Tuesday, 5 May 2020

मंदिरों में आरती के समय जाने से हृदय में भक्ति जागृत होती है ----

मंदिरों में आरती के समय जाने से हृदय में भक्ति जागृत होती है ----
.
किसी भी मंदिर में जहाँ ठाकुर जी की आरती विधि विधान से होती है, नियमित रूप से आरती के समय जाने पर हृदय में भक्ति निश्चित रूप से जागृत होती है| आरती के समय बजाये जाने वाले घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व शंख आदि की ध्वनि अनाहत चक्र पर चोट करती है| अनाहत चक्र से ही आध्यात्म का आरम्भ होता है और वहीं भक्ति का जागरण होता है| अनाहत चक्र का स्थान है मेरु दंड में ह्रदय की पीछे थोडा सा ऊपर पल्लों (shoulder blades) के बीच में| जो साधक नियमित रूप से ध्यान करते हैं उन्हें अनाहत चक्र के जागृत होने पर ऐसी ही ध्वनि सुनती है जो ह्रदय में दिव्य प्रेम की निरंतर वृद्धि करती है| उसी ध्वनी की ही नक़ल कर भारत में आरती के समय मंदिरों में घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व टाली आदि बजाने की परम्परा आरम्भ की गयी| मंदिरों में होने वाली घंटा-ध्वनि भी अनाहत चक्र को आहत करती है| फिर मंदिरों के शिखर आदि के बनाने की शैली भी ऐसी होती है कि वहाँ दिव्य स्पंदन बनते हैं और खूब देर तक बने रहते है| वहाँ जाते ही शांति का आभास होता है| बिना तुलसी-चरणामृत लिए प्रातःकाल कुछ भी आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए| पूरे दिन प्रभु का स्मरण रखें| यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः प्रारम्भ कर दें|
.
कभी ऐसे स्थान पर जाएँ जहाँ सरोवर हो या नदी के बहते हुए जल की ध्वनि आ रही हो, वहाँ विशुद्धि चक्र पर (कंठकूप के पीछे गर्दन के मूल में) ध्यान करना चाहिए| इससे विशुद्धि चक्र आहत होता है और चैतन्य के विस्तार की अनुभूति होती है| ऐसे स्थान पर गहरा ध्यान करने पर यह अनुभूति शीघ्र होती है कि आप यह देह नहीं बल्कि सर्वव्यापक चैतन्य हैं|
.
आज्ञाचक्र पर ध्यान करते करते प्रणव की ध्वनि (समुद्र की गर्जना जैसी) सुननी आरम्भ हो जाती है तब उसी पर ध्यान करना चाहिए| मूलाधारचक्र पर भ्रमर या मधुमक्खियों के गुंजन, स्वाधिष्ठानचक्र पर बांसुरी कि ध्वनि, मणिपुरचक्र पर वीणा की ध्वनि, अनाहतचक्र पर घंटे,घड़ियाल,नगाड़े आदि की मिलीजुली ध्वनि, विशुद्धिचक्र पर बहते जल की ध्वनि, और आज्ञाचक्र पर समुद्र की गर्जना जैसी ध्वनि सुनाई देती है| इन ध्वनियों से इन चक्रों की जागृति भी होती है|
.
साधना के लिए नीचे से ऊपर की ओर निम्न बीजमंत्रों का क्रमशः जाप करें| नीचे के तीन चक्रों पर कम समय दें और ऊपर के तीन चक्रों पर अधिक|
मूलाधार पर लं लं लं लं लं ......| स्वाधिष्ठान पर वं वं वं वं वं .....| मणिपुर पर रं रं रं रं रं .......| अनाहत पर यं यं यं यं यं .....| विशुद्धि पर हं हं हं हं हं .....| आज्ञाचक्र पर ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ .....| सहस्त्रार में स्थिति सद्गुरु की कृपा से ही होती है| चक्र जागरण का एकमात्र उद्देश्य है चेतना और भक्ति का विस्तार| कुण्डलिनी जागरण भी स्वतः ही होता है जो हमारी चेतना को ईश्वर की चेतना से संयुक्त कर देता है|
.
साधना में सबसे बड़ी और पूर्ण आवश्यक है --- भक्ति| बिना भक्ति के आप कितनी भी यंत्रवत (mechanical) साधना कर लो, कुछ भी लाभ नहीं होगा|
लोग मुझसे प्रश्न करते हैं कि भक्ति से क्या लाभ होगा? यदि दो पैसे का लाभ हो तो भक्ति करें अन्यथा क्यों समय नष्ट करें| मैं पूरी गारंटी के साथ कहता हूँ कि भगवान की भक्ति से लाभ ही लाभ होगा| अधिकाँश लोगों के लिए ईश्वर तो एक साधन है और संसार साध्य| पर वास्तविकता इससे विपरीत है|
नारद भक्ति-सूत्र में नारद जी कहते हैं कि भगवान के भक्त अपने कुल, जाति का ही गौरव नहीं होते वल्कि पूरे विश्व को ही गौरवान्वित करते हैं| ऐसे दिव्य पुरुष संसार के प्राणियों में दयाभाव व सहिष्णुता बढ़ाकर जगत की वासना को शुद्ध करते हैं| ऐसे प्राणी धरती पर चलते फिरते भगवान हैं| वे जहाँ रहते हैं वह स्थान तीर्थ बन जाता है| भक्तों के पितृगण आनंदित होते हैं, देवता नृत्य करते हैं और यह पृथ्वी इनसे सनाथ हो जाती है|
.
भक्ति के मार्ग में अग्रसर होने के लिए किसी शुभ समय की प्रतीक्षा न करें| अभी इसी समय से बढकर कोई और अच्छा समय है ही नहीं| अपने जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा को ही बनाएं, जीवन का हर कार्य उन्हीं की प्रसन्नता के लिए करें और उन्हीं को कर्ता, साक्षी और दृष्टा भी बनाएँ|
हरिः ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
६ मार्च २०२०

होली की दारुण रात्रि की तैयारी अभी से करें .....

होली की दारुण रात्रि की तैयारी अभी से करें .....
-------------------------------------------------
सर्वप्रथम भगवान नृसिंह और भक्त प्रहलाद को नमन| उन की परम कृपा मुझ अकिंचन पर निरंतर बनी रहे| भगवान नृसिंह ने जिस तरह हिरण्यकशिपु को अपनी गोद में लेटाकर उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर दिया था, वैसे ही वे मेरे लोभ व अहंकार रूपी हिरण्यकशिपु को मार डालें| कुछ बचे तो उन का प्रेम ही बचे, बाकी सब नष्ट हो जाये| असत्य का जो आवरण मुझे परमात्मा से दूर रखे हुए है, वह आवरण, इस नश्वर देह का बोध और इसकी चेतना भी नष्ट हो जाए| हमारे राष्ट्र भारतवर्ष के भीतर और बाहर के सभी शत्रुओं का नाश हो| भारतवर्ष में कहीं भी असत्य का अंधकार न रहे|
इस सुअवसर का सदुपयोग करें और समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें| एक विराट आध्यात्मिक शक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है| यह कार्य हमें करना ही पड़ेगा| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
.
पुनश्चः आप सब को नमन और होली की शुभ कामनाएँ| ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
५ मार्च २०२०

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा, करहु सो बेगि दास मैं तोरा .....

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा, करहु सो बेगि दास मैं तोरा .....
भगवान हमें बुरे विचारों और बुरी संगत से बचायें| सुना था कि मनुष्य के रूप में जन्म मिलना बड़ा दुर्लभ है| पर आजकल तो बड़ा सुलभ हो गया है| ये ८४ लाख वाला चक्र अब समाप्त हो गया लगता है| समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर समाज को भ्रमित रखने के लिए बहुत सारे असुरों ने जन्म ले लिया है| इनका आनन्द सिर्फ नशा और सेक्स ही होता है| ये दूसरों के दुःख में सुखी और दूसरों के सुख में दुःखी होते हैं| लोगों में असंतोष को जन्म देकर उनमें द्वेष पैदा करना इनका स्वभाव होता है| धर्म से लोगों को विमुख करना और अन्याय का समर्थन, इनका मनोरंजन होता है| ये बड़े शक्तिशाली लोग हैं| इन से से दूर रहने में ही कल्याण है| भगवान हम सब की रक्षा करें|
५ मार्च २०२० 

तत्व रूप में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही गुरु-रूप परमब्रह्म हैं ....

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने| प्रणत: क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||
तत्व रूप में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं ही गुरु-रूप परमब्रह्म हैं| वे ही आत्मगुरु है, वे ही विश्वगुरु हैं, परमब्रह्म और परमशिव भी वे ही हैं| हम उन के एक उपकरण मात्र हैं, कर्ता तो वे ही हैं| हमारा पूरा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) उन्हें ही समर्पित हो| आज्ञाचक्र में उनके बीजमंत्र के जप से अज्ञानरूपी रुद्र-ग्रंथि का भेदन होता है| ज्योतिर्मय आकाश-तत्व कूटस्थ में उन के ध्यान, और प्राण-तत्व के साथ मेरुदंड के चक्रों में उनके भागवत मंत्र के जप से कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होती है, जो अंततः ब्रह्मरंध्र का भेदन कर अनंतता से परे परमशिव से एकाकार हो जाती है| वे ही मोक्ष है, वे ही मुक्ति हैं, वे ही उपास्य हैं, वे ही उपासना हैं, और वे ही उपासक हैं| वे हमारी सतत रक्षा करें और इतनी सामर्थ्य और शक्ति दें कि हम पूर्णरूपेण समर्पित होकर उनके साथ एक हो सकें|
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः|| ॐ नमो भगवते वासुदेवाय|| ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
५ मार्च २०२०

रक्त से किस की प्यास बुझती है? आतंक क्या है? आतंकवादी कौन है? आतंक का सामना कैसे करें? ....

रक्त से किस की प्यास बुझती है? आतंक क्या है? आतंकवादी कौन है? आतंक का सामना कैसे करें?
.
रक्त से नरपिशाचों और हिंसक पशुओं की ही प्यास बुझती है| हिंसा और अत्याचार के द्वारा, जोर जुल्म से, तलवार की नोक पर दूसरों से अपनी बात मनवाना आतंक है, और जो ऐसा करते हैं, वे आतंकवादी है| भारत पिछले एक हजार वर्षों से आतंकवाद को झेल रहा है| आतंकवादी चाहते हैं कि या तो हम उनके गुलाम बन कर रहें, या उनकी बात स्वीकार कर उनके साथ एक हो जाएँ| हाल ही में दिल्ली और देश के अन्य भागों में हुए दंगे करने और कराने वाले ..... नरपिशाच, हिंसक-पशु आतंकवादी ही थे| उनका यह कृत्य ही आतंक था|
.
अब भारत को अपना आत्मबल जागृत कर उठना ही होगा| भारत का भविष्य ही इस पृथ्वी का और सृष्टि का भविष्य है| मनुष्य अपनी निजी शक्ति से पिशाचों से युद्ध नहीं कर सकता| उसे दैवीय सहायता की आवश्यकता पड़ती ही है| अपने निज जीवन में परमात्मा की शक्ति को अवतरित कर के ही हम पैशाचिक शक्तियों को पराभूत कर सकते हैं| इसके लिए हम निजस्वभावानुसार भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण या श्रीहनुमान या भगवती दुर्गा की आराधना करते हुए स्वयं शक्तिशाली बनें और अपनी कमजोरियों को दूर कर भारतवर्ष की रक्षा करें|
.
भारत विजयी होगा, निश्चित रूप से होगा| ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ मार्च २०२०

भगवान को निश्चित रूप से पाने का सबसे सरल व लघुत्तम (shortcut) मार्ग :----

भगवान को निश्चित रूप से पाने का सबसे सरल व लघुत्तम (shortcut) मार्ग :----
-----------------------------------------------------------------------------------
परमात्मा की अनंतता और सर्वव्यापकता का निरंतर सचेतन अभ्यास बहुत बड़ी साधना है| भगवान कोई ऊपर से उतर कर आने वाली चीज नहीं हैं| वे निरंतर हमारे चैतन्य में हैं| वे यहीं है, इसी समय हैं और कभी हम से दूर हो ही नहीं सकते| सतत रूप से उनका स्मरण तो करना ही होगा| भगवान कहते हैं ....
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः| तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः||१८:१४||
अनन्य चित्त वाला योगी सर्वदा निरन्तर प्रतिदिन मुझ परमेश्वरका स्मरण किया करता है| (छः महीने या एक वर्ष ही नहीं, जीवनपर्यन्त जो निरन्तर मेरा स्मरण करता है) हे पार्थ उस नित्यसमाधिस्थ योगीके लिये मैं सुलभ हूँ|
.
"मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय| निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः||१२:८||"
तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है||
"अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्| अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय||१२:९||"
हे धनंजय ! यदि तुम अपने मन को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं हो, तो अभ्यासयोग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त करने की इच्छा (अर्थात् प्रयत्न) करो||
"अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव| मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि||१२:१०||"
यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो मत्कर्म परायण बनो; इस प्रकार मेरे लिए कर्मों को करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे||
"अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः| सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्||१२:११||"
"श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते| ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्||१२:१२||"
और यदि इसको भी करने के लिए तुम असमर्थ हो, तो आत्मसंयम से युक्त होकर मेरी प्राप्ति रूप योग का आश्रय लेकर, तुम समस्त कर्मों के फल का त्याग करो||
अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है; ज्ञान से श्रेष्ठ ध्यान है और ध्यान से भी श्रेष्ठ कर्मफल त्याग है; त्याग से तत्काल ही शान्ति मिलती है||
"अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च| निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी||१२:१३||"
भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है||
"सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः| मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः||१२:१४||"
जो संयतात्मा, दृढ़निश्चयी योगी सदा सन्तुष्ट है, जो अपने मन और बुद्धि को मुझमें अर्पण किये हुए है, जो ऐसा मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है||
"यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः| हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः||१२:१५||"
जिससे कोई लोक (अर्थात् जीव, व्यक्ति) उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी व्यक्ति से उद्वेग अनुभव नहीं करता तथा जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता) भय और उद्वेगों से मुक्त है,वह भक्त मुझे प्रिय है||
.
सबसे अंत में यह सदा याद रखें .....
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः| तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम||१८:७८||"
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है||
.
निरंतर हृदय में उन की उपस्थिति का आभास और अपने सभी कर्मों व कर्मफलों का उन्हें समर्पण ...... उन्हें पाने का सब से आसान Short Cut है|
ॐ तत्सत् | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||
कृपा शंकर
३ मार्च २०२०

हारिये ना हिम्मत, बिसारिये न हरिः नाम -----

हारिये ना हिम्मत, बिसारिये न हरिः नाम| जब भी समय मिले तब कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें| गीता में जिस ब्राह्मी स्थिति की बात कही गई है, निश्चय पूर्वक प्रयास करते हुए आध्यात्म की उस परावस्था में रहें| सारा जगत ही ब्रह्ममय है| हमारे हृदय में इतनी पवित्रता हो जिसे देखकर श्वेत कमल भी शरमा जाए| किसी भी परिस्थिति में परमात्मा के अपने इष्ट स्वरूप की उपासना न छोड़ें| पता नहीं कितने जन्मों में किए हुए पुण्य कर्मों के फलस्वरूप हमें भक्ति का यह अवसर मिला है| कहीं ऐसा न हो कि हमारी ही उपेक्षा से परमात्मा को पाने की हमारी अभीप्सा ही समाप्त हो जाए| जीवन में अंधकारमय प्रतिकूल झंझावात आते ही रहते हैं जिनसे हमें विचलित नहीं होना चाहिए| इनसे तो हमारी प्रखर चेतना ही जागृत होती है व अंतर का सौंदर्य और भी अधिक निखर कर बाहर आता है| समस्त सृष्टि चैतन्य का एक खेल मात्र है| जो कुछ भी देश-काल में घटित हो रहा है वह एक विराट चुम्बकीय क्षेत्र के दो विपरीत ध्रुवों के बीच का तनाव या घर्षण मात्र है| इसे ईश्वर के मन का एक विचार भी कह सकते हैं| प्रकृति, माया और जीव उसी परम चैतन्य की अभिव्यक्तियाँ हैं| सृष्टि के इस रहस्य को समझ कर उस परम चैतन्य से अंततः जुड़ना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है| कभी भी विचलित न हों| हम सब सच्चिदानंद परमात्मा की ही अभिव्यक्तियाँ हैं|
.
आध्यात्म में जितना हमें परमात्मा से प्रेम है उतना ही इस भौतिक जगत में अपने राष्ट्र भारतवर्ष की अस्मिता से भी है| राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए शस्त्र भी धारण करना पड़े तो वह भी धारण करेंगे, प्राणोत्सर्ग भी करना पड़े तो वह भी करेंगे| पता नहीं कितनी बार शस्त्रास्त्र धारण किये हैं और प्राण भी दिए हैं| राष्ट्र को अब और खंडित नहीं होने देंगे|
.
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१ मार्च २०२०