Saturday, 29 March 2025

"किसी भी परिस्थिति में हमें यज्ञ, दान व तप रूपी कर्मों को (यानि भक्ति व साधना को) नहीं छोडना चाहिए।"

"किसी भी परिस्थिति में हमें यज्ञ, दान व तप रूपी कर्मों को (यानि भक्ति व साधना को) नहीं छोडना चाहिए।"
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का यह स्पष्ट आदेश है --
"यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥१८:५॥"
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥१८:६॥"
अर्थात् -
यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियों को पवित्र करनेवाले हैं।
हे पार्थ ! इन कर्मों को भी, फल और आसक्ति को त्यागकर करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।
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"मन लगे या न लगे, चाहे यंत्र की तरह ही करनी पड़े, किसी भी परिस्थिति में ईश्वर की भक्ति और साधना हमें नहीं छोड़नी चाहिए।
हमारी निष्काम साधना एक यज्ञ है, जिसमें हम अपने अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) की आहुतियाँ भगवान को देते हैं। यज्ञों में स्वयं को भगवान ने जपयज्ञ बताया है। अतः किसी भी परिस्थिति में जपयज्ञ नहीं छोड़ना चाहिए। जो भी जितनी भी मात्रा में जप का संकल्प लिया है, उसे भगवान की प्रसन्नता के लिए करना ही चाहिए।
अपने सदविचारों से हम समष्टि का कल्याण करते हैं, यह बहुत बड़ा दान है।
इन सब के लिए जो प्रयास करते हैं, वह तप है।
कर्मफल और आसक्ति का त्याग ही वास्तविक त्याग है।
हमारी चेतना में हर समय केवल भगवान छाये रहें। सम्पूर्ण जीवन उन्हें समर्पित हो।
कितनी भी बार असफलता मिले, अपने प्रयास को छोड़ो मत। भगवान के पीछे ढीठ की तरह पड़े रहो। सफलता अवश्य मिलेगी।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३० मार्च २०२४ 

पप्पी दुश्चरित्र पुराण !

 पप्पी दुश्चरित्र पुराण !

बहुत कम लोग जानते होंगे कि विदेशी मूल की वर्णसंकर पापिनी महिला ने अपने कुपुत्र "पप्पू " को देश का प्रधान मंत्री बनाने की योजना उसी दिन से शुरू कर दी थी , जिस दिन पप्पू पैदा हुआ था , इसके लिए पापिनी ने कई कांग्रेसी नेताओं को रास्ते से हटा कर जन्नत भेज दिया , लेख के अगले भाग में यह बात विस्तार से देंगे ,आप ने देखा होगा की आजकल "पप्पी " हिन्दुओ के वोट समेटने के बनारस के घाटों का पानी पी रही है , हिंदी में घाट घाट का पानी पीने वाली औरत को दुश्चरित्र माना जाता जिस तरह पप्पू की मम्मी पापिनी ने बड़ी चालाकी से विरोधी कान्ग्रेसिओं को साफ़ करा दिया , और उसी अनुसरण पप्पी ने भी ससुराल के लोगों को साफ कर दिया ,
जिस दिन 16/2/1998 को राजेन्द्र वडेरा ने अपने छोटे बेटे रॉबर्ट की शादी प्रियंका से की थी ,उसी दिन से उसके सारे परिवार पर मौत का साया मंडरा रहा था। देश विभाजन के बाद राजेन्द्र के पिता एच आर वडेरा सियालकोट से मुरादाबाद आकर बस गए थे। वह पंजाबी हिन्दू थे। उनके दो लड़के थे ,ओमप्रकाश और राजेन्द्र। इनका परिवार पीतल के हस्तशिल्प का व्यवसाय करता था। राजेन्द्र ने मौरीन मेक डोनाड नामकी एक एंग्लो इंडियन महिला से प्रेम विवाह किया था। मौरीन का बाप अँगरेज़ और माँ भारतीय थे। मौरीन हमेशा राजेन्द्र पर ईसाई बनने का दवाब डालती थी ,जिसे वह मना कर देते थे। लेकिन फ़िर भी मौरीन ने अपनी मर्जी से राजेन्द्र का नाम एरिक और अपने ससुर का नाम हैरी रख दिया। इसके लिए मौरीन ने यह तर्क दिया की ऐसा करने से विदेशी ग्राहक आकर्षित होंगे। क्योंकि विदेशी भारतीय वस्तुएं पसंद करते हैं।राजेन्द्र की तीन संतानें हुयीं ,रिचार्ड,मिशेल और रॉबर्ट। धीमे धीमे राजेन्द्र और मौरीन के बीच में इतना मनमुटाव बढ़ गया की मौरीन दिल्ली चली गयी। और वहाँ उसने दक्षिण दिल्ली की अमर कालोनी में अपना एक शोरूम खोल लिया ,जो आज भी चल रहा है। राजेन्द्र ने अपने बड़े लड़के रिचार्ड और लड़की मिशेल की पाहिले ही शादी कर दी थी। जो अपना अपना व्यवसाय कर रहे थे। रॉबर्ट मुरादाबाद की एक गेरेज में मेकेनिक था। दिल्ली में आकर मौरीन की दोस्ती सोनिया से हो गयी ।बाद में यह दोस्ती इतनी बढ़ गयी की सोनिया ने प्रियंका की शादी रॉबर्ट से करदी। और आख़िर प्रियंका राजेन्द्र वडेरा के परिवार के लिए एक यमदूती साबित हुयी।
7-मिशेल वडेरा (-मृत्य 16 अप्रैल 2001 )
यह राजेन्द्र वडेरा की दूसरी संतान थी .अपने पिता की तरह मिशेल भी रॉबर्ट और प्रियंका की शादी के ख़िलाफ़ थी। क्योंकि शादी के बाद प्रियंका कभी ससुराल नहीं गयी। बल्कि रॉबर्ट को ही अपने साथ ले गयी। और वडेरा परिवार के किसी भी व्यक्ति को रॉबर्ट से नहीं मिलने देती थी। रॉबर्ट भी सोनिया और प्रियंका के इशारों पर नाचता था। प्रियंका ने रॉबर्ट को अपना रखैला बना रखा था। मिशेल दिल्ली में ज्वैलरी डिजायनिंग का कम करती थी। वह लोगों को प्रियंका के इस व्यवहार के बारे में बताती थी। और कहती थी की सोनिया और प्रियंका ने मेरे परिवार में फूट दाल दी है। प्रियंका वडेरा परिवार में नफरत के बीज बो रही है.मिशेल प्रियंका के चरित्र पर भी उंगली उठाती थी। फैलते फैलते यह बात सोनिया के कानों तक पहुँच गयी। और जब एक दिन मिशेल जरूरी काम के लिए अपनी कार से जयपुर जा रही थी तो अलवर के पास बेहरोर नाम की जगह पर अचानक उसकी कार पलट गयी। कार में 2 बच्चों को मिला कर 6 लोग थे। स्थानीय लोगों ने काफी मदद की लेकिन मेडिकल सहायता आने से पूर्व ही मिशेल की मौत हो चुकी थी।पुलिस का कहना था की कार के एक तरफ के दोनों टायर फट गए थे .जिस से दुर्घटना हुयी थी। लेकिन गांव वालों का कहना था की उन्होंने गोलियों की आवाज़ सुनी और देखा की एक दूसरी गाडी ने बगल से टक्कर मारी थी। बाद ने मिशेल की लाश को दिल्ली लाया गया जहाँ उसका अन्तिम संस्कार किया गया था। सिर्फ़ उसी दिन राजेन्द्र अपने बेटे से दूसरी बार मिले थे। पहिली बार वह सोनिया द्वारा आयोजित एक समारोह में अपने बेटे से मिले थे। क्योंकि सोनिया ने रॉबर्ट को अपने पिता से मिलने पर रोक लगा थी। जिस से राजेन्द्र ख़ुद को काफी अपमानित महसूस करते थे.
8-रिचार्ड वडेरा-(मृत्यु 20 सितम्बर 2003 )
यह राजेन्द्र वडेरा के बड़े पुत्र थे,और अपनी पत्नी सिमरन के साथ मुरादाबाद में वसंत विहार कालोनी में रहते थे।मौरीन ने सिमरन का ईसाई नाम सायरा कर दिया था। उसकी एक बच्ची भी है। रिचार्ड आर्टेक्स एक्सपोर्ट के नाम से हैंडीक्राफ्ट का व्यवसाय चलाते थे। अपने पिता की तरह रिचार्ड को भी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी .लेकिन जब उसके छोटे भी रॉबर्ट की प्रियंका से शादी हो गयी तो उसके पास कई कांग्रेसी नेता तरह तरह की सिफारासें लेकर आने लगे। और उसे अपने यहाँ भी बुलाने लगे। इसी तरह महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री कृपा शंकर ने रिचार्ड को दो बार मुम्बई बुलाया था.और उस से अपने ख़ास लोगों को टिकिट दिलवाने के लिए सोनिया से सिफारिश करने को कहा था। कृपा शंकर ने रिचार्ड को पहली बार मुम्बई के सन एंड सैंड होटल में ठहराया था। जिसका 50,000/- का बिल कृपा शंकर ने चुकाया था। दूसरी बार रिचार्ड को सरकारी गेस्ट हाउस "हाई माउन्ट "में ठहराया गया था जिसका इंतजाम विलास राव देशमुख ने किया था। जब यह बात तत्कालीन मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ,और कर्णाटक के मुख्य मंत्री एस एम् कृष्णा को पता चली तो उन्होंने इसकी शिकायत सोनिया को कर दी। इस पर सोनिया ने रॉबर्ट पर दवाब डाला की वह सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करे की उसका अपने पिता और भाई से कोई सम्बन्ध नहीं है। सोनिया के कहने पर रॉबर्ट ने 16 जनवरी 2002 को अपने वकील अरुण भारद्वाज के माध्यम से अपने पिता और भाई को नोटिस भेज दिया। इस नोटिस में रॉबर्ट ने अपने पिता को अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया था। उसने पिता के स्थान पर "एक व्यक्ति"शब्द लिखा था.नोटिस में कहा गया था की "एक राजेन्द्र वडेरा नाम का आदमी मेरी पत्नी ओर उसके साथ रिचार्ड नामका व्यक्ति मेरी पत्नी प्रियंका के नाम से लोगों को नौकरी दिलाने के बहाने धोखा दे रहे हैं । मेरा इन लोगों से किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है "यह सूचना सभी अखबारों में छपी थी। जब राजेन्द्र को इस नोटिस के बारे में पता चला तो उन्होंने अपने वकील छेदीलाल मौर्य के माध्यम से रॉबर्ट ,सोनिया, ओर प्रियंका पर मानहानि का दावा करने की धमकी देते हुए जवाब देने को कहा था। उन्होंने अपने नोटिस में रॉबर्ट पर आरोप लगाया था की वह सोनिया ओर प्रियंका के इशारों पर नाच रहा है ओर एक औरत के चक्कर में अपने बाप तक को भूल गया है। राजेन्द्र ने यह भी कहा था की वह रोवेर्ट को अपनी संपत्ति से बेदखल कर देंगे। यह सारी बातें 21 जनवरी 2002 के इंडिया टू डे में विस्तार से छपी थीं। इस घटना के कुछ ही दिनों के बाद रिचार्ड अचानक गायब हो गया था। उसकी पत्नी सिमरन ने काफी खोज की थी। लेकिन वहाँ की पुलिस ने उसकी कोई मदद नहीं की। ओर एक दिन 20/9/2003को रिचार्ड मुरादाबाद के सिविल लाइन की वसंत विहार कालोनी में रहस्यमय रूप से मरा हुआ पाया गया था। राजेन्द्र ने मौत की जांच काने की मांग की थी लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी । ओर मौत को आत्महत्या का मामला बताकर केस बंद कर दिया.
9-राजेन्द्र वडेरा -(म्रत्यु 3 अप्रैल 2003)
यह प्रियंका के ससुर थे। यह दक्षिण दिल्ली के हौज ख़ास इलाके के सिटी इन नामके एक गेस्ट हाउस में रहस्य पूर्ण रूप से मरे पाये गए। इसकी कोई ऍफ़ आई आर दर्ज नहीं की गयी। उनकी आयु 60 वर्ष थी। पुलिस की औपचारिक खानापूर्ति के बाद उनके शव का लोधी रोड के श्मशान में संस्कार कर दिया गया। पाहिले मौत का कारण हार्ट अटैक बताया गया था। लेकिन बाद में पुलिस अपने बयान से मुकर गयी। प्रतक्ष्य दर्शिओं के अनुसार राजेन्द्र के गले और शरीर पर चोट के निशान पाते गए थे।इसलिए प्रियंका और सोनिया ने इसे आत्मह्त्या बताने की कोशिश की थी। लेकिन आधिकारिक रूप से कुछ भी कहने से मना कर दिया। पुलिस ने भी अपना मुंह बंद कर लिया। जब पुलिस अपनी कार्यवाही कर रही थी तो मीडिया वालों को काफी दूर हटा दिया था। मौत की खबर मिलने पर राहुल पटना से दिल्ली आया और केवल 12 मिनट वहां रुका। और बाद में मृतक को श्रृद्धांजली देकर सोनिया और प्रियंका को साथ लेकर अमेठी के लिए रवाना हो गया। जहाँ उसे अपने चुनाव का पर्चा दाखिल करना था। जब अमेठी में राहुल का और रायबरेली में सोनिया का जुलूस निकल रहा था तो प्रियंका उसके साथ साथ चल रही थी ,और खुशी से फूली नहीं समा रही थी। उसके चेहरे पर दुःख का कोई लक्षण नहीं दिखाई दे रहा था। अपने पुत्र और पुत्री की मौत के बाद राजेन्द्र अकेले हो गए थे। उनकी पत्नी मौरीन तो पाहिले ही उनसे अलग रह रही थी। इस लिए काफी सालों से राजेन्द्र सिटी इन नामके एक गेस्ट हाउस में रह रहे थे। उनका लड़का पूरी तरह से सोनिया और प्रियंका के चंगुल में था और अपने बाप से कोई मतलब नहीं रखता था। लगभग एक साल से राजेन्द्र लीवर की बीमारी से पीडित थे ।और मेक्स हॉस्पिटल में अपना इलाज करा थे ।इस दौरान रॉबर्ट ,सोनिया या प्रियंका कोई भी उनका हाल पूछने अस्पताल नहीं आया। अपने लड़के के इस व्यवहार से राजेन्द्र बहुत नाराज़ और दुखी थे। लगभग दो हफ्ता पहले उनको अस्पताल से छुट्टी मिल गयी थी। अस्पताल से निकलने के बाद उन्होंने पहिला काम यह किया की ,अपने बड़े भाई ओमप्रकाश की तरह अपनी ज़मीन एक ऐसे ट्रस्ट को दे दी जिसका सम्बन्ध आर एस एस था। आजकल वहाँ सरस्वती मन्दिर स्कूल चल रहा ।जब यह बात सोनिया को पता चली तो हड़कंप मच गया। पहले सोनिया ने कुछ प्रभावशाली कांग्रेसी नेताओं के माध्यम से राजेन्द्र पर दवाब डलवाया की की वह दान में दी गयी ज़मीन वापिस ले ले । लेकिन राजेन्द्र ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तबसे राजेन्द्र को बार बार धमकियां दी जा रही थीं। और आख़िर उसे अपनी जान से हाथ धोना पडा। उक्त सभी घटनाओं को मात्र संयोग या दुर्घता मानना ठीक नहीं होगा। सभी घटनाओं का गहराई से विश्लेषण करने पर जो तथ्य निकल कर आते हैं वह इस प्रकार हैं -सभी मरने वाले सोनिया के आलोचक,और प्रतिस्पर्धी थे। और सोनिया उनको अपने रास्ते का काँटा मानती थी। यह सभी सोनिया के राजनीतिक प्रतिद्वंदी थे। इन लोगों ने सोनिया के कुछ ऐसे गुप्त रहस्य मालूम कर लिए थे ,जिनके प्रकट हो जाने से सोनिया को जेल हो सकती थी। इन लोगों की मौत से सोनिया को निष्कंटक, असीमित ,और एकछत्र सत्ता हासिल हो गयी। और भविष्य में राहुल को प्रधान मंत्री बनाने के लिए रास्ता साफ़ हो गया। सोनिया ने अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक एक करके इन सब का सफाया करा दिया। प्रियंका भी कुछ कम नहीं है। यदि प्रियंका नेहरू गांधी परिवार की इसी परम्परा को निबाहते हुए ,भविष्य में रॉबर्ट को भी इसी तरह से रास्ते से हटा दे ,तो हमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए। ऎसी महिलाओं को ही डायन कहा जाता है ।'लोग ठीक ही कहते हैं "माँ हत्यारिनी तो बेटी कुलघातिनी। !
जय भारत २९ मार्च २०१९ (संकलित लेख)

हे चित्तचोर, तुम्हारी जय हो ---

 भगवान श्रीहरिः जब तक हमारा चित्त न चुराएँ, तब तक कोई भी आध्यात्मिक साधना सफल नहीं हो सकती| वे हमारा चित्त ही नहीं, पूरा अंतःकरण ही चुराएँ, तभी हम सफल हो सकते हैं| जो सफल हुए हैं उनका रहस्य उनसे पूछिये| पहिले उनका मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ..... चोरी हुआ, तभी वे सफल हुए| आध्यात्म में खुद के प्रयासों से कभी सफलता नहीं मिलती| माँ भगवती स्वयं ही हृदय में आकर भक्ति करे तभी हम सफल हो सकते हैं|

जब तक हमारे में कर्ताभाव का अहंकार है, तब तक विफलता के नर्क-कुंडों में ही हम गिरेंगे| यह बिलकुल सत्य है जिसे मैं अपने अनुभवों से लिख रहा हूँ| अहंकारी लोग या तो नर्कगामी हुये हैं या आसुरी लोकों में गए हैं|
भगवान ने कृपा कर के अपने कई रहस्य अनावृत कर दिये हैं| हे चित्तचोर, तुम्हारी जय हो| २९ मार्च २०२०

Friday, 28 March 2025

आज नहीं तो कल, कभी तो उनकी कृपा होगी ही, हम सदा अंधकार में नहीं रह सकते ---

आज नहीं तो कल, कभी तो उनकी कृपा होगी ही| हम सदा अंधकार में नहीं रह सकते| हमारी उच्च प्रकृति में परमात्मा के सिवाय अन्य कुछ भी नहीं है| लेकिन निम्न प्रकृति दलदल में है| कोई भी माता हो अपनी संतान को संकट में नहीं देख सकती| जगन्माता जिसने इस सारे ब्रह्मांड को धारण कर रखा है, वह कभी निष्ठुर नहीं हो सकती| इस दलदल से मुझे विरक्त और मुक्त तो उन्हें करना ही होगा|

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भगवान ने अनेक अनुभव दिए हैं, लेकिन हमें तो अनुभव नहीं, स्वयं भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिति चाहिए| वर्षों पहिले की बात है| एक बार इस शरीर से संबंध टूट गया और मैं एक ऐसे स्थान पर पहुँच गया जहाँ अंधकार ही अंधकार था| एक खड़ी सीधी विशाल अंधकारमय सुरंग थी जिसमें इतना गहरा काला अंधकार था कि कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था| मुझे ऊपर-नीचे विचरण करने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी, लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि इतना अंधकार क्यों हैं| इतना अवश्य अनुभूत हो रहा था कि वहाँ अनेक जीवात्माएं हैं जो अत्यधिक कष्ट में हैं| अचानक किसी ने चिल्लाकर कर्कश आवाज में मुझ से कहा कि तुम यहाँ कैसे आ गए ? निकलो बाहर ! और मुझे धक्का देकर बाहर फेंक दिया गया| उसी क्षण बापस इस शरीर में आ गया| यह कुछ डरावना अनुभव था| भगवान से प्रार्थना की कि ऐसे अनुभव दुबारा न हों| फिर कभी ऐसे अनुभव नहीं हुए| भगवान की कृपा से एक विधि अवश्य समझ में आई कि अंत समय में ब्रह्मरंध्र से कैसे निकला जाये| इस शरीर के बाहर की अनुभूतियाँ अनेक बार हुई हैं जिनसे मृत्यु का भय नहीं रहा| लेकिन इन सब से संतोष और तृप्ति नहीं हुई है| संतोष और तृप्ति तो भगवान की प्रत्यक्ष उपस्थिती से ही हो सकती है|
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हमारा उद्देश्य किसी तरह के अनुभव लेना नहीं, बल्कि परमात्मा का साक्षात्कार है| भगवान एक न दिन तो अवश्य कृपा करेंगे और इस सांसारिक महामोह से विरक्त और मुक्त करेंगे| और कुछ लिखा ही नहीं जा रहा है| इस लेख को आधा-अधूरा ऐसे ही छोड़ रहा हूँ|
ॐ तत्सत् !!
२९ मार्च २०२१

हमारी रक्षा धर्म ही करेगा, लेकिन तभी करेगा -- जब हम धर्म की रक्षा करेंगे ---

हमारी रक्षा धर्म ही करेगा, लेकिन तभी करेगा -- जब हम धर्म की रक्षा करेंगे ---
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धर्म सदा हम सब भारतीयों के जीवन का केंद्र बिंदु है, और धर्म ही भारत का प्राण है| अतः हमारा आचरण धर्ममय हो, यह धर्म ही हमारी रक्षा करेगा| भगवान से हमारी प्रार्थना है कि हमारा आचरण धर्ममय हो और धर्म सदा हमारी सदा रक्षा करे| धर्म उसी की रक्षा करेगा जो धर्म की रक्षा करेंगे ---
"धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः| तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्|| (म.स्म.८:१५)"
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धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं ---
"धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:| धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌|| (म.स्म.६:९२)"
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धर्म को इस प्रकार परिभाषित किया है --- "यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धि: स धर्म:| (वै.सू.१:१:२)"
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गीता में भगवान ने कहा है ---
"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते| स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्||२:४०||"

२९ मार्च २०२१ 

पशुपतिनाथ भगवान शिव से प्रार्थना :---

 पशुपतिनाथ भगवान शिव से प्रार्थना :---

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हे पशुपतिनाथ, मैंने चारों ओर घूर-घूर कर खूब अच्छी तरह से देख लिया है| आपके आसपास मुझे तो कोई पशु दिखाई नहीं देता| आपके तो स्मरण मात्र से ही सारे पाश नष्ट हो जाते हैं, जिनसे बंधा मनुष्य अपने पशुत्व से मुक्त हो जाता है| फिर आपने अपना एक नाम पशुपतिनाथ क्यों रखा है? अपना नाम सार्थक करो, और मुझे ही पशु बनाकर सदा के लिए स्थायी रूप से अपने साथ रख लो|
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आध्यात्मिक दृष्टि से पशु का अर्थ जानवर यानि Animal नहीं है| जो पाशों (बंधनों) से बंधा है, वह पशु है| इन पाशों से मुक्ति भगवान की कृपा ही दिला सकती है|
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पशुपतिनाथ स्तोत्र :--
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।१।
महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।२।
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।३।
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।४।
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।५।
न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड।६।
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।७।
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।८।
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:।९।
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।१०।
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।११।
ॐ ॐ ॐ !!
२९ मार्च २०२१

मन लगे या न लगे, चाहे यंत्र की तरह ही करनी पड़े, किसी भी परिस्थिति में ईश्वर की साधना हमें नहीं छोड़नी चाहिए ---

मन लगे या न लगे, चाहे यंत्र की तरह ही करनी पड़े, किसी भी परिस्थिति में ईश्वर की साधना हमें नहीं छोड़नी चाहिए ---
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जीवन की यह एक बहुत बड़ी शिक्षा है जो स्वयं भगवान ने गीता में दी है। मन लगे या न लगे, चाहे यंत्र की तरह ही करनी पड़े, किसी भी परिस्थिति में ईश्वर की साधना नहीं छोड़नी चाहिए। गीता में भगवान श्रीकृष्ण हमें स्पष्ट आदेश देते हैं कि यज्ञ, दान और तप -- किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ने चाहियें। हमारी निष्काम साधना एक यज्ञ है, जिसमें हम अपने मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की आहुतियाँ भगवान को देते हैं। अपने सदविचारों से हम समष्टि का कल्याण करते हैं, यह बहुत बड़ा दान है। इन सब के लिए जो प्रयास करते हैं, वह तप है। कर्मफल और आसक्ति का त्याग ही वास्तविक त्याग है जो भगवान ने गुरु रूप में हमें सिखाया है।
यज्ञों में स्वयं को भगवान ने जपयज्ञ बताया है। अतः किसी भी परिस्थिति में जपयज्ञ नहीं छोड़ना चाहिए। जो भी जितनी भी मात्रा में जप का संकल्प लिया है, उसे भगवान की प्रसन्नता के लिए करना ही चाहिए। अनेक बातें हैं जो भगवान ने हमें सिखाई हैं। हृदय में भगवान के प्रति परमप्रेम हो तो वे अपने सारे रहस्य अपने भक्तों के लिए अनावृत कर देते हैं। चेतना में इस समय केवल भगवान छाए हुये हैं। यह सम्पूर्ण जीवन उन्हें समर्पित है।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर

२९ मार्च २०२३