आज गीता जयंती है। सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ।
Tuesday, 16 December 2025
आज गीता जयंती है। सभी को मंगलमय शुभ कामनाएँ।
निराश्रयं माम् जगदीश रक्षः॥
निराश्रयं माम् जगदीश रक्षः॥
ईश्वर की कृपा से सरल से सरल भाषा में मैं भगवान की भक्ति, आध्यात्मिक साधना और ब्रह्मविद्या पर अनेक लघु लेख लिख पाया
ईश्वर की कृपा से सरल से सरल भाषा में मैं भगवान की भक्ति, आध्यात्मिक साधना और ब्रह्मविद्या पर अनेक लघु लेख लिख पाया। ब्रह्मविद्या को ही को उपनिषदों में "भूमा" कहा गया है, जिसे दर्शन शास्त्रों में "वेदान्त" भी कहते हैं। जो मैं नहीं लिख पाया वह मेरी सीमित बुद्धि की समझ से परे था।
निरंतर ब्रह्म-चिंतन द्वारा वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ही हम इस समष्टि की सबसे बड़ी सेवा कर सकते हैं ---
ॐ तत् सत् ----- निरंतर ब्रह्म-चिंतन द्वारा वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ही हम इस समष्टि की सबसे बड़ी सेवा कर सकते हैं। किशोरावस्था से ही यह सत्य पढ़ता आ रहा हूँ, लेकिन अब इस समय अपनी निज-अनुभूतियों से यह बात पक्काई से कह सकता हूँ। आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) ही सबसे बड़ी सेवा है, जो हमारे माध्यम से सम्पन्न हो सकती है।
परमात्मा से उनके परमप्रेम/अनुराग के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए ---
पुनश्च: ---
भगवत्-प्राप्ति, यानि आत्म-साक्षात्कार -- मनुष्य के लिए सबसे अधिक सरल और सहज है। चाहे तो कोई भी मनुष्य ब्रह्मज्ञ हो सकता है, लेकिन हमारा लोभ और अहंकार ऐसे नहीं होने देता। हमारे शास्त्र तो कहते हैं कि भगवान की माया का आवरण और विक्षेप हमें भगवान से दूर करता है, लेकिन हमारा लोभ और अहंकार ही माया का मुख्य आवरण है।
Saturday, 6 December 2025
भारतवर्ष सदा एक हिदू राष्ट्र था, हिन्दू राष्ट्र है, और हिन्दू राष्ट्र ही रहेगा .....
भारतवर्ष सदा एक हिदू राष्ट्र था, हिन्दू राष्ट्र है, और हिन्दू राष्ट्र ही रहेगा .....
Thursday, 4 December 2025
सत्यनिष्ठा से निरंतर परमात्मा के हृदय में रहो, व परमात्मा को सदा निज हृदय में रखो ---
सत्यनिष्ठा से निरंतर परमात्मा के हृदय में रहो, व परमात्मा को सदा निज हृदय में रखो। यही हमारा सर्वोच्च रक्षा-कवच है।
अपनी चेतना के उच्चतम बिन्दु पर रहें। वहीं से नीचे उतर कर इस भौतिक देह के माध्यम से साधना करें, और पुनश्च: उच्चतम पर लौट जायें। उच्चतम पर ही परमशिव पुरुषोत्तम की अनुभूति होती है। यह मनुष्य देह भगवान द्वारा दिया हुआ एक साधन है जिसे स्वस्थ रखें, क्योंकि इसी के माध्यम से हम आत्म-साक्षात्कार कर सकते हैं। शब्दजाल में न फँसें। अपनी अनुभूति स्वयं करें। कोई अन्य नहीं है। अपने आराध्य इष्ट देव की छवि को आत्म-भाव से कूटस्थ में सदा अपने समक्ष रखें। जब भूल जायें तब याद आते ही पुनश्च उनका स्मरण और आंतरिक दर्शन प्रारम्भ कर दें।