आज प्रातःकाल उठते ही प्रेरणा मिली कि मैं आज प्राण-तत्व, आकाश-तत्व और परमशिव के बारे में कुछ लिखूं| पर ज्यों ही लिखने को उद्यत हुआ तब सूक्ष्म जगत में भटक रही एक-दो नरपिशाच रही आसुरी प्रेतात्माओं की स्मृति आ गयी जिन्होनें तुरंत आकर मेरे दिमाग में एक ऐसा विक्षेप डाल दिया कि मैं विषय से भटक गया और उपरोक्त विषयों पर कुछ भी लिखना असंभव हो गया| साधना के मार्ग पर देवता भी मिलते हैं और असुर भी जिनसे रक्षा गुरु महाराज के रूप में जगन्माता ही करती हैं|
मेरा सौभाग्य देखिये कि यहाँ से सैंकड़ों मील दूर वर्तमान में नर्मदा तट के पास प्रवास कर रहे एक सिद्ध सन्यासी महात्मा जी का अपने आप ही एक घंटे पूर्व एक विडिओ कॉल आया जिसमें उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष लगभग एक घंटे तक उपदेश और सत्संग लाभ देकर मेरे उद्वेलित मन को तो शांत किया ही, मानस में छिपे हुए सारे अव्यक्त प्रश्नों का उत्तर भी दे दिया| अब कोई जिज्ञासा या ऐसी बात नहीं रही है जो कोई रहस्य हो|
अभी तो परमात्मा का ध्यान करने की प्रेरणा मिल रही है| फिर कभी सार की बात लिखूंगा|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! श्रीगुरवे नमः !
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०१९
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