की। किसी भी तरह का कोई संशय या शंका नहीं है। प्रकृति की प्रत्येक शक्ति मेरा साथ देगी ऐसी मेरी दृढ़ आस्था, श्रद्धा और विश्वास है। परमात्मा मेरे साथ हैं जिनके समक्ष कोई असत्य का अंधकार नहीं टिक सकता। मैं सदा कूटस्थ चैतन्य में, यानि ब्राह्मी स्थिति में रहूँ, और मेरी चेतना परम प्रेममय होकर समष्टि के साथ एक होकर रहे।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२:७२॥"
अर्थात् - हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है॥
यह अवस्था ब्राह्मी यानी ब्रह्म में होनेवाली स्थिति है, जहाँ सर्व कर्मों का संन्यास कर के केवल ब्रह्मरूप से स्थित हो जाना है। परमात्मा सब गुरुओं के गुरु हैं। उनसे प्रेम करो, सारे रहस्य अनावृत हो जाएँगे। हम भिक्षुक नहीं, परमात्मा के अमृत पुत्र हैं। मुझे सब में परमात्मा के ही दर्शन होते हैं। अतः सभी को मैं नमन करता हूँ।
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भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं --
"प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैतिदिव्यं॥८:१०॥"
अर्थात - भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित कर के, फिर निश्छल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष को ही प्राप्त होता है|
आगे भगवान कहते हैं --
"सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥८:१२॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८:१३॥"
अर्थात सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृदय में स्थिर कर के फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित कर के, योग धारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है|
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निश्छल मन से स्मरण करते हुए भृकुटी के मध्य में प्राण को स्थापित करना और ॐकार का निरंतर जाप करना -- यह एक दिन का काम नहीं है। इसके लिए हमें आज से इसी समय से अभ्यास करना होगा। उपरोक्त तथ्य के समर्थन में किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, भगवान का वचन तो है ही, और सारे उपनिषद्, शैवागम और तंत्रागम इसी के समर्थन में भरे पड़े हैं।
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ध्यान का अभ्यास करते करते चेतना सहस्त्रार पर या ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस शरीर से बाहर भी चली जाए तो चिंता न करें। जब तक प्रारब्ध में जीवन लिखा है, मृत्यु नहीं आने वाली। सहस्त्रार में तो गुरु महाराज के चरण कमल हैं। कूटस्थ केंद्र भी वहीं चला जाता है। वहाँ स्थिति मिल गयी तो गुरु चरणों में आश्रय मिल गया।
चेतना ब्रह्मरंध्र से बाहर निकल कर अनंत में या उस से भी परे रहने लगे तब तो और भी प्रसन्नता की बात है। वह विराटता ही तो "विराट पुरुष" है।
उस अनंतता से भी परे परमशिव की अनुभूति "पञ्चमुखी महादेव" के रूप में होती है। इस देह से बाहर दिखाई देने वाली ज्योति भी अवर्णनीय और दिव्यतम है। परमात्मा के प्रेम में मग्न रहें, फिर तो परमात्मा ही परमात्मा होंगे, न कि हम।
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खोपड़ी के पीछे का भाग मेरुशीर्ष (Medulla Oblongata) हमारी देह का सर्वाधिक संवेदनशील स्थान है जहाँ मेरुदंड की सभी नाड़ियाँ मष्तिष्क से मिलती हैं। इस भाग की कोई शल्यक्रिया नहीं हो सकती। हमारी सूक्ष्म देह में आज्ञाचक्र यहीं पर स्थित है। यह स्थान भ्रूमध्य के एकदम विपरीत दिशा में है। योगियों के लिए यह उनका आध्यात्मिक हृदय है। यहीं पर जीवात्मा का निवास है। इसके थोड़ा सा ऊपर ही शिखा बिंदु है, जहाँ शिखा रखते हैं। उस से ऊपर सहस्त्रार और ब्रह्मरंध्र है।
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गुरु की आज्ञा से शिवनेत्र होकर यानि बिना किसी तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासिकामूल के समीपतम लाकर, भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी मुद्रा में या जीभ को बिना किसी तनाव के ऊपर पीछे की ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखते हुए, प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को अपने अंतर में सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का ध्यान-चिंतन नित्य नियमित करें। गुरु की कृपा से कुछ महिनों या वर्षों की साधना के पश्चात् विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। यह ब्रह्मज्योति और प्रणव की ध्वनि दोनों ही आज्ञाचक्र में प्रकट होती हैं, पर इस ज्योति के दर्शन भ्रूमध्य में प्रतिबिंबित होते हैं, इसलिए गुरु महाराज सदा भ्रूमध्य में ध्यान करने की आज्ञा देते हैं। ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के पश्चात् उसी की चेतना में सदा रहें। यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता। लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है, पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता। यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है। यह योगमार्ग की उच्चतम साधनाओं/उपलब्धियों में से एक है।
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दो बातें और कहना चाहता हूँ, जिन्हें बताने की भगवान से मुझे पूरी अनुमति है। आज अन्तःचेतना में स्वयं भगवान शिव ने दो बातें कहीं ---
एक तो उन्होंने कहा कि मुक्ति या मोक्ष की कामना ही मुक्ति और मोक्ष के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। जब तक मुक्ति और मोक्ष की कामना है तब तक हम बंधन में हैं, तब न तो मुक्ति मिल सकती है और न ही मोक्ष।
दूसरी बात उन्होंने कही -- "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्।" अर्थात स्वयं शिव बनकर शिव की उपासना करो॥
ॐ नमः शिवाय। ॐ तत्सत्। ॐ स्वस्ति। ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
३० अप्रेल २०२३

Monday, 27 April 2026

हे प्रभु, सभी को उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो।

 हे प्रभु, सभी को उचित मार्गदर्शन प्राप्त हो। तमोगुण के प्रभाव से जो मूढ़ योनियों में हैं, उनका उद्धार करो। रजोगुण के प्रभाव से जो कर्मठ तो हैं, लेकिन धर्म-विमुख हो गए हैं, उनका भी उद्धार करो। यह समय बहुत अधिक खराब चल रहा है। आपके प्रत्यक्ष अनुग्रह की आवश्यकता सभी को है। इस समय आपकी प्रत्यक्ष आवश्यकता है। अपनी आरोग्यकारी उपस्थिति सभी प्राणियों के अंतःकरण में प्रकट करो। लाखों महान जीवनमुक्त पुण्यात्माओं का भारत में जन्म हो। वे इस धरा पर आपका कार्य संपन्न करें। जन्म-जन्मांतरों के सारे कर्मफल और सारे अवगुण-गुण, व सम्पूर्ण अस्तित्व -- वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित हैं।

सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश, और धर्म के अभ्युत्थान के लिए भगवान वचनबद्ध हैं। सत्य-सनातन-धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण शीघ्रतापूर्वक हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !

ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
२८ अप्रेल २०२२

इधर-उधर की मन बहलाने वाली मीठी मीठी बातों से काम नहीं चलेगा ---

 इधर-उधर की मन बहलाने वाली मीठी मीठी बातों से काम नहीं चलेगा। उन में भटकाव ही भटकाव है। सीधी सी बात है ---

(१) जब तक हम अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) पर विजय नहीं पाते, तब तक कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती।
(२) इन पर विजय के पश्चात -- जीव-भाव से ऊपर उठ कर स्वयं को परमात्मा में दृढ़ता से स्थित करना पड़ेगा।
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इन के लिए किसी सिद्ध, ब्रहमनिष्ठ, श्रौत्रीय (जिन्हें वेदों का ज्ञान हो) आचार्य से मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके सान्निध्य में साधना करनी पड़ेगी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, अन्य कोई मार्ग नहीं है। भटकाव में कुछ नहीं रखा है। आप सब को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२१

हनुमान जी की अनुभूति ---

 हनुमान जी की अनुभूति ---

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मुझे हनुमान जी की अनुभूति कभी-कभी ध्यान में अपने मेरुदंड में होती है। परमात्मा की अनंतता से अवतरित होकर हनुमान जी अपने परम ज्योतिर्मय रूप में पता नहीं कब और कैसे मेरी सूक्ष्म देह के मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में व्यक्त होने लगते हैं। नासिका से जब साँस अंदर जाती है, तब हनुमान जी मूलाधारचक्र से बड़े प्रेम और आनंद से सब चक्रों को भेदते हुए सहस्त्रारचक्र में आ जाते हैं। कभी तो वे वहीं स्थिर हो जाते हैं, कभी सुषुम्ना में बड़े प्रेम और आनंद से विचरण कर, बापस अपनी अनंतता में विलीन हो जाते हैं। उनकी उपस्थिती बड़े प्रेम और आनंद को प्रदान करती है।
मैं उनके समक्ष नतमस्तक हूँ।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं|
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये||"
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हनुमान जी ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो सदा सफल रहे हैं, उन्होने कभी विफलता नहीं देखी। वे सेवा और भक्ति के परम आदर्श हैं।
"अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥"
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ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२७ अप्रेल २०२१

Saturday, 25 April 2026

वर्तमान भारत में नक्सलवाद ---

 वर्तमान भारत में नक्सलवाद ---

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वर्तमान भारत में नक्सलवाद तो कभी का पूरी तरह समाप्त हो चुका है, जिनको अब हम नक्सलवादी कहते हैं वे और उनके समर्थक सिर्फ "ठग" "बौद्धिक आतंकवादी", "डाकू" और "तस्कर" हैं, इस के अलावा वे कुछ भी अन्य नहीं हैं| उनका एक ही इलाज है, और वह है ...... "बन्दूक की गोली"| इसी की भाषा को वे समझते हैं| वे कोई भटके हुए नौजवान नहीं है, वे कुटिल राष्ट्रद्रोही तस्कर हैं, जिनको बिकी हुई प्रेस, वामपंथियों और राष्ट्र्विरोधियों का समर्थन प्राप्त है| जिस समय नक्सलबाड़ी में चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने नक्सलवादी आन्दोलन का आरम्भ किया था, उस समय चाहे मैं किशोरावस्था में ही था, पर तब से अब तक का सारा घटनाक्रम मुझे याद है|
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नक्सलवादी आन्दोलन का विचार कानू सान्याल के दिमाग की उपज थी| यह एक रहस्य है कि कानू सान्याल इतना खुराफाती कैसे हुआ| वह एक साधू आदमी था जिसका जीवन बड़ा सात्विक था| उसका जन्म एक सात्विक ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उसकी दिनचर्या बड़ी सुव्यवस्थित थी और भगवान ने उसे बहुत अच्छा स्वास्थ्य दिया था| कहते हैं कि उसकी निजी संपत्ति में खाना पकाने के कुछ बर्तन, कुछ पुस्तकों का पोटली में बंधा हुआ एक ढेर, एक चटाई और एक कुर्सी थी| और कुछ भी उसके पास नहीं था| वह एक झोंपड़ी में रहता था| सन १९६२ में वह बंगाल के तत्कालीन मुख्य मंत्री श्री वी.सी.रॉय को काला झंडा दिखा रहा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जहाँ उसकी भेट चारु मजुमदार से हुई|
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चारु मजूमदार एक कायस्थ परिवार से था और हृदय रोगी था, जो तेलंगाना के किसान आन्दोलन से जुड़ा हुआ था और जेल में बंदी था| दोनों की भेंट सन १९६२ में जेल में हुई और दोनों मित्र बन गए|
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सन १९६७ में दोनों ने बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक गाँव से तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध एक घोर मार्क्सवादी हिंसक आन्दोलन आरम्भ किया जो नक्सलवाद कहलाया| इस आन्दोलन में छोटे-मोटे तो अनेक नेता थे पर इनको दो और प्रभावशाली कर्मठ नेता मिल गए ........ एक तो था नागभूषण पटनायक, और दूसरा था टी.रणदिवे| इन्होनें आँध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम के जंगलों से इस आन्दोलन का विस्तार किया|
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कालांतर में यह आन्दोलन पथभ्रष्ट हो गया जिससे कानु सान्याल और चारु मजूमदार में मतभेद हो गए और दोनों अलग अलग हो गए| चारु मजुमदार की मृत्यु सन १९७२ में हृदय रोग से हो गयी, और कानु सान्याल को इस आन्दोलन का सूत्रपात करने की इतनी अधिक मानसिक ग्लानि और पश्चाताप हुआ कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली|
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जो मूल नक्सलवादी थे उनकी तीन गतियाँ हुईं .......
उनमें से आधे तो पुलिस की गोली का शिकार हो गए| वे अस्तित्वहीन ही हो गए| जो जीवित बचे थे उन में से आधों ने तत्कालीन सरकार से समझौता कर लिया और नक्सलवादी विचारधारा छोड़कर राष्ट्र की मुख्य धारा में बापस आ कर सरकारी नौकरियाँ ग्रहण कर लीं| बाकी बचे हुओं ने इस विचारधारा से तौबा कर ली और इस विचारधारा के घोर विरोधी हो गए| उनमें से कई तो साधु बन गए| अब कोई असली नक्सलवादी नहीं है| जिनको हम नक्सलवादी बताते हैं वे चोर बदमाश हैं जिन्हें उचित दंड मिलना चाहिए|
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वन्दे मातरं | भारत माता की जय ||
२५ अप्रेल २०२०

मैमूना बेगम की दास्तान ---

 मैमूना बेगम की दास्तान ---

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किसी ज़माने में इलाहाबाद में एक बहुत मशहूर गुजराती व्यापारी हुआ करते थे -- ज़नाब नवाब अली ख़ान साहब। वे इलाहाबाद और प्रतापगढ़ जिलों के शराब के सबसे बड़े व्यापारी और ठेकेदार भी थे। इलाहाबाद के बड़े बड़े घरों में शराब की बड़ी-बड़ी पार्टियाँ हुआ करती थीं, जिनमें मंहगी से मंहगी शराब की सप्लाई का काम वे ही करते थे। शराब के अलावा घर-गृहस्थी के काम का सारा सामान भी सप्लाई करते थे। उनकी बेगम साहिबा अपने निक़ाह से पहिले एक पारसी परिवार की बेटी थीं जिनका पारिवारिक उपनाम गंधी (Gandhi) था, गांधी नहीं। उनके परिवार का खानदानी पेशा गंध यानि इत्र बेचना था। शादी के समय इस्लाम कबूल कर के वे मुसलमान हो गई थीं।
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वहाँ के कब्रिस्तान में उन दोनों की और उनके बेटे की कब्रें भी हैं, पता नहीं वहाँ अक़ीदत के फूल चढ़ाने भी कोई जाता है या नहीं? उनके खानदान में बड़े बड़े मशहूर लोग हुए हैं, जिन्हें सारी दुनिया जानती है। उन ज़नाब नवाब अली खान साहब के साहबज़ादे का नाम फिरोज़ ख़ान था, जिन से मेमूना बेगम का निकाह हुआ। बाद में दोनों की बनी नहीं, और मेमूना बेगम ने धक्के मारकर उनको घर से बाहर कर दिया और युनूस खान नाम के एक दूसरे शख़्स से निक़ाह कर लिया।
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अब तो यह बात बहुत पुरानी हो गई है जिसे भूल जाना चाहिए। पर भूल कर भी भूल नहीं पा रहे हैं। उन ज़नाब नवाब अली साहब से बड़ा अभागा शायद ही कोई हुआ हो। उनके समधी, उनकी बहु, उनके नाती, और नाती की बहु -- दुनियाँ के सबसे मशहूर और रईस लोगों में हुए हैं, जिनकी याद में हर वर्ष बड़े बड़े जलसे होते हैं, उनके नाम पर हिंदुस्तान की आधी संस्थाओं के नाम हैं। लेकिन बेचारे फिरोज खान और उनके माँ-बाप को कोई याद नहीं करता। पता नहीं इनकी कब्र पर किसी ने कोई श्रद्धा-सुमन कभी चढ़ाया भी है या नहीं। सच का दामन जब छूट जाता है, तब झूठ का आईना टूट जाता है।
कृपा शंकर
२५ अप्रेल २०२०