प्रारब्ध और पुरुषार्थ ---
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ह्रदय में कई बार यह प्रश्न उठता था कि सब कुछ प्रारब्ध के आधीन है या पुरुषार्थ के|
कुछ संत कहते हैं कि जैसी ईश्वर की इच्छा होती है वैसे ही होता है, मनुष्य की कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं होती|
अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या मनुष्य कर्म करने को स्वतंत्र है| यदि सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है तो कर्मफल का सिद्धांत कितना सही है ?
अधिकाँश लोग शिकायत करते हैं कि हमने तो कोई बुरा कर्म ही नहीं किया फिर कष्ट क्यों पा रहे हैं| इन सब पर मंथन करने के पश्चात जो उत्तर निकलता है वह यह कि भौतिक रूप से किया हुआ कार्य ही कर्म नहीं है|
आपके हमारे विचार और अपेक्षाएँ ही हमारे "कर्म" हैं| हमारी हर कामना और अपेक्षा हमारा 'कर्म' है जिस का फल मिले बिना नहीं रहता| हमारे विचार ही घनीभूत होकर भौतिक जगत की रचना करते हैं| सारे सुखों और दु:खों का कारण हमारे विचार ही हैं| हर कामना, हर संकल्प और हर विचार फलिभूत अवश्य होता है|
माँ आनन्दमयी से एक बार यही प्रश्न पूछा गया कि मनुष्य को कर्म करने की कितनी स्वतंत्रता है|
माँ का उत्तर था कि ------ हमारे समक्ष एक ही विकल्प है की हम प्रभु को प्रेम करें या ना करें| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
प्रभु से प्रेम होगा तो हमारे विचार और संकल्प भी अच्छे होंगे| फिर स्वतः ही हमारे कर्म भी अच्छे होंगे| अहंकारमय विचार होंगे तो स्वतः कर्म भी बुरे होंगे|
यहाँ अब आगे और कुछ भी लिखने की आवश्यकता नहीं है| आप सब समझते हैं|
ॐ शिव | ॐ ॐ ॐ ||
८ मार्च २०१४
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