Thursday, 5 September 2019

१५ अगस्त और इसके साथ जुड़ा भारत का विभाजन .....

१५ अगस्त पर आजादी का दिवस मनाते हुए मुझे बड़ी पीड़ा होती है क्योंकि इसके साथ भारत के विभाजन का अध्याय जुड़ा हुआ है| सत्ता लोलूप राजनेताओं और जिहादी उन्मादियों ने देश के तीन टुकड़े कर दिए| खंडित भारत के उन भागों में जो देश से पृथक हुए थे, में पच्चीस-तीस लाख निर्दोष लोगों की हत्या हुई, लाखों माताओं व बालकों के साथ घृणित क्रूर दुराचार हुआ, और करोड़ों लोग विस्थापित हुए| फिर स्वतंत्रता के स्थान पर मिला सत्ता का हस्तांतरण जो अंग्रेजों के मानसपुत्रों को ही किया गया|
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१५ अगस्त को मैं स्थानीय श्रीअरविंदाश्रम जाकर वहाँ बच्चों द्वारा गाए जाने वाले भजन-कीर्तन सुनता हूँ| वहाँ बड़ा आनंद आता है| इस बार तो रक्षाबंधन के प्रातःकालीन कार्यक्रम भी हैं. फिर घर पर भगवान के ध्यान व जप में ही शांति मिलती है| सब से मेरी प्रार्थना है कि श्री अरविन्द का उत्तरपाड़ा में दिया भाषण इस दिन अवश्य पढ़ें|
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व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि हमें स्वतन्त्रता दिवस ३० दिसंबर को मनाना चाहिए, १५ अगस्त को नहीं, क्योंकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी 'आजाद हिन्द फौज' व जापानी सेना की सहायता से ३० दिसंबर १९४३ को भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को अंग्रेजों के अधिकार से मुक्त करा कर उसी दिन यानि ३० दिसंबर १९४३ को ही पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में सर्वप्रथम तिरंगा फहराया था| नेताजी ने अंडमान व निकोबार का नाम बदल कर शहीद और स्वराज रख दिया था| स्वतंत्र भारत की घोषणा कर के स्वतंत्र भारत की सरकार भी नेता जी ने बना दी थी, जिसे विश्व के अनेक देशों ने मान्यता दे दी थी| वहाँ पूरे एक वर्ष से अधिक समय तक आजाद हिन्द फौज का शासन रहा| नेताजी की संदेहास्पद तथाकथित मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों ने आजाद हिन्द फौज से वहाँ का शासन बापस छीन लिया| पर भारत के एक महत्वपूर्ण बड़े भाग को अंग्रेजों से मुक्त कराने और सबसे पहिले तिरंगा फहराने का श्रेय नेताजी सुभाष बोस को ही जाता है| यह सभी भारतीयों के साथ एक अन्याय है कि दुर्भावनावश इस सत्य को इतिहास की पुस्तकों से छिपा दिया गया| बहुत सारी बातें हैं जो लिखी नहीं जा सकतीं| काश ! हमें स्वतन्त्रता 'आज़ाद हिन्द फौज' द्वारा मिलती !!!
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इस बार तो आपके सब के आशीर्वाद से मेरा श्रावण का व्रत भी कल सम्पन्न हो जाएगा जिसमें पूरा श्रावण माह देसी गाय के शुद्ध दूध और फल व सलाद खाकर ही बिताया|
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भारत माता की जय ! वन्दे मातरं ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१४ अगस्त २०१९

मनुष्य की दो साँसों व दो विचारों के मध्य का समय परमात्मा को सर्वाधिक प्रिय है

मनुष्य की दो साँसों, व दो विचारों के मध्य का समय परमात्मा को सर्वाधिक प्रिय है| इन अवधियों का अधिकाधिक समय पूर्ण भक्ति से परमात्मा के ध्यान में व्यतीत करने से सारे योगों का साधकों को ज्ञान भी हो जाता है, उनकी साधना भी हो जाती है, और वे सिद्ध भी हो जाते हैं| ऐसा हमने सिद्ध संत-महात्माओं से सुना है|
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सर्वव्यापी-सर्वमय अनादि-अनंत परमशिव गुरु महाराज को नमन जिनके स्मरण मात्र से जीवन में वेदान्त स्वयमेव प्रस्फुटित हो जाता है, कहीं कोई भेद नहीं रहता| उनकी परमकृपा से अज्ञानरूपी आवरण दूर होकर उनकी विराट ज्योतिर्मय अनंत आभा का कूटस्थ में आभास होता है| उनकी इच्छा से ही इस शरीर रूपी दुपहिया वाहन की सांसें चल रही हैं, और चेतना इस संसार से जुड़ी हुई है| उनकी कृपा सभी प्राणियों पर निरंतर सदा बनी रहे|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवाते वासुदेवाय ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ अगस्त २०१९

भारत का स्वतन्त्रता दिवस :----

भारत का स्वतन्त्रता दिवस :----
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व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है कि हमें स्वतन्त्रता दिवस ३० दिसंबर को मनाना चाहिए, १५ अगस्त को नहीं, क्योंकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी 'आजाद हिन्द फौज' व जापानी सेना की सहायता से ३० दिसंबर १९४३ को भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को अंग्रेजों के अधिकार से मुक्त करा कर उसी दिन यानि ३० दिसंबर १९४३ को ही पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में सर्वप्रथम तिरंगा फहराया था| नेताजी ने अंडमान व निकोबार का नाम बदल कर शहीद और स्वराज रख दिया था| स्वतंत्र भारत की घोषणा कर के स्वतंत्र भारत की सरकार भी नेता जी ने बना दी थी, जिसे विश्व के अनेक देशों ने मान्यता दे दी थी| वहाँ पूरे एक वर्ष से अधिक समय तक आजाद हिन्द फौज का शासन रहा| नेताजी की संदेहास्पद तथाकथित मृत्यु के पश्चात अंग्रेजों ने आजाद हिन्द फौज से वहाँ का शासन बापस छीन लिया| पर भारत के एक महत्वपूर्ण बड़े भाग को अंग्रेजों से मुक्त कराने और सबसे पहिले तिरंगा फहराने का श्रेय नेताजी सुभाष बोस को ही जाता है| यह सभी भारतीयों के साथ एक अन्याय है कि दुर्भावनावश इस सत्य को इतिहास की पुस्तकों से छिपा दिया गया|
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१५ अगस्त को अंग्रेजों ने अपनी मजबूरी में सत्ता का हस्तांतरण किया था, कोई स्वतन्त्रता नहीं दी थी| खंडित भारत को जो तथाकथित आज़ादी मिली, वह भी किस कीमत पर? देश के टुकड़े कर दिये गए, करोड़ों लोग विस्थापित हुए, लाखों लोगों की हत्याएँ हुईं और हजारों महिलाओं के साथ दुराचार हुआ| बहुत सारी बातें हैं जो लिखी नहीं जा सकतीं| काश ! हमें स्वतन्त्रता 'आज़ाद हिन्द फौज' द्वारा मिलती !!!
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भारत माता की जय ! वन्दे मातरं ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
१२ अगस्त २०१९


हिन्दुत्व, स्वधर्म, और परधर्म .....

हिन्दुत्व, स्वधर्म, और परधर्म .....
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जहाँ तक मुझे समझ में आया है, 'हिन्दुत्व' यानि 'हिन्दू धर्म' जिसे 'सनातन धर्म' भी कहते हैं, कोई औपचारिक धर्म नहीं है| इसे मानने के लिए किसी दीक्षा या मतांतरण की आवश्यकता नहीं है| कोई भी धर्मावलम्बी अपने मत में रहते हुए 'हिन्दू धर्म' के सिद्धांतों का पालन कर सकता है| देश-विदेश में रहने वाले मुझे अनेक ईसाई व अन्य मतावलंबी जीवन में मिले हैं जो अपने मतों में रहते हुए भी व्यावहारिक रूप से 'सनातन धर्म' के सिद्धांतों का पालन करते हैं .... जैसे आसन, प्राणायाम, ध्यान, व स्वाध्याय आदि| उन की बातचीत से यही स्पष्ट हुआ कि उनके हृदय में परमात्मा के प्रति गहन प्रेम है जिसकी अभिव्यक्ति का अवसर उन्हें सनातन धर्म के सिद्धांतों में ही मिला| 'हिन्दू धर्म' में दीक्षा सिर्फ गुरु परम्पराओं में ही होती है, भगवान की भक्ति के लिए नहीं|
हिन्दुत्व क्या है ? :---
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मेरे विचार से 'सनातन धर्म' या 'हिन्दुत्व' एक ऊर्ध्वमुखी चेतना है जो जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ना चाहती है| परमात्मा के प्रति परम प्रेम, परमात्मा को पाने की अभीप्सा, और उस दिशा में की जाने वाली साधना 'सनातन धर्म' यानि 'हिन्दुत्व' है|
हिन्दू कौन हैं ? :----
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हिन्दू वह है जो आत्मा की शाश्वतता, कर्मफलों के सिद्धान्त, व पुनर्जन्म को मानता है| एक नास्तिक भी हिन्दू हो सकता है और आस्तिक भी|
हिन्दू वह है जो सत्यान्वेषी है, यानि जो सत्य को जानना व निज जीवन में अवतरित करना चाहता है|
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्| स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः||३:३५||"
अर्थात सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है| स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है||
अतः यह जानना आवश्यक है कि स्वधर्म और परधर्म क्या है| प्रत्येक व्यक्ति का स्वधर्म है| किन्हीं दो व्यक्तियों का एक स्वधर्म नहीं है| धर्म है हमारा स्वभाव, प्रकृति, और अंतःप्रकृति|
स्वधर्म :---
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अपने स्वभावानुसार सर्वश्रेष्ठ आचरण ही स्वधर्म है| हम किसी को पीड़ा नहीं दें, जहाँ तक हो सके दूसरों का उपकार ही करें|
मनुष्य यह देह नहीं अपितु एक शाश्वत आत्मा है| यहाँ 'स्व' का अर्थ 'आत्मा' ही हो सकता है, देह नहीं| आत्मा का धर्म है .... सच्चिदानंद की प्राप्ति|
मनुष्य की मौज-मस्ती में सुख की खोज, विषयों में सुख की खोज और अहंकार में सुख की खोज, अप्रत्यक्ष रूप से सच्चिदानंद की ही खोज है| मनुष्य संसार में सुख खोजता है पर उसे दुःख और पीड़ा ही मिलती है| अंततः दुखी होकर या फिर हरिःकृपा से वह स्थायी सुख यानि आनंद की खोज में परमात्मा की ओर ही उन्मुख होता है, तब उसे भक्ति और उपासना से सच्चिदानंद की प्राप्ति होती है| सच्चिदानंद का अर्थ है .... नित्य अस्तित्ववान, नित्य सचेतन और नित्य नवीन आनन्द| सार रूप में कह सकते हैं कि अपने स्वभावानुसार सर्वश्रेष्ठ सोच-विचार और आचरण ही स्वधर्म है|
परधर्म :---
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काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर्य, चुगली यानि द्वेषपूर्ण परनिंदा, परस्त्री व पराये धन की कामना 'परधर्म' है, जो मनुष्य को अपने वास्तविक अस्तित्व यानि परमात्मा से दूर ले जाता है| इस की चेतना में मरने वाले को चौरासी का चक्कर एक भयावह दुश्चक्र में डाल देता है| यथार्थ में भगवान से विमुख होना ही 'परधर्म' है|
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हम असहाय नहीं है| परमात्मा सदा हमारे साथ है| हम परिस्थितियों के शिकार नहीं बल्कि उनके जन्मदाता हैं| जिन भी परिस्थितियों में हम हैं उनको हमने ही अपने भूतकाल में अपने विचारों और भावों से जन्म दिया है| हमारा सबसे बड़ा भ्रम और हमारी सभी पीड़ाओं का कारण ...... परमात्मा से पृथकता की भावना है| यह भी एक विकार है, जिससे हमें मुक्त होना है| परमात्मा को पाने की अभीप्सा, परमात्मा से परमप्रेम और हमारे सदविचार व सदाचरण ही हमारा वास्तविक स्वधर्म है जिसका हम पालन करें| इस से विपरीत ही परधर्म है जो महादुःखदायी है|
उपरोक्त विषय पर जो लिखा है वह कम से कम शब्दों में लिखा है जिसे कोई भी औसत बुद्धि का मनुष्य समझ सकता है| यह अपने आप में पर्याप्त है|
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परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को मेरा सादर प्रणाम !
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ अगस्त २०१९

अब मन तृप्त और शांत है ....

अब मन तृप्त और शांत है ....
मन में जिज्ञासा, प्रश्न और कामनाएँ तभी तक उठती हैं, जब तक मन सीमित व अशांत रहता हो| मन के शांत और विस्तृत हो जाने पर सारी जिज्ञासाएँ, प्रश्न और कामनाएँ भी तिरोहित हो जाती हैं| मैं जुलाई २०११ में फ़ेसबुक और ट्वीटर पर आया था सिर्फ स्वयं को व्यक्त करने की एक गहन कामना की पूर्ति के लिए, जिसका पूरा अवसर फ़ेसबुक ने दिया| आरंभ में मन भरकर राष्ट्रवाद पर खूब लिखा, फिर भक्ति और आध्यात्म पर खूब लिखा| अनेक दिव्य आत्माओं से परिचय और मित्रता हुई, जो जीवन में अन्यथा कभी नहीं हो सकती थी|
अब मन तृप्त और शांत है, कोई कामना नहीं है, अतः लिखने की आवृति (frequency) भी कम हो जाएगी| जितना समय यहाँ लिखने में व्यतीत होता है वह समय परमात्मा के ध्यान और स्वाध्याय में व्यातीत करेंगे| अब जीवन में कोई उद्देश्य नहीं है, कोई कामना नहीं है; जो परमात्मा की इच्छा है वह ही मेरी इच्छा है|
"यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः|
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम||१८:७८||" (गीता)
कहीं जा नहीं रहा| आप सब के मध्य ही रहूँगा, जब भी कुछ लिखने की प्रेरणा मिलेगी तब अवश्य लिखूंगा| परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्तियाँ हैं आप सब| बहुत अधिक कहने से कोई लाभ नहीं है| समस्त योग और उनके बीज सर्व व्याप्त, अनंत, असीम, योगेश्वर भगवान परमशिव से ही उत्पन्न हुए हैं| वे ही आदि और अंत हैं| अवशिष्ट सम्पूर्ण जीवन उन्हीं के ध्यान में उन्हीं के साथ बीते, कहीं कोई भेद न हो, कभी किसी कामना का जन्म न हो|
मंगलमय शुभ कामनाएँ और नमन !
ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ अगस्त २०१९

मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों ? ...

मैं तो एक फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल क्यों ?
तुम तो महक हो, हवाओं में जिसे समाना है ...
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भूतकाल चाहे जितना भी दुःखद हो, उसे तो हम बदल नहीं सकते, भविष्य हमारे लिए एक स्वप्न मात्र है| हमारा अधिकार सिर्फ वर्तमान पर है| जैसा भविष्य हम चाहते हैं, वैसे ही वर्तमान का निर्माण करें| यह परिवर्तन स्वयं से हो, वर्तमान हमारे आदर्शों का हो|
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"इंसान मुस्तक़बिल को सोच के अपना हाल ज़ाया करता है |
फिर मुस्तक़बिल में अपना माज़ी याद कर के रोता है ||" (शे.सादी)
(मुस्तकबिल = भविष्य, माज़ी = भूतकाल, हाल = वर्तमान)
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"यादों को भुलाने में कुछ देर तो लगती है,
आँखों को सुलाने में कुछ देर तो लगती है |
पुरानी बातों को भुला देना इतना आसान नहीं होता,
दिल को समझाने में कुछ देर तो लगती है ||" (अज्ञात)
भूतकाल को याद कर कर के अपना वर्तमान खराब करने का क्या औचित्य है .....
"मुझे पतझड़ों की कहानियाँ, न सुना सुना के उदास कर |
तू खिज़ाँ का फूल है, मुस्कुरा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया ||
वो नही मिला तो मलाल क्या, जो गुज़र गया सो गुज़र गया |
उसे याद करके ना दिल दुखा, जो गुज़र गया सो गुज़र गया ||" (ब.बद्र)
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं .....
"उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ | आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः||६:५||"
अर्थात हम अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करें, और अपने को अधोगति में न डाले| क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है||"
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दुनियादारी की सब पुरानी बातों को भूल कर अपना हृदय, पूर्ण प्रेम पूर्वक परमात्मा को ही दे देने में सार्थकता और समझदारी है| यह दुनिया परमात्मा की है, हमारी नहीं| उसकी मर्जी, वह इसे चाहे जैसे चलाये| पर उसकी अभिव्यक्ति उसके विश्व में निरंतर हो|
ॐ तत्सत ! ॐ नमो भगवाते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अगस्त २०१९

भ्रामरी गुफा, आवरण, विक्षेप और कूटस्थ-चैतन्य .....

भ्रामरी गुफा, आवरण, विक्षेप और कूटस्थ-चैतन्य .....
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कई प्रतीकात्मक शब्द हैं जैसे "भ्रामरी गुफा", "आवरण", "विक्षेप", "कूटस्थ-चैतन्य" आदि आदि जिनका अर्थ साधक तो समझ सकते हैं, पर कोई सामान्य व्यक्ति नहीं| कई तथ्यों को समझाने के लिए प्रतीकात्मक शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है अन्यथा उन्हें समझाना असंभव है| ऐसे ही ये शब्द भी हैं| महाभारत में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में भी "धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्", गुहा यानि गुफा शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसमें धर्म के तत्व निहित हैं| एक बहुत महान संत के एक लेख में पढ़ा था कि सत्य को जानने के लिए भ्रामरी गुफा में प्रवेश करना होगा जिसके बाहर "आवरण" और "विक्षेप" नाम की दो राक्षसियाँ बैठी हैं, जिन्हें पराजित करना असंभव है, पर कैसे भी ईश्वर की कृपा से इनसे बचकर भीतर जाना है|
इस विषय पर चार वर्ष पूर्व एक विस्तृत लेख लिखा था जिसमें अनेक लोगों ने लेख का स्त्रोत पूछा तो मेरा उत्तर था कि मेरा एकमात्र स्त्रोत गुरुकृपा से प्राप्त निज अनुभव हैं| जिस विषय पर मेरे माध्यम से कुछ लिखा जाता है, उन सब का एकमात्र स्त्रोत है ... "गुरुकृपा", जिसके अतिरिक्त मेरे पास अन्य कुछ भी नहीं है| कुछ लोग शिकायत करते हैं कि मेरी भाषा बड़ी कठिन है| पर मैं जो कुछ भी लिखता हूँ उसे व्यक्त करने के लिए इस से अधिक सरल भाषा हो ही नहीं सकती|
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जो लोग नियमित ध्यान साधना करते हैं उन्हें जब गहरे ध्यान में कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म का आभास होने लगता है तब आरम्भ में ज्योतिर्मय किरणों से घिरा एक काला बिंदु दिखाई देता है, यही भ्रामरी गुफा है| यह अमृतमय मधु से भरी होती है| इसको पार करने के पश्चात् ही एक स्वर्णिम और फिर एक नीली प्रकाशमय सुरंग को भी पार करने पर साधक को श्वेत पञ्चकोणीय नक्षत्र के दर्शन होते हैं| यह पञ्चकोणीय नक्षत्र पञ्चमुखी महादेव का प्रतीक है| जब इस ज्योति पर साधक ध्यान करता है तब कई बार वह ज्योति लुप्त हो जाती है, यह 'आवरण' की मायावी शक्ति है जो एक बहुत बड़ी बाधा है| इस ज्योति पर ध्यान करते समय 'विक्षेप' की मायावी शक्ति ध्यान को छितरा देती है| इन दोनों मायावी शक्तियों पर विजय पाना साधक के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है|
ब्रह्मचर्य, सात्विक भोजन, सतत साधना और गुरुकृपा से एक आंतरिक शक्ति उत्पन्न होती है जो आवरण और विक्षेप की शक्तियों को कमजोर बना कर साधक को इस भ्रामरी गुफा से पार करा देती है| आवरण और विक्षेप का प्रभाव समाप्त होते ही साधक को धर्मतत्व का ज्ञान होने लगता है| यहाँ आकर कर्ताभाव समाप्त हो जाता है और साधक धीरे धीरे परमात्मा की ओर अग्रसर होने लगता है| यह ज्ञान भगवान की परम कृपा से किन्हीं सद्गुरु के माध्यम से ही होता है|
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शिवनेत्र होकर (बिना तनाव के दोनों नेत्रों के गोलकों को नासामूल के समीप लाकर भ्रूमध्य में दृष्टी स्थिर कर, खेचरी मुद्रा में संभव हो तो ठीक है अन्यथा जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोड़कर) प्रणव यानि ओंकार की ध्वनि को सुनते हुए उसी में लिपटी हुई सर्वव्यापी ज्योतिर्मय अंतर्रात्मा का चिंतन करने की साधना नित्य नियमित यथासंभव अधिकाधिक करनी चाहिए| समय आने पर हरिकृपा से विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है| उस ब्रह्मज्योति का प्रत्यक्ष साक्षात्कार करने के बाद उसी की चेतना में निरंतर रहने की साधना करें| यह ब्रह्मज्योति अविनाशी है, इसका कभी नाश नहीं होता| लघुत्तम जीव से लेकर ब्रह्मा तक का नाश हो सकता है पर इस ज्योतिर्मय ब्रह्म का कभी नाश नहीं होता| यही कूटस्थ है, और इसकी चेतना ही कूटस्थ चैतन्य है| इसकी साधना के लिए कुसंग का त्याग, यम-नियमों का पालन और सद्गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है|
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हम सब को परमात्मा की पराभक्ति प्राप्त हो और हम सब उसके प्रेम में निरंतर मग्न रहें| परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति आप सब को नमन !
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शिवमस्तु ! ॐ नमः शिवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० अगस्त २०१९