Thursday, 29 July 2021

जो हम दूसरों को देते हैं, वही हमें प्राप्त होता है --

 जो हम दूसरों को देते हैं, वही हमें प्राप्त होता है --

जैसी हमारी भावना दूसरों के प्रति होगी, हमारे प्रति भी दूसरों की वही भावना होगी। हम मन ही मन दूसरों से घृणा करेंगे तो दूसरे भी हमारे से घृणा करेंगे। हम सब के प्रति प्रेम रखेंगे तो हमारे प्रति भी सब प्रेम ही रखेंगे। इसलिए सब के प्रति आरोग्यकारी सद्भावना रखनी चाहिए।
.
लेकिन कोई आततायी हमें मारना चाहे तो निश्चित रूप से उसे मृत्यु भी हम ही देंगे। कितना भी बड़ा शत्रु क्यों न हो, उसके प्रति घृणा हमारे मन में नहीं होनी चाहिए। आतताइयों का संहार बिना अहंकार व घृणा से करेंगे तो यह हमारा कर्मयोग होगा। भगवान कहते हैं कि -- जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है, और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं है, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो किसी को मारता है और न ही (पाप से) बँधता है।
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
.
प्रेम मुदित मन से सब को राम राम राम कहो, क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि राममय है| सब में राम के दर्शन करो, सब को प्रसन्नता से देखो और सब के सुख की कामना मन ही मन करो| किसी को भी कष्ट में देखो तो करुणावश मन ही मन 'राम' से उसके कल्याण की कामना करो| सब को देखकर प्रसन्न होओ और किसी की निंदा मत करो| हम आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, कोई पृथक नहीं है। हम स्वयं ही हैं जो दूसरों के रूप में व्यक्त हो रहे हैं| सारी सृष्टि हमारा ही प्रतिबिम्ब है|
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२३ जून २०२१

"अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ यह कहना अहंकार नहीं है, अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना --

 "अहं ब्रह्मास्मि" यानि मैं ब्रह्म हूँ यह कहना अहंकार नहीं है, अहंकार है स्वयं को यह देह, मन, और बुद्धि समझ लेना ---

.
अहंकार व ब्रह्मभाव में बहुत अंतर है। सांसारिक बुद्धि के तमोगुण प्रधान लोग, ब्रह्मभाव को अहंकार मानते हैं। ब्राह्मी चेतना से युक्त जब कोई योग साधक "शिवोSहम् शिवोSहम् अहम् ब्रह्मास्मि" कहता है तब यह उसकी अहंकार की यात्रा यानि कोई ego trip नहीं है| यह उसका वास्तविक अंतर्भाव है| आत्मा का धर्म है -- परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम| यही हमारा सही धर्म है| और भी आगे बढ़ें तो परमात्मा की सर्वव्यापकता के साथ एक होकर हम कह सकते हैं -- "शिवोंहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि|"
.
शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि को निज स्वरुप समझना ही अहंकार है| वास्तव में 'अहं' केवल सर्वव्यापि आत्म-तत्व का नाम है जिसे हम नहीं समझते इसलिए अपने शरीर, मन और बुद्धि आदि को ही हम स्वयं मान लेते हैं| यही अहंकार है| हम परमात्मा के अंश हैं, परमात्मा के अमृतपुत्र हैं, और सच्चिदानंद के साथ एक हैं| यह होते हुए भी स्वयं को शरीर समझते हैं, यह अहंकार है|
.
शरीर के धर्म हैं -- भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि| प्राणों का धर्म है बल आदि| मन का धर्म है राग-द्वेष, मद यानि घमंड आदि| चित्त का धर्म है वासनाएँ आदि| इन सब को अपना समझना अहंकार है|
.
आत्मा का धर्म है -- परमात्मा के प्रति अभीप्सा और परम प्रेम| यही हमारा सही धर्म है| और भी आगे बढ़ें तो परमात्मा की सर्वव्यापकता के साथ एक होकर हम कह सकते हैं -- "शिवोंहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि|"
.
यह अनुभूति का विषय है, बुद्धि का नहीं, अतः इस विषय पर और अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है| आप सब निजात्माओं में व्यक्त परमात्मा को मेरा नमन|
गुरु ॐ | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय | अयमात्मा ब्रह्म |
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् || ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२३ जून २०२१

हम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं? कमी हमारी समझ में है, भगवान तो यहीं हैं ---

 हम किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं? कमी हमारी समझ में है, भगवान तो यहीं हैं ---

.
भगवान कोई ऊपर से उतर कर आने वाले व्यक्ति या चीज नहीं हैं। हमें स्वयं के अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को विसर्जित कर, स्वयं को ही भगवान बनना पड़ेगा। यही उनको पाने का एकमात्र उपाय है। तभी हम उनके साथ एक हो सकते हैं।
.
प्राण-तत्व के रूप में वे निरंतर हमारे अस्तित्व में हैं। वे ही हमारे प्राण हैं। "प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्।" उन्होने ही प्राण रूप से हमारे अंतःकरण में प्रवेश कर हमारी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को जीवंत किया है। जब वे स्वयं हमारे समक्ष हैं, तो हमारे लिए अब कोई धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य, पाप-पुण्य, उपदेश, आदेश, सिद्धान्त, मत-पंथ, संप्रदाय, मांग, कामना, आकांक्षा, अपेक्षा, आदि नहीं रहे हैं; सब कुछ उनको ही बापस समर्पित है। सब कुछ उन्हीं का है, और सब कुछ वे ही हैं।
.
प्राण-तत्व के रूप में सुषुम्ना नाड़ी में उनके प्रवाह की प्रतिक्रिया स्वरूप हमारी सांसें चल रही हैं। हमारे माध्यम से वे ही, स्वयं को व्यक्त कर रहे हैं।
सहस्त्रार -- भगवान के चरणकमल हैं। सहस्त्रार पर ध्यान उनके चरणकमलों का ध्यान है। सहस्त्रार में स्थिति उनके चरणकमलों में आश्रय है। ब्रह्मरंध्र से परे की अनंतता -- भगवान का विराट स्वरूप है। उस अनंतता से भी परे का ज्योतिषांज्योतिर्मय आलोक -- वे स्वयं हैं। उन के चरणकमलों में हमारा समर्पण पूर्ण हो।
.
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"
ॐ शांति, शांति, शांति॥"
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२१

भगवान को पाने का प्रयास - क्या हमारा "अहंकार" है? ---

 भगवान को पाने का प्रयास - क्या हमारा "अहंकार" है? ---

.
मेरा उत्तर है - नहीं। भगवान हमें - (१) निर्द्वन्द्व, (२) नित्यसत्त्वस्थ, (३) निर्योगक्षेम और (४)आत्मवान् बनने का आदेश देते हैं -- "निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।" ये तो अहंकार से मुक्ति के उपाय हैं, जिनसे हम उन्हें पा सकते हैं।
.
अब इन के शब्दार्थों पर विचार कर लेते हैं --
(१) निर्द्वन्द्व - यानि सुखदुःख के हेतु जो परस्पर विरोधी युग्म हैं, उनका नाम द्वन्द्व है, उनसे रहित हों।
(२) नित्यसत्त्वस्थ - यानि सदा सत्त्वगुण में स्थित रहें।
(३) निर्योगक्षेम - यानि योगक्षेम को न चाहने वाले हों। अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करने का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम क्षेम है।
(४) आत्मवान - यानि सावधान व जागरूक होकर आत्मा में स्थित रहें।
.
उपरोक्त गुणों को कैसे प्राप्त करें? एक ही उपाय है, और वह है - "गुरु प्रदत्त साधना।" गुरु महाराज ने जो साधना हमें दी है, उसको हम अपने पूरे "प्राण", पूरी "सत्यनिष्ठा" और पूरी "भक्ति" (परमप्रेम) से करें। सत्यनिष्ठा और परमप्रेम जब हमारे में होंगे, तब भगवान की प्राप्ति में समय नहीं लगेगा। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२२ जून २०२१

भगवान से शिकायत ---

भगवान से शिकायत ---
.
आध्यात्म में भगवान से शिकायत होना -- इस बात का संकेत है कि मेरे समर्पण में कहीं न कहीं, कोई न कोई, कमी रह गई है। मैं अपनी पीड़ा अन्य किसी से व्यक्त नहीं कर सकता, और उन्हें भूल भी नहीं सकता, -- बस यही शिकायत है मुझे भगवान से।
.
अन्य कोई है भी तो नहीं, जिस से अपनी बात कह सकें। शिकायत होने का अर्थ है कि यथासंभव पूर्ण प्रयासों के पश्चात भी कहीं न कहीं हमारे समर्पण में कमी है। लेकिन सारी कमियाँ भी उन्हीं की है।
.
भगवान ने कह तो दिया कि --
"अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते"॥१८:५३॥
अर्थात् -- अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह को त्याग कर ममत्वभाव से रहित और शान्त पुरुष ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बन जाता है।
.
जब उनके मार्ग पर चलते हैं तो बाधा बनकर भी तो वे ही समक्ष आ जाते हैं। अब कोई फर्क नहीं पड़ता, कितनी भी बाधाएँ आयें, कितनी भी शिकायतें हों, प्रेम और समर्पण तो उन्हीं को रहेगा। उन ब्रह्म से पृथक कोई भी अन्य नहीं है, मैं भी नहीं। सब कुछ तो वे ही हैं। उन की शिकायत अब उनको ही करेंगे। सबके हृदय में कुछ ऐसी घनीभूत पीड़ायें होती हैं, जिन्हें कोई मनुष्य नहीं समझ सकता। वे सब भगवान को समर्पित कर देनी चाहियें।
कृपा शंकर
२२ जून २०२१

सभी प्राणियों को मैं नमन करता हूँ, क्योंकि प्राण रूप में स्वयं परम-पुरुष भगवान नारायण उन में उपस्थित हैं ---

 सभी प्राणियों को मैं नमन करता हूँ, क्योंकि प्राण रूप में स्वयं परम-पुरुष भगवान नारायण उन में उपस्थित हैं।

प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ---
.
ध्रुव उवाच -
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना ।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥ - श्रीमद् भागवतम् ४.९.६
अर्थात् -- हे प्रभो! आपने ही मेरे अंतःकरण में प्रवेश कर मेरी सोई हुई वाणी को सजीव किया है, तथा आप ही हाथ,पैर कान और त्वचा आदि इंद्रियों को चेतना प्रदान करते हैं। मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं।
Prostration to You, O Bhagavān, the supreme Consciousness, possessor of all powers, who, having entered my being, has activated my dormant speech, and likewise has empowered the other organs such as the hands, feet, ears, skin and all the vital forces, by virtue of His mere Presence.
.
सत्य सनातन धर्म -- प्राण-तत्व है, जिसने इस सारी सृष्टि को धारण कर रखा है। प्राण-तत्व से ही ऊर्जा निर्मित हुई है, जिससे सृष्टि का निर्माण हुआ। प्राण-तत्व से ही सारे प्राणियों और देवी-देवताओं का अस्तित्व है। प्राण-तत्व को जानना ही परमधर्म है। प्राण-तत्व का ज्ञान श्रौत्रीय ब्रह्मनिष्ठ सिद्ध योगी सद्गुरु की कृपा से उनके द्वारा बताई हुई साधना, उनके सान्निध्य में, सफलतापूर्वक करने से होता है।
.
स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नाद्धीर्य तपोमंत्राः कर्मलोकालोकेषु च नाम च। -प्रश्नोपनिषद् ६/४॥
अर्थात् - परमात्मा ने सर्वप्रथम प्राण की रचना की। तत्पश्चात् श्रद्धा उत्पन्न की। तब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह पाँच तत्व बनाये। इसके उपरान्त क्रमशः मन, इन्द्रिय, समूह, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, और कर्मों का निर्माण हुआ। तदन्तर विभिन्न लोक बने।
.
सोऽयमाकाशः प्राणेन वृहत्याविष्टव्धः तद्यथा यमाकाशः प्राणेन वृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतानि आपि पीलिकाभ्यः प्राणेन वृहत्या विष्टव्धानी त्येवं विद्यात्। -एतरेय २/१/६
अर्थात्- प्राण ही इस विश्व को धारण करने वाला है। प्राण की शक्ति से ही यह ब्रह्मांड अपने स्थान पर टिका हुआ है। चींटी से लेकर हाथी तक सब प्राणी इस प्राण के ही आश्रित हैं। यदि प्राण न होता तो जो कुछ हम देखते हैं कुछ भी न दीखता।
.
कतम एको देव इति। प्राण इति स ब्रह्म नद्रित्याचक्षते। -बृहदारण्यक
अर्थात्- वह एक देव कौन सा है? वह प्राण है। ऐसा कौषितकी ऋषि ने व्यक्त किया है।
‘प्राणों ब्रह्म’ इति स्माहपैदृश्य। अर्थात्- पैज्य ऋषि ने कहा है कि प्राण ही ब्रह्म है।
.
प्राण एव प्रज्ञात्मा। इदं शरीरं परिगृह्यं उत्थापयति। यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः। -शाखायन आरण्यक ५/३
अर्थात्- इस समस्त संसार में तथा इस शरीर में जो कुछ प्रज्ञा है, वह प्राण ही है। जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।
.
भृगुतंत्र में कहा गया है -- "उत्पत्ति मायाति स्थानं विभुत्वं चैव पंचधा। अध्यात्म चैब प्राणस्य विज्ञाया मृत्यश्नुते॥" अर्थात् - प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है? कहाँ से शरीर में आता है? कहाँ रहता है? किस प्रकार व्यापक होता है? उसका अध्यात्म क्या है? जो इन पाँच बातों को जान लेता है, वह अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।
२० जून २०२१ 

इस शरीर रूपी रथ में जो सूक्ष्म आत्मा को देखता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता --

 इस शरीर रूपी रथ में जो सूक्ष्म आत्मा को देखता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता --

.
एक ग्रन्थ के संदर्भ में कहीं लिखा है -- "रथस्थं वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते|" अर्थात् इस शरीर रूपी रथ में जो सूक्ष्म आत्मा को देखता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। यह शाश्वत सत्य है। इसका उत्तर समझने में तो बड़ा सरल है, लेकिन व्यवहार में अपनाना बड़ा कठिन है। गीता में भगवान कहते हैं --
"आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥८:१६॥"
अर्थात् -- हे अर्जुन ! ब्रह्म लोक तक के सब भुवन पुनरावर्ती हैं। परन्तु, हे कौन्तेय ! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता॥
.
भगवान को भी वही प्राप्त करता है जो इस शरीर रूपी रथ में सर्वव्यापी सूक्ष्म आत्मा को अनुभूत करता है, यानि देखता है। यह बुद्धि का नहीं बल्कि अनुभूति का विषय है। इसका अर्थ वही समझ सकता है जो अपना सम्पूर्ण ध्यान कूटस्थ पर केन्द्रित करके अनंत ब्रह्म में लीन हो जाता है।
.
हम झूले में ठाकुर जी को झूला झुला कर उत्सव मनाते हैंं, यह तो प्रतीकात्मक है। लेकिन वास्तविक झूला तो कूटस्थ में है, जहाँ सचमुच आत्मा की अनुभूति --ज्योति, नाद व स्पंदन के रूप में होती है। तब सौ काम छोड़कर भी उस में लीन हो जाना चाहिए। यह स्वयं में एक उत्सव है। ज्योति, नाद व भगवत-स्पंदन की अनुभूति होने पर पूरा अस्तित्व आनंद से भर जाता है जैसे कोई उत्सव हो। यही ठाकुर जी को झूले में डोलाना है।
.
जीवरूपी गजेन्द्र और मोहरूपी ग्राह (मगर मच्छ) का युद्ध शाश्वत है। यह सृष्टि के आदिकाल से ही हम सब के भीतर चल रहा है और सृष्टि के अंत यानि तब तक चलता रहेगा, जब तक हमारी करुण प्रार्थना सुनकर भगवान हमें इस मोह-रूपी ग्राह से मुक्त नहीं कर देते। ग्राह की मुक्ति पहले होगी, तब उसके बाद ही हम मुक्त और विजयी होंगे।
.
तंत्र शास्त्रों में इसे दूसरे रूप में समझाया गया है --
"पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति भूतले।
उत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते॥" (तन्त्रराज तन्त्र).
अर्थात् पीये, और बार बार पीये जब तक भूमि पर न गिरे| उठ कर जो फिर से पीता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता|
यह एक बहुत ही गहरा ज्ञान है जिसे एक रूपक के माध्यम से समझाया गया है|
.
आचार्य शंकर ने "सौंदर्य लहरी" के आरम्भ में ही भूमि-तत्त्व के मूलाधारस्थ कुण्डलिनी के सहस्रार में उठ कर परमशिव के साथ विहार करने का वर्णन किया है| विहार के बाद कुण्डलिनी नीचे भूमि तत्त्व के मूलाधार में वापस आती है| बार बार उसे सहस्रार तक लाकर परमेश्वर से मिलन कराने पर पुनर्जन्म नहीं होता|
.
आज निर्जला एकादशी के दिन ये भाव आए और मैं उन्हें लिपिबद्ध कर पाया, मैं धन्य हुआ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे !!
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ नमो नारायण !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
आप सब महापुरुषों को नमन !!
कृपा शंकर
२१ जून २०२१