Wednesday, 1 April 2026

भारत से नक्सलवाद का अंत ---

 भारत से नक्सलवाद का अंत ---

कल ३१ मार्च २०२६ को देश की संसद में माननीय गृहमंत्री श्री अमित शाह ने देश से नक्सलवाद समाप्त होने की घोषणा की थी। यह एक ऐतिहासिक घोषणा थी जो भारत के इतिहास में अमर रहेगी। नक्सलवादी आन्दोलन का विचार कानू सान्याल नाम के एक व्यक्ति के दिमाग की उपज था। उसको इस आंदोलन से इतनी ग्लानि हुई कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली। इससे पूर्व उसका सहयोगी चारु मजूमदार सन १९७२ में हृदय रोग से मर गया था। यह एक रहस्य है कि कानू सान्याल इतना विद्रोही कैसे हो गया। निजी जीवन में वह एक गरीब ब्राह्मण और साधु व्यक्ति था जिसका जन्म एक सात्विक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उसका जीवन बड़ा सात्विक, और दिनचर्या बड़ी सुव्यवस्थित थी। भगवान ने उसे बहुत अच्छा स्वास्थ्य दिया था। सन १९६२ में वह बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री को काला झंडा दिखा रहा था कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जहाँ उसकी भेट चारु मजुमदार से हुई। चारु मजूमदार एक कायस्थ परिवार से था जो जो तेलंगाना के किसान आन्दोलन से जुड़ा हुआ था और जेल में बंदी था। जेल में ही दोनों मित्र बने, और जेल से छूटकर सन १९६७ में दोनों ने बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक गाँव से तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध एक घोर मार्क्सवादी आन्दोलन आरम्भ किया जो नक्सलवाद कहलाया। इस आन्दोलन में छोटे-मोटे तो अनेक नेता थे पर इनको दो प्रभावशाली कर्मठ नेता मिल गये -- एक तो था नागभूषण पटनायक, और दूसरा था टी.रणदिवे। इन्होंने आंध्र प्रदेश में श्रीकाकुलम के जंगलों से इस आन्दोलन का विस्तार किया।
.
यह आन्दोलन पथभ्रष्ट हो गया जिससे कानु सान्याल और चारु मजूमदार में मतभेद हो गए और दोनों अलग अलग हो गए। चारु मजुमदार की मृत्यु सन १९७२ में हृदय रोग से हो गयी, और कानु सान्याल को इस आन्दोलन का सूत्रपात करने से इतनी अधिक मानसिक ग्लानि और पश्चाताप हुआ कि २३ मार्च २०१० को उसने आत्महत्या कर ली। उस समय के जितने भी नक्सलवादी थे, उनमें से लगभग आधे तो पुलिस की गोली से मारे गये थे, और बचे हुए आधों ने सरकार से माफी मांग ली और देश की मुख्यधारा में लौट आये।
.
वर्तमान नक्सलवादियों का मूल नक्सलवाद से कोई संबंध नहीं है। मूल नक्सलवाद और नक्सलवादियों का अब कोई अस्तित्व नहीं है। वर्तमान नक्सलवादी और उनके समर्थक "ठग", "डाकू" और "तस्कर" के अलावा कुछ भी नहीं हैं, जिन्हें सिर्फ बंदूक की भाषा ही समझ में आती है। भारत सरकार ने उनका सही इलाज कर दिया। वे कोई भटके हुए नौजवान नहीं, अपितु कुटिल राष्ट्रद्रोही तस्कर हैं, जिनको बिकी हुई प्रेस, वामपंथियों और राष्ट्र्विरोधियों का समर्थन प्राप्त है।
वन्दे मातरं। भारत माता की जय।
कृपा शंकर
१ अप्रेल २०२६

No comments:

Post a Comment