तस्माद्योगी भवार्जुन ---
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श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अपने शिष्य अर्जुन को योगी होने का आदेश देते हैं --
"तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥६:४६॥"
अर्थात् -- " क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है और (केवल शास्त्र के) ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो॥"
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योगमार्ग की साधना वही कर सकता है जिसके हृदय में परम भक्ति, और परमात्मा को समर्पित होने की अभीप्सा हो। अन्यथा कोई भी सफल नहीं हो सकता। योगमार्ग की साधनाओं का आरंभ -- "हंस:योग" से होता है, और इसकी पूर्णता "पुरुषोत्तम-योग" से होती है। पुरुषोत्तम-योग को तो बिना हरिःकृपा के कोई समझ भी नहीं सकता, क्योंकि यह बुद्धि का नहीं आध्यात्मिक अनुभूतियों का विषय है। जो क्रिया-योग की साधना करते हैं, वे अपनी साधना में उन्नत होकर पुरुषोत्तम-योग को स्वतः ही समझ लेते हैं।
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कल ५ मार्च २०२६ को मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी जिसका शीर्षक था -- "जहां तक मेरी बुद्धि काम करती है, शिव का ध्यान ही श्रीहरिः का ध्यान है"। उपरोक्त शीर्षक के अंतर्गत मैंने हंस:योग के बारे में अपनी क्षमतानुसार सब कुछ लिखा था। जो नहीं लिखा गया, वह मेरी क्षमता से परे था। जिन श्रद्धालुओं की रुचि हो वे उस पोस्ट का अवलोकन कर सकते हैं।
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हठयोग एक अलग विषय है। जिनकी रुचि हठयोग में है वे निम्न तीन प्रामाणिक ग्रन्थों का स्वाध्याय कर लें -- "घेरण्ड संहिता", "हठयोग प्रदीपिका", और "शिव-संहिता"। ये तीनों प्रामाणिक ग्रंथ हैं। इनको आधार बनाकर सैंकड़ों लेखकों ने हजारों पुस्तकें लिखी हैं। हठयोग और तंत्रयोग दोनों ही नाथ संप्रदाय की देन हैं। हठयोग और तंत्रविद्या दोनों ही लुप्त हो गये थे, कालांतर में नाथ संप्रदाय के योगियों ने उन्हें ढूंढ़ निकाला। इसके लिए उनकी परंपरा को नमन करता हूँ।
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और भी कई बातें हैं जिन्हें लिखा नहीं जा सकता। इस समय और कुछ लिखने की क्षमता भी मुझ में नहीं है, अतः इस लेख का यहीं समापन कर रहा हूँ।
हरिः ॐ तत् सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ स्वस्ति॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
६ मार्च २०२६
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