Tuesday, 14 July 2026

सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

 सब पीड़ाओं, दुःखों और कष्टों का स्वागत है; उनके आगमन से अब कोई परेशानी नहीं होती ---

.
संत तुलसीदासजी ने लिखा है ---
"'कह हनुमंत विपत्ति प्रभु सोई, जब तब सुमिरन भजन न होई।"
हनुमान जी महाराज भगवान श्रीराम को कहते हैं कि -- "हे प्रभु, जीवन में विपत्ति ही तब आती है, जब आपका भजन और सुमिरन नहीं होता है।"
.
जिस दिन भगवान का भजन नहीं होता, उस दिन बड़ी भयंकर असह्य पीड़ा होती है, जो भगवान के भजन से ही दूर होती है। उस समय ऐसा लगता है जैसे मैं इस पृथ्वी पर एक पशु की तरह चरते हुए व्यर्थ ही यह जीवन नष्ट कर रहा हूँ। मेरे लिये तो इस संसार में सबसे बड़ा कष्ट ही भगवान का चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान का नहीं होना है। अतः सब ओर से मन को हटाकर भगवान में ही लगाना पड़ेगा। स्वयं भगवान का भी यही निर्देश है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं ---
"सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६:२४॥"
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥६:२५॥"
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् --
"संकल्प से उत्पन्न समस्त कामनाओं को नि:शेष रूप से परित्याग कर मन के द्वारा इन्द्रिय समुदाय को सब ओर से सम्यक् प्रकार वश में करके॥"
"शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥"
"यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥"
.
समस्त कामनाओं से मुक्त हो कर धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे धीरे मन को सर्वव्यापी आत्मा में स्थित कर के अन्य किसी भी वस्तु का चिन्तन न करे। यह योग की परम श्रेष्ठ विधि है। इस प्रकार योगाभ्यास के बल से योगी का मन आत्मा में ही शान्त हो जाता है। उपनिषदों की सहायता से इसे बहुत अच्छी तरह से समझाया जा सकता है। यह साधक की पात्रता पर निर्भर है कि वह कितना समझ सकता है। अतः किसी भी साधक को एक बार तो किन्हीं ब्रहमनिष्ठ श्रौत्रीय आचार्य से व्यक्तिगत मार्गदर्शन लेना ही पड़ेगा। "मूमुक्षुत्व और फलार्थित्व" -- दोनों साथ साथ नहीं चल सकते। जब मुमुक्षुत्व जागृत होता है तब शनैः शनैः कर्ताभाव और सब कामनाएँ नष्ट होने लगती हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१४ जुलाई २०२४

No comments:

Post a Comment