"बलात्कार" शब्द को परिभाषित किया जाए .....
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हर तरह का दुराचार तभी रुकेगा जब देश में चरित्रवान नागरिक जन्म लेंगे| इसके लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वर-प्रणिधान की शिक्षा देनी होगी|
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असली विकास आत्मा का विकास है, बाहरी नहीं| बाहरी भी हो पर साथ साथ आत्मा का भी हो| आत्मा का विकास होगा तो बाहरी विकास निश्चित है| संतान अच्छी और चरित्रवान हो इसके लिए भारत में सौलह संस्कार भी होते थे, जिन्हें हमने अपनी धर्म-निरपेक्षता के चक्कर में भुला दिया है|
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बाहरी उपक्रम कितने भी करो, कितनी भी अच्छी सड़कें और मकान बनाओ, या कितने भी पुरुषों को फांसी पर लटकाओ, उससे देश में लोग चरित्रवान नहीं बनेंगे| बच्चों को बाल्यकाल से ही ध्यान करना और परमात्मा से प्रेम करना सिखाना होगा, तभी वे चरित्रवान बनेंगे|
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आप नशा कर के, अश्लीलता का चिंतन कर के, और अभक्ष्य भक्षण कर के संतान पैदा करोगे तो वे बलात्कारी, घूसखोर और नर-पिशाच ही होंगे| समस्या की जड़ पर प्रहार करो, न कि उसके फलों पर| सिर्फ सजा से बलात्कार और दुराचार नहीं रुकने वाले, इस पर चिंतन करो कि देश में सज्जन पुरुष कैसे पैदा हों|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ अप्रेल २०१८
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हर तरह का दुराचार तभी रुकेगा जब देश में चरित्रवान नागरिक जन्म लेंगे| इसके लिए अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, और ईश्वर-प्रणिधान की शिक्षा देनी होगी|
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असली विकास आत्मा का विकास है, बाहरी नहीं| बाहरी भी हो पर साथ साथ आत्मा का भी हो| आत्मा का विकास होगा तो बाहरी विकास निश्चित है| संतान अच्छी और चरित्रवान हो इसके लिए भारत में सौलह संस्कार भी होते थे, जिन्हें हमने अपनी धर्म-निरपेक्षता के चक्कर में भुला दिया है|
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बाहरी उपक्रम कितने भी करो, कितनी भी अच्छी सड़कें और मकान बनाओ, या कितने भी पुरुषों को फांसी पर लटकाओ, उससे देश में लोग चरित्रवान नहीं बनेंगे| बच्चों को बाल्यकाल से ही ध्यान करना और परमात्मा से प्रेम करना सिखाना होगा, तभी वे चरित्रवान बनेंगे|
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आप नशा कर के, अश्लीलता का चिंतन कर के, और अभक्ष्य भक्षण कर के संतान पैदा करोगे तो वे बलात्कारी, घूसखोर और नर-पिशाच ही होंगे| समस्या की जड़ पर प्रहार करो, न कि उसके फलों पर| सिर्फ सजा से बलात्कार और दुराचार नहीं रुकने वाले, इस पर चिंतन करो कि देश में सज्जन पुरुष कैसे पैदा हों|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२५ अप्रेल २०१८
स्वयं की रक्षा के लिए opposite sex से कभी एकांत में न तो मिलें और न उनका स्पर्श करें|
ReplyDeleteझूठे आरोप मृत्यु की पीड़ा से कम नहीं हैं|
ReplyDeleteArun Kumar Upadhyay
दुर्भाग्य है कि भारतीय लोग अभी तक शासन करना सीख नहीं पाये हैं। जार्ज आर्वेल का १९८४ उपन्यास बिलकुल सही प्रमाणित हो रहा है। कांग्रेस को अंग्रेजों की उत्तराधिकारी के रूप में आधा शासन करना मालूम है। भाजपा सत्ता में आते ही चुनाव के लिये कांग्रेस से अधिक हिन्दू विरोधी हो जाती है। अभी संघ भी उसी रास्ते पर चल पड़ा है जिसे चुनाव नहीं लड़ना है। अंग्रेजों ने जो कानून बनाये थे वे भारत में १८६० से १९७३ तक बिलकुल ठीक काम कर रहे थे। १९७३ में दण्ड प्रक्रिया संहिता का संशोधन होने के बाद कानून और धीमा हो गया। बची खुची कसर १९७५ के आपात काल ने पूरी कर दी। हर घटना के बाद ५ मिनट में नया कानून नहीं बनता है। यह शुद्ध पागलपन है। कानून बनाने और उसकी भाषा शुद्ध करने, उसके परिणाम और क्रियान्वयन के बारे में सोचना पड़ता है। बलात्कार का मूल कानून अधिक सही था जो युगों से चला आ रहा है। उसमें एक तो भारत के न्याय व्यवस्था की सुस्ती थी दूसरे २/३ बलात्कार के मुकदमे झूठे होते हैं तथा आधे मुकदमे या तो रिपोर्ट नहीं होते या दर्ज नहीं होते। कड़े कानून से झूठे मुकदमों की बाढ़ आ जायेगी और निर्दोष लोग विशेषकर हिन्दू सन्त या कोई ईमानदार शिक्षक या अधिकारी फंसेंगे। विवाह और बलात्कार के कानून इतने स्त्री समर्थक हो गये हैं कि पुरुषों के लिये स्त्रियों से घर या कार्यालय में काम कराना कठिन हो गया है। कोई शिक्षक किसी छात्र को परीक्षा में अंक नहीं देगा तो वह बलात्कार का दोषी बन जायेगा। इसके लिये मृत्युदण्ड देने से बलात्कार के बाद स्त्रियों की हत्या की घटनायें बढ़ जायेंगी। कई सन्तों को फंसाने के षड्यन्त्र पिछले १० वर्षों से चल रहे हैं। लोग १० वर्षों तक अत्याचार झेलने के बाद किसी तरह मुक्त हुए। पर सन्त आशाराम जी दुर्भाग्य से गुजरात के हैं जहां किसी अन्य की अधिक लोकप्रियता सहन नहीं हो सकती है।