Thursday, 7 October 2021

इस सृष्टि में सद्भाव और एकता संभव है सिर्फ परमात्मा से प्रेम और ध्यान साधना से ही ---

इस सृष्टि में सद्भाव और एकता संभव है सिर्फ परमात्मा से प्रेम और ध्यान साधना से ही, अन्यथा यह संसार एक मृग-मरीचिका है| संसार में सबसे अधिक मार-काट, हिंसा और अन्याय, मज़हब के नाम पर ही हुए हैं, और हो रहे हैं| जीवन में सुख-शांति और सुरक्षा चाहिए तो दिन में जब भी समय मिले, भगवान की उपासना करो, ध्यान-साधना करो, अन्यथा जीवन में कुछ भी मिलने वाला नहीं है|
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भारत में कल ही एक व्यक्ति ने आत्म-हत्या की, जो हिमाचल प्रदेश का पुलिस महानिर्देशक, सीबीआई का निर्देशक, दो राज्यों का राज्यपाल, और एक विश्वविद्यालय का उपकुलपति भी रह चुका था| उसने संसार की उच्चतम उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, और खूब रुपया-पैसा और सम्मान भी कमाया| किसी भी प्रकार की कमी उसके पास नहीं थी, पर जीवन में सुख-शांति नहीं थी| यह सुख-शांति जीवन में भिखारियों के पीछे-पीछे भागने से या दूसरों से नहीं, सिर्फ परमात्मा के प्रेम और ध्यान-साधना से ही मिल सकती है|
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संसार में अधिकांश लोग उचित-अनुचित हर प्रकार से धन एकत्र करते हैं, और संसार से अपेक्षा व माँग करते हैं कि संसार उन का सम्मान करे| पर ऐसे लोगों को जीवन में निराशा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं मिलता| यह संसार हमें सुख की आशा देता है, पर अंततः निराशा ही हाथ लगती है|
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !! आप सब को नमन और शुभ कामनायें !!
कृपा शंकर
८ अक्टूबर २०२०

भारत से तुर्की क्यों चिढ़ता और द्वेष रखता है? ---

भारत से तुर्की क्यों चिढ़ता और द्वेष रखता है? इसका कारण जैसा मुझे समझ में आया है, वैसा ही यहाँ लिख रहा हूँ|
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प्रथम विश्व युद्ध में गैलिपोली की अति भयंकर लड़ाई में तुर्की की पराजय के साथ ही सल्तनत-ए-उस्मानिया (Ottoman empire) का पतन हो गया था| इस से वह सल्तनत बिखर गई और उस के आधीन बुल्गारिया, मिश्र, हंगरी, जॉर्डन, लेबनान, इज़राइल, फिलिस्तीन, मसीडोनिया, रोमानिया, सीरिया, अरब का अधिकांश भाग, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के सारे समुद्र-तटीय देश इस सल्तनत से स्वतंत्र हो गए| इस युद्ध में ब्रिटेन की ओर से लड़ने वाले सारे सैनिक भारतीय थे जिनको श्रेय इसलिए नहीं मिला क्योंकि भारत उस समय अंग्रेजों के आधीन था| सारे अधिकारी अंग्रेज़ थे जिनमें भारतीय सैनिकों के बिना युद्ध करने का साहस नहीं था| विशुद्ध अंग्रेजी फौज ने हर जगह बुरी तरह मार खाई और उन्हें भारतीय सैनिकों द्वारा ही सदा बचाया गया| हर अंग्रेज़ सैनिक अधिकारी भारतीय सिपाहियों की सहायता के साथ ही लड़ना चाहता था क्योंकि भारतीय सिपाही अपने प्राणों की परवाह किए बिना युद्ध करते थे| तुर्की से भारतीय सिपाहियों की सहायता के बिना युद्ध जीतना असंभव था| यरूशलम को भी तुर्की से अंग्रेजों ने भारतीय सिपाहियों के द्वारा ही मुक्त कराया था|
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तुर्की के खलीफा की यह इच्छा थी कि वह अंग्रेजों को हराकर भारत पर अपना अधिकार करे| तुर्की की पराजय के पश्चात भारत में गांधी जी ने दुर्भाग्य से खलीफा को बापस सत्ता दिलाने के लिए खिलाफत आंदोलन आरंभ किया था| तुर्की के इतिहास में यह नहीं पढ़ाया जाता है कि उन्हें अंग्रेजों ने हराया था| उन्हें पढ़ाया जाता है कि ब्रिटिश-इंडिया की हिन्दुस्तानी फौज ने उन्हें हराया था| वहाँ का राष्ट्रपति अर्दोआन चाहता है कि भारत में गजवा-ए-हिन्द हो, अतः वह पाकिस्तान का समर्थन करता है| तुर्की को यह मलाल है कि वे अंग्रेजों से नहीं बल्कि हिन्दुस्तानी सैनिकों से हारे थे|
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प्रथम विश्वयुद्ध में कुल मिलाकर ७४,१८७ भारतीय सैनिक मारे गए , और ६७,००० घायल हुए थे| जयपुर राज्य के ७,००० से अधिक सैनिक मारे गए जिनमें से अधिकांश शेखावाटी के थे| उनकी स्मृति में एक छोटा सा शिलालेख झुंझुनूं के जोरावर गढ़ के दरवाजे पर (सब्जी मंडी में) लगा है, जिसे ध्यान से देखने पर दिखाई देता है|
ॐ तत्सत् !!
८ अक्तूबर २०२०

 

कोई किसी का शत्रु या मित्र नहीं होता, सब अपने-अपने स्वार्थ देखते हैं, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तो यह शत-प्रतिशत सत्य है ---

 

कोई किसी का शत्रु या मित्र नहीं होता| सब अपने-अपने स्वार्थ देखते हैं| अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तो यह शत-प्रतिशत सत्य है|
आजकल अर्मेनिया और अज़रबेजान में एक धर्मयुद्ध चल रहा है| जिसमें मुख्य भूमिका तुर्की की है| इसकी पृष्ठभूमि में जाते हैं| प्रथम विश्व युद्ध (२८ जुलाई १९१४ से ११ नवंबर १९१८) की समाप्ति ..... तुर्की की पराजय, और सल्तनत-ए-उस्मानिया (The Ottoman Empire) के विखंडन के साथ हुई थी| यह सल्तनत उस समय से पीछे लगभग ६०० वर्षों से विश्व का एक सबसे बड़ा साम्राज्य था, जिसके आधीन बुल्गारिया, मिश्र, हंगरी, जॉर्डन, लेबनान, इज़राइल, फिलिस्तीन, मसीडोनिया, रोमानिया, सीरिया, अरब का अधिकांश भाग, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के सारे समुद्र-तटीय देश थे| भारत पर भी जितने मुसलमान बादशाहों ने राज्य किया, वे मूल रूप से तुर्क ही थे और तुर्की के खलीफा सुल्तान को अपने लगान का एक भाग नियमित रूप से भेजते थे| वर्तमान सऊदी अरब भी तुर्की के आधीन था|
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प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त हुए एक सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं| तुर्की के वर्तमान राष्ट्रपति अर्दोआन चाहते हैं कि तुर्की अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त कर विश्व की एक महाशक्ति बने| इसके लिए उन्हें मुस्लिम देशों का समर्थन चाहिए जो उन्हें सिर्फ पाकिस्तान से मिला| तुर्की ने अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुसलमान देश अज़र्बेज़ान को भड़का कर अपने पुराने शत्रु आर्मेनिया से युद्ध करवा ही दिया| आर्मेनिया एक कट्टर ईसाई देश है जहाँ का आर्मेनियायी चर्च रूस के ओर्थोंडॉक्स चर्च से निकला है| अज़र्बेज़ान में सुन्नी सिर्फ १५% ही हैं, और शिया ८५%, पर सुन्नी तुर्की उनको भड़का कर अपनी ओर करने में सफल रहा है| अरब और तुर्क, हालाँकि कट्टर सुन्नी मुसलमान हैं पर एक-दूसरे से बहुत घृणा करते हैं|
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आश्चर्य इस बात का हो रहा है कि विश्व का सबसे बड़ा शिया देश ईरान, विश्व के दूसरे सबसे बड़े शिया देश अज़र्बेजान की सहायता न कर के उसके विरोध में ईसाई देश आर्मेनिया की सहायता कर रहा है, और आर्मेनिया को भारी मात्रा में युद्ध लड़ने के लिए सामान दे रहा है| रूस भी ईरान के माध्यम से आर्मेनिया को सहायता भेज रहा है|
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सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि इज़राइल, अज़र्बेज़ान की सहायता कर रहा है| चीन भी अज़र्बेज़ान की सहायता कर रहा है| यह दिखाता है कि कोई भी देश हो अपनी विदेश नीति अपने आर्थिक हितों को देख कर ही करता है|
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जब से यह सृष्टि बनी है तब से युद्ध होते रहे हैं, और होते रहेंगे| उन्हें कोई भी नहीं रोक पाया है| सभ्यताओं का उदय और अस्त ऐसे ही होता रहेगा|
कृपा शंकर
७ अक्तूबर २०२०

Wednesday, 6 October 2021

लंबी यात्रा न कर सकें तो परमात्मा की गहराई में उतरें ...

लंबी यात्रा न कर सकें तो परमात्मा की गहराई में उतरें ...
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हम लंबी यात्रा नहीं कर सकते तो जहाँ पर भी हैं वहीं से गहराई में तो उतर ही सकते हैं| नकारात्मकता का चिंतन न करें| हमारी भूलें चाहे हिमालय से भी बड़ी हों, जीवन में चाहे कितना भी भयावह अंधकार हो, उसका चिंतन न करें| परमात्मा का चिंतन हमारी हर कमी को दूर कर सकता है| मेरुदंड को उन्नत रखते हुए एकांत व पवित्र स्थान में बैठकर दृष्टिपथ को भ्रूमध्य में रखें| अजपा-जप का अभ्यास करें| कानों को बंद कर भगवान के पवित्र नाम का श्रवण करें| हर साँस हमें परमात्मा से जोड़ती है| अपना पूर्ण प्रेम परमात्मा को दें| स्वयं को परमात्मा को समर्पित कर दें| हमारे में परमप्रेम और सत्यनिष्ठा होगी तो हमें मार्गदर्शन भी मिलेगा, हमारी रक्षा भी होगी और भगवान की परमकृपा भी होगी|
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आध्यात्मिक मार्ग में सबसे अधिक संघर्ष स्वयं की निम्न-प्रकृति से होता है| निम्न-प्रकृति अधोगामी होती है जो हमें परमात्मा से दूर ले जाती है| उच्च-प्रकृति ऊर्ध्वगामी होती है जो परमात्मा की ओर बढ़ने की ओर प्रेरणा देती है| इनमें संघर्ष व्यक्तित्व का विखंडन तक कर सकता है| इससे बचने के लिए हमें सत्संग यानि उस तरह के लोगों का साथ चाहिए जैसा हम बनना चाहते हैं| सत्संग भी सुलभ नहीं है, यह हरिः कृपा से ही प्राप्त होता है| सत्संग के नाम पर ठगी भी बहुत अधिक है| बाहरी सत्संग न मिले तो परमात्मा के साथ या महापुरुषों के साथ आंतरिक सत्संग करें| भगवान से यदि हम सत्संग लाभ के लिए सत्यनिष्ठा से प्रार्थना करते हैं तो भगवान निश्चित रूप से हम पर कृपा करते हैं|
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जीवन में और उस से भी परे, ईश्वर ही एकमात्र सत्य है। यह आभासित जगत उसी की अभिव्यक्ति है, पर यह आभासित जगत एक धोखा है| किसी से किसी भी प्रकार की अपेक्षा महादुःखदायी है| स्वयं में ही उसे व्यक्त करना होगा| बाहर की भागदौड़ और अपेक्षाओं का अब अंत होना चाहिए|
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उस परम सत्य का बोध जब हो जाये तब इस अंतहीन भागदौड़ पर पूर्णविराम लगना ही चाहिए अन्यथा धोखा ही धोखा है| हमारी हर साँस, हमारा हर क्षण, हमारा हर विचार, उसी परम सत्य परमात्मा की अभिव्यक्ति हो|
ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शांकर
६ अक्टूबर २०२०

 

Saturday, 2 October 2021

हम कितने भाग्यशाली हैं कि भगवान स्वयं हमें याद कर रहे हैं ---

 

हम कितने भाग्यशाली हैं कि भगवान स्वयं हमें याद कर रहे हैं ---
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भगवान की प्राप्ति के लिए ऐसी छटपटाहट और पीड़ा होनी चाहिए जैसे किसी ने एक परात में जलते हुए कोयले भर कर सिर पर रख दिए हों, और हमें उस अग्नि की दाहकता से मुक्ति पानी हो| ऐसी भक्ति हमें अनेक जन्मों के पुण्य और परमात्मा की कृपा द्वारा ही प्राप्त हो सकती है| वराह पुराण में भगवान् हरि कहते हैं --
"वातादि दोषेण मद्भक्तों मां न च स्मरेत्।
अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्॥"
अर्थात् -- यदि वातादि दोष के कारण मृत्यु के समय मेरा भक्त मेरा स्मरण नहीं कर पाता तो मैं उसका स्मरण कर उसे परम गति प्राप्त करवाता हूँ॥
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अतः भगवान का नाम निरन्तर जपें और सदा प्रसन्न रहें। निश्चय कर संकल्प सहित अपने आप को परमात्मा के हाथों में सौंप दो| जहाँ हम विफल हो जाएँगे, वहाँ वे हाथ थाम लेंगे|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ अक्टूबर २०१७

असहमति में उठा मेरा हाथ ---

असहमति में उठा मेरा हाथ ---
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मुझे असहमत होने का अधिकार है। कोई व्यक्ति दुनियाँ की निगाह में चाहे कितना भी महान हो, लेकिन मेरे लिए महान वही है जिसने निज जीवन में परोपकार ही परोपकार किये हैं, और परमात्मा को व्यक्त किया है। जिसके जीवन में कोई भी अनुकरणीय आदर्श नहीं है, वह कभी महान नहीं हो सकता, चाहे सारी दुनियाँ उसे महात्मा कहती हो।
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एक अश्वेत युवा लंदन में रहते हुए बिना किसी बाधा के श्वेतों के साथ पढ़ सकते हैं, छात्रावास के एक कमरे में रह सकते हैं, एक भोजनालय में भोजन कर सकते हैं, फिर अचानक ही रेलगाड़ी में एक साथ यात्रा करने पर डिब्बे से बाहर फेंक दिये जाते हैं, -- यह बात पचती नहीं है। वही व्यक्ति बाद में उन्हीं गोरों की सेना में सार्जेंट मेजर बनते हैं, और दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश बोर युद्ध में उन की नियुक्ति एम्बुलेंस यूनिट में होती है। सैनिक वेश में उन का चित्र अंतर्जाल पर उपलब्ध है। आप सार्जेंट मेजर गांधी लिखकर खोज लीजिए।
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सन १९१५ में ४६ वर्ष की आयु में उनका देशप्रेम जागता है और सैनिक पोशाक (मिलिट्री यूनिफार्म) उतारकर उन्हें बैरिस्टर घोषित कर दिया जाता है। फिर उन्हें शांति और अहिंसा का दूत बनाकर दक्षिण अफ्रीका से सीधे चंपारण (बिहार, भारत) में भेज दिया जाता है। वहाँ वे विवशता में आतंकित कर के बलात् नील उगाने को बाध्य किसानों के आंदोलन का अपहरण कर लेते हैं। यानि हिंसक होते आंदोलन को अहिंसा शांति के आंदोलन में परिवर्तित कर देते हैं।
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दिन में आधी धोती लपेट कर शांति-अहिंसा के नाम पर भारतीयों की स्वतन्त्रता के लिये होनेवाले हर उग्र आंदोलन की हवा निकाल कर उसे बिना किसी परिणाम के अचानक समाप्त कर देते हैं, और अंग्रेजों को सुख-शांति से रहने देते हैं। दिन में आधी धोती लपेटे अहिंसा के ये पुजारी रात्रि में निर्वस्त्र होकर अपने साथ अपनी बेटी भतीजी के अलावा अनेक महिलाओं के साथ स्वयं पर परीक्षण करने के लिए सोते हैं। शारीरिक संभोग करने की शक्ति को जाँचने के लिये किये गए दुष्कृत्य को ब्रह्मचर्य का प्रयोग कहते हैं। (यह अपनी पुस्तक "सत्य के साथ मेरे प्रयोग" में उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है।)
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मुझे लगता है ये अंग्रेजों के एजेंट थे। अंग्रेजों की प्रेस और प्रचार ने ही इन्हें महान बनाया। अंग्रेजों ने हरेक क्रांतिकारी की भूमि जब्त कर ली थी, लेकिन इन्हें दक्षिण अफ्रीका में, और भारत में -- (वर्धा, साबरमती और नोआखली में) सैंकड़ों एकड़ भूमि निःशुल्क भेंट में दी। जब ये गिरफ्तार होते थे तब सब तरह से सुख-सुविधापूर्ण भवनों में इनको रखा जाता। रेलगाड़ी में यात्रा करते थे तब पूरा डिब्बा आरक्षित होता था। डिब्बा तो प्रथम श्रेणी का ही होता, लेकिन बाहर तृतीय श्रेणी लिख दिया जाता था। जिस बकरी का ये दूध पीते थे, उसको नित्य एक सेर बादाम खिलाया जाता था। नित्य एक सेर बादाम खिलाई हुई बकरी का दूध इनकी भौतिक सामर्थ्य को बनाए रखता।
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तुर्की के खलीफा अब्दुल मजीद को बापस खलीफा बनाए जाने के लिए इन्होंने खिलाफत आंदोलन आरंभ किया, जिसकी परिणिति मोपलाओं द्वारा केरल में हजारों हिंदुओं की निर्मम हत्या, बलात्कार, और देश के विभाजन के रूप में हुई। देश को बांटने वाला राष्ट्रपिता बन जाता है, और लाखों को मरवा देनेवाला अहिंसा का पुजारी और महात्मा बन जाता है। देश के विभाजन के ये स्वयं दोषी थे, जिसमें लाखों लोगों की हत्या हुई, और करोड़ों लोग विस्थापित हुये। अनशन कर के पाकिस्तान को आपने करोड़ों रुपये दिलवाए, और उसी धन से धनवान बने पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया। इनकी धर्म-निरपेक्षता एक ढोंग थी। दिल्ली के मंदिर में कुरान पढ़ने की जिद पूरी करने के लिए ये पुलिस बुला लेते थे, लेकिन कभी मस्जिद में गीता या रामायण पढ़ने की हिम्मत ये नहीं जुटा पाये। पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए १६ किलोमीटर चौड़े मार्ग को आप बनाना चाहते थे, जिसके दोनों ओर १० कि.मी. तक केवल मुस्लिम ही जमीन खरीद सकते थे। जिद पकड़ कर अनशन कर के आपने देश को ब्लैकमेल ही किया। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती के हत्यारे को आपने अपना भाई कहा, और उसे बचाया, यह आपका अक्षम्य अपराध था।
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फिर भी मैं आपको श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ, क्योंकि आप ने देश को नेतृत्व दिया। उस जमाने में सब नेताओं को या तो बंदी बना लिया जाता या उनको फांसी दे दी जाती। कैसे भी आपने अंग्रेजों को अपने अनुकूल रखते हुए देश का नेतृत्व संभाला। आपको उसके लिए धन्यवाद॥ यद्यपि आपका नेतृत्व भारत के लिए विनाशकारी था, क्योंकि आपने एक बहुत बड़ी उलझन और भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी थी देश में।
आज गांधी-जयंती है। भारत माता की जय॥
२ अक्तूबर २०२१
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पुनश्च: -- आपका नेतृत्व भारत के लिए विनाशकारी था, क्योंकि आपने एक बहुत बड़ी उलझन और भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी थी देश में। 

माँ काली ---

माँ काली
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जिस माँ के प्रकाश से समस्त नक्षत्रमंडल और ब्रह्मांड प्रकाशित हैं, उस माँ की महिमा के बारे में इस अकिंचन का कुछ भी लिखना, सूर्य को दीपक दिखाने का प्रयास मात्र सा है, जिसके लिए यह अकिंचन क्षमा याचना करता है| पता नहीं जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, उनका नाम "काली" क्यों रख दिया?
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सृष्टि की रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ काली ही है| सृष्टि, स्थिति और संहार उसकी अभिव्यक्ति मात्र है| यह संहार नकारात्मक नहीं है, यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है|
सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, मात्र रूपांतरित होता है| यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है| माँ प्रेम और करुणामयी है|
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माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है| उसकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है वह प्रतीकात्मक ही है|
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माँ के विग्रह में चार हाथ है| अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है| माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक है| ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं|
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माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं| यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं|
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माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं| माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है| किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है|
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माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है|
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उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य कि अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं|
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माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं|
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माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं|
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उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं|
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उनकी लीला में एक पैर भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है|
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माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है|
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माँ इतनी करुणामयी है कि उसके प्रेमसिन्धु में मेरी हिमालय सी भूलें भी कंकड़ पत्थर से अधिक नहीं है| माँ से मैंने उनके चरणों में आश्रय माँगा था तो उन्होनें अपने ह्रदय में ही स्थान दे दिया है| माँ कि यह करुणा और अनुकम्पा सब पर बनी रहे|
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जब तक मैं उनकी गोद में हूँ, तब तक ही जीवित हूँ| उनकी गोद से परे जो कुछ भी है वह मृत्यु का द्वार है| माँ, अपनी गोद में ही रखो, मृत्यु के द्वार पर मत जाने दो, अन्य कुछ भी मुझे नहीं चाहिए
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|| ॐ ॐ ॐ ||
२ अक्टूबर २०२०