"परम प्रेम" और "समर्पण" का स्वभाव हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है .....
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परमात्मा से पूर्ण प्रेम करो, "अनाहत नाद" या "ज्योति" के रूप में, या अपने अन्य किसी प्रियतम के रूप में साकार या निराकार, पर प्रेम करो| गीता में भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं का सार ही भक्ति और समर्पण है ....
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः|९:३४||"
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु| मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे||१८:६५||
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज| अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः||१८:६६||
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अपने भौतिक व्यक्तित्व का मोह हमें हिंसक बनाता है| भिन्नता से भेद की उत्पत्ति होती है, और भेद से भय और हिंसा उत्पन्न होती है| भयभीत प्राणी दूसरों को भी भयभीत करता है और हिंसक बन जाता है| व्यक्तित्व की दासता और मोह हमें हिंसक बना देता है| इस व्यक्तित्व की दासता से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है ..... "परमात्मा से परम-प्रेम और समर्पण"|
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परमात्मा से "पूर्ण प्रेम" और "समर्पण" हमें अपने "शिवत्व" का बोध कराता है| जब हम परमात्मा को "प्रेम" और "समर्पण" करते हैं तब वही "प्रेम" और "समर्पण" अनंत गुणा होकर हमें ही बापस मिलता है| जब हम उन के "शिवत्व" में विलीन हो जाते हैं, वह "शिवत्व" भी हमारे में विलीन हो जाता है| तब हम "जीव" नहीं, स्वयं साक्षात शिव बन जाते हैं| जहाँ कोई क्रिया-प्रतिक्रिया, मिलना-बिछुड़ना, अपेक्षा व मांग नहीं, जो बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा से भी परे है, वह असीमता, अनंतता व सम्पूर्णता हम स्वयं हैं| हमारा पृथक अस्तित्व उस परम प्रेम और परम सत्य को व्यक्त करने के लिए है| भक्ति और समर्पण द्वारा हम जीव से शिव बनें|
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ॐ तत्सत् ! शिवोहं शिवोहं अहं ब्रह्मास्मि ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
६ अप्रेल २०१९
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