आजकल एक विचित्र सी मनःस्थिति हो गई है, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। समय, मान्यताएँ और परिस्थितियाँ -- पूरी तरह बदल गई हैं। मेरे पुराने अधिकांश साथी अज्ञात में चले गए हैं। बहुत कम, दो-चार ही बचे हैं। शारीरिक, मानसिक, और बौद्धिक क्षमताएँ भी बहुत अधिक क्षीण हो गई हैं।
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आज बहुत ठंडे दिमाग से चिंतन किया है कि वर्तमान परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ क्या किया जा सकता है। पूरी दिनचर्या और सोच बदल रहा हूँ। ईश्वर-प्रदत्त विवेक के प्रकाश में अब से वही होगा जो ईश्वर चाहेंगे। अपने विचारों में आमूलचूल परिवर्तन अब इसी क्षण से कर रहा हूँ।
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इस दीपक में अधिक ईंधन नहीं बचा है। मुझे अब इस जीवन का बचा हुआ सारा समय विरक्त होकर ईश्वर की उपासना में ही व्यतीत करना चाहिए, और जहाँ भी ईश्वर रखें, वहीं रहना चाहिए। साठ वर्ष पूर्व पन्द्रह-सौलह वर्ष की आयु में ही मुझे विरक्त हो जाना चाहिए था। लेकिन उस समय इतनी समझ नहीं थी। अब तक तो पता नहीं कितना पानी गंगा जी में बह चुका है। जैसी भी ईश्वर की इच्छा। कुछ समझ भी आई है तो बहुत देरी से आई है। अब और कुछ भी लिखने की इच्छा नहीं है। जितना समय लिखने में लगता है, उतना समय परमशिव का ध्यान अधिक सार्थक रहेगा।
आप सब में परम शिव को नमन !!
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ मार्च २०२३
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