जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है, शिव का ध्यान ही श्रीहरिः का ध्यान है ---
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हरिः शरणम्, हरि: शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्, हरिः शरणम्॥
हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व ही शिव है। शिव से परे अन्य कुछ भी नहीं है। शिव है ईश्वर की अनंतता, जो हम स्वयं हैं। हम स्वयं सम्पूर्ण अस्तित्व हैं, यह नश्वर देह नहीं। हमारे से परे अन्य कुछ भी नहीं है। 'शिव' ही ध्यान का विषय है। 'शिव' ही ईश्वर का श्रीहरिः रूप है, जिससे अधिक आनंददायक अन्य कुछ भी नहीं है। जहां तक मैं समझता हूँ -- श्री शब्द का संधि-विच्छेद होता है -- श+र+ई। यहाँ श शब्द श्वास-प्रश्वास है, र अग्नि बीज है, और ई शक्ति बीज है। श्वास-प्रश्वास की अग्नि रूपी शक्ति "श्री" है।
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'हं' विशुद्धिचक्र का बीजमंत्र है। यह शिव यानी सम्पूर्ण अस्तित्व यानी आकाश (अंतरिक्ष की अनंतता) तत्व पर ध्यान के लिए प्रयुक्त होता है। 'स:' आध्यात्मिक सूर्य का बीज मंत्र है (भौतिक सूर्य का नहीं)। यह सकारात्मक ऊर्जा और एकाग्रता को बढ़ाता है। इस हंस: शब्द का जप हम हर सांस के साथ करते हैं। इसे हंस: गायत्री, अजपा-जप, हंस:योग, व हंसवतीऋक आदि नामों से पुकारते हैं। ईश्वर के साक्षात्कार के पश्चात यह "हंसः" मंत्र ही "सोहं" हो जाता है। "ओम्" (ॐ) उस परमात्मा का वाचक है।
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प्रातःकाल उठते ही, और रात्रि को सोने से पूर्व एक ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर के पद्मासन या सिद्धासन में खेचरी या अर्धखेचरी मुद्रा लगाकर बैठ जाएँ। अर्धखेचरी मुद्रा को तो कोई भी कर सकता है, खेचरी के लिए दीर्घ अभ्यास करना पड़ता है। मेरुदण्ड किसी भी परिस्थिति में उन्नत और ठुड्डी भूमि के समानान्तर हो, अन्यथा कुछ भी अनुभूत नहीं होगा और नींद आ जाएगी।
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जिन्हें ज्योति के दर्शन नहीं होते वे भ्रूमध्य में एक ज्योति की कल्पना करें। उसका विस्तार सारे ब्रह्मांड में कर दें। वह ज्योति सारी सृष्टि में, और सारी सृष्टि उस ज्योति में है। अब हम उस ज्योति का ध्यान करें। हम यह नश्वर देह नहीं, वह असीम अनंत ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं। वह ज्योतिर्मय ब्रह्म ही शिव हैं। वे ही हमारा अपना स्वरूप है। जब सांस भीतर जाती है, तब "हंsssssssssss" का मानसिक जप करें। जब सांस बाहर जाती है, तब "सःsssssssss" का मानसिक जप करें। जब साँसे रुक जाएँ, यानी कुंभक लग जाए, तब उस अनंतता के साथ एकाकार होकर प्रणव का मानसिक जप करें। इसका कितनी भी देर तक अभ्यास कीजिए, समय की कोई सीमा नहीं है। हंस: का अङ्ग्रेज़ी में अर्थ होता है -- I am He. यह विशुद्ध वेदान्त/योग की साधना है।
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इसके पश्चात का यह अगला चरण है --
बिलकुल एकांत में किसी भी तरह के कोलाहल से दूर ध्यानमुद्रा में ध्यान के आसन पर बैठ जाइए। मेरुदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, पूर्ण या अर्धखेचरी मुद्रा। हो सके तो किसी न किसी विधि से कान बंद कर लीजिये। नहीं हो सके तो कोई बात नहीं। जो सबसे तीब्र ध्वनि सुनती है, उसके साथ श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय में बताई हुई विधि से मूर्धा में और अनंतता से भी परे प्रणव मंत्र का मानसिक जप कीजिये। साथ में अन्य किसी भी मंत्र को न लगाएँ, केवल प्रणव मंत्र। मंत्र के साथ स्वयं को एकाकार कीजिये, और अपनी चेतना को सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त कर दीजिये। शिवभाव में स्थित होकर शिव की अनंतता का ध्यान करें।
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यम-नियमों का पालन और सद् आचरण अनिवार्य है, अन्यथा लाभ के स्थान पर बहुत अधिक हानि होगी जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। किसी भी तरह की कामना यानि आकांक्षा न हो। यम नियमों का पालन नहीं कर सकते, या किसी भी तरह का कोई संशय है, तो ये साधनाएं न करें।
ॐ तत् सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ मार्च २०२६
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