Monday, 16 March 2026

जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं?

 जो लोग भ्रष्टाचार से अनाप-शनाप अथाह रुपया बनाते हैं, क्या वे उसे अपने जीवन काल में खर्च कर सकते हैं? इन्द्रीय भोगों की भी एक सीमा होती है, पेट भी एक सीमा से अधिक नहीं खा सकता, कपड़े भी कितने पहिनेंगे? वह धन हड़प कर दूसरे लोग ही खायेंगे|

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प्राचीन भारत में सिर्फ राक्षस लोग ही अधर्म से धन का संचय करते थे| चक्रवर्ती राजा भी प्रजा से वैसे ही कर वसूलते थे जैसे सूर्य समुद्र से जल सोखकर बापस पृथ्वी पर बादलों के द्वारा बरसा देता है| ऋषि अगस्त्य की एक कथा है जिसे ध्यान से पढ़िए|
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एक बार अगस्त्य मुनि कहीं चले जा रहे थे| उन्होंने एक जगह अपने पितरों को देखा, जो एक गड्ढे में नीचे मुँह किये लटक रहे थे| तब उन लटकते हुए पितरों से अगस्त्य जी ने पूछा ..... "आप लोग यहाँ किसलिये नीचे मुँह किये काँपते हुए से लटक रहे हैं"? यह सुनकर उन पितरों ने उत्तर दिया ..... "संतान परम्परा के लोप की सम्भावना के कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है"| अपने पितरों की यह दुर्दशा देखने के बाद अगस्त्य मुनि ने विवाह करने का निश्चय किया|
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उन्होंने अपने लिए सबसे उपयुक्त कन्या विदर्भ-नरेश की पुत्री लोपामुद्रा को समझा और उसका हाथ माँगने के लिए विदर्भ-नरेश के दरबार में पहुँच गए| राजा ने उनका खूब आदर सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा| अगस्त्य मुनि ने कहा कि मैं आपकी पुत्री से विवाह करना चाहता हूँ| राजा ये बात सुनकर चिन्ता में डूब गए| उसी समय लोपामुद्रा राजा के पास आयी और बोली ..... "पिता जी, आप दुविधा में क्यों पड़ गये? मैं ॠषिवर से विवाह करने के लिए प्रस्तुत हूँ"| लोपामुद्रा और अगस्त्य मुनि का विवाह सम्पन्न हो गया| विवाह के पश्चात् अगस्त्य मुनि ने लोपामुद्रा से कहा कि ....."तुम्हारे ये राजकीय वस्त्र ऋषि-पत्नी को शोभा नहीं देते, इनका परित्याग कर दो"| लोपामुद्रा ने कहा ..... "जो आज्ञा, स्वामी! अब से मैं छाल, चर्म और वल्कल ही धारण करूँगी"| कुछ समय बाद लोपामुद्रा ने कहा ..... "स्वामी मेरी एक इच्छा है"| ऋषि बोले- "कहो, क्या इच्छा है तुम्हारी?" लोपामुद्रा ने कहा ...."हम ठहरे गृहस्थ! हमारे लिए धन से सम्पन्न होना कोई अपराध न होगा| प्रभु, मै उसी तरह रहना चाहती हूँ, जैसे अपने पिता के घर रहती थी"| ऋषि बोले ....."अच्छा तो मैं धन-प्राप्ति के लिए जाता हूँ| तुम यहीं मेरी प्रतीक्षा करना"| अगस्त्य चल पड़े| मैं राजा श्रुतर्वा के पास चलूँ| कहते हैं, वे अत्यन्त समृद्ध हैं|
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जब अगस्त्य राजा श्रुतर्वा के दरबार में पहुँचे तो महाराज श्रुतर्वा ने पूछा ..... "महात्मन, बताइये मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" अगस्त्य बोले ..... "मैं तुमसे कुछ धन माँगने आया हूँ| तुम अपनी सामर्थ्य के अनुसार मुझे धन प्रदान करो"| राजा ने कहा ..... "मेरे पास देने को अतिरिक्त धन नहीं है| फिर भी जो है, उसमें से आप इच्छानुसार ले सकते हैं"| अगस्त्य ऋषि नीतिवान थे| अगर मैं इस राजा से कुछ लेता हूँ, तो दूसरों को उससे वंचित होना पड़ेगा| उन्होंने श्रुतर्वा से कहा ..... "मैं तुमसे कुछ नहीं ले सकता| आओ, हम राजा बृहदस्थ के पास चलें"| लेकिन राजा बृहदस्थ के पास भी देने लायक़ अतिरिक्त धन नहीं था| ऋषि अगस्त्य ने कहा ..... "शायद, राजा त्रसदस्यु मेरी कुछ सहायता कर सकें| आओ, हम सब उनके पास चलें"| लेकिन जब वे लोग राजा त्रसदस्यु के यहाँ पहुँचे तो राजा त्रसदस्यु भी उनको धन देने में असमर्थ रहे| तीनों राजा एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे| अन्त में उन्होंने समवेत स्वर में कहा ..... "यहाँ इल्वल नामक एक असुर रहता है, जिसके पास अथाह धन है| आइये, हम उसके पास चलें"|
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इल्वल महाधूर्त राक्षस था| उसका एक भाई भी था, जिसका नाम वातापि था| वे दोनों ही ब्राह्मणों से घृणा करते थे और ब्राह्मणों की हत्या का उन्होंने संकल्प ले रखा था| वह मायावी अपने भाई वातापि को माया से बकरा बना देता था| वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ था| अत: वह क्षणभर में बकरा बन जाता था| फिर इल्वल उस बकरे का मांस धोखे से किसी ब्राह्मण को खिला देता, और अपने भाई वातापी को जब पुकारता तो वातापी उस ब्राह्मण का पेट फाड़कर बाहर निकल आता और वह ब्राह्मण मर जाता|
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जब अगस्त्य तीनों राजाओं के साथ इल्वल के साम्राज्य में पहुँचे, वह उनके स्वागत के लिए तैयार बैठा था| उनके वहाँ पहुँचते ही उसने कहा ..... "आइये, आप सबका स्वागत है| मैंने आपके लिए विशेष भोजन तैयार करवाया है"| तीनों राजाओं को आशंका हुई तो उन्होंने ऋषि को बताया| ऋषि ने कहा ..... "चिन्ता मत करो| मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा"| अगस्त्य ने भोजन शुरू किया| सचमुच ऐसा स्वादिष्ट भोजन पहली बार खाने को मिला|
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जब ऋषि अगस्त्य ने अन्तिम कौर ग्रहण किया तो इल्वल ने वातापि को आवाज़ दी| वातापि बाहर आओ| पर वातापी बाहर नहीं आया| इल्वल क्रोध से पागल हो उठा| अगस्त्य बोले ..... "अब वह कैसे बाहर आ सकता है? मैं तो उसे योगबल से खाकर पचा भी गया"| इल्वल ने अपनी हार स्वीकार कर ली| उसने अगस्त्य से कहा ..... "आपका किस उद्देश्य से आना हुआ? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ"? अगस्त्य बोले ..... "हमें पता है कि तुम बड़े धनवान हो| इन राजाओं को और मुझे धन चाहिए| औरों को वंचित किए बिना जो भी दे सकते हो हमें दे दो"| इल्वल पल-भर को चुप रहा| फिर उसने कहा कि ..... "मैं हर एक राजा को दस-दस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा और अगस्त्य ऋषि को बीस हज़ार गायें और उतनी ही मुहरें दूँगा| इसके अलावा मैं उनकी सेवा में अपना सोने का रथ और घोड़े भी अर्पित कर दूँगा| आप ये सारी वस्तुएँ स्वीकार करें"|
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इल्वल के घोड़े धरती पर वायु-वेग से दौड़ते थे| वे लोग पल-भर में ही ऋषि अगस्त्य के आश्रम पहुँच गये| अब राजाओं ने ऋषि अगस्त्य से जाने की आज्ञा माँगी और ऋषि ने उन्हें जाने की आज्ञा दे दी| उन लोगों के जाने के बाद ऋषि अगस्त्य लोपामुद्रा के पास गये और कहा कि ..... "लोपामुद्रा, जो तुम चाहती थीं वह मैं ले आया| अब हम तुम्हारी इच्छानुसार जीवन बिताएँगे|" कई वर्षों बाद लोपामुद्रा ने एक पुत्र को जन्म दिया| इस प्रकार ऋषि अगस्त्य ने अपने पितरों को दिया हुआ वचन पूरा किया|
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यह कथा बताती है कि प्राचीन भारत में जो राक्षस लोग होते थे वे ही अधर्म से धन संचय करते थे| बड़े बड़े राजा भी अधर्म से कुछ भी धन संचय नहीं करते थे|
१७ मार्च २०१८

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