सर्वव्यापी सर्वस्व आत्मा का नित्य नियमित ध्यान हमें परमब्रह्म परमात्मा में स्थित कर देता है। तब हम पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म से भी क्रमशः ऊपर उठ जाते हैं। ये पाप-पुण्य और धर्म-अधर्म भी अंततः एक बंधन हैं। इनसे मुक्त तो हमें होना ही होगा।
मूलाधार से सहस्त्रार तक व उससे भी ऊपर प्रवाहित हो रहा प्राण-प्रवाह -- कुंडलिनी महाशक्ति है। अंततः ध्यान भी ऊर्ध्वमूलस्थ परमशिव का ही होता है। एक दिन हम पायेंगे कि जिसे हम ढूंढ रहे थे वे तो हम स्वयं हैं। सारा मार्गदर्शन गुरु रूप में शिव ही करते हैं। वे ही दक्षिणामूर्ति हैं और वे ही वासुदेव श्रीकृष्ण हैं। सभी को मंगलमय शुभकामनाएँ और नमन॥
कृपा शंकर
१२ मार्च २०२६
No comments:
Post a Comment