Sunday, 2 February 2020

शिवो भूत्वा शिवं यजेत् .....

शिवो भूत्वा शिवं यजेत् .....
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श्रुति भगवती कहती है ..... ‘शिवो भूत्वा शिवं यजेत्’ यानि शिव बनकर शिव की उपासना करो| जिन्होने वेदान्त को निज जीवन में अनुभूत किया है वे तो इस तथ्य को समझ सकते हैं, पर जिन्होने गीता का गहन स्वाध्याय किया है वे भी अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे| तत्व रूप में शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है| गीता के भगवान वासुदेव ही वेदान्त के ब्रह्म हैं| वे ही परमशिव हैं|
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मेरे इस जीवन का अब संध्याकाल है, बहुत कम समय बचा है, करने को तो बहुत कुछ बाकी है, पर अब कुछ भी स्वाध्याय करने का समय नहीं है| अतः सब कुछ भगवान पर छोड़ दिया है| जो करेंगे सो वे ही करेंगे, स्वयं पर कोई भी भार लेने में असमर्थ हूँ| अब सारी उपासना, उपास्य और उपासक वे ही हैं| स्वयं का पता नहीं जो सांसें चल रही हैं, वे कब तक चलेंगी| अब तो ये सांसें भी वे ही ले रहे हैं| जन्म-जन्मांतरों के सारे कर्म, उनके फल, सारी बुराइयाँ/अच्छाइयाँ सब कुछ उन्हें बापस सौंप दिया है| स्वयं को भी उन्हें समर्पित कर दिया है| मेरी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है| जो उन की इच्छा है वह ही मेरी इच्छा है|
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जीवन का मूल उद्देश्य है ..... शिवत्व की प्राप्ति| हम शिव कैसे बनें एवं शिवत्व को कैसे प्राप्त करें? इस का उत्तर है ..... कूटस्थ में ओंकार रूप में शिव का ध्यान| यह किसी कामना की पूर्ती के लिए नहीं है बल्कि कामनाओं के नाश के लिए है| आते जाते हर साँस के साथ उनका चिंतन-मनन और समर्पण ..... उनकी परम कृपा की प्राप्ति करा कर आगे का मार्ग प्रशस्त कराता है| जब मनुष्य की ऊर्ध्व चेतना जागृत होती है तब उसे स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है --- कामना और इच्छा की समाप्ति|
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"शिव" का अर्थ शिवपुराण के अनुसार ..... जिन से जगत की रचना, पालन और नाश होता है, जो इस सारे जगत के कण कण में संव्याप्त है, वे शिव हैं| जो समस्त प्राणधारियों की हृदय-गुहा में निवास करते हैं, जो सर्वव्यापी और सबके भीतर रम रहे हैं, वे ही शिव हैं|
अमरकोष के अनुसार 'शिव' शब्द का अर्थ मंगल एवं कल्याण होता है|
विश्वकोष में भी शिव शब्द का प्रयोग मोक्ष में, वेद में और सुख के प्रयोजन में किया गया है|
अतः शिव का अर्थ हुआ आनन्द, परम मंगल और परम कल्याण| जिसे सब चाहते हैं और जो सबका कल्याण करने वाला है वही ‘शिव’ है|
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ॐ तत्सत् | ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय, ॐ नमः शिवाय ||
शिवोहं शिवोहं अयमात्मा ब्रह्म | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर बावलिया
झुंझुनूं (राजस्थान)
२७ जनवरी २०२०

भारत को तोड़ने की बात करना एक देशद्रोह है ....

भारत को तोड़ने की बात करना एक देशद्रोह है जिसके लिए देशद्रोहियों को प्रकृति कभी क्षमा नहीं करेगी| जिन्होंने भी इस देश को तोड़ा है, इसका विभाजन किया है, वे सब नर्कगामी नरपिशाच थे|
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मैनें अपने इसी जीवन में इन ग्यारह घोषित रूप से मुस्लिम देशों का भ्रमण किया है ..... मोरक्को, सऊदी अरब, मिश्र, तुर्की, बांग्लादेश, मलयेशिया, इंडोनेशिया, यमन, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और ईरान| अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि भारत में जितनी सुख-शांति है उतनी विश्व के किसी भी मुस्लिम देश में नहीं है, और भारत में मुसलमान जितने सुखी हैं उतने विश्व के अन्य किसी भी मुस्लिम देश में नहीं हैं| घोषित रूप से मुस्लिम देशों में अन्य मतावलंबियों (धार्मिक अल्पसंख्यकों) को कोई नागरिक अधिकार नहीं हैं|
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तीस-बत्तीस वर्ष पूर्व यूक्रेन के ओडेशा नगर में एक वयोवृद्धा विदुषी तातार मुस्लिम महिला और उनके परिवार से मेरी मित्रता थी जिनसे मुझे ऐतिहासिक रूप से बहुत कुछ जानने को मिला| कई भाषाओं की ज्ञाता वह तातार मुस्लिम महिला मूल रूप से मंचूरिया में एक मेडिकल डॉक्टर थी जिसका पति व्यापारी था| मंचूरिया पर चीन के अधिकार के बाद चीन ने उसके पति को मार दिया और उसे जापान समर्थक होने का आरोप लगाकर दस वर्ष तक राजनीतिक बंदी के रूप में कारावास में रखा| अमेरिका के दबाव से वह मुक्त हुई और अपनी खोयी हुई एकमात्र संतान अपनी बेटी की खोज की तो अपनी बेटी को यूक्रेन में पाया जहाँ वह विवाह कर के बस गई थी| वह महिला भी अपनी अमेरिकी नागरिकता को छोड़कर यूक्रेन के ओडेशा नगर में अपनी बेटी के पास ही बस गई थी| गजब का ऐतिहासिक ज्ञान था उन्हें जिस पर मेरे साथ उन्होंने काफी चर्चा की| उन्होने सप्रमाण बताया कि पूरा मध्य एशिया इस्लाम के आगमन से पूर्व बौद्ध मत का अनुयायी था| उन्होने अहिंसा पर इतना अधिक ज़ोर दिया कि इस्लामी तलवार का सामना नहीं कर सके| सब को इस्लाम कबूल करना पड़ा, जिन्होने नहीं किया, वे काट डाले गए|
अपनी रुचि से इतिहास में मैंने सल्तनत-ए-उस्मानिया के इतिहास का, और अन्य कई मत-मतांतरों का अध्ययन भी किया है|
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अपनी अंतर्प्रज्ञा से कह सकता हूँ कि भारत के भीतर और बाहर के शत्रुओं का नाश होगा, और भारत विजयी होगा| मैं उस दिन को देखने जीवित रहूँ या न रहूँ पर एक न एक दिन भारत अवश्य ही अपने द्वीगुणित परम वैभव को प्राप्त कर अखंड होगा| कोई असत्य और अंधकार यहाँ नहीं रहेगा| अमर शहीद पंडित रामप्रसाद विस्मिल की एक बहुत पुरानी कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ....
"भारत जननि तेरी जय हो विजय हो ।
तू शुद्ध और बुद्ध ज्ञान की आगार,
तेरी विजय सूर्य माता उदय हो ।।
हों ज्ञान सम्पन्न जीवन सुफल होवे,
सन्तान तेरी अखिल प्रेममय हो ।।
आयें पुनः कृष्ण देखें द्शा तेरी,
सरिता सरों में भी बहता प्रणय हो ।।
सावर के संकल्प पूरण करें ईश,
विध्न और बाधा सभी का प्रलय हो ।।
गांधी रहे और तिलक फिर यहां आवें,
अरविंद, लाला महेन्द्र की जय हो ।।
तेरे लिये जेल हो स्वर्ग का द्वार,
बेड़ी की झन-झन बीणा की लय हो ।।
कहता खलल आज हिन्दू-मुसलमान,
सब मिल के गाओं जननि तेरी जय हो ।।"
भारत माता की जय | वंदे मातरम् ||
२६ जनवरी २०२०

जय भारतवर्ष .....

भारतवर्ष ..... जिस देश में गंगा, गोमति, गोदावरी, सिन्धु, सरस्वती, सतलज, यमुना, नर्मदा, कावेरी, कृष्णा व ब्रह्मपुत्र जैसी पवित्र नदियाँ बहती हैं; जहाँ हिमालय जैसे अति विस्तृत और उत्तुंग पर्वत शिखर और अनेक पावन पर्वतमालाएँ; सप्त पुरियाँ, द्वादश ज्योतिर्लिंग, बावन शक्तिपीठ; अनगिनत पवित्र तीर्थ, वन, गुफाएँ, वैदिक संस्कृति, सनातन धर्म की परम्परा, अनेक ऊर्ध्वगामी मत-मतान्तर, तपस्वी संत-महात्मा व ऐसे अनगिनत लोग भी हैं जो दिन-रात निरंतर परमात्मा का चिन्तन करते हैं और परमात्मा का ही स्वप्न देखते हैं; हम सब धन्य हैं जिन्होनें इस पावन भूमि में जन्म लिया है| मैं उन सब का सेवक, उन सब को नमन करता हूँ जिन के ह्रदय में परमात्मा को पाने की प्रचंड अभीप्सा है, और जो निरंतर प्रभु प्रेम में मग्न हैं| उन के श्रीचरणों की धूल मेरे माथे की शोभा है|
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हर चौबीस हज़ार वर्षों के कालखंड में चौबीस सौ वर्षों का एक ऐसा समय आता है जब इस भूमि पर अन्धकार व असत्य की शक्तियाँ हावी रहती हैं| वह समय अब व्यतीत हो चुका है| ऐसी शक्तियाँ अब पराभूत हो रही हैं| आने वाला समय सतत प्रगति का है| कोई चाहे या न चाहे अब हमारी चेतना को ऊर्ध्वगामी होने से कोई नहीं रोक सकता| भारतवर्ष निश्चित रूप से एक आध्यात्मिक राष्ट्र होगा और अपने परम वैभव को प्राप्त करेगा, अतः चिंता की कोई बात नहीं है| अपना दृष्टिकोण बदल कर अपना अहैतुकी परम प्रेम परमात्मा को दें| अपने जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा को बनायें| जीवन में अपना सर्वश्रेष्ठ करते रहें| सब अच्छा ही अच्छा होगा|
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गणतंत्र दिवस की पुनश्च: शुभ कामनाएँ और अभिनंदन | ॐ तत्सत् ||
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२०

आध्यात्म में सर्वोपरी महत्व कुछ होने का है, करने का नहीं .....

आध्यात्म में सर्वोपरी महत्व कुछ होने का है, करने का नहीं| हम कुछ होने के लिए ही कुछ करते हैं| योगसूत्रों व आगम ग्रन्थों के अनुसार हम वही हो जाते हैं जैसा हम निरंतर सोचते है| निरंतर परमात्मा का चिंतन करने से परमात्मा के गुण हमारे में आ जाते हैं| तभी शिव-संकल्पों पर ज़ोर दिया गया है| ऐसे ही लोगों के साथ मेलजोल रखें जो सदा परमात्मा के बारे में सोचते हैं| उन लोगों का साथ विष की तरह छोड़ दें जो परमात्मा से विमुख हैं| उनसे मिलना तो क्या उनकी और आँख उठाकर देखना भी बड़ा दुःखदायी होता है|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ जनवरी २०२०

भारत के राष्ट्रपिता कौन हो सकते हैं ? .....

भारत के राष्ट्रपिता कौन हो सकते हैं ? .....
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पिता वह है जो अपने बच्चों का उचित पालन-पोषण, विकास और रक्षा करे| भारत के राष्ट्रपिता स्वयं भगवान विष्णु ही हो सकते हैं, अन्य कोई नहीं. वे ही हमारा पालन-पोषण और रक्षा कर रहे हैं|
या फिर ऋषभदेव के पुत्र भरत हो सकते हैं जिनके नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है|
राष्ट्र की अवधारणा वैदिक है जिसके अनुसार इस पृथ्वी पर एकमात्र राष्ट्र सिर्फ भारतवर्ष ही है|
२५ जनवरी २०२०

Saturday, 1 February 2020

व्यक्ति या देश-दोनों की उन्नति का एकमात्र स्रोत आध्यात्मिक शक्ति ही है ....

व्यक्ति या देश-दोनों की उन्नति का एकमात्र स्रोत आध्यात्मिक शक्ति ही है।
मधुसूदन ओझा जी के अनुसार जब पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव अभिजित् नक्षत्र की दिशा में था तब भारत विश्व गुरु था, अतः इस नक्षत्र का स्वामी ब्रह्मा हैं। अभिजित से ध्रुव दूर हटने पर भारत का पतन आरम्भ हुआ। अभी पुनः उत्तरी ध्रुव अभिजित नक्षत्र की तरफ बढ़ रहा है। यह भारत की उन्नति का समय है।
भागवत पुराण के अनुसार जब सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति पुष्य नक्षत्र में एक राशि में होंगे तो कृत युग का आरम्भ होगा तथा शम्भल ग्राम में विष्णुयश के पुत्र कल्कि द्वारा दुष्टों का संहार होगा और प्रजा सात्विक हो जायेगी-भागवत पुराण, स्कन्ध १२, अध्याय २-
शम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः।
भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति॥।१८॥
अश्वमाशुगमारुह्य देवदत्तं जगत्पतिः।
असिनासाधुदमनमष्टैश्वर्यगुणान्वितः॥१९॥
यदावतीर्णो भगवान् कल्किर्धर्मपतिर्हरिः।
कृतं भविष्यति तदा प्रजासूतिश्च सात्विकी॥२३॥
यदा चन्द्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्ये बृहस्पती।
एकराशौ समेष्यन्ति भविष्यति तदा कृतम्॥२४॥
१ अगस्त, २०३८ को भारतीय समय ९ बजे सूर्य, चन्द्र. बृहस्पति तीनों ग्रह पुष्य नक्षत्र तथा एक राशि में होंगे। तब भारत सबसे उन्नत होगा, किन्तु उसके पूर्व बहुत हिंसा होगी।
ब्रह्मा के अयनाब्द युग गणना के अनुसार १९९९ से त्रेता युग की सन्ध्या समाप्त हो कर मुख्य त्रेता आरम्भ होगा। महाभारत के अनुसार त्रेता में यज्ञ की उन्नति होती है। यज्ञ द्वारा अन्य यज्ञों के साधन सेही देव उन्नति के शिखर पर पहुंचते हैं।
अयनाब्द युग २४,००० वर्ष का है, जो ३१२,००० वर्ष के दीर्घकालिक मन्दोच्च चक्र तथा विपरीत दिशा में २६,००० वर्ष के अयन चक्र का योग है। इसका प्रथम भाग १२,००० वर्ष का अवसर्पिणी है। इसमें खण्ड युगों का क्रम है-सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि, जो ४, ३, २, १ के अनुपात में हैं। उसके बाद १२,००० वर्ष का उत्सर्पिणी काल होगा जिसमें खण्ड युग विपरीत क्रम से होंगे। यह जल प्रलय का वास्तविक चक्र है, जो विश्व इतिहास का दीर्घकालिक चक्र है। अवसर्पिणी त्रेता में जल प्रलय तथा उत्सर्पिणी त्रेता में हिमयुग होता है। अभी तृतीय अयनाब्द चल रहा है, जो वैवस्वत मनु से आरम्भ हुआ था।
प्रथम अयनाब्द-६१,९०२-३७९०२ ईपू.
द्वितीय अयनाब्द-३७९०२-१३९०२ ईपू.
तृतीय अयनाब्द-१३९०२ ईपू. से १०,०९९ ई. तक।
इसमें अवसर्पिणी १३९०२-१९०२ ई.पू. तक-सत्य युग-९१०२ ईपू. तक, त्रेता ५५०२ ईपू. तक, द्वापर ३१०२ ईपू. तक, कलि १९०२ ईपू. तक।
उत्सर्पिणी १९०२ ई.पू. से-कलि ७०२ ई.पू. तक, द्वापर १६९९ ई.पू तक (ईस्वी सन् में ० वर्ष नहीं है), त्रेता १६९९-५२९९ ई. तक, सत्य युग १०,०९९ ई. तक।
इस त्रेता में हिम युग होगा, पृथ्वी की प्रदूषण से गर्मी अल्पकालिक घटना है।
त्रेता में यन्त्र युग का आरम्भ हुआ, ३०० वर्ष की सन्ध्या १६९९ में समाप्त होने के बाद कम्प्यूटर तथा सञ्चार युग आरम्भ हुआ है, जो महाभारत के अनुसार है।
विधिस्त्वेष यज्ञानां न कृते युगे। द्वापरे विप्लवं यान्ति यज्ञाः कलियुगे तथा॥
त्रेतायां तु समस्ता ये प्रादुरासन् महाबलाः। संयन्तारः स्थावराणां जङ्गमानां च सर्वशः॥
(महाभारत, शान्ति पर्व, २३२/३१-३४)
यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ (पुरुष सूक्त, १६)
(साभार : माननीय पं. अरुण उपाध्याय)
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(माननीय पं. अरुण उपाध्याय ..... प्रखर वैदिक विद्वान, गणितज्ञ और ज्योतिषी हैं| इनकी गणना को भारत के सभी ज्योतिषी और धर्माचार्य अंतिम प्रमाण मानते हैं| वे जो बात कह रहे हैं वह निश्चित रूप से सत्य होगी|)
२ जनवरी २०२०

Thursday, 23 January 2020

भगवान सब के हृदय में हैं .....

भगवान सबके ह्रदय में हैं, ढूँढने से वहीं मिलते हैं| मेरा आध्यात्मिक हृदय इस शरीर का यह भौतिक हृदय नहीं, कूटस्थ चैतन्य है| मुझे भगवान की अनुभूतियाँ कूटस्थ में ही होती हैं, पर इस भौतिक हृदय में भी वे ही धड़क रहे हैं, इन फेफड़ों से वे ही साँस ले रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, और इस मन से वे ही सोच रहे हैं| वे और कोई नहीं, मेरे प्रियतम ही हैं, जिनके साथ जुड़कर मैं भी उनके साथ एक हूँ|
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति| भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया||१८:६१||
सभी को सप्रेम सादर नमन! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय| ॐ तत्सत्| ॐ ॐ ॐ||
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
२४ जनवरी २०२०