"यथा ब्रज गोपिकानाम्" ----
Thursday, 4 June 2026
"यथा ब्रज गोपिकानाम्" ----
कभी कभी ईश्वर से विछोह भी अच्छा है क्योंकि उसमें मिलने का आनंद समाया होता है| मिलने में वियोग की पीड़ा भी होती है|
वह स्थिति सब से अच्छी है जहाँ ना कोई मिलना है और ना कोई विछुड़ना| क्योंकि की जो मिलता और विछुड़ता है वह तो आप स्वयं ही हो| आपसे पृथक कुछ है ही नहीं|
कभी जब आप एक अति उत्तुंग पर्वत के शिखर से नीचे की गहराई में झांकते हो तो वह डरावनी गहराई भी आपमें झाँकती है| ऐसे ही जब आप नीचे से अति उच्च पर्वत को घूरते हो तो वह पर्वत भी आपको घूरता है| जिसकी आँखों में आप देखते हो वे आँखें भी आपको देखती हैं| जिससे भी आप प्रेम या घृणा करते हो उससे वैसी ही प्रतिक्रिया कई गुणा होकर आपको ही प्राप्त होती है|
वैसे ही जब आप प्रभु को प्रेम करते हो तो वह प्रेम अनंत गुणा होकर आपको ही प्राप्त होता है| वह प्रेम आप स्वयं ही हो| प्रभु में आप समर्पण करते हो तो प्रभु भी आपमें समर्पण करते हैं| जब आप उनके शिवत्व में विलीन हो जाते हो तो आप में भी वह शिवत्व विलीन हो जाता है और आप स्वयं साक्षात् शिव बन जाते हो| जहाँ ना कोई क्रिया-प्रतिक्रिया है, ना कोई मिलना-बिछुड़ना, जहाँ कोई अपेक्षा या माँग नहीं है, जो बैखरी मध्यमा पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता आप स्वयं ही हो|
आपका पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए ही है|
ॐ शिव | शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
झुंझुनू(राजस्थान)
03 जून 2014
Wednesday, 3 June 2026
मैं जड़-चेतन और यह सारी सृष्टि हूँ। केवल मैं हूँ। ---
मैं जड़-चेतन और यह सारी सृष्टि हूँ। केवल मैं हूँ। मैं ही परमब्रह्म परमशिव और विष्णु हूँ। मुझसे अन्य कोई या कुछ भी नहीं है।
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सृष्टिकर्ता परमात्मा से जुड़ कर ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा हम कर सकते हैं। स्वयं में उनको निरंतर व्यक्त करें। कमर को सदा सीधी रखते हुए खेचरी/अर्ध-खेचरी/शांभवी मुद्रा में बैठें, और भ्रूमध्य की ओर अपने नेत्रों के गोलकों को स्थिर कर कूटस्थ सूर्यमण्डल में पुरुषोत्तम का ध्यान करें।
जब भी समय मिले तब गीता के १५वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" का स्वाध्याय करें और उसके आरंभ के ऊर्ध्वमूल वाले श्लोकों को समझते हुए तदानुसार ऊर्ध्वमूल में ही ध्यान करते हुए अपनी चेतना का अनंत में विस्तार करें।
मैं पूर्ण सत्यनिष्ठा से यह कह रहा हूँ कि गीता के स्वाध्याय से मेरे सारे संशय दूर हुए हैं, और अनेक रहस्य अनावृत हुए हैं। ज्ञान, भक्ति और कर्म -- इन तीनों विषयों को भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत अच्छी तरह समझाया है।
हमारा निवास आनंद-सिंधु के मध्य हैं, अब कभी प्यासे नहीं रहेंगे।
हरिः ॐ तत्सत् !! ॐ स्वस्ति !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३ जून २०२२
"आनन्द सिन्धु मध्य तव वासा, बिनु जाने तू मरत पियासा" ---
"आनन्द सिन्धु मध्य तव वासा, बिनु जाने तू मरत पियासा" ---
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आज तक के इस जीवन में जितने भी संतों से मेरा सत्संग हुआ है, एक बात तो प्रायः सभी ने कही है कि मनुष्य की देह, बुद्धि, भक्ति और सत्संग लाभ पा कर भी परमात्मा का चिंतन मनन और ध्यान न करना प्रमाद यानि मृत्यु है|
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अब स्वयं के बारे में सोच कर ही विचार होता है कि मैं जीवित हूँ या मृत ?
लगता है मृत ही अधिक हूँ|
गुण गोविन्द गायो नहीं, जनम अकारथ कीन।
कहे नानक हरिः भज मना, जा विध जल की मीन॥
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क्षण क्षण बीत गये, कितने दिन-रात, महीने-वर्ष और जीवन बीत गया। माया के पीछे भागे तो -- "माया मिली न राम" -- वाली कहावत स्वयं पर ही चरितार्थ हो गयी। परमात्मा सामने है, उसका महासागर उमड़ रहा है, फिर भी उससे भेद है। मेरी इस पीड़ा को मैं ही जानता हूँ।
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"आनन्द सिन्धु मध्य तव वासा, बिनु जाने तू मरत पियासा।
धन्य हैं गोसांई बाबा तुलसीदासजी जो हम सब के लिए इतनी बड़ी बात कह गये कि तुम आनन्द के समुद्र में रह रहे हो, लेकिन बिना जाने प्यासे मर रहे हो।
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हे परमशिव, रक्षा करो। आप मेरे समक्ष हैं, फिर भी मैं उल्टी दिशा में आपसे दूर आपकी इस मृग-मरीचिका रूपी माया के पीछे भाग रहा हूँ। त्राहिमाम् त्राहिमाम् त्राहिमाम् रक्षा करो हे राम ! अपने ध्यान से मुझे विमुख मत करो | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
०३ जून २०१७
Tuesday, 2 June 2026
भगवान की भक्ति से क्या मिलेगा? --- -- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख) .
भगवान की भक्ति से क्या मिलेगा? --- -- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख)
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इस प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर तो भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के ९वें अध्याय में दिया है।
इस प्रश्न के उत्तर रामचरितमानस व भागवत में भी अनेक प्रसंगों में दिये हुए हैं।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् - मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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लेकिन व्यावहारिक बात तो यह है कि --
"भगवान की भक्ति में सिर्फ भगवान ही मिलेंगे, भौतिक/सांसारिक दृष्टि से कुछ भी नहीं मिलेगा। जो कुछ स्वयं के पास में है, वह भी छीन लिया जाएगा। सारी विषय-वासनाएँ और कामनाएँ समाप्त हो जायेंगी, और इस दुनियाँ के भोग हमारे लायक नहीं रहेंगे।"
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जिन्हें कुछ सांसारिक सामान चाहिए वे भगवान की भक्ति नहीं करें, क्योंकि भगवान एक स्वार्थी प्रेमी हैं, वे हमारा १००% (शत-प्रतिशत) प्रेम मांगते हैं। उनके यहाँ ९९.९९% भी नहीं चलेगा। हम उन्हें अपना शत-प्रतिशत देंगे तभी वे आएंगे।
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ईसाईयों के ग्रन्थों में भी यही बात कही गई है --
"For unto every one that hath shall be given, and he shall have abundance: but from him, that hath not shall be taken away even that which he hath. (Matthew 25:29 KJV).
(दुर्भाग्य से पश्चिमी जगत ने इस बात को नहीं माना, और अपने स्वयं के ही अर्थ लगा लिए)
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झूठे वैराग्य और झूठी भक्ति का ढोंग हमें भगवान से दूर करता है। अपने शब्दों या अभिनय के द्वारा एक झूठे वैराग्य और झूठी भक्ति का प्रदर्शन -- सबसे बड़ा छल और धोखा है, जो हम स्वयं के साथ करते हैं। हम किसी को प्रभावित करने के लिए दिखावा करते हैं, यह एक बहुत बड़ा और छिपा हुआ दुःखदायी अहंकार है। किसी को प्रभावित करने से क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिर्फ अहंकार की ही तृप्ति होगी। महत्वपूर्ण हम नहीं, भगवान हैं, जो हमारे ह्रदय में हैं।
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हम अपने रूप, गुण, धन, विद्या, बल, पद, यौवन और व्यक्तित्व का भी बहुत अधिक दिखावा कर के दूसरों को हीन और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं। यह भी स्वयं को धोखा देना, और भगवान का अपमान करना है।
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वर्णाश्रम धर्म का पालन करके भी यदि प्रभु में प्रेम नहीं हुआ तो क्या लाभ?
और प्रभु में प्रेम हो गया तो वर्णाश्रम धर्म का पालन न हुआ तो क्या हानि?
आप सब में परमात्मा को नमन !!
कृपा शंकर
२ जून २०२२
कोई भी आध्यात्मिक साधना हो या कोई भी आस्था --- उसके औचित्य का एक ही मापदंड है -- "परमात्मा की अनुभूति" ---
कोई भी आध्यात्मिक साधना हो या कोई भी आस्था --- उसके औचित्य का एक ही मापदंड है -- "परमात्मा की अनुभूति"। आप किसी भी मार्ग पर चल रहे हों, यदि आपको दिव्य प्रेम, आनंद, और परमात्मा की निरंतर अनुभूति होती है तो वह मार्ग सही है; अन्यथा गलत। हमारा लक्ष्य केवल परमात्मा है।
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एक बार परमात्मा की गहनतम अनुभूति हो जाये तब न तो कोई गुरु है और न कोई शिष्य। न कोई भूतकाल है और न वर्तमान। उस समय हम कालातीत हैं। अपना सम्पूर्ण विलय परमात्मा में कर दें। जो हमें परमात्मा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे और मार्ग बताए, उस महापुरुष का स्वागत है। लेकिन किसी का भी साथ शाश्वत नहीं है। यहाँ कोई अन्य नहीं है। केवल परमात्मा ही सत्य है, हम उसके साथ एक हैं। अन्य कोई नहीं है, हम भी नहीं। कालातीत परम चेतना को ही कूटस्थ कहते हैं। हम कूटस्थ चैतन्य में रहें।
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ध्यानस्थ होते ही हमारी चेतना सूक्ष्म जगत में चली जाती है। ध्यान के जिस आसन पर हम बैठते हैं, वह हमारा राजसिंहासन है। ध्यानस्थ होने पर सूक्ष्म जगत के सारे अनंत आकाश, सारे ब्रह्मांड, सारी आकाश-गंगाएँ, सारे चाँद, तारे, नक्षत्र और सारी सृष्टि -- हमारे साथ एक हो जाती हैं। जो कुछ भी सृष्ट हुआ है, और जो कुछ भी सृष्ट होना है, वह सम्पूर्ण अस्तित्व हम हैं। हमारे से पृथक कुछ भी नहीं है। परमात्मा के प्रेम और आनंद के रूप में हम व्यक्त होते हैं। समस्त सृष्टि हमारा परिवार, और समस्त ब्रह्मांड हमारा घर है। हम अनंत असीम सर्वत्र हैं। हम और हमारे प्रभु एक हैं। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जून २०२६
Saturday, 30 May 2026
कुर्द जाति क्या मूल रूप से हिन्दू है?
कुर्द जाति क्या मूल रूप से हिन्दू है? क्या ये महाराजा विक्रमादित्य के कृत-सैनिक हैं? फारसी का कुर्द शब्द क्या संस्कृत के कृत शब्द का अपभ्रंस है?
विकिपीडिया के अनुसार कुर्द (کورد) या कुर्द लोग, पश्चिम एशिया से एक ईरानी जातीय समूह है। वे कुर्दिस्तान के मूल निवासी हैं, जो दक्षिणपूर्वी तुर्की, उत्तर-पश्चिमी ईरान, उत्तरी इराक और उत्तरपूर्वी सीरिया में फैला एक भौगोलिक क्षेत्र है। इनका कोई देश नहीं है। इनके बारे में जानने की जिज्ञासा है।
पुनश्च: ---
मुझे लगता है कि महाराजा विक्रमादित्य का साम्राज्य पश्चिम में फारस, अरब और रोम तक था। उत्तर में पूरा मध्य एशिया, और पूरा शिविर (जिसे हम साइबेरिया कहते हैं उसे रूसी भाषा में "Сибирь" सिबिर कहते हैं) था। पूर्व में विएतनाम तक, और दक्षिण में मलेशिया और इन्डोनेशिया तक था।
कुछ वर्षों पूर्व ईरान में हुई एक खुदाई में महाराजा विक्रमादित्य की मूर्ति मिली थी जिसमें वे एक घोड़े पर बैठे हुए हैं, धोती पहिन रखी है, कमर में तलवार लटकी हुई है। यह समाचार मैंने कहीं पढ़ा था। यह भी पढ़ा था कि उनकी मृत्यु फारस (वर्तमान ईरान) में हुई थी। यह भी पढ़ा था कि उनके साथ जो सैनिक थे वे वही रह गये। वे कृत (सेवा निवृत) थे। समय के साथ उन्हें इस्लाम अपनाना पड़ा, और वे ही "कुर्द" कहलाये। उनमें कुछ यजीदी भी हैं। लेकिन मूल रूप से सभी हिन्दू थे।
यह अनुसंधान का विषय है, मुझे इस बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। आप सभी को धन्यवाद॥
३१ मई २०२५
Wednesday, 20 May 2026
ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है --- .
ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है ---
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ब्रह्मज्ञान ही हमारी वास्तविक शक्ति है। ब्रह्मज्ञ होने पर असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हमारा कुछ भी अहित नहीं कर सकतीं। हम ब्रह्ममय हों, यही समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है।
ब्रह्मज्ञान के लिए सर्वप्रथम तो परमात्मा से प्रार्थना करें, फिर किन्हीं श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) और ब्रहमनिष्ठ महात्मा (जिनकी पूर्ण निष्ठा ब्रह्म में हो) से मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके सान्निध्य में उनके द्वारा बताई हुई विधि से वैदिक साधना का आरंभ करें।
यदि ऐसे आचार्य नहीं भी मिलते हैं तो दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव, और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण तो हैं ही। उन्हें गुरु मान कर उपनिषदों व श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई साधना का आरंभ करें। फिर वे लौकिक सद्गुरु की उचित व्यवस्था भी कर देंगे। लौकिक रूप से एक ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय आचार्य ही सद्गुरु हो सकता है। अन्य कोई नहीं।
ब्रह्मज्ञान ही भूमाविद्या है। ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को ब्रह्मज्ञान का जो उपदेश दिया था, उसका नाम उन्होने भूमा-विद्या रखा।
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भगवान विष्णु या भगवान शिव की निरंतर विस्तृत हो रही ज्योतिर्मय सर्वव्यापक अनंतता का ही कूटस्थ-चैतन्य में ध्यान करें। साधनाकाल में अपने इस नश्वर देह को भूल जाएँ। परमात्मा की ज्योतिर्मय अनंतता ही हमारा शरीर है, और हम परमात्मा के साथ एक हैं। ध्यान साधना में अकिंचन-भाव को भूल जाएँ, और सर्वदा सर्वस्व-भाव में ही स्थित रहें।
मेरुदंड सर्वदा उन्नत और ठुड्डी भूमि के सामानांतर रहे। पूर्ण खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा में ध्यानस्थ होने से पूर्व कुछ देर तक प्राणायाम करें, फिर "अजपा-जप" से आरंभ करें। तत्पश्चात मूर्धा में प्रणव मंत्र का जप करें। भगवान की कृपा फलीभूत हुई तो सारा मार्गदर्शन और साधना में सफलता भी प्राप्त हो जाएगी। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१९ मई २०२६
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