Sunday, 31 December 2017

रूस की बहुत पुरानी स्मृतियाँ ......

रूस की बहुत पुरानी स्मृतियाँ ......

बहुत पुरानी स्मृतियाँ हैं रूस की| पचास वर्ष पूर्व सन १९६७ में मैं रूस में एक विशेष प्रशिक्षण ले रहा था| रूसी भाषा का अच्छा ज्ञान था| उन दिनों बोल्शेविक क्रांति की पचासवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही थी| वहाँ की भव्य परेड और कुछ दिनों बाद उन की विराट सैन्य शक्ति का प्रदर्शन भी देखा| सर्दी के मौसम में चारों ओर बर्फ ही बर्फ जमी रहती थी| वहाँ रहकर बर्फ में स्केटिंग करना भी सीख लिया था| लगभग दो वर्षों तक वहाँ रहा| बड़े अच्छे अच्छे मित्र मिले वहाँ जिन की स्मृतियाँ वर्षों तक रही|

रूस के बारे में मेरा यह मत है कि साहित्य और कला का वहाँ खूब विकास हुआ| उन्नीसवी शताब्दी में तो वहाँ विश्व के तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ साहित्य, संगीत व नृत्य की रचना हुई थी| साहित्यकारों व कलाकारों को वहाँ खूब सम्मान मिलता था, ऐसा सम्मान मैनें अन्यत्र कहीं भी नहीं देखा| भारतीय फ़िल्में वहाँ बहुत अधिक लोकप्रिय थीं, और राजकपूर लोकप्रिय फ़िल्मी नायक था| भारत के बारे में अधिकाधिक जानने की इच्छा वहाँ के लोगों में रहती थी| बैले नृत्य नाटिकाएँ बहुत लोकप्रिय हुआ करती थीं, जहाँ हर अच्छी प्रस्तुति के बाद मिनटों तक तालियाँ बजती रहती थीं| अंत में कलाकारों को बापस मंच पर आकर दर्शकों का आभार व्यक्त करना पड़ता था| शकुन्तला और रामायण पर आधारित नृत्य नाटिकाएँ भी लोकप्रिय थीं| सैनिक सेवा वहाँ अनिवार्य थी| १८ वर्ष का होते ही हर नवयुवक को दो वर्ष तक सेना में नौकरी करना अनिवार्य था|

भयानक ठण्ड और संघर्षमय अभावपूर्ण जीवन के कारण कुल मिलाकर रूस एक कष्टभूमि ही था| पर वहाँ के लोगों के जीवन में जो जिजीविषा थी वह बड़ी प्रशंसनीय थी| उस समय के कितने ही कष्टों और अभावों के बावजूद भी लोगों का जीवन के प्रति बड़ा उत्साह था| अब तो स्थिति बहुत बदल गयी है| रूसी साम्यवाद उस समय चरम शिखर पर था| उन दिनों वहाँ घरों में स्नानघर नहीं होते थे| सार्वजनिक स्नानघर होते थे पुरुषों व महिलाओं के लिए अलग अलग जो एक हॉल की तरह होते थे, जहाँ लोग सप्ताह में एक दिन नग्न होकर स्नान करते थे| साईबेरिया में तो लोग महीने में एक दिन ही स्नान करते थे| लोगों को सार्वजनिक रूप से राजनीतिक चर्चा करने की अनुमति नहीं थी| लोग राजनीति पर वही बात करते जैसा उन्हें करने का निर्देश मिलता था, बाकी हर विषय पर खूब बातें करते| लोग खूब मिलनसार थे|

इस प्रवास के २०-२१ वर्षों बाद संयोग से युक्रेन के प्रवास में सोवियत संघ के बिखराव का आरम्भ भी देखा| 
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आज से ९५ वर्ष पूर्व आज ही के दिन ३० दिसंबर १९२२ को सोवियत संघ की स्थापना हुई थी जो ७० वर्षों तक विश्व की दूसरी सबसे बड़ी महाशक्ति रही| शायद पहली भी रही हो, कुछ कह नहीं सकते|

समय के साथ सब कुछ बदल जाता है| जीवन परिवर्तनशील है| सब कुछ भगवान की माया है| भगवान भी क्या क्या दृश्य दिखलाते हैं ! हे प्रभु, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो|
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ॐ तत्सत् | ॐ शांति शांति शांति | ॐ ॐ ॐ !!
३० दिसम्बर २०१७

1 comment:

  1. विश्व की सबसे बड़ी सैनिक परेड और सबसे बड़ा सैनिक प्रदर्शन प्रति वर्ष 9 मई को मॉस्को (रूस) में होता है। 1945 में इस दिन रूस ने जर्मनी को पराजित कर द्वितीय विश्व युद्ध का अंत कर दिया था। उस दिन जर्मनी में 8 मई थी, लेकिन मॉस्को में 9 मई थी अतः 9 मई को ही पूर्व सोवियत संघ के सभी देशों में यह पर्व मनाया जाता है।
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    19वीं शताब्दी में लिखे गये रूसी साहित्य और रूस के पिछली दो शताब्दियों के इतिहास में मेरी कुछ-कुछ रुचि रही है। मेरे दृष्टिकोण से रूस एक कष्ट-भूमि है जहाँ मनुष्य कष्ट पाने के लिए ही जन्म लेता है, लेकिन वहाँ के लोगों ने अत्यधिक कष्टों के बाद भी मनुष्य जीवन की जिजीविषा (जीने की चाह), और कष्टों से ऊपर उठने के मानसिक संघर्ष का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है।
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    आध्यात्म का अभाव वहाँ है। आध्यात्म में रुचि धीरे धीरे बढ़ रही है, जिसकी यही गति रही तो भविष्य में रूस एक सनातन धर्मावलम्बी देश होगा। अभी तो वहाँ रूसी ओर्थोडोक्स चर्च का पूरा प्रभाव है। मार्क्सवाद का त्याग तो वहाँ आधिकारिक रूप से कर दिया गया है, लेकिन मार्क्सवाद का भूत वहाँ के जीवन से अभी तक गया नहीं है।

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