Monday, 16 March 2026

किसी भी कालखंड में जब भी हमारा पतन हुआ, उसका मुख्य और एकमात्र कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता का होना था।

 किसी भी कालखंड में जब भी हमारा पतन हुआ, उसका मुख्य और एकमात्र कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता का होना था। हमारी जो भी प्रगति हो रही है, वह तमोगुण का प्रभाव घटने, और रजोगुण में वृद्धि के कारण हो रही है।

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जब तक हमारी देह में प्राण है, तब तक हम स्वधर्म की रक्षा करेंगे। जीवन का अन्य कोई उद्देश्य भी नहीं है। हमारी सारी आध्यात्मिक साधना परमात्मा और सत्य-सनातन-धर्म को समर्पित है। हम शाश्वत आत्मा हैं, जिसका स्वधर्म निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है।
गीता में भगवान कहते हैं --
"श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥ (गीता ३:३५॥"
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥(गीता २:४०॥"
अर्थात् -- सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है; स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है॥३:३५॥"
इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है॥२:४०॥"
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ॐ तत् ॐ सत् ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ ॐ नमः शिवाय ॥
कृपा शंकर
१३ मार्च २०२६

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