Sunday, 21 August 2016

परमात्मा को निरंतर अपने चित्त में, अपने अस्तित्व में प्रवाहित होने दो, सब बातों का सार यही है .....

परमात्मा को निरंतर अपने चित्त में, अपने अस्तित्व में प्रवाहित होने दो,
सब बातों का सार यही है .....
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कई बार मनुष्य कोई जघन्य अपराध जैसे ह्त्या, बलात्कार या अन्य कोई दुष्कर्म कर बैठता है फिर सोचता है कि मेरे होते हुए यह सब कैसे हुआ, मैं तो ऐसा कर ही नहीं सकता था| पर उसे यह नहीं पता होता कि वह किन्हीं आसुरी शक्तियों का शिकार हो गया था जिन्होंने उस पर अधिकार कर के यह दुष्कर्म करवाया|
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सूक्ष्म जगत की आसुरी और पैशाचिक शक्तियाँ निरंतर अपने शिकार ढूँढती रहती हैं| जिसके भी चित्त में वासनाएँ होती हैं उस व्यक्ति पर अपना अधिकार कर वे उसे अपना उपकरण बना लेती हैं और उस से सारे गलत काम करवाती हैं|
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जितना हमारा गलत और वासनात्मक चिंतन होता है, उतना ही हम उन आसुरी शक्तियों को स्वयं पर अधिकार करने के लिए निमंत्रित करते हैं| भौतिक जगत पूर्ण रूप से सूक्ष्म जगत के अंतर्गत है| सूक्ष्म जगत की अच्छी या बुरी शक्तियाँ ही यहाँ अपना कार्य कर रही है|
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अगर हम संसार में कोई अच्छा कार्य करना चाहते हैं उसका एक ही उपाय है कि परमात्मा को निरंतर स्वयं के भीतर प्रवाहित होने दें, उसके उपकरण बन जाएँ|
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वह सदा हमारे साथ है| हमारे ह्रदय में भी वो ही धड़क रहा है, व हमारी हर साँस में वह ही है| उस के प्रति सजग रहो| साकार भी वही है और निराकार भी वही है| साकार ही निराकार का आधार है| साकार की साधना करते करते वह उससे भी परे हो जाता है|
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ध्यान साधना के लिए परमात्मा के दो साकार रूप सर्वश्रेष्ठ हैं -- एक भगवान् नारायण का और दूसरा भगवान् शिव का| इनमें से जो भी हमारा प्रिय रूप हो निरंतर उसे अपने चित्त में रखें| उस के प्रति समर्पित होने का निरंतर प्रयास करते रहें| उसका निरंतर स्मरण करें| उन्हें या सद्गुरु जो अपने भीतर कार्य करने दें, और उन के प्रति समर्पित हो जाएँ, व उन्हें ही अपने जीवन का कर्ता बनाएँ|

ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||

साधना का एक अति गूढ़ तत्व ------ "संधिक्षण" ....

साधना का एक अति गूढ़ तत्व ------ "संधिक्षण" .....
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संधिक्षण में की गयी साधना ही "संध्या" कहलाती है| संधिक्षण दिन में चार बार आता है| यह अति शुभ मुहूर्त होता है| पर यह मात्र एक क्षण का ही होता है| यही समय "संध्या" करने का होता है|
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क्षण, स्थान और काल का महत्व साधना में बहुत महत्वपूर्ण है| किसी भी सिद्धि की प्राप्ति इस तथ्य पर निर्भर करती है कि किस स्थान पर, किस काल में और किस क्षण में साधना सम्पन्न हुई| क्षणों में संधिक्षण का विशेष महत्व है| उस समय मन्त्रचेतना प्रबल होती है और सिद्धि आसानी से मिल जाती है|
आजकल समय का प्रभाव ही ऐसा है कि मनुष्य तपस्यादि की परवाह न कर बाहरी दिखावे और आडम्बर में फंस गया है|
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जब रात्री का अवसान होता है और ऊषा का आगमन होता है ---- तब एक संधिक्षण आता है जिसमें किये हुए जप-तप का विशेष फल होता है| ऐसे ही मध्यान्ह में एक संधिक्षण आता है जो सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के बिलकुल मध्य में होता है जिसकी गणना करनी होती है| सायंकाल को भी ऐसे ही दिन की समाप्ति पर रात्री से पूर्व एक संधिक्षण आता है| मध्यरात्री को भी एक महाक्षण आता है जो सूर्यास्त और सूर्योदय के बिल्कुल मध्य में होता है जिसका भी हिसाब लगाना पड़ता है|
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इन शुभ क्षणों में किसी सिद्ध क्षेत्र में, ध्यानासन पर बैठकर किसी सिद्ध मन्त्र की गुरुपरम्परानुसार साधना की जाए तो सिद्धिलाभ अति शीघ्र होता है|
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ब्राह्मणों के लिए द्विकाल यानि प्रातः और सायं की संध्या अनिवार्य है| जिनके पास समय होता है वे त्रिकालसंध्या भी करते हैं| श्रीविद्या के उपासक मध्यरात्रि में तुरीय संध्या करते हैं|
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एक रहस्य और भी है| दो तिथियों के मिलने का समय भी अति पवित्र होता है|
प्रातः और सायंकाल की संध्या तो यथासम्भव अवश्य ही करनी चाहिए|
ॐ नमः शिवाय||

ॐ ॐ ॐ ||

आजकल परमात्मा हम सब को निरंतर कुछ अधिक ही याद कर रहे हैं ....

आजकल परमात्मा हम सब को निरंतर कुछ अधिक ही याद कर रहे हैं ....
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जीवन में आ रही सभी बाधाओं, कठिनाइयों, पीड़ाओं, दुःखों, कष्टों, अभिशापों और सभी प्रकार की विपरीतताओं का स्वागत है| ये सब भगवान की कृपा हैं जो हमें उनकी याद दिलाने के लिए निरंतर आती हैं| इनके बिना सृष्टिकर्ता को कौन याद करेगा ?
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प्रभुकृपा से ये सब तो है हीं, साथ साथ परमात्मा के आशीर्वाद और महती कृपा से बौद्धिक स्तर पर कोई किसी भी तरह की कणमात्र भी शंका या संदेह नहीं है| सोच व विचारों में स्पष्टता है|
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अब एक ही अभीप्सा है ..... बचा-खुचा अवशिष्ट जीवन परमात्मा के ध्यान में ही बिता दिया जाए, और समर्पण में पूर्णता हो| अन्य कोई कामना नहीं है|
भगवान योग-क्षेम का वहन भी करेंगे और निराश्रय की रक्षा भी करेंगे|
ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ !!

Friday, 19 August 2016

अपने समय के एक-एक क्षणका सदुपयोग और ईश्वर प्रदत्त विवेक के प्रकाश में सारे कार्य करें .....

अपने समय के एक-एक क्षणका सदुपयोग
और ईश्वर प्रदत्त विवेक के प्रकाश में सारे कार्य करें .....
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हमें अपने समय के एक एक क्षण का सदुपयोग करना होगा अन्यथा हम स्वयं को क्षमा नहीं कर पाएंगे | आग लगने पर कुआँ नहीं खोदा जा सकता, कुएँ को तो पहिले से ही खोद कर रखना पड़ता है|
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जिस भौतिक विश्व में हम रहते हैं, उससे भी बहुत अधिक बड़ा एक सूक्ष्म जगत भी हमारे चारों ओर है, जिसमें नकारात्मक और सकारात्मक दोनों तरह की सत्ताएँ हैं|
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जितना हम अपनी दिव्यता की ओर बढ़ते हैं, ये नकारात्मक शक्तियां उतनी ही प्रबलता से हम पर अधिकार करने का प्रयास करती हैं| सबसे पहिले वे हमारा मनोबल क्षीण करती हैं| इनका उपकरण बनने से बचने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है| इसके लिए निरंतर हरि स्मरण, सत्संग, स्वाध्याय और कुसंग-त्याग व सात्विक भोजन ये ही उपाय हैं| अपने विचारों और भावों पर सदा ध्यान रखें और अच्छे संकल्प करें|

भगवान सबकी रक्षा करें| हमारा समर्पण पूर्ण हो| ॐ गुरु ! जय गुरु !
ॐ ॐ ॐ !!

राजस्थान के लोक-देवता गोगा जी .....

राजस्थान के लोकदेवता गोगा जी .....
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वीर प्रसूता भारत माँ ने जैसे और जितने वीर उत्पन्न किये हैं वैसे पूरे विश्व के इतिहास में कहीं भी नहीं हुए| भारत का इतिहास सदा गौरवशाली रहा है| हजारों वर्षों के वैभव और समृद्धि के बाद पिछले एक हज़ार वर्षों का कालखंड कुछ खराब रहा जो हमारे ही सामूहिक बुरे कर्मों का फल था| वह समय ही खराब था जो निकल चुका है| पर इसमें कभी भी भारत ने पूर्णतः पराधीनता स्वीकार नहीं की और निरंतर अपना संघर्ष जारी रखा| राजस्थान में अनेक वीरों को आज भी लोक देवता के रूप में पूजा जाता है| इनमें प्रमुख हैं ---- पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी, हडबुजी और महाजी| इन सब ने धर्मरक्षार्थ बड़े भीषण युद्ध किये और कीर्ति अर्जित की| निम्न लेख लोकदेवता गोगाजी को समर्पित है|
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गोगा नवमी पर पूरे राजस्थान में घर घर में पकवान बनाए जाते हैं और मिट्टी से बनी गोगाजी की प्रतिमा को प्रसाद लगाकर रक्षाबन्धन पर बाँधी हुई राखियाँ व रक्षासूत्र खोलकर उन्हें चढाए जाते हैं|
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जब महमूद गजनवी सोमनाथ मंदिर का विध्वंश करने और लूटने जा रहा था तब राजपूताने में गोगाजी (गोगा राव चौहान) ने ही सर्वप्रथम उसका रास्ता रोका था| उन्होंने उसके द्वारा भेजे गए हीरे जवाहरातों के थाल पर ठोकर मार दी और अपनी छोटी से सेना को युद्ध का आदेश दिया| इसका विवरण आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने अपनी कालजयी कृति "जय सोमनाथ" में भी किया है|
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घमासान युद्ध हुआ| गजनी की विशाल सेना के सामने उनकी छोटी सी सेना कहाँ टिकती| वृद्ध गोगाजी ने अपने सभी पुत्रों, पौत्रों, भाइयों, भतीजों, भांजों व सभी संबंधियों सहित जन्मभूमि और धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दे दिया| उनके परिवार व सैनिकों की समस्त मातृशक्ति ने जीवित अग्नि में कूद कर जौहर किया ताकि विधर्मी उनकी देह को ना छू सकें|
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उनका एक पुत्र सज्जन बचकर सोमनाथ चला गया| मंदिर के विध्वंस के बाद जब गज़नवी की सेना लूट के माल के साथ बापस लौट रही थीं तब वह उनका मार्गदर्शक बन गया और उसकी सेना को मरुभूमि में ऐसा फँसाया कि गजनवी की सेना के हजारो सिपाही प्यास से मर गए|
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युद्ध में जिस स्थान पर गोगाजी का शरीर गिरा था उसे गोगामेडी कहते हैं| यह स्थान हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में है| इसके पास में ही गोरखटीला है तथा नाथ संप्रदाय का विशाल मंदिर स्थित है|
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नागवंशी क्षत्रीय चौहान वीर गोगाजी का जन्म विक्रम संवत 1003 में चुरू जिले के ददरेवा गाँव में हुआ था| गोगाजी को गुरु गोरखनाथ जी से एक वरदान प्राप्त था अतः उन्हें सर्पों का देवता माना जाता है| आज भी सर्पदंश से मुक्ति के लिए गोगाजी की पूजा की जाती है| गोगाजी के प्रतीक के रूप में पत्थर या लकडी पर सर्प मूर्ती उत्कीर्ण की जाती है| लोकधारणा है कि सर्प दंश से प्रभावित व्यक्ति को यदि गोगाजी की मेडी तक लाया जाये तो वह व्यक्ति सर्प विष से मुक्त हो जाता है| भादवा माह के शुक्लपक्ष तथा कृष्णपक्ष की नवमियों को गोगाजी की स्मृति में मेला लगता है| नाथ परम्परा के साधुओं के ‍लिए यह स्थान बहुत महत्व रखता है।
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चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान की तरह गोगाजी भी एक परम वीर यशस्वी राजा हुए| गोगाजी का राज्य सतलुज से हांसी (हरियाणा) तक था। ये गुरु गोरक्षनाथ के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। इनका जन्म भी गुरु गोरखनाथ के वरदान से हुआ था| विद्वानों व इतिहासकारों ने उनके जीवन को शौर्य, धर्म, पराक्रम व उच्च जीवन आदर्शों का प्रतीक माना है।
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भारत में एक बहुत बड़े ऐतिहासिक शोध की और सही इतिहास पढाये जाने की आवश्यकता है| हमें हमारा गौरवशाली इतिहास नहीं पढ़ाया जाता, सिर्फ पराधीनता की दास्ताँ पढाई जाती है| हमें वो ही इतिहास पढ़ाया जाता है जिसे हमारे शत्रुओं ने हमें नीचा दिखाने के लिए लिखा था|
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जय हो भारतभूमि और सनातन धर्म, जिसने ऐसे वीरों को जन्म दिया|
जय जननी जय भारत !
ॐ ॐ ॐ ||

भारत कभी निरक्षर नहीं था ....

भारत कभी निरक्षर नहीं था ......
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(लेखक : Vinay Jha )
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लार्ड विलियम बेंटिक के समय जब लार्ड मैकॉले की नयी शिक्षा नीति प्रस्तुत की गयी थी, उसी काल में बंगाल-बिहार की पारम्परिक शिक्षा पर एडम महोदय की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी थी जो मैंने पढ़ी है | इसमें स्पष्ट लिखा है कि लड़कियों की शिक्षा के बारे में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, किन्तु लड़कों के बारे में एडम महोदय का निष्कर्ष है कि उस प्रांत में कुल 150748 गाँवों में लगभग एक लाख पाठशालाएं थीं | अतः दो तिहाई गाँवों में स्कूल थे | अर्थात केवल छोटे गाँवों में ही स्कूल नहीं थे |
एडम महोदय के शब्दों में पाठशाला जाने योग्य आयुवर्ग के सभी छात्रों की कुल अनुमानित संख्या को ध्यान में रखने पर प्रत्येक "31 या 32 लड़कों पर एक स्कूल था" !! एडम महोदय के पास विशुद्ध आंकड़े नहीं थे, किन्तु विभिन्न स्रोतों से उन्होंने जो आंकड़े उपलब्ध किये वे लगभग विश्वसनीय थे | उनका निष्कर्ष था कि "निम्नतम वर्गों में भी अपने लड़कों को शिक्षित करने की इच्छा मन में गहरी बैठी थी" (मैंने शब्दशः अनुवाद किया है)| उनकी रिपोर्ट के पृष्ठ 19 में ये बातें लिखी हैं , जो सिद्ध करते हैं कि सभी जातियों , यहाँ तक कि तथाकथित जनजातियों और तथाकथित दलितों में भी लगभग शत-प्रतिशत साक्षरता थी, औरतों को छोड़कर !! औरतों के बारे में आंकडें उपलब्ध नहीं थे, किन्तु एडम महोदय का मत है कि पुरुषों से औरतें पीछे थीं | उस समय इंग्लैंड में भी औरतों की साक्षरता पुरुषों से लगभग 20% - 25% कम थी |
मनोरंजक तथ्य यह है कि एडम महोदय के अनुसार कलकत्ता में स्कूलों और छात्रों की संख्या आबादी के हिसाब से देहातों की अपेक्षा बहुत कम थी (पृष्ठ 20) !! अर्थात जहाँ अंग्रेजी सत्ता अधिक प्रभावी थी, वहाँ साक्षरता कम थी ! अब समझ में आ गया न कि भारत में शिक्षा और साक्षरता का विनाश किन लोगों ने किया ? जिन्होंने शिक्षा का विनाश किया उन्होंने ही प्रचार किया कि ब्राह्मण दूसरों को पढने नहीं देते थे और ब्राह्मणों ने ही दलितों को हर अधिकारों से वंचित किया जिस कारण अम्बेडकर को "सामाजिक तथा शैक्षणिक पिछड़ों" के लिए आरक्षण का अनुच्छेद संविधान में जोड़ना पडा और मनुस्मृति जलानी पड़ी, जबकि एडम महोदय की रिपोर्ट में शिक्षकों की जातियों और फीस आदि पर विस्तृत विवरण हैं |
कमाल की बात है कि फारसी मदरसों की संख्या बहुत कम थी, जिससे स्पष्ट है कि अधिकाँश मुस्लिम बच्चे भी ब्राह्मण शिक्षकों की पाठशालाओं में पढ़ते थे ! उदाहरणार्थ, एडम महोदय ने Dr Buchanan की रिपोर्ट (1808) को उद्धृत किया है जिसमें दिनाजपुर के विशाल जिले के बारे में उल्लेख है कि आबादी में 70% मुस्लिम थे किन्तु 9 फारसी मदरसे थे और 135 हिन्दू पाठशाला थे जिनमें 16 उच्च शिक्षा के लिए थे (पृष्ठ 76, एडम रिपोर्ट) !
एडम महोदय ने स्पष्ट लिखा है कि दिव्य (वैदिक) विद्याएँ ब्राह्मण सबको नहीं देते थे | किन्तु सांसारिक विद्याओं पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था |
उन्नीसवीं शती के आरम्भ तक साक्षरता लगभग 10% ही रह गयी थी, और वह भी मुख्यतः आधुनिक पद्धति वाले स्कूलों द्वारा ही |
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पहले यह तो प्रचारित करना चाहिए कि भारत निरक्षर नहीं था जैसा कि अंग्रेजों ने बना दिया | बंगाल में एक लाख पाठशालाएं थीं तो देश में कितनी होंगी ? जनसंख्या के हिसाब से छ-सात लाख, जो आज भी नहीं है ! कम से कम दैनन्दिन का गणित और भाषा की पढ़ाई थी न !! आज तो बड़े बड़े वैज्ञानिकों और गणित के प्रोफेसरों को देखता हूँ परचून की दूकान पर स्मार्टफ़ोन के कैलकुलेटर पर हिसाब जोड़ते हुए | भूगोल के विद्वान हैं किन्तु अपने गाँव का भूगोल नहीं जानते और न गाँवके लिए उनका ज्ञान किसी काम का है | इतिहासकार हैं किन्तु अपने पाँच पुरखों का भी नाम नहीं जानते, अपने गाँव और समाज के इतिहास में कोई रूचि नहीं | निपट मूर्ख हैं, कूड़ा-कर्कट दिमाग में ठूँसकर विद्वान बनते हैं | इनसे बेहतर तो अनपढ़ लोग हैं जो श्रम करके खाते हैं, गरीब देश में लाखों का वेतन नहीं लूटते | पादरी विलियम एडम की बाद वाली रिपोर्टों में अधूरी और झूठी बातें जुड़वायी गयीं क्योंकि देशी पाठशालाओं को बन्द कराने की मानसिकता ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बना ली थी, 1832 में ही भारतीय विद्याओं से घृणा करने वाले लार्ड मैकॉले भारत सम्बन्धी मामलों पर लन्दन में सबसे बड़े हाकिम बन गए थे |
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19 वीं शताब्दी में (1857 के आसपास) मेरे गाँव में केशव चौधरी जी नाम के ब्राह्मण बिना फीस के पाठशाला चलाते थे जिसमें सबको शिक्षा मिलती थी, किन्तु वैदिक विद्याएँ केवल ब्राह्मणों को दी जाती थी | उस गाँव में तथाकथित दलित भी बहुत से हैं | केशव चौधरी के बाद उनके शिष्य पशुपति ठाकुर जी ने पाठशाला का प्रभार लिया | पशुपति ठाकुर जी घर से दूर गाँव की सीमा के बाहर एक स्वनिर्मित मन्दिर पर रहते थे जहाँ उनका भोजन घरवाले पँहुचा देते थे | उनके पाँचों पुत्र प्रोफेसर बने, बड़े पुत्र वाचस्पति ठाकुर जी BPSC (बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन) के अध्यक्ष बने, किन्तु पशुपति ठाकुर जी के मरणोपरान्त संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना उनके शिष्यों ने की (उनके शिष्य और ग्रामीण सांसद ने) ताकि हिन्दू पाठशाला की अति-प्राचीन परम्परा बन्द न हो (उसी पाठशाला में पुरी गोवर्धन मठ के वर्तमान शंकराचार्य जी के दादा भी पढ़ते थे जो मेरे ही ग्रामीण थे किन्तु सौ वर्ष पहले पास के गाँव में प्रवास कर गए) | उस संस्कृत महाविद्यालय में प्राथमिक विद्यालय भी अन्तर्निहित था (अभी भी है) | संस्कृत महाविद्यालय के प्रथम सचिव वाचस्पति ठाकुर जी थे और वर्त्तमान सचिव मैं हूँ |
केशव चौधरी जी की अधिकाँश भूमि पर दलितों ने कब्जा जमा लिया, कुछ भूमि दलितों से बचाने के लिए उनके वंशजों ने संस्कृत महाविद्यालय को दान में दे दिया |
आज से चार वर्ष पूर्व उनके वंशज की 17 वर्ष की नाबालिग बच्ची का उन्हीं की भूमि पर बसने वाले एक दलित ने अपहरण कर लिया | हमलोगों ने अपहर्ता को पुलिस से पकड़वाया, किन्तु हरिजन एक्ट के भय से बच्ची के पिता ने मुकदमा नहीं किया | अपहर्ता का पिता दारू की अवैध भट्ठी चलाता था जिसे लोगों ने बन्द कराया तो संस्कृत महाविद्यालय के ठीक मुहाने पर शराब का ठेका खोल दिया जिसे मैंने बन्द कराया | उसने अपने बेटे को सिखाया था कि कहीं से ब्राह्मणी पुतोहू ला दो, जितना पैसा चाहिए दूंगा ! बच्ची पिता के घर लौटी किन्तु दोबारा उसी दलित ने अपहरण कर लिया, जिसके बाद उस बच्ची के पिता शर्म के मारे गाँव छोड़कर भाग गए |
केशव चौधरी जी दलितों को न पढ़ाते और उनके पोते ने दलितों को बसने के लिए भूमि नहीं दी होती तो आज केशव चौधरी का वंश बर्बाद और बदनाम न होता ! उन्हीं दलितों ने संस्कृत महाविद्यालय को बन्द कराने के लिए कई बार हंगामा किया और दूर से नक्सलों को भी बुलाया जिन्हें समझा कर मैंने विदाकर दिया और उनके स्थानीय कम्युनिस्ट (CPI) मित्रों पर मुकदमा करके गिरफ्तारी का आदेश करा दिया | अब इन लोगों को टीवी द्वारा अम्बेडकर की भी जानकारी मिल गयी है और अब उन्हें सिखाया जा रहा है कि हज़ारों वर्षों से ब्राह्मणोंने उनका शोषण किया है और पढने नहीं दिया | कम्युनिस्ट पार्टी का साथ कई ब्राह्मण भी दे रहे हैं |
पूरे देश का लगभग यही हाल रहा है |
एडम महोदय के काल में ही मद्रास और मुंबई प्रेसिडेंसियों में भी शिक्षा पर सर्वेक्षण हुआ था जिनके निष्कर्ष भी लगभग समान थे |
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तीस वर्ष पहले मैंने पढ़ा था कि 19वीं शती के मध्य में भारत में एक भी खेतिहर मजदूर नहीं था, अंग्रेजों और जमींदारों की लूट-खसोट के कारण छोटे किसान भूमिहीन होते गए जो आज़ादी के बाद भी जारी है, आज भी गरीब किसान या तो मजदूर बनते हैं या आत्महत्या करते हैं | वह पुस्तक एक विद्यार्थी ने चुरा ली, किन्तु दिल्ली में आज भी उपलब्ध है | लेखक (स्वर्गीय) ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे किन्तु उच्च कोटि के बुद्धिजीवी थे ; उस पुस्तक की खासियत थी कि अंग्रेजों और उनके भारतीय पिट्ठूओं (गान्धी-नेहरु सहित) सबका भंडाफोड़ करने वाले मूल दस्तावेज लेखक ने छाप दिए जिस कारण अंग्रेजों ने इस पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया था | ब्रिटिश राज के इतने मूल दस्तावेज किसी दूसरी पुस्तक में नहीं मिलेंगे -- स्वर्गीय रजनी पाल्मे दत्त की "India Today" जो आधुनिक भारतीय इतिहास पर महानतम ग्रन्थ है (इनकी माँ स्वीडन के पाल्मे परिवार की थी जिसने स्वीडन को ओलोफ पाल्मे नाम का प्रधानमन्त्री दिया था, और पिता बंगाली थे)| रजनी पाल्मे दत्त से वैचारिक मतभेद रखने वाले भी न तो उनके दस्तावेजों को काट सकते हैं और न ही उनके तर्कों को | उदाहरणार्थ, 1937 ईस्वी का नेहरु का वह पत्र इस पुस्तक में प्रकाशित है जिसने कांग्रेस के उस समय के मित्र जिन्ना को पाकिस्तान की माँग करने के सिवा कोई रास्ता नहीं छोड़ा , गान्धी जी का वह बयान छपा है जिसमें उन्होंने 1946 के नौसेना विद्रोह का विरोध किया था, ब्रिटिश वाइसराय का ब्रिटिश प्रधानमन्त्री के नाम पत्र छपा है जिसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि नौसेना विद्रोह के बाद अब अंग्रेज भारत पर राज नहीं कर सकते, जिसे पढ़ते ही ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एटली ने तत्क्षण घोषणा कर दिया कि भारत चाहे या न चाहे अगस्त 1947 तक अंग्रेज भारत छोड़ देंगे | किन्तु हमें पढ़ाया जाता है कि गान्धी-नेहरु के डर से अंग्रेज भाग गए !!
(1942 के आन्दोलन का भी गान्धी-नेहरु ने नेतृत्व नहीं किया था, वे लोग तो जेल में आराम फरमा रहे थे और बाहर लाखों लोगों पर ब्रिटिश हवाई जहाज बम बरसा रहे थे क्योंकि दसियों हज़ार थानों से ब्रिटिश पुलिस और अफसरों को लोगों ने बलपूर्वक भगा दिया था -- बहुत ही हिंसक आन्दोलन था जिसे अब कांग्रेस अहिंसक कहती है | आन्दोलन का आरम्भ जिन लोगों ने किया वे लोग आजीवन कांग्रेस के विरोधी रहे और 1947 तक केन्द्रीय कारागारों में बन्द या फरार रहे, किन्तु ब्रिटिश शासन जब तक रहा तबतक वे लोग राष्ट्रीय आन्दोलन में एकता चाहते रहे जबकि सत्ता के लिए गान्धी-नेहरु अंग्रेजों से सौदेबाजी कर रहे थे |)
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1868 ईस्वी में पुनः प्रकाशित उपरोक्त रिपोर्ट की छायाप्रति मेरे पास है जो 123 MB की फाइल है | यदि दूसरे लोग पढ़ना चाहें तो ले सकते हैं |
साभार : विनय झा

Thursday, 18 August 2016

महर्षि अरविन्द का उत्तरपाड़ा भाषण .......

(प्रत्येक भारतीय को यह लेख अवश्य पढना चाहिए) (इसे अधिकाधिक शेयर करें)
(श्रीअरविन्द का यह भाषण --- सर्वश्रेष्ठ लेख है जो मैंने अपने पूरे जीवनकाल में पढ़ा है)
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महर्षि अरविन्द का उत्तरपाड़ा भाषण
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सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता है- (१)
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(अलीपुर जेल से छूटने के बाद श्रीअरविंद का पहला महत्त्वपूर्ण भाषण उत्तरपाड़ा में हुआ था। 'धर्म रक्षिणी सभा' के वार्षिक अधिवेशन में १९०१ के दिन यह उद्बोधन हुआ था। इसमें उन्होंने अपने जेल-जीवन का आध्यात्मिक अनुभव सुनाया और साथ ही देश को सच्ची राष्ट्रीयता का संदेश दिया। इसमें उन्होंने बताया है कि सच्चा हिंदू धर्म, सच्चा सनातन धर्म क्या है और आज के संसार को उसकी क्यों जरूरत है। उनका यह भाषण उनके जीवन में एक नये मोड़ का परिचय देता है। इस भाषण को सौ वर्ष से अधिक पूरे हो गये हैं)
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जब मुझे आपकी सभा के इस वार्षिक अधिवेशन में बोलने के लिये कहा गया, तो मैंने यही सोचा था कि आज के लिये जो विषय चुना गया है उसी पर, अर्थात् हिंदू धर्म पर कुछ कहूंगा। मैं नहीं जानता कि उस इच्छा को मैं पूरा कर सकूंगा या नहीं, क्योंकि जैसे ही मैं यहां आकर बैठा, मेरे मन में एक संदेश आया और यह संदेश आपको और सारे भारत राष्ट्र को सुनाना है। यह वाणी मुझे पहले-पहल जेल में सुनायी दी थी और उसे अपने देशवासियों को सुनाने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूं।
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पिछली बार जब में यहां आया था उसे एक वर्ष से ऊपर हो चुका है। उस बार मैं अकेला न था, तब मेरे साथ ही बैठे थे राष्ट्रीयता के एक परम शक्तिमान् दूत। उन दिनों वे उस एकांतवास से लौटकर आये थे जहां उन्हें भगवान् ने इसलिये भेजा था कि वे अपनी कालकोठरी की शांति और निर्जनता में उस वाणी को सुन सकें जो उन्हें सुनानी थी। उस समय आप सैंकड़ों की संख्या में उन्हीं का स्वागत करने आये थे। आज वे हमसे बहुत दूर हैं, वे हमसे हजारों मील के फासले पर हैं। दूसरे लोग भी, जिन्हें मैं अपने साथ काम करते हुए पाता था, आज अनुपस्थित हैं। देश पर जो तूफान आया था उसने उन्हें दूर-दूर बिखेर दिया है। इस बार एक वर्ष का समय निर्जनवास में बिताकर आया हूं और अब बाहर आकर देखता हूं कि सब कुछ बदल गया है। जो सदा मेरे साथ बैठते थे, जो सदा मेरे काम में सहयोग दिया करते थे, आज बर्मा में कैद हैं, दूसरे उत्तर में नजरबंद होकर सड़ रहे हैं। जब मैं बाहर आया तो मैंने अपने चारों ओर देखा, जिनसे सलाह और प्रेरणा पाने का अभ्यास था उन्हें खोजा। वे मुझे नहीं मिले। इतना ही नहीं, जब मैं जेल गया था तो सारा देश वंदेमातरम् की ध्वनि से गूंज रहा था, वह एक राष्ट्र बनने की आशा से जीवंत था। यह उन करोड़ों मनुष्यों की आशा थी जो गिरी हुई दशा से अभी-अभी ऊपर उठे थे। जब मैं जेल से बाहर आया तो मैंने इस ध्वनि को सुनने की कोशिश की, किंतु इसके स्थान पर निस्तब्धता थी। देश में सन्नाटा था और लोग हक्के-बक्के से दिखायी दिये, क्योंकि जहां पहले हमारे सामने भविष्य की कल्पना से भरा ईश्वर का उज्ज्वल स्वर्ग था वहां हमारे सिर पर धूसर आकाश दिखायी दिया जिससे मानवीय वज्र और बिजली की वर्षा हो रही थी। किसी को यह न दिखायी देता था कि किस ओर चलना चाहिये, चारों ओर से यही प्रश्न उठ रहा था ''अब क्या करें? हम क्या कर सकते हैं? मुझे भी पता न था कि अब क्या किया जा सकता है। लेकिन एक बात मैं जानता था, ईश्वर की जिस महान् शक्ति ने उस ध्वनि को जगाया था, उस आशा का संचार किया था उसी शक्ति ने यह सन्नाटा भेजा है। जो ईश्वर उस कोलाहल और आंदोलन में थे, वे ही इस विश्राम और निस्तब्धता में भी हैं। ईश्वर ने इसे भेजा है ताकि राष्ट्र क्षणभर के लिये रुककर अपने अंदर खोजे और जाने कि उनकी इच्छा क्या है। इस निस्तब्धता से मैं निरुत्साहित नहीं हुआ हूं, क्योंकि कारागार में इस निस्तब्धता के साथ मेरा परिचय हो चुका है और मैं जानता हूं कि मैंने एक वर्ष की लंबी कैद के विश्राम और निस्तब्धता में ही यह पाठ पढ़ा है। जब विपिनचंद्र पाल जेल से बाहर आये तो वह एक संदेश लेकर आये थे और वह प्रेरणा से मिला हुआ संदेश था। उन्होंने यहां जो वक्तृता दी थी वह मुझे याद है। उस वक्तृता का मर्म और अभिप्राय उतना राजनीतिक नहीं था जितना धार्मिक था। उन्होंने उस समय जेल के अंदर मिली हुई अनुभूति की, हम सबके अंदर जो भगवान् हैं, राष्ट्र के अंदर जो परमेश्वर हैं उनकी बात की थी। अपने बाद के व्याख्यानों में भी उन्होंने कहा था कि इस आंदोलन में जो शक्ति काम कर रही है वह सामान्य शक्ति की अपेक्षा महान् है और इसका हेतु भी साधारण हेतु से कहीं बढ़ कर है। आज मैं भी आपसे फिर मिल रहा हूं, मैं भी जेल से बाहर आया हूं और इस बार भी आप ही, इस उत्तरपाड़ा के निवासी ही, मेरा सबसे पहले स्वागत कर रहे हैं। किसी राजनीतिक सभा में नहीं, बल्कि उस समिति की सभा में जिसका उद्देश्य है धर्म की रक्षा। जो संदेश विपिनचंद्र पाल ने बक्सर जेल में पाया था, वही भगवान् ने मुझे अलीपुर में दिया। वह ज्ञान भगवान् नेे मुझे बारह महीने के कारावास में दिन-प्रतिदिन दिया और आदेश दिया है कि अब जब मैं जेल से बाहर आ गया हूं तो आपसे उसकी बात करूं ।
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मैं जानता था कि मैं जेल से बाहर निकल आऊंगा। यह वर्षभर की नजरबंदी केवल एक वर्ष के एकांतवास और प्रशिक्षण के लिये थी। भला किसी के लिये यह कैसे संभव होता कि वह मुझे जेल में उतने दिनों से अधिक रोक रखता जितने दिन भगवान् का हेतु सिद्ध करने के लिये आवश्यक थे? भगवान् ने कहने के लिये एक संदेश दिया है और करने के लिये एक काम। मैं यह जानता था कि जब तक यह संदेश सुना नहीं दिया जाता तब तक कोई मानव शक्ति मुझे चुप नहीं कर सकती, जब तक वह काम नहीं हो जाता तब तक कोई मानव शक्ति भगवान् के यंत्र को रोक नहीं सकती, फिर वह यंत्र चाहे कितना ही दुर्बल, कितना ही कमजोर क्यों न हो। अब जब कि मैं बाहर आ गया हूं, इन चंद मिनटों में ही मुझे एक ऐसी वाणी सुझायी गयी है जिसे व्यक्त करने कीे मेरी कोई इच्छा न थी। मेरे मन में जो कु छ था उसे भगवान् ने निकालकर फेंक दिया है और मैं जो कुछ बोल रहा हूं वह एक प्रेरणा के वश होकर, बाध्य होकर बोल रहा हूं।
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जब मुझे गिरफ्तार करके जल्दी-जल्दी लालबाजार की हवालात में पहुंचाया गया तो मेरी श्रद्धा क्षणभर के लिये डिग गयी थी, क्योंकि उस समय मैं भगवान् की इच्छा के मर्म को नहीं जान पाया था। इसलिये मैं क्षणभर के लिये विचलित हो गया और अपने हृदय में भगवान् को पुकारकर कहने लगा, ''यह क्या हुआ? मेरा यह विश्वास था कि मुझे अपने देशवासियों के लिये कोई विशेष काम करना है और जब तक वह काम पूरा नहीं हो जाता तबतक तुम मेरी रक्षा करोगे। तब फिर मैं यहां क्यों हूं और वह भी इस प्रकार के अभियोग में? एक दिन बीता, दो दिन बीते, तीन दिन बीत गये, तब मेरे अंदर से एक आवाज आयी, ''ठहरो और देखो कि क्या होता है। तब मैं शांत हो गया और प्रतीक्षा करने लगा। मैं लाल बाजार थाने से अलीपुर जेल में ले जाया गया और वहां मुझे एक महीने के लिये मनुष्यों से दूर एक निर्जन कालकोठरी में रखा गया। वहां मैं अपने अंदर विद्यमान भगवान् की वाणी सुनने के लिये, यह जानने के लिये कि वे मुझसे क्या कहना चाहते हैं और यह सीखने के लिये कि मुझे क्या करना होगा, रात-दिन प्रतीक्षा करने लगा।
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इस एकांतवास में मुझे सबसे पहली अनुभूति हुई, पहली शिक्षा मिली। उस समय मुझे याद आया कि गिरफ्तारी से एक महीना या उससे भी कुछ अधिक पहले मुझे यह आदेश मिला था कि मैं अपने सारे कर्म छोड़कर एकांत में चला जाऊं और अपने अंदर खोज करूं ताकि भगवान् के साथ अधिक संपर्क में आ सकूं । मैं दुर्बल था और उस आदेश को स्वीकार न कर सका। मुझे अपना कार्य बहुत प्रिय था और हृदय में इस बात का अभिमान था कि यदि मैं न रहूं तो इस काम को धक्का पहुंचेगा, इतना ही नहीं शायद असफल और बंद भी हो जायेगा, इसलिये मुझे काम नहीं छोडऩा चाहिये। लेकिन मुझे ऐसा बोध हुआ कि वे मुझसे फिर बोले और उन्होंने कहा कि, ''जिन बंधनों को तोडऩे की शक्ति तुममें नहीं थी उन्हें तुम्हारे लिये मैंने तोड़ दिया है क्योंकि मेरी यह इच्छा नहीं है और न थी ही कि वे कार्य जारी रहें। तुम्हारे करने के लिये मैंने दूसरा काम चुना है और उसी के लिये मैं तुम्हें यहां लाया हूं ताकि मैं तुम्हें वह बात सिखा दूं जिसे तुम स्वयं नहीं सीख सके और तुम्हें अपने काम के लिये तैयार कर लूं। इसके बाद भगवान् ने मेरे हाथों में गीता रख दी। मेरे अंदर उनकी शक्ति प्रवेश कर गयी और मैं गीता की साधना करने में समर्थ हुआ। मुझे केवल बुद्धि द्वारा ही नहीं, बल्कि अनुभूति द्वारा यह जानना पड़ा कि श्री कृष्ण की अर्जुन से क्या मांग थी और वे उन लोगों से क्या मांगते हैं जो उनका कार्य करने की इच्छा रखते हैं, अर्थात् घृणा और कामना-वासना से मुक्त होना होगा, फल की इच्छा न रखकर भगवान् के लिये कर्म करना होगा, अपनी इच्छा का त्याग करना होगा और निश्चेष्ट तथा सच्चा यंत्र बनकर भगवान् के हाथों में रहना होगा, ऊंच और नीच, मित्र और शत्रु, सफलता और विफलता के प्रति समदृष्टि रखनी होगी और यह सब होते हुए भी उनके कार्य में कोई अवहेलना न आने पाये।
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मैंने यह जाना कि हिंदू धर्म का मतलब क्या है। बहुधा हम हिंदू धर्म, सनातन धर्म की बातें करते हैं, किंतु वास्तव में हममें से कम ही लोग यह जानते हैं कि यह धर्म क्या है। दूसरे धर्म मुख्य रूप से विश्वास, व्रत, दीक्षा और मान्यता को महत्त्व देते हैं, किंतु सनातन धर्म तो स्वयं जीवन है, यह इतनी विश्वास करने की चीज नहीं है जितनी जीवन में उतारने की चीज है। यही वह धर्म है जिसका लालन-पालन मानव-जाति के कल्याण के लिये प्राचीन काल से इस प्रायद्वीप के एकांतवास में होता आ रहा है। यही धर्म देने के लिये भारत उठ रहा है। भारतवर्ष, दूसरे देशों की तरह, अपने लिये ही या मजबूत होकर दूसरों को कुचलने के लिये नहीं उठ रहा। वह उठ रहा है सारे संसार पर वह सनातन ज्योति डालने के लिये जो उसे सौंपी गयी है। भारत का जीवन सदा ही मानव-जाति के लिये रहा है, उसे अपने लिये नहीं बल्कि मानव जाति के लिये महान् होना है।
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अत: भगवान् ने मुझे दूसरी वस्तु दिखायी-उन्होंने मुझे हिंदू धर्म के मूल सत्य का साक्षात्कार करा दिया। उन्होंने मेरे जेलरों के दिल को मेरी ओर मोड़ दिया, उन्होंने जेल के प्रधान अंग्रेज अधिकारी से कहा कि ''ये कालकोठरी में बहुत कष्ट पा रहे हैं, इन्हें कम-से-कम सुबह-शाम आध-आध घंटा कोठरी के बाहर टहलने की आज्ञा दे दी जाये। यह आज्ञा मिल गयी और जब मैं टहल रहा था तो भगवान् की शक्ति ने फिर मेरे अंदर प्रवेश किया। मैंने उस जेल की ओर दृष्टि डाली तो ऊंची दीवारों के अंदर बंद नहीं हूं, मुझे घेरे हुए थे वासुदेव। मैं अपनी कालकोठरी के सामने के पेड़ की शाखाओं के नीचे टहल रखा था, परंतु वहां पेड़ न था, मुझे प्रतीत हुआ कि वह वासुदेव हैं, मैंने देखा कि स्वयं श्री कृष्ण खड़े हैं और मेरे ऊपर अपनी छाया किये हुए हैं।
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मैंने अपनी कालकोठरी के सींखचों की ओर देखा, उस जाली की ओर देखा जो दरवाजे का काम कर रही थी, वहाँ भी वासुदेव दिखायी दिये। स्वयं नारायण संतरी बनकर पहरा दे रहे थे। जब मैं उन मोटे कंबलों पर लेटा जो मुझे पलंग की जगह मिले थे तो मैंने यह अनुभव किया कि मेरे सखा और प्रेमी श्री कृष्ण मुझे अपनी बाहुओं में लिये हुए हैं। मुझे उन्होंने जो गहरी दृष्टि दी थी उसका यह पहला प्रयोग था। मैंने जेल के कैदियों-चोरों, हत्यारों और बदमाशों को देखा और मुझे वासुदेव दिखायी पड़े, उन अंधेरे में पड़ी आत्माओं और बुरी तरह काम में लाये गये शरीरों में मुझे नारायण मिले। उन चोरों और डाकुओं में बहुत से ऐसे थे जिन्होंने अपनी सहानुभूति और दया के द्वारा मुझे लज्जित कर दिया, इस विपरीत परिस्थिति में मानवता विजयी हुई थी। इनमें से एक आदमी को मैंने विशेष रूप से देखा जो मुझे एक संत मालूम हुआ। वह हमारे देश का एक किसान था जो लिखना-पढऩा नहीं जानता था, जिसे डकैती के अभियोग में दस वर्ष का कठोर दंड मिला था। यह उनमें से एक व्यक्ति था जिन्हें हम वर्ग के मिथ्याभिमान में आकर 'छोटो लोक' (नीच) कहा करते हैं। फिर एक बार भगवान् मुझसे बोले, उन्होंने कहा 'अपना कुछ थोड़ा-सा काम करने के लिये मैंने तुम्हें जिनके बीच भेजा है उन लोगों को देखो। जिस जाति को मैं ऊपर उठा रहा हूँ उसका स्वरूप यही है और इसी कारण मैं उसे ऊपर उठा रहा हूँ।
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जब छोटी अदालत में मुकदमा शुरू हुआ और हम लोग मजिस्ट्रेट के सामने खड़े किये गये तो वहाँ भी मेरी अंतदृष्टि मेरे साथ थी। भगवान् ने मुझसे कहा, 'जब तुम जेल में डाले गये थे तो क्या तुम्हारे हृदय हताश नहीं हुआ था, क्या तुमने मुझे पुकारकर यह नहीं कहा था, कहाँ, तुम्हारी रक्षा कहां है? लो, अब मजिस्ट्रेट की ओर देखो, सरकारी वकील की ओर देखो। मैंने देखा कि अदालत की कुर्सी पर मजिस्ट्रेट नहीं, स्वयं वासुदेव नारायण बैठ थे। अब मैंने सरकारी वकील की ओर देखा पर वहां कोई सरकारी वकील नहीं दिखायी दिया, वहाँ तो श्री कृष्ण बैठे थे, मेरे सखा, मेरे प्रेमी वहाँ बैठे मुस्करा रहे थे। उन्होंने कहा, 'अब डरते हो? मैं सभी मनुष्यों में विद्यमान हूँ और उनके सभी कर्मों और शब्दों पर राज करता हूँ। मेरा संरक्षण अब भी तुम्हारे साथ है और तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारे विरुद्ध जो यह मुकदमा चलाया गया है उसे मेरे हाथों में सौंप दो। यह तुम्हारे लिये नहीं है। मैं तुम्हें यहाँ मुकदमें के लिये नहीं बल्कि किसी और काम के लिये लाया हूँ। यह तो मेरे काम का साधनमात्र है, इससे अधिक कुछ नहीं। इसके बाद जब सेशन जज की अदालत में विचार आरंभ हुआ तो मैं अपने वकील के लिये ऐसी बहुत-सी हिदायतें लिखने लगा कि गवाही में मेरे विरुद्ध कही गयी बातों में से कौन-सी बातें गलत हैं और किन-किन पर गवाहों से जिरह की जा सकती है। तब एक ऐसी घटना घटी जिसकी मैं आशा नहीं करता था। मेरे मुकदमें की पैरवी के लिये जो प्रबंध किया गया था वह एकाएक बदल गया और मेरी सफाई के लिये एक दूसरे ही वकील खड़े हुए। वे अप्रत्याशित रूप से आ गये- वे मेरे एक मित्र थे, किन्तु मैं नहीं जानता था कि वे आयेंगे। आप सभी ने उनका नाम सुना है, जिन्होंने मन से सभी विचार निकाल बाहर किये और इस मुकदमें के सिवा सारी वकालत बंद कर दी, जिन्होंने महीनों लगातार आधी-आधी रात तक जगकर मुझे बचाने के लिये अपना स्वास्थ्य बिगाड़ लिया- वे हैं श्री चित्तरंजन दास। जब मैंने उन्हें देखा तो मुझे संतोष हुआ, फिर भी मैं समझता था कि हिदायत लिखना जरूरी है। इसके बाद यह विचार हटा दिया गया और मेरे अंदर से आवाज आयी, 'यही आदमी है जो तुम्हारे पैरों के चारों ओर फैले जाल से तुम्हें बाहर निकालेगा। तुम इन कागजों को अलग धर दो। इन्हें तुम हिदायतें नहीं दोगे, मैं दूंगा। उस समय से इस मुकदमें के संबंध में मैंने अपनी ओर से अपने वकील से एक शब्द भी नहीं कहा, कोई हिदायत नहीं दी और यदि कभी मुझसे कोई सवाल पूछा गया तो मैंने सदा यही देखा कि मेरे उत्तर से मुकदमें को कोई मदद नहीं मिली। मैंने मुकदमा उन्हें सौंप दिया और उन्होंने पूरी तरह उसे अपने हाथों में ले लिया, और उसका परिणाम आप जानते ही हैं। मैं सदा यह जानता था कि मेरे संबंध में भगवान् की क्या इच्छा है, क्योंकि मुझे बार-बार यह वाणी सुनायी पड़ती थी, मेरे अंदर से सदा यह आवाज आया करती थी, 'मैं रास्ता दिखा रहा हूँ, इसलिये डरो मत।
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'मैं तुम्हें जिस काम के लिये जेल में लाया हूँ अपने उस काम की ओर मुड़ो और जब तुम जेल से बाहर निकलो तो यह याद रखना-कभी डरना मत, कभी हिचकिचाना मत। याद रखो, यह सब मैं कर रहा हूँ, तुम या और कोई नहीं। अत: चाहे जितने बादल घिरें, चाहे जितने खतरे और दु:ख-कष्ट आयें, कठिनाइयाँ हों, चाहे जितनी असंभवताएं आयें, कुछ भी असंभव नहीं है, कुछ भी कठिन नहीं है। मैं इस देश और इसके उत्थान में हूँ, मैं वासुदेव हूँ, मैं नारायण हूँ। जो कुछ मेरी इच्छा होगी वही होगा, दूसरों की इच्छा से नहीं। मैं जिस चीज को लाना चाहता हूँ उसे कोई मानव-शक्ति नहीं रोक सकती।
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इस बीच वे मुझे उस एकांत कालकोठरी से बाहर ले आये और मुझे उन लोगों के साथ रख दिया जिन पर मेरे साथ ही अभियोग चल रहा था। आज आपने मेरे आत्म-त्याग और देशप्रेम के बारे में बहुत कुछ कहा है। मैं जब से जेल से निकला हूँ तब से इसी प्रकार की बातें सुनता आ रहा हूँ, किन्तु ऐसी बातें सुनने से मुझे लज्जा आती है, मेरे अंदर एक तरह की वेदना होती है। क्योंकि मैं अपनी दुर्बलता जानता हूँ, मैं अपने दोष और त्रुटियों का शिकार हूँ। मैं इन बातों के बारे में पहले भी अंधा न था और जब मेरे एकांतवास में, ये सब-की-सब मेरे विरुद्ध खड़ी हो गयीं तो मैंने इनका पूरी तरह अनुभव किया। तब मुझे मालूम हुआ कि मनुष्य के नाते मैं दुर्बलताओं का एक ढेर हूँ, एक दोषभरा अपूर्ण यंत्र हूँ, मुझमें ताकत तभी आती है जब कोई उच्चतर शक्ति मेरे अंदर आ जाये। अब मैं उन युवकों के बीच में आया और मैंने देखा कि उनमें से बहुतों में एक प्रचण्ड साहस और अपने को मिटा देने की शक्ति है और उनकी तुलना में मैं कुछ भी नहीं हूँ। इनमें से एक-दो ऐसे थे जो केवल बल और चरित्र में ही मुझसे बढ़कर नहीं थे- ऐसे तो बहुत थे- बल्कि मैं जिस बुद्धि की योग्यता का अभिमान रखता था, उसमें भी बढ़े हुए थे। भगवान् ने मुझसे फिर कहा, 'यही वह युवक-दल, वह नवीन और बलवान जाति है जो मेरे आदेश से ऊपर उठ रही है। ये तुमसे अधिक बड़े हैं। तुम्हें भय किस बात का है? यदि तुम इस काम से हट जाओ या सो जाओ तो भी काम पूरा होगा। कल तुम इस काम से हटा दिये जाओ तो ये युवक तुम्हारे काम को उठा लेंगे और उसे इतने प्रभावशाली ढंग से करेंगे जैसे तुमने भी नहीं किया। तुम्हें इस देश को एक वाणी सुनाने के लिये मुझसे कुछ बल मिला है, यह वाणी इस जाति को ऊपर उठाने में सहायता देगी। यह वह दूसरी बात थी जो भगवान् ने मुझसे कही।
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इसके बाद अचानक कुछ हुआ और क्षणभर में मुझे एक कालकोठरी के एकांतवास में पहुँचा दिया गया। इस एकांतवास में मेरे अंदर क्या हुआ यह कहने की प्रेरणा नहीं हो रही, बस इतना काफी है कि वहाँ दिन-प्रतिदिन भगवान् ने अपने चमत्कार दिखाये और मुझे हिन्दू धर्म के वास्तविक सत्य का साक्षात्कार कराया। पहले मेरे अंदर अनेक प्रकार के संदेह थे। मेरा लालन-पालन इंग्लैण्ड में विदेशी भावों और सर्वथा विदेशी वातावरण में हुआ था। एक समय मैं हिन्दू धर्म की बहुत-सी बातों को मात्र कल्पना समझता था, यह समझता था कि इसमें बहुत कुछ केवल स्वप्न, भ्रम या माया है। परन्तु अब दिन-प्रतिदिन मैंने हिन्दू धर्म के सत्य को, अपने मन में, अपने प्राण में और अपने शरीर में अनुभव किया। वे मेरे लिये जीवित अनुभव हो गये और मेरे सामने ऐसी सब बातें प्रकट होने लगीं जिनके बारे में भौतिक विज्ञान कोई व्याख्या नहीं दे सकता। जब मैं पहले-पहल भगवान् के पास गया तो पूरी तरह भक्ति-भाव के साथ नहीं गया था, पूरी तरह ज्ञानी के भाव से भी नहीं गया था। बहुत दिन हुए, स्वदेशी-आंदोलन शुरू होने से पहले और मेरे सार्वजनिक काम में घुसने से कुछ वर्ष पहले बड़ौदा में मैं उनकी ओर बढ़ा था।
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उन दिनों जब मैं भगवान् की ओर बढ़ा तो मुझे उनपर जीवंत श्रद्धा न थी। उस समय मेरे अंदर अज्ञेयवादी था, नास्तिक था, संदेहवादी था और मुझे पूरी तरह विश्वास न था कि भगवान् हैं भी। मैं उनकी उपस्थिति का अनुभव नहीं करता था। फिर भी कोई चीज थी जिसने मुझे वेद के सत्य की ओर, गीता के सत्य की ओर, हिन्दूधर्म के सत्य की ओर आकर्षित किया। मुझे लगा कि इस योग में कहीं पर कोई महाशक्तिशाली सत्य अवश्य है, वेदांत पर आधारित इस धर्म में कोई परम बलशाली सत्य अवश्य है। इसलिये जब मैं योग की ओर मुड़ा और योगाभ्यास करके यह जानने का संकल्प किया कि मेरी बात सच्ची है या नहीं तो मैंने उसे इस भाव और इस प्रार्थना से शुरू किया। मैंने कहा, 'हे भगवान्, यदि तुम हो तो तुम मेरे हृदय की बात जानते हो। तुम जानते हो कि मैं मुक्ति नहीं मांगता, मैं ऐसी कोई चीज नहीं मांगता जो दूसरे मांगा करते हैं। मैं केवल इस जाति को ऊपर उठाने की शक्ति मांगता हूँ, मैं केवल यह मांगता हूँ कि मुझे इस देश के लोगों के लिये, जिनसे मैं प्यार करता हूँ, जीने और कर्म करने की आज्ञा मिले और यह प्रार्थना करता हूँ कि मैं अपना जीवन उनके लिये लगा सकूं। मैंने योगसिद्धि पाने के लिये बहुत दिनों तक प्रयास किया और अंत में किसी हद तक मुझे मिली भी, पर जिस बात के लिये मेरी बहुत अधिक इच्छा थी उसके संबंध में मुझे संतोष नहीं हुआ। तब उस जेल के, उस कालकोठरी के एकांतवास में मैंने उसके लिये फिर से प्रार्थना की। मैंने कहा, 'मुझे अपना आदेश दो, मैं नहीं जानता कि कौन-सा काम करूं और कैसे करूं। मुझे एक संदेश दो।
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इस योगयुक्त अवस्था में मुझे दो संदेश मिले। पहला यह था, 'मैंने तुम्हें एक काम सौंपा है और वह है इस जाति के उत्थान में सहायता देना। शीघ्र ही वह समय आयेगा जब तुम्हें जेल के बाहर जाना होगा, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि इस बार तुम्हें सजा हो या तुम अपना समय, औरों की तरह अपने देश के लिये कष्ट सहते हुए बिताओ। मैंने तुम्हें काम के लिये बुलाया है और यही वह आदेश है जो तुमने मांगा था। मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि जाओ और काम करो।Ó दूसरा संदेश आया, वह इस प्रकार था, 'इस एक वर्ष के एकांतवास में तुम्हें कुछ दिखाया गया है, वह चीज दिखायी गयी है जिसके बारे में तुम्हें संदेह था, वह है हिन्दुधर्म का सत्य। इसी धर्म को मैं संसार के सामने उठा रहा हूँ, यही वह धर्म है जिसे मैंने ऋषि-मुनियों और अवतारों के द्वारा विकसित किया और पूर्ण बनाया है और अब यह धर्म अन्य जातियों में मेरा काम करने के लिये बढ़ रहा है। मैं अपनी वाणी का प्रसार करने के लिये इस जाति को उठा रहा हूँ। यही वह सनातन धर्म है जिसे तुम पहले सचमुच नहीं जानते थे, किन्तु जिसे अब मैंने तुम्हारे सामने प्रकट कर दिया है। तुम्हारे अंदर जो नास्तिकता थी, जो संदेह था उनका उत्तर दे दिया गया है, क्योंकि मैंने अंदर और बाहर स्थूल और सूक्ष्म, सभी प्रमाण दे दिये हैं और उनसे तुम्हें संतोष हो गया है। जब तुम बाहर निकलो तो सदा अपनी जाति को यही वाणी सुनाना कि वे सनातन धर्म के लिये उठ रहे हैं, वे अपने लिये नहीं बल्कि संसार के लिये उठ रहे हैं। मैं उन्हें संसार की सेवा के लिये स्वतंत्रता दे रहा हूँ। अतएव जब यह कहा जाता है कि भारतवर्ष ऊपर उठेगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म ऊपर उठेगा| जब कहा जाता है कि भारतवर्ष महान् होगा तो उसका अर्थ होता है सनातन धर्म महान् होगा। जब कहा जाता है कि भारतवर्ष बढ़ेगा और फैलेगा तो इसका अर्थ होता है सनातन धर्म बढ़ेगा और संसार पर छा जायेगा। धर्म के लिये और धर्म के द्वारा ही भारत का अस्तित्व है। धर्म की महिमा बढ़ाने का अर्थ है देश की महिमा बढ़ाना। मैंने तुम्हें दिखा दिया है कि मैं सब जगह हूँ, सभी मनुष्यों और सभी वस्तुओं में, हूँ, मैं इस आंदोलन में हूँ और केवल उन्हीं के अंदर कार्य नहीं कर रहा जो देश के लिये मेहनत कर रहे हैं बल्कि उनके अंदर भी जो उनका विरोध करते और मार्ग में रोड़े अटकाते हैं। मैं प्रत्येक व्यक्ति के अंदर काम कर रहा हूँ और मनुष्य चाहे जो कुछ सोचें या करें, पर वे मेरे हेतु की सहायता करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते। वे भी मेरा ही काम कर रहे हैं, वे मेरे शत्रु नहीं बल्कि मेरे यंत्र हैं। तुम यह जाने बिना भी कि तुम किस ओर जा रहे हो, अपनी सारी क्रियाओं के द्वारा आगे बढ़ रहे हो। तुम करना चाहते हो कुछ और पर कर बैठते हो कुछ और। तुम एक परिणाम को लक्ष्य बनाते हो और तुम्हारे प्रयास ऐसे हो जाते हैं जो उससे भिन्न या उल्टे परिणाम लाते हैं। शक्ति का आविर्भाव हुआ है और उसने लोगों में प्रवेश किया है। मैं एक जमाने से इस उत्थान की तैयारी करता आ रहा हूँ और अब वह समय आ गया है अब मैं ही इसे पूर्णता की ओर ले जाऊंगा।
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यही वह वाणी है जो मुझे आपको सुनानी है। आपकी सभा का नाम है 'धर्मरक्षिणी सभाÓ। अस्तु, धर्म का संरक्षण, दुनिया के सामने हिन्दुधर्म का संरक्षण और उत्थान- यही कार्य हमारे सामने है। परन्तु हिन्दुधर्म क्या है? वह धर्म क्या है जिसे हम सनातन धर्म कहते हैं? वह हिन्दुधर्म इसी नाते है कि हिन्दुजाति ने इसको रखा है, क्योंकि समुद्र और हिमालय से घिरे हुए इस प्रायद्वीप के एकांतवास में यह फला-फूला है, क्योंकि इस पवित्र और प्राचीन भूमि पर इसकी युगों तक रक्षा करने का भार आर्यजाति को सौंपा गया था। परन्तु यह धर्म किसी एक देश की सीमा से घिरा नहीं है, यह संसार के किसी सीमित भाग के साथ विशेष रूप से और सदा के लिये बंधा नहीं है। जिसे हम हिन्दूधर्म कहते हैं वह वास्तव में सनातन धर्म है, क्योंकि यही वह विश्वव्यापी धर्म है जो दूसरे सभी धर्मों का आलिंगन करता है। यदि कोई धर्म विश्वव्यापी न हो तो वह सनातन भी नहीं हो सकता। कोई संकुचित धर्म, सांप्रदायिक धर्म, अनुदार धर्म कुछ काल और किसी मर्यादित हेतु के लिये ही रह सकता है। यही एक ऐसा धर्म है जो अपने अंदर सायंस के आविष्कारों और दर्शनशास्त्र के चिंतनों का पूर्वाभास देकर और उन्हें अपने अंदर मिलाकर जड़वाद पर विजय प्राप्त कर सकता है। यही एक धर्म है जो मानवजाति के दिल में यह बात बैठा देता है कि भगवान् हमारे निकट हैं, यह उन सभी साधनों को अपने अंदर ले लेता है जिनके द्वारा मनुष्य भगवान् के पास पहुँच सकते हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो प्रत्येक क्षण, सभी धर्मों के माने हुए इस सत्य पर जोर देता है कि भगवान् हर आदमी और हर चीज में हैं तथा हम उन्हीं में चलते-फिरते हैं और उन्हीं में हम निवास करते हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो इस सत्य को केवल समझने और उसपर विश्वास करने में ही हमारा सहायक नहीं होता बल्कि अपनी सत्ता के अंग-अलंग में इसका अनुभव करने में भी हमारी मदद करता है। यही एक धर्म है जो संसार को दिखा देता है कि संसार क्या है- वासुदेव की लीला। यही एक ऐसा धर्म है जो हमें यह बताता है कि इस लीला में हम अपनी भूमिका अच्छी-से-अच्छी तरह कैसे निभा सकते हैं, जो हमें यह दिखाता है कि इसके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म नियम क्या हैं, इसके महान्-से-महान् विधान कौन-से हैं। यही एक ऐसा धर्म है जो जीवन की छोटी-से-छोटी बात को भी धर्म से अलग नहीं करता, जो यह जानता है कि अमरता क्या है और जिसने मृत्यु की वास्तविकता को हमारे अंदर से एकदम निकाल दिया है।
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यही वह वाणी है जो आपको सुनाने के लिये आज मेरी जबान पर रख दी गयी थी। मैं जो कुछ कहना चाहता था वह तो मुझसे अलग कर दिया गया है और जो मुझे कहने के लिये दिया गया है उससे अधिक मेरे पास कहने के लिये कुछ नहीं है। जो वाणी मेरे अंदर रख दी गयी थी केवल वही आपको सुना सकता हूँ। अब वह समाप्त हो चुकी है। पहले भी एक बार जब मेरे अंदर यही शक्ति काम कर रही थी तो मैंने आपसे कहा था कि यह आंदोलन राजनीतिक आंदोलन नहीं है और राष्ट्रीयता राजनीति नहीं, बल्कि एक धर्म है, एक विश्वास है, एक निष्ठा है। उसी बात को आज फिर मैं दोहराता हूँ, किन्तु आज मैं उसे दूसरे ही रूप में उपस्थित कर रहा हूँ। आज मैं यह नहीं कहता कि राष्ट्रीयता एक विश्वास है, एक धर्म है, एक निष्ठा हे, बल्कि मैं यह कहता हूँ कि सनातन धर्म ही हमारे लिये राष्ट्रीयता है। यह हिन्दुजाति सनातन धर्म को लेकर ही पैदा हुई है, उसी को लेकर चलती है और उसी को लेकर पनपती है। जब सनातन धर्म की हानि होती है तब इस जाति की भी अवनति होती है और यदि सनातन धर्म का विनाश संभव होता तो सनातन धर्म के साथ ही-साथ इस जाति का विनाश हो जाता। सनातन धर्म ही है राष्ट्रीयता। यही वह संदेश है जो मुझे आपको सुनाना है|