जीवन में 'धर्म' तभी साकार हो सकता है जब हमारे हृदय में परमात्मा हो।
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धर्म इतना व्यापक है कि उसे मत-मतान्तरों में सीमित नहीं किया जा सकता। हम किसी मत विशेष को धर्म मान लेते हैं, यह हमारा अज्ञान है। धर्म एक ही है, अनेक नहीं। कणाद ऋषि ने धर्म को "यथोSभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिसधर्मः" परिभाषित किया है। हम मनुष्य नहीं, एक शाश्वत आत्मा हैं। मनुष्य देह एक मोटर-साइकिल की तरह वाहन मात्र है जो इस लोकयात्रा के लिये मिला है। हम उस मोटर-साइकिल पर कुछ काल के लिए यात्रा कर रहे हैं। मानव मात्र के कल्याण की बात वेद-विरुद्ध है। हमारे शास्त्रों में समष्टि के कल्याण की बात की गयी है, न कि व्यष्टि यानि मनुष्य मात्र के कल्याण की।
मनु-स्मृति में मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं --
"धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥"
धृति (धैर्य), क्षमा (क्षमाशील होना), दम (वासनाओं पर नियन्त्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये धर्म के दस लक्षण हैं जिन्हें धारण करना ही धर्म है। जहाँ ये नहीं हैं, वहाँ अधर्म है।
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जीवन का लक्ष्य कोई इन्द्रीय सुखों या किसी स्वर्ग की प्राप्ति नहीं है। आत्म-तत्व यानि परमात्मा में स्थिति ही हमारा एकमात्र परम धर्म है, अन्य सब इसी का विस्तार है। यही जीवन कि सार्थकता है। मेरे लिये तो स्वर्ग एक प्रलोभन, और नर्क एक भय है। ईश्वर ही एकमात्र सत्य है।
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पुनश्च: ----- निज जीवन में परमात्मा को शरणागति द्वारा पूर्ण समर्पण हमारा धर्म है, और जीवन में परमात्मा का न होना अधर्म है। यह सनातन सत्य है। मनुष्य का स्वभाव परिवर्तित होकर दैवीय या आसुरी हो सकता है, लेकिन धर्म कभी परिवर्तित नहीं हो सकता। धर्म एक ही है जो सत्य, सनातन और अपरिवर्तनीय है। ॐ तत् सत्॥
कृपा शंकर
२० मार्च २०२६
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