अब तक मेरे इस लौकिक जीवन का अधिकाँश भाग व्यतीत हो चुका है, बहुत थोड़ा सा समय बाकी है, वह भी अनिश्चित है| जो समय बीत चुका है वह तो बापस आ नहीं सकता, पर जितना भी अनिश्चित समय बचा है, उसमें मेरा इसी क्षण से एक ही धर्म है और एक ही राजनीति है, वह है ..... निरंतर ईश्वर में रमण, उसी का चिंतन और उसी का ध्यान, उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं|
Wednesday, 9 April 2025
निरंतर ईश्वर में रमण, उसी का चिंतन और उसी का ध्यान ---
कूटस्थ में वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण अपना स्वयं का ध्यान कर रहे हैं ---
कूटस्थ में वासुदेव भगवान श्रीकृष्ण अपना स्वयं का ध्यान कर रहे हैं| वे अपने आसन पर पद्मासन में बैठे हैं| उनकी छवि अलौकिक व अवर्णनीय है| सारी सृष्टि उनमें, और वे सारी सृष्टि में समाहित हैं| उनका ज्योतिर्मय कूटस्थ विग्रह -- "शब्दब्रह्म", -- चारों ओर गूंज रहा है| अभय प्रदान करता हुआ हुआ उनका संदेश स्पष्ट है ---
अन्तर्मन की पीड़ा ---
अन्तर्मन की पीड़ा:--
मनुष्य जाति का एक ही धर्म है ---
हम शाश्वत आत्मा हैं। आत्मा का धर्म एक ही होता है , और वह है -- परमात्मा को पूर्ण समर्पण। इसके लिये निरंतर परमात्मा का स्मरण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, और उन्हीं में रमण करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त आत्मा का कोई धर्म नहीं होता। यही सनातन धर्म है। इससे अतिरिक्त बाकी सब धर्म के नाम पर अधर्म है। गीता में भगवान कहते हैं --
नारायण नारायण नारायण !! अपना परम आदर्श मैं किसे कहूँ? ---
नारायण नारायण नारायण !! अपना परम आदर्श मैं किसे कहूँ? ---
उपासना / सहस्त्रारचक्र में गुरु महाराज के चरण कमलों का ध्यान करें।
Tuesday, 8 April 2025
जानने योग्य सिर्फ भगवान ही हैं जिन्हें जान कर व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है --- .
जानने योग्य सिर्फ भगवान ही हैं जिन्हें जान कर व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है ---