Wednesday, 18 March 2026

अब हम किस का ध्यान करें ? .

अब हम किस का ध्यान करें ?

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वास्तव में हम जहां भी, जिस भी समय हैं, परमात्मा वहीं हैं। वहीं सारे तीर्थ हैं, और वहीं सारे संत-महात्मा हैं। हमारा अस्तित्व ही परमात्मा के होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हम यह शरीर नहीं, परमात्मा की अनंतता और उनका सम्पूर्ण अस्तित्व हैं। ध्यान परमात्मा के अंश का नहीं, उनकी संपूर्णता का होता है। द्वैत-अद्वैत, साकार-निराकार -- ये सब बुद्धि-विलास और मन की परिस्थितियाँ हैं। इन सब से ऊपर उठना पड़ेगा। सहस्त्रारचक्र में दिखाई दे रही ज्योति भगवान विष्णु के और भगवती श्री के पद्म-पाद हैं, वे ही गुरु महाराज के चरण-कमल हैं। अनन्य-योग से उसका ध्यान ही श्रीगुरु-चरणों का ध्यान है, और वहाँ पर स्थिति ही श्रीगुरुचरणों में आश्रय ग्रहण करना है। उस ज्योति का अनंत विस्तार करना होता है जिसमें सारी सृष्टि और उससे परे की संपूर्णता समाहित हो जाती है। फिर उस सर्वव्यापी ज्योति का ही ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में ध्यान होता है।
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आगे की और भी अनेक बातें हैं, जिनका ज्ञान सिद्ध गुरु की अनुकंपा से ही होता है अतः उनके बारे में लिखना अनुचित है। जिसमें पात्रता होती है, उनको मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है। यहाँ कोई SC/ST या OBC का आरक्षण नहीं है। आध्यात्म की हरेक उपलब्धि पात्रता के अनुसार बिना किसी पक्षपात के है। सभी को मंगलमय शुभ कामना।
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मुझे अनावश्यक फोन न करें। अज्ञात नंबरों से आया हुआ फोन मैं अब नहीं उठाता हूँ।
ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०२६

इस समय सभी अनारक्षित हिन्दू जातियों में आरक्षण के विरुद्ध बहुत भयंकर आक्रोश है ---

 इस समय सभी अनारक्षित हिन्दू जातियों में आरक्षण के विरुद्ध बहुत भयंकर आक्रोश है। वर्ग-भेद उत्पन्न कर वर्ग-संघर्ष द्वारा सनातन हिन्दू धर्म और भारत को नष्ट करने के लिए अधर्मी शासकों और उनके समर्थकों ने आरक्षण आरंभ करवाया था। यह शासक वर्ग का लोभ और अहंकार ही है जो "समान नागरिक संहिता" को लागू नहीं होने दे रहा। आरक्षण की वर्तमान नीति से देश का भविष्य खतरे में है।

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भारत के मूल संविधान में किसी भी प्रकार के किसी आरक्षण की कोई स्थाई व्यवस्था नहीं है। दस वर्ष के पश्चात आरक्षण को बढ़ाना पूर्णतः अनुचित था। अब आरक्षण को अब और फैलाना पूर्णतया अनुचित और अन्याय है।
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हमें यह झूठ क्यों बताया जाता है कि भारत का संविधान भीमराव रामजी अंबेडकर ने बनाया था। यह शत-प्रतिशत झूठ है। भारत के संविधान का प्रारूप श्री बी.एन.राव ने बनाया था। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ.राजेंद्र प्रसाद थे। अंबेडकर तो अनेक कमेटियों में से एक कमेटी के अध्यक्ष मात्र थे, वे भी बिना मन के। वे तो इस संविधान के बिलकुल भी पक्ष में नहीं थे।
२५ फरवरी २०२६ . पुनश्च: --- कर्म के आधार पर जाति मानने वाले यदि जन्म पर आधारित जातिगत आरक्षण की सुविधा लेते हैं तो वे निश्चित रूप से निकृष्ट घोर दुराचारी हैं।

शीश कटा खाटू लड़े महंत मंगलदास ---

 शीश कटा खाटू लड़े महंत मंगलदास ---

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आजकल श्याम जी खाटू का मेला चल रहा है। मुख्य मेला फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादसी को पड़ता है। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी के दिन से ही मेले का आरंभ हो गया है, जो होली तक चलेगा। कुम्भ के मेले के पश्चात सर्वाधिक भीड़ इस मेले में होती है। भगवान की भक्ति की पराकाष्ठा देखनी हो तो इस मेले से अधिक अच्छा संभवतः ही अन्यत्र कहीं देखने को मिलेगा। हर रास्तों से लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ इस समय हाथों में ध्वज लिए पैदल ही भजन-कीर्तन करते हुए खाटू की ओर बढ़ रही है। थोड़ी थोड़ी दूर पर हज़ारों सेवार्थी -- आगंतुकों की सेवा में खड़े हैं। एकादशी को तो पूरी रात ही भजन-कीर्तन होते हैं, कोई नहीं सोता। यह मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में पड़ता है। सबसे समीप का रेलवे स्टेशन रींगस है। राजस्थान में शेखावाटी की संस्कृति और भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति ही देखनी हो तो एक बार यहाँ अवश्य आना चाहिए। प्रशासन और स्वयंसेवकों के द्वारा बहुत अच्छी व्यवस्था रहती है।
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इस स्थान की महिमा और कथा का वर्णन पौराणिक है। इस मंदिर का विस्तृत इतिहास राजस्थान पत्रिका के "नगर परिक्रमा" स्तम्भ के अंतर्गत एक बार छपा था। दो बार मुग़ल शासकों ने इस मंदिर को तोड़ा था। एक बार तो औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। उस समय इस मंदिर की रक्षा के लिए अनेक क्षत्रियों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था। फिर दुबारा मुग़ल बादशाह फर्रूखशियर ने इसको तोड़ा था तब क्षेत्र के क्षत्रियों और दादुपंथी नागा साधुओं के साथ साथ अनेक ब्राह्मणों ने भी शस्त्र उठाकर युद्ध किया था। उस समय नागा साधुओं के महंत मंगल दास और उनके भंडारी सुन्दर दास की कथा बहुत प्रसिद्ध हुई थी। उनके सिर कट गये पर धड़ युद्ध करते करते मुग़ल सेना के अन्दर तक चले गये गये, जिससे डर कर मुग़ल सेना भाग खड़ी हुई। मुगल बादशाह फर्रूखशियर ने उनके पैरों में पड़कर माफी माँगी और स्वयं को गाफिल बताया तब जाकर वे धड़ शांत हुए। तब एक कहावत पड़ी थी—"शीश कटा खाटू लड़े महंत मंगलदास"। फिर कभी मुग़ल सेना का इस ओर आने का साहस नहीं हुआ।
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यहाँ श्रद्धालुओं की भक्ति और लगन देखकर कोई भी भावविह्वल हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण और उनके भक्त बर्बरीक की जय, जिनका भव्य मंदिर खाटू ग्राम में खाटू श्याम जी के नाम से प्रसिद्ध है। जय हो।
कृपा शंकर
२६ फरवरी २०२६
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पुनश्च: -- खाटू श्याम (बर्बरीक) की कथा मुख्य रूप से स्कंद पुराण के अंतर्गत वर्णित है। स्कंद पुराण के 'माहेश्वर खंड' के 'कौमारिक खंड' (अध्याय 59 से 66) में बर्बरीक के शीशदान और उनके भगवान कृष्ण द्वारा 'श्याम' नाम पाने की विस्तृत दिव्य कथा दी गई है। यह कहानी महाभारत काल से जुड़ी है

परमात्मा से कम मुझे कुछ भी स्वीकार्य नहीं है ---

 परमात्मा से कम मुझे कुछ भी स्वीकार्य नहीं है। एक प्रबल आकर्षण है जो मुझे अपनी ओर खींच रहा है। मैं स्वयं को रोक नहीं पा रहा हूँ। रोकने का प्रयास करता हूँ तो हृदय में बड़ी पीड़ा होती है।

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मेरे लिए हृदय शब्द का अर्थ -- वक्षस्थल में दो स्तनों के मध्यस्थ मर्मांग नहीं है जो रक्त का संचार करता है। मेरे लिए "हृदय" का अर्थ है — 'चेतना' — जो भावना और बुद्धि दोनों को दर्शाती है। मैं जब कहता हूँ कि भगवान मेरे हृदय में हैं, तो इसका अर्थ है कि भगवान मेरी चेतना में हैं। हृदयहीन का अर्थ है भावना और बुद्धि से हीन।
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मैं एक ऐसे वातावरण में रहना चाहता हूँ जहाँ के स्पंदनों में परमात्मा की निरंतर प्रत्यक्ष उपस्थिति हो। और ऐसे ही मनुष्यों के साथ रहना चाहता हूँ जिनके चैतन्य में परमात्मा निरंतर स्पंदित होते हों। यदि उपरोक्त वातावरण असंभव है तो उसका निर्माण मेरे चैतन्य में परमात्मा स्वयं करेंगे। परमात्मा से कम मुझे कुछ भी स्वीकार्य नहीं है, और परमात्मा से कम कोई अपेक्षा भी मुझ से न करें।
ॐ तत् सत्॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ फरवरी २०२६

अव्यभिचारिणी भक्ति और अनन्य योग --- .

 अव्यभिचारिणी भक्ति और अनन्य योग ---

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अब समय आ गया है। हमें बाहर की विपरीततम निराशाजनक परिस्थितियों से ऊपर उठकर, परमात्मा से परमप्रेम जागृत कर, उन के प्रकाश का निरंतर विस्तार करते हुए स्वयं को ब्रह्मभाव में स्थित होना होगा। यह निरंतर ब्रह्मभाव ही हमारा लक्ष्य हो, यही हमारी रक्षा कर सकता है। अन्य कोई उपाय नहीं है। यही कर्मयोग, भक्तियोग व ज्ञानयोग है।
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मुझे आजकल ठीक से नींद आनी बंद हो गयी है। चौबीस घंटों में बड़ी कठिनाई से कुल मिलाकर दो घंटे से अधिक सो नहीं पाता। किसी भी तरह की कोई औषधि प्रभाव नहीं करती। यह इस जीवन का संध्याकाल यानि अंतिम अध्याय है, अतः इस समय का उपयोग परमात्मा के चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में ही हो। अभीप्सा केवल परमात्मा की सर्वव्यापक अनंतता में सम्पूर्ण समर्पण की हो। भगवान की उपासना ही उनकी सेवा है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने एक बहुत बड़ा आश्वासन दिया है --
"मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥१४:२६॥"
अर्थात् - जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरी सेवा अर्थात् उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों के अतीत होकर ब्रह्म बनने के लिये योग्य हो जाता है॥ And he who serves Me and only Me, with unfaltering devotion, shall overcome the Qualities and become One with the Eternal.
आचार्य शंकर के अनुसार -- मां च ईश्वरं नारायणं सर्वभूतहृदयाश्रितं यो यतिः कर्मी वा अव्यभिचारेण न कदाचित् यो व्यभिचरति भक्तियोगेन भजनं भक्तिः सैव योगः तेन भक्तियोगेन सेवते सः गुणान् समतीत्य एतान् यथोक्तान् ब्रह्मभूयाय भवनं भूयः ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति इत्यर्थः॥
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परमात्मा से अतिरिक्त अन्य किसी भी कामना या चाहत को भगवान ने व्यभिचार की संज्ञा दी है। अतः परमात्मा से अतिरिक्त अन्य किसी कामना का जन्म ही न हो। यही अनन्य-योग है, जो हमें पुरुषोत्तम तक ले जाकर उनमें स्थित करता है। यही भगवान को समर्पण है। जो पुरुषोत्तम हैं वे ही परमशिव हैं। उनसे परे कुछ भी नहीं है। उनकी अनुभूति ही इस जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
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इससे पूर्व भगवान कह चुके हैं --
"मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥१३:११॥"
अर्थात् -- अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति; एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और (असंस्कृत) जनों के समुदाय में अरुचि॥
Unswerving devotion to Me, by concentration on Me and Me alone, a love for solitude, indifference to social life.
(आचार्य शंकर का इस विषय पर भाष्य थोड़ा लंबा है इसलिए उसे यहाँ उद्धृत नहीं कर रहा हूँ।)
अव्यभिचारिणी का अर्थ है -- अविभाजित अनन्य निश्चल प्रेम। ऐसी भक्ति जिस में मन ईश्वर से अतिरिक्त कहीं और भटकता नहीं है। अनन्ययोग का अर्थ है -- केवल भगवान का आश्रय लेना, किसी अन्य का नहीं। प्रतिकूलता या अनुकूलता आने पर भी भगवान की भक्ति से विचलित न होना। विविक्तदेशसेवित्व: का अर्थ है एकांत स्थान में रहने का स्वभाव जो ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त हो।
जनसंसदि अरतिः का अर्थ है अध्यात्म-विमुख लोगों की भीड़ में रुचि न होना। यह अव्यभिचारिणी भक्ति तीनों तीन गुणों (सत्त्व रज तम) से ऊपर उठाकर ब्रह्मज्ञान (ब्रह्मभूयाय) प्राप्त करने में सहायक होती है।
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रामचरितमानस में दूसरी तरह से बहुत संक्षेप में लिखा है --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
रामचरितमानस में "अनपायिनी भक्ति" शब्द का प्रयोग किया गया है। सुंदरकांड में हनुमानजी ने प्रभु राम से वरदान मांगते हुए कहा --
"नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी"
(हे नाथ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिए)।
इसका गूढ़ार्थ भी लगभग वही निकलता है।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२८ फरवरी २०२६

जिस बात की आशंका थी, वही हो गया है ---

 जिस बात की आशंका थी, वही हो गया है ---

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(१) अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर ईरान पर आक्रमण कर दिया है। "होरमुज" अभी तक तो खुला हुआ है, लेकिन कब क्या होगा? कुछ कह नहीं सकते। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने "बाब-अल-मंडाब" को भी बंद करने की धमकी दी है। ये दोनों संभावित घटनाएँ भारत के आर्थिक हितों पर बहुत गहरी चोट करेंगी, और भारत तटस्थ नहीं रह पाएगा।
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(२) पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मध्य युद्ध आरंभ हो गया है। इसके परिणाम बड़े भयंकर होंगे। पाकिस्तान की पराजय और पाकिस्तान का विघटन भारत के हित में हैं। अतः भारत यहाँ भी तटस्थ नहीं रह पाएगा।
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(३) भारत में शासक दल भाजपा हिन्दूत्व के अपने मूल सिद्धांतों से दूर हो गई है। सनातन धर्म की कहीं पर बात भी नहीं हो रही है। हिंदुओं के मंदिर अभी भी सरकार के कब्जे में हैं, उनकी आय अधार्मिक गतिविधियों के लिए हो रही है। समान नागरिक संहिता की कोई बात नहीं हो रही है। हिंदुओं को अपने विद्यालयों में अपने धर्म की शिक्षा देने की छूट अभी तक नहीं मिली है। वीर सावरकर, डॉ.हेडगेवार, गुरु गोलवाल्कर, पं.श्यामाप्रसाद मुखर्जी, पं.दीनदयाल उपाध्याय, प्रो.बलराज मधोक व करपात्री जी महाराज, जैसे महान पुरुषों के आदर्शों से हमने दूरी बना ली है। वर्तमान भाजपा पिछड़ावादी और अंबेडकरवादी होकर अनारक्षित वर्ग और हिंदुत्व की शत्रु हो गई है। अन्य कोई विकल्प नहीं है, इसलिए विवशता में ही भाजपा को समर्थन दे रहे हैं। कोई विकल्प मिलेगा तो उस को समर्थन देंगे।
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(४) मन में बड़ी उथल-पुथल हो रही है। मन को पूरी तरह एकाग्र कर अब केवल परमात्मा की उपासना करेंगे, जिसका लक्ष्य धर्म की रक्षा ही होगा। यही हमारा स्वधर्म है। हम अपने स्वधर्म को न भूलें। आप सब मेरे ही निजात्मा हो। आप सबको नमन॥ अति आवश्यक होगा तभी मैं उपलब्ध रहूँगा, अन्यथा नहीं।
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ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ फरवरी २०२६

Monday, 16 March 2026

जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं?

 जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं? इन्द्रीय भोगों की भी एक सीमा होती है, पेट भी एक सीमा से अधिक नहीं खा सकता, कपड़े भी कितने पहिनेंगे? वह धन हड़प कर दूसरे लोग ही खायेंगे|

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प्राचीन भारत में सिर्फ राक्षस लोग ही अधर्म से धन का संचय करते थे| चक्रवर्ती राजा भी प्रजा से वैसे ही कर वसूलते थे जैसे सूर्य समुद्र से जल सोखकर बापस पृथ्वी पर बादलों के द्वारा बरसा देता है| ऋषि अगस्त्य की एक कथा है जिसे ध्यान से पढ़िए|
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एक बार अगस्त्य मुनि कहीं चले जा रहे थे| उन्होंने एक जगह अपने पितरों को देखा, जो एक गड्ढे में नीचे मुँह किये लटक रहे थे| तब उन लटकते हुए पितरों से अगस्त्य जी ने पूछा ..... "आप लोग यहाँ किसलिये नीचे मुँह किये काँपते हुए से लटक रहे हैं"? यह सुनकर उन पितरों ने उत्तर दिया ..... "संतान परम्परा के लोप की सम्भावना के कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है"| अपने पितरों की यह दुर्दशा देखने के बाद अगस्त्य मुनि ने विवाह करने का निश्चय किया|
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उन्होंने अपने लिए सबसे उपयुक्त कन्या विदर्भ-नरेश की पुत्री लोपामुद्रा को समझा और उसका हाथ माँगने के लिए विदर्भ-नरेश के दरबार में पहुँच गए| राजा ने उनका खूब आदर सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा| अगस्त्य मुनि ने कहा कि मैं आपकी पुत्री से विवाह करना चाहता हूँ| राजा ये बात सुनकर चिन्ता में डूब गए| उसी समय लोपामुद्रा राजा के पास आयी और बोली ..... "पिता जी, आप दुविधा में क्यों पड़ गये? मैं ॠषिवर से विवाह करने के लिए प्रस्तुत हूँ"| लोपामुद्रा और अगस्त्य मुनि का विवाह सम्पन्न हो गया| विवाह के पश्चात् अगस्त्य मुनि ने लोपामुद्रा से कहा कि ....."तुम्हारे ये राजकीय वस्त्र ऋषि-पत्नी को शोभा नहीं देते, इनका परित्याग कर दो"| लोपामुद्रा ने कहा ..... "जो आज्ञा, स्वामी! अब से मैं छाल, चर्म और वल्कल ही धारण करूँगी"| कुछ समय बाद लोपामुद्रा ने कहा ..... "स्वामी मेरी एक इच्छा है"| ऋषि बोले- "कहो, क्या इच्छा है तुम्हारी?" लोपामुद्रा ने कहा ...."हम ठहरे गृहस्थ! हमारे लिए धन से सम्पन्न होना कोई अपराध न होगा| प्रभु, मै उसी तरह रहना चाहती हूँ, जैसे अपने पिता के घर रहती थी"| ऋषि बोले ....."अच्छा तो मैं धन-प्राप्ति के लिए जाता हूँ| तुम यहीं मेरी प्रतीक्षा करना"| अगस्त्य चल पड़े| मैं राजा श्रुतर्वा के पास चलूँ| कहते हैं, वे अत्यन्त समृद्ध हैं|
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जब अगस्त्य राजा श्रुतर्वा के दरबार में पहुँचे तो महाराज श्रुतर्वा ने पूछा ..... "महात्मन, बताइये मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" अगस्त्य बोले ..... "मैं तुमसे कुछ धन माँगने आया हूँ| तुम अपनी सामर्थ्य के अनुसार मुझे धन प्रदान करो"| राजा ने कहा ..... "मेरे पास देने को अतिरिक्त धन नहीं है| फिर भी जो है, उसमें से आप इच्छानुसार ले सकते हैं"| अगस्त्य ऋषि नीतिवान थे| अगर मैं इस राजा से कुछ लेता हूँ, तो दूसरों को उससे वंचित होना पड़ेगा| उन्होंने श्रुतर्वा से कहा ..... "मैं तुमसे कुछ नहीं ले सकता| आओ, हम राजा बृहदस्थ के पास चलें"| लेकिन राजा बृहदस्थ के पास भी देने लायक़ अतिरिक्त धन नहीं था| ऋषि अगस्त्य ने कहा ..... "शायद, राजा त्रसदस्यु मेरी कुछ सहायता कर सकें| आओ, हम सब उनके पास चलें"| लेकिन जब वे लोग राजा त्रसदस्यु के यहाँ पहुँचे तो राजा त्रसदस्यु भी उनको धन देने में असमर्थ रहे| तीनों राजा एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे| अन्त में उन्होंने समवेत स्वर में कहा ..... "यहाँ इल्वल नामक एक असुर रहता है, जिसके पास अथाह धन है| आइये, हम उसके पास चलें"|
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इल्वल महाधूर्त राक्षस था| उसका एक भाई भी था, जिसका नाम वातापि था| वे दोनों ही ब्राह्मणों से घृणा करते थे और ब्राह्मणों की हत्या का उन्होंने संकल्प ले रखा था| वह मायावी अपने भाई वातापि को माया से बकरा बना देता था| वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ था| अत: वह क्षणभर में बकरा बन जाता था| फिर इल्वल उस बकरे का मांस धोखे से किसी ब्राह्मण को खिला देता, और अपने भाई वातापी को जब पुकारता तो वातापी उस ब्राह्मण का पेट फाड़कर बाहर निकल आता और वह ब्राह्मण मर जाता|
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जब अगस्त्य तीनों राजाओं के साथ इल्वल के साम्राज्य में पहुँचे, वह उनके स्वागत के लिए तैयार बैठा था| उनके वहाँ पहुँचते ही उसने कहा ..... "आइये, आप सबका स्वागत है| मैंने आपके लिए विशेष भोजन तैयार करवाया है"| तीनों राजाओं को आशंका हुई तो उन्होंने ऋषि को बताया| ऋषि ने कहा ..... "चिन्ता मत करो| मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा"| अगस्त्य ने भोजन शुरू किया| सचमुच ऐसा स्वादिष्ट भोजन पहली बार खाने को मिला|
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जब ऋषि अगस्त्य ने अन्तिम कौर ग्रहण किया तो इल्वल ने वातापि को आवाज़ दी| वातापि बाहर आओ| पर वातापी बाहर नहीं आया| इल्वल क्रोध से पागल हो उठा| अगस्त्य बोले ..... "अब वह कैसे बाहर आ सकता है? मैं तो उसे योगबल से खाकर पचा भी गया"| इल्वल ने अपनी हार स्वीकार कर ली| उसने अगस्त्य से कहा ..... "आपका किस उद्देश्य से आना हुआ? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ"? अगस्त्य बोले ..... "हमें पता है कि तुम बड़े धनवान हो| इन राजाओं को और मुझे धन चाहिए| औरों को वंचित किए बिना जो भी दे सकते हो हमें दे दो"| इल्वल पल-भर को चुप रहा| फिर उसने कहा कि ..... "मैं हर एक राजा को दस-दस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा और अगस्त्य ऋषि को बीस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा| इसके अलावा मैं उनकी सेवा में अपना सोने का रथ और घोड़े भी अर्पित कर दूँगा| आप ये सारी वस्तुएँ स्वीकार करें"|
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इल्वल के घोड़े धरती पर वायु-वेग से दौड़ते थे| वे लोग पल-भर में ही ऋषि अगस्त्य के आश्रम पहुँच गये| अब राजाओं ने ऋषि अगस्त्य से जाने की आज्ञा माँगी और ऋषि ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी| उन लोगों के जाने के बाद ऋषि अगस्त्य लोपामुद्रा के पास गये और कहा कि ..... "लोपामुद्रा, जो तुम चाहती थीं वह मैं ले आया| अब हम तुम्हारी इच्छानुसार जीवन बिताएँगे|" कई वर्षों बाद लोपामुद्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया| इस प्रकार ऋषि अगस्त्य ने अपने पितरों को दिया हुआ वचन पूरा किया|
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यह कथा बताती है कि प्राचीन भारत में जो राक्षस लोग होते थे वे ही अधर्म से धन संचय करते थे| बड़े बड़े राजा भी अधर्म से कुछ भी धन संचय नहीं करते थे|
१७ मार्च २०१८