Monday, 16 March 2026

सम्पूर्ण अस्तित्व ही राम का नाम है। उससे परे कुछ भी नहीं है।

 सम्पूर्ण अस्तित्व ही राम का नाम है। उससे परे कुछ भी नहीं है।

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तंत्र शास्त्रों के अनुसार जहां तक मैं समझा हूँ, खेचरी मुद्रा में -- ब्रह्मरंध्र यानि सहस्त्रार से जो अमृतधारा निकलती है उसका पान मद्यपान है। अनावश्यक बात करने की इच्छा की समाप्ति मांसभक्षण है। आतंरिक प्राणायाम द्वारा सुषुम्ना में बह रहे प्राण तत्व को नियंत्रित करना मत्स्य भक्षण है। सहस्त्रारचक्र में निजात्मा का ध्यान मुद्रा है। और ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की अभीप्सा और साधना मैथुन है।
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मणिपुरचक्र के भीतर तेजस तत्व 'र'कार है। उसका अजपा-जप द्वारा आज्ञाचक्र में स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप 'म'कार से मिलन होता है। तब ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होती है और ब्रह्मज्ञान का उदय होता है। उस अवस्था में रमण करना राम नाम का जप है। जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं उनके लिए "राम" नाम तारकमंत्र है। मृत्युकाल में राम नाम जिसके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं।
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आत्मतत्व में स्थित होना मैथुन है। अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है। स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है। केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है, वह सीत्कार है। खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है। अजपा-जप ही रमण है। यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है वह दक्षिणा है। संक्षेप में आत्मा में यानि राम में सदैव रमण ही मैथुन है। इस साधना में साधक सूक्ष्म रूप से सांस मेरुदंड में स्थित सुषुम्ना नाड़ी में लेते हैं। नाक या मुंह से ली गई सांस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित हो रहा है। जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब सांस रुक जाती है और मृत्यु हो जाती है। इसे ही प्राण निकलना कहते हैं। अतः अजपा-जप और ध्यान का अभ्यास नित्य निरंतर करना चाहिए। जिन का कभी जन्म ही नहीं हुआ, उन मृत्युंजयी परमशिव का निरंतर ध्यान ही मृत्यु पर विजय है। उनके ध्यान से मृत्यु पराजित है।
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ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ तत् सत्॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपाशंकर
१४ मार्च २०२६
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पुनश्च: -- हम जहां भी हैं, उससे दक्षिण दिशा में स्वयं यमराज अपने काले रंग के भैंसे पर बैठे मुस्करा रहे हैं। उनके भैंसे के गले में बंधी घंटी की ध्वनि बड़ी कर्कश है। एक बार जिसने भी वह ध्वनि सुन ली, उसे अपने जीवन के सारे पाप याद आ जाते हैं। वह पश्चात्ताप करता है, इतने में यमराज उसके प्राण हर लेते हैं।
हमारे से उत्तर दिशा में मृत्युंजयी भगवान शिव नंदी पर बिराजमान हैं। नंदी के गले में जो घंटी बंधी है, उसमें से प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि निरंतर निःसृत हो रही है जिसे सुनते सुनते कोई भी साधक अमर हो जाता है। ऊर्ध्वस्थ कूटस्थ सूर्यमण्डल में परमशिव का ध्यान कीजिये, और ओंकार की ध्वनि को सुनते रहें। वह ओंकार की ध्वनि ही राम का नाम है। मैंने शिव का वरण किया है। आप भी शिव का वरण कीजिये। ॐ ॐ ॐ !!

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