क्या यह संसार परमात्मा के मन का एक स्वप्न मात्र है?
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लगता तो ऐसा ही है। परमात्मा से लगातार जुड़े होने के कारण परमात्मा की मादकता (नशा) भी छाने लगी है। अब अच्छा-बुरा जो कुछ भी संसार में हो रहा है, उससे मुझे अब कुछ भी फर्क पड़ना कम होते होते बंद होने लगा है। यह सृष्टि परमात्मा की है, मेरी नहीं। अपनी सृष्टि के लिए परमात्मा स्वयं जिम्मेदार हैं। मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ मेरे अपने विचारों और कर्मों की है। जैसे सिनेमा हॉल में सिनेमा देखते हैं, वैसे ही संसार को निरपेक्ष भाव से देख रहा हूँ।
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मेरी कमियों को दूर करने की, मेरे निर्वाह की, और मुझे अपने साथ एक करने की सारी ज़िम्मेदारी अब स्वयं परमात्मा की है, मेरी नहीं।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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अपने भाष्य में आचार्य शंकर लिखते हैं कि -- "जो अनन्य भाव से, यानि भगवान को आत्म-रूप से जानते हुए भगवान का निरन्तर चिन्तन करते हैं, भगवान में स्थित उन परमार्थ-ज्ञानियों का योगक्षेम भगवान स्वयं चलाते हैं।
अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है। उनके ये दोनों काम भगवान स्वयं करते हैं। अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योग-क्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। वे जीने और मरने में भी अपनी वासना नहीं रखते। केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।"
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सच्चिदानंद परमात्मा के सान्निध्य का नशा बड़ा आनंददायक है। संसार के सब नशे उस के सामने बेकार हैं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ अगस्त २०२३
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