आज श्रमण परंपरा (जैन मत) के २४ वें व अंतिम तीर्थंकर महावीर की जयंती है। तीर्थंकर का अर्थ है जो स्वयं तप के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करते है और संसार-सागर से पार लगाने वाले तीर्थ की रचना करते हैं। तीर्थंकर वह व्यक्ति है जिसने पूरी तरह से क्रोध, अभिमान, छल, इच्छा, आदि पर विजय प्राप्त की है। इस अवसर पर सभी श्रद्धालुओं का अभिनंदन।
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जैन मत का लक्ष्य है— "वीतरागता"। स्यात् इसी कारण मेरा आकर्षण महावीर स्वामी की शिक्षाओं के प्रति है। यह लेख लंबा न हो इसलिए "स्यादवाद" जिसे अनेकांतवाद, सप्तभङ्गी का सिद्धान्त, और "सापेक्षतावाद" भी कहते हैं की चर्चा इस लेख में नहीं कर रहा। इसी तरह "कैवल्य" शब्द पर भी चर्चा नहीं करूंगा। इस लेख में मैं बिना किसी पूर्वाग्रह के कम से कम शब्दों में श्रमण-परंपरा और ब्राह्मण-परंपरा में भेद, आस्तिकता, व नास्तिकता पर अपने विचार लिखूंगा।
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सभी जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। सुख सबको प्रिय है, और दुःख अप्रिय। इसलिए हम जैसा व्यवहार दूसरों से स्वयं के प्रति चाहते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति भी करें। किसी भी प्राणी को मारना, काटना या प्रताड़ित करना अमानवीय क्रूरता है। हम जीयें और दूसरों को भी जीने दें -- यह महावीर की शिक्षाओं का सार है।
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महावीर का जन्म वैशाली के क्षत्रिय गणतंत्र राज्य कुण्डलपुर में हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज-वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये। १२ वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवल्यज्ञान प्राप्त हुआ। यह श्रमण परम्परा ही कालान्तर में जैन धर्म कहलाई। जैन का अर्थ होता है जितेन्द्रिय, यानि जिस ने मन आदि इन्द्रियों को जीत लिया है।
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श्रमण परम्परा के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे जिनके पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष है। ऋषभदेव का उल्लेख वेदों में भी है और भागवत में भी। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को उच्चतम नैतिक गुण बताया। उनके पंचशील के सिद्धांत -- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य हैं। योग-दर्शन में ये ही 'यम' कहलाते हैं। उन्होंने अनेकांतवाद व स्यादवाद जैसे अद्भुत सिद्धांत दिए। हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें स्वयं को पसंद है। यह महावीर का "जीओ और जीने दो" का सिद्धांत है।
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श्रमण परम्परा और ब्राह्मण परम्परा दोनों ही अति प्राचीन काल से चली आ रही हैं। इनमें अंतर यह है कि श्रमण परम्परा नास्तिक है जो वेदों को अपौरुषेय नहीं मानती। ब्राह्मण परम्परा आस्तिक है जो वेदों को अपौरुषेय मानती है। लेकिन इन दोनों में एक समानता भी है। ये दोनों परम्पराएँ आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म और कर्मफलों के सिद्धांत को मानती हैं।
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ब्राह्मण परम्परा में ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म को ही मोक्ष का आधार मानता है और वेदवाक्य को ही ब्रह्म-वाक्य मानता है।
श्रमण परम्परा में श्रमण वह है जो निज श्रम द्वारा मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को मानता है और जिसके लिए जीवन में ईश्वर की नहीं बल्कि श्रम की आवश्यकता है। श्रमण परम्परा ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानती।
श्रमण परम्परा का आधार -- श्रमण, समन, शमन -- इन तीन शब्दों पर है। 'श्रमण' शब्द 'श्रमः' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'परिश्रम करना'। श्रमण शब्द का उल्लेख वृहदारण्यक उपनिषद् में 'श्रमणोऽश्रमणस' के रूप में हुआ है। यह शब्द इस बात को प्रकट करता है कि व्यक्ति अपना विकास अपने ही परिश्रम द्वारा कर सकता है। सुख–दुःख, उत्थान-पतन सभी के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है। 'समन' का अर्थ है, समताभाव, अर्थात् सभी को आत्मवत् समझना, सभी के प्रति समभाव रखना। जो बात अपने को बुरी लगती है, वह दूसरे के लिए भी बुरी है। ‘शमन' का अर्थ है अपनी वृत्तियों को शान्त रखना, उनका निरोध करना। जो व्यक्ति अपनी वृत्तियों को संयमित रखता है वह महाश्रमण है। इस प्रकार श्रमण परम्परा का मूल आधार श्रम, सम, शम इन तीन तत्त्वों पर आश्रित है।
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अंग्रेज़ इतिहासकारों के अनुसार तीर्थंकर महावीर का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व हुआ था, लेकिन आधुनिक भारतीय गणनाओं के अनुसार बुद्ध का जन्म ईसा से १८०० वर्ष पूर्व हुआ था, और तीर्थंकर महावीर उनसे आयु में ३० वर्ष बड़े थे। अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए द्वेष व दुर्भावनावश भारत का गलत इतिहास लिखा है।
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कुछ अस्वस्थ होने के कारण यह लेख आज प्रातः पोस्ट नहीं कर पाया, इसलिए शाम को पोस्ट कर रहा हूँ। सभी को नमन !! ॐ स्वस्ति !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३१ मार्च २०२६
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