Monday, 16 March 2026

स्वयं भगवान विष्णु ही यह समस्त सृष्टि बन गये हैं, उनकी इस विराट अनंतता का बोध ऊर्ध्व में होता है ---

 स्वयं भगवान विष्णु ही यह समस्त सृष्टि बन गये हैं, उनकी इस विराट अनंतता का बोध ऊर्ध्व में होता है। उस अनंतता का ध्यान ऊर्ध्वमूल में करते हुए स्वयं को उन की दिव्य चेतना में ऐसे ही विलीन कर दें, जैसे जल की एक बूंद विराट महासागर में विलीन हो जाती है। भगवान की अनुभूति सच्चिदानंद के रूप में होती है। हम स्वयं वह सत् चित्त आनंद हैं, यह नश्वर देह नहीं।

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पूरी सृष्टि -- प्रणव का जप कर रही है, जिसे सुनना और निरंतर उसकी चेतना में रहना योग मार्ग की सर्वोच्च साधना है। साधना काल में कमर सीधी, ठुड्डी भूमि के समानांतर और चेतना कूटस्थ में रखें। नेत्रों के दोनों गोलक बिना किसी तनाव के नासिका-मूल के समीप व उनका दृष्टि-पथ भ्रूमध्य की ओर रहे। धीरे धीरे प्रणव में लिपटी एक ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होकर सारी सृष्टि में व्याप्त हो जाती है। ध्यान उन ज्योतिर्मय ब्रह्म का ही किया जाता है। सारा ब्रह्मांड उनका जप-योग कर रहा है। गीता में भगवान ने कहा है --
"महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥१०:२५॥"
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी सम्बन्धी भेदों में (पदात्मक वाक्यों में) एक अक्षर 'ओंकार' हूँ। यज्ञों में जपयज्ञ हूँ, और स्थावरों में अर्थात् अचल पदार्थों में हिमालय हूँ। (महर्षीणां भृगुः अहम्। गिरां वाचां पदलक्षणानाम् एकम् अक्षरम् ओंकारः अस्मि। यज्ञानां जपयज्ञः अस्मि। स्थावराणां स्थितिमतां हिमालयः॥)
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तंत्र शस्त्रों में भगवान शिव कहते हैं -- ‘हे पार्वती जी! मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि जप से ही सिद्धि प्राप्त हो सकती है।’
लगभग ९० प्रतिशत साधक जपयोग की ही साधना करते हैं। वह शक्ति जो मन को बन्धन से मुक्त कर दे, वह मंत्र है। ध्वनि के सूक्ष्म विद्युत रुपान्तर को मंत्र कह सकते हैं। मंत्र का जप करते-करते मन जब अपने आराध्य के ध्यान में तन्मय होकर लयभाव को प्राप्त कर लेता है, तब मंत्र की सिद्धि होती है। जिसके जपने मात्र से मनुष्य संसार रूपी भवसागर से पार हो जाता है, वह मंत्र की सार्थकता है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ मार्च २०२६

1 comment:

  1. मंत्र जप ---
    मंत्र जप विशेष ध्वनियों या शब्दों का श्रद्धापूर्वक बार-बार उच्चारण है, जो मन को शांत, केंद्रित और शुद्ध करता है। यह आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाता है, तनाव कम करता है और सकारात्मकता लाता है। इसे मानसिक (सबसे उत्तम), उपांशु (होंठ हिलना) या वाचिक (बोलकर) विधि से माला द्वारा या मानसिक रूप से किया जाता है। चार प्रकार के मंत्र है -- वैदिक, पौराणिक, तांत्रिक और शाबर।
    मंत्र जप अपनी श्रद्धानुसार या अपनी गुरु-परंपरानुसार ही करने चाहिए। कुछ मंत्र ऐसे भी हैं जिनमें देश-काल या शौच-अशौच का कोई बंधन नहीं होता है। वे भी अपनी श्रद्धानुसार ही किए जाते हैं। इसलिए इस विषय पर और कुछ नहीं लिख रहा। वैसे "राम" नाम ही सबसे अधिक शक्तिशाली, प्रभावशाली और तारक मंत्र है, जिसका जप निरापद है।

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