Tuesday, 24 February 2026

हमारा शिव-संकल्प, अंतर्दृष्टि, प्राण-तत्व और गुरुकृपा ..... ये साधन हैं, जिनकी सहायता से परमशिव का ध्यान किया जाता है ---

 हमारा शिव-संकल्प, अंतर्दृष्टि, प्राण-तत्व और गुरुकृपा ..... ये साधन हैं, जिनकी सहायता से परमशिव का ध्यान किया जाता है| परमशिव एक अनुभूति है जो परमात्मा की परमकृपा से उनके द्वारा भेजे हुए सद्गुरु के मार्गदर्शन से होती है| गुरु का भौतिक देहधारी होना आवश्यक नहीं है| सूक्ष्म जगत की महान आत्मायें भी गुरु रूप में मार्ग-दर्शन कर सकती हैं|

प्राण का घनीभूत रूप कुंडलिनी महाशक्ति है| कुंडलिनी महाशक्ति और परमशिव का मिलन 'योग' है|
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जब हृदय में भगवान से परमप्रेम (भक्ति) और उन्हें पाने की अभीप्सा जागृत होती है, तब सद्गुरु लाभ होता है| भगवान श्रीकृष्ण स्वयं परात्पर गुरु रूप में निष्ठावान साधकों का मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| भगवद्गीता के रहस्य उन्हीं की कृपा से समझ में आ सकते हैं, अन्यथा नहीं| वे हमारे अंतर में सर्वदा बिराजमान हैं| उनका आभास उनकी परमकृपा से ही होता है| हमारे हिमालय जैसे बड़े बड़े पाप भी उनके विराट कृपासिंधु में छोटे-मोटे महत्वहीन कंकर-पत्थर से अधिक नहीं हैं| सब कर्मफलों से मुक्ति और आगे की गतियाँ उनकी कृपा से होती हैं| वे ही परमब्रह्म हैं, वे ही जगन्माता हैं|
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ब्रह्मरंध्र से परे अनंत महाकाश है| उस से भी बहुत परे श्वेत क्षीरसागर है जहाँ भगवान नारायण, परमशिव के रूप में बिराजमान हैं| उनके दर्शन एक विराट पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र के रूप में होते हैं| वे पंचमुखी महादेव हैं| उनके संकल्प से ही यह सारी सृष्टि निर्मित हुई और चलायमान है| गीता में उस लोक के बारे में कहा गया है ....
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः| यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम||"
श्रुति भगवती कहती है .....
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः| तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति||"
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उन परमात्मा की परमकृपा मुझ अकिंचन पर और हम सब पर सदा बनी रहे|
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च| नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व| अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ ॐ ॐ!!
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०२०

Monday, 23 February 2026

हरियाणा की बर्बादी ---

 हरियाणा की बर्बादी

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हरियाणा में आरक्षण के आन्दोलन के नाम पर जो हुआ है उससे मैं सिहर गया हूँ, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि ऐसा आत्मघाती विध्वंश और विनाश भारत के लोग कर सकते है| यह भारत को एक गृहयुद्ध में धकेलने और भारत को सीरिया, इराक और लीबिया बनाने की तैयारी थी|
पुलिस थानों और रेलवे स्टेशनों को जला दिया गया, रेल के इंजन जला दिए गए, रेल की पटरियाँ उखाड़ दी गईं, बसों को जला दिया गया, अन्य जातियों की दुकानों को लूट कर जला दिया गया, और दिल्ली का पानी बंद कर दिया गया| टीवी पर अब बर्बादी के जो दृश्य दिखाए जा रहे हैं उन्हें देखकर कोई भी काँप जाएगा| पूरा प्रशासन विफल हो गया था| आन्दोलनकारी लोग सेना तक से भी लड़ने और मरने मारने को तैयार हो गए थे|
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धिक्कार है ऐसे आन्दोलनों पर, ऐसी बहादुरी पर और ऐसे आरक्षण पर| यह पूरे भारतवासियों के माथे पर एक कलंक था| पूरा भारत इस पर शर्मसार है|
धिक्कार है जातिगत आरक्षण पर| यह पूरे भारत को बर्बाद कर देगा|
देश में आरक्षण हो सिर्फ .......
(१) अपंगों और अनाथों के लिए,
(२) देश पर शहीद होने वालों के बच्चों के लिए|
अन्य किसी के लिए भी नहीं| गरीबों को आर्थिक सहायता दो, आरक्षण नहीं| गरीबी को महिमान्वित मत करो|
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ऐसे आन्दोलन देश में अन्यत्र भी चलाने के प्रयास हुए जो ईश्वर की कृपा से सफल नहीं हुए| मेरी आस्था उन राजनीतिकों से उठ गयी है जो सता के लिए देश की ह्त्या करने को तैयार हैं|
अब तो सिर्फ भगवान ही मालिक है|
(इस तरह के आन्दोलन पूर्व में भी हुए हैं जैसे तमिलनाडु में हिंदी के विरोध में, आंध्रप्रदेश में पृथक आंध्र के विरोध में, और राजस्थान में गुर्जर आरक्षण के लिए)
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ॐ शिव शिव शिव शिव शिव ||
24 फरवरी 2016

श्रीमयी के विवाह का निमंत्रण

 वैवाहिक निमंत्रण

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हमारे आराध्य देव भगवान शिव, कुलदेवी, पितृगणों, और गुरु परम्परा के गुरुओं के आशीर्वाद व आत्मीयजनों की शुभ कामनाओं से हमारी --
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स्वस्तिमयी हृदयकणिका सौभाग्यकांक्षिणी पुत्री --- श्रीमयी --- का मंगल परिणयोत्सव ....
चैत्र कृष्ण तृतीया सोमवार दिनांक ९ मार्च २०१५ को शुभ लग्नानुसार वेद मन्त्रों व मंगल गीतों के साथ धरा, अम्बर, वरुण, पवन एवं अग्नि की साक्षी में स्वस्तिमय हृदयांश चिरंजीवी --- शेखर --- के साथ संपन्न होगा|
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इस अवसर पर शहनाई की मंगलमय मधुर ध्वनी और वेदमंत्रों के मध्य नव युगल की नूतन अंकुरित सुरभित मंगलमय शुभ आकांक्षाओं व अभिलाषाओं को अपने स्नेहाशीषों की निर्मल वर्षा से अभिसिंचित कर हमें अनुगृहित करें|
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२४ फरवरी से नित्य नियमित रूप से मध्याह्न में हमारे घर पर मंगल गीतों के गायन हमारे घर-परिवार, कुटुम्ब-कबीले की परमस्नेही मातृशक्ति द्वारा हो रहे हैं|
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माता पिता की भावनाएँ .......
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रणत भँवर रा लाडला गौरीपुत्र गणेश, रिद्धि सिद्धि सहित पधारियो ब्रह्मा विष्णु महेश|
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हमारी लाडली के मामा आयेंगे भात चूनरी लायेंगे,
आप सब के साथ मिलकर हम भी मंगल गीत गायेंगे|
कुम्भकार के चाक से कलशपूजन भी होगा,
गृहस्थी की नींव का गुरुमंत्र यह होगा|
सौलह श्रृंगार के साथ होगी मेंहदी की भी रीत,
हमारी लाडली की हथेली पर उकरेगी पिया की प्रीत|
विवाह पूर्व ही होगा हल्द हाथ और बान,
आपके आगमन से बढ़ जाएगा हमारा मान|
विवाह की पूर्वसंध्या पर लाड चाव संगीत होगा,
ढोल नगाड़े गीत नृत्य से चिर स्मरणीय दिवस होगा|
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फूलों की वादियों ने सुनी ह्रदय की बात,
आप अवश्य पधारना संग खुशियों की सौगात|
इस मधुरिम बेला पर आपके आशीष से जीवन पुष्प खिलेगा,
प्रसन्नता हम सब को होगी हमें गौरव व संबल मिलेगा|
तारों की छांव में जब लाडली विदा होगी,
जन्म से लेकर अब तक की स्मृति आँखों में होगी|
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संसार की रीति का मुझको करना होगा निर्वाह,
हंसती खेलती वह सुख से रहे यही हमारे ह्रदय की चाह|
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सस्नेह दर्शनाभिलाषी ----
कृपा शंकर
संतोष
२४ फरवरी २०१५
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विवाह स्थल : गाड़िया सभागार (टाउन हॉल) झुंझुनू (राजस्थान).

हृदय में परमात्मा हो तो मनुष्य विपरीततम परिस्थितियों में भी महानतम कार्य कर सकता है ---

हृदय में परमात्मा हो तो मनुष्य विपरीततम परिस्थितियों में भी महानतम कार्य कर सकता है ---

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(संशोधित व पुनःप्रेषित लेख) --- दो तीन वर्ष पूर्व मैनें इंदौर की प्रातःस्मरणीया, भगवान् शिव की मानसपुत्री, शिवकन्या महारानी अहिल्याबाई होलकर के बारे में कुछ साहित्य पढ़ा था जिससे मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ था| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है| आज अंतर्प्रेरणा से अपने दो वर्ष पुराने एक लेख को संशोधित कर पुनर्प्रेषित कर रहा हूँ| . व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विकटतम कष्ट और प्रतिकूलताओं के पश्चात् भी इन्होने महानतम कार्य किये| इतने महान कार्य कि जिनकी तुलना नहीं की जा सकती| इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी| इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे| इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए| अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की म्रत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थी और राज्य संभाला| अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया| अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया| राजधानी इंदौर उन्हीं की बसाई हुई नगरी है| जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन कल्याण के व्रत का पालन करती रही| उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया|

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अहिल्याबाई ने सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की| वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से पुनर्निर्मित हुए| हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू लोग इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे| सेंकडों असहाय लोगों और साधू संतों को अन्न वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी| पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए| नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं| महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना| अमरकंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया| परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएं कीं| ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की| वहां प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था| बदरीनाथ के मार्ग में एक गाँव आता है जिसका नाम गोचर है| वहाँ की भूमि को खरीद कर उन्होंने गायों के चरने के लिए छोड़ दिया|
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यहाँ दो शब्द उनके श्वसुर मल्हार राव के बारे में भी लिखना उचित रहेगा| छत्रपति शिवाजी के पोते साहू जी ने एक चित्तपावन ब्राह्मण विश्वनाथ बालाजी बाजीराव (प्रथम) को पेशवा नियुक्त किया| एक बार बालाजी बाजीराव वेश बदल कर बिना सुरक्षा व्यवस्था के तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े| मार्ग के एक गाँव में उनको मुगलों के जासूसों ने पहचान लिया और उनकी हत्या के लिए बीस मुग़ल सैनिक पीछे लगा दिए|
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मल्हार राव ने कुछ भैंसे पाल रखीं थीं और उस गाँव में दूध बेच कर गुजारा करते थे| वे मुग़ल जासूस भी उन्हीं से दूध खरीदते थे| उनकी आपसी बातचीत से मल्हार राव को सब बातें स्पष्ट हो गईं| उनकी देशभक्ति जागृत हो गयी और चुपके से उन्होंने पेशवा को ढूंढकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी| यही नहीं पेशवा को एक संकरी घाटी में से सुरक्षित निकाल कर भेज दिया और उनकी तलवार खुद लेकर उन बीस मुगलों को रोकने खड़े हो गए| उस तंग घाटी से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति निकल सकता था| ज्यों ही कोई मुग़ल सैनिक बाहर निकलता, मल्हार राव की तलवार उसे यमलोक पहुंचा देती| उन्होंने पांच मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया| इसे देख बाकी पंद्रह मुग़ल सैनिक गाली देते हुए बापस लौट गए| उन्होंने मल्हार राव के घर को आग लगा दी, उसके बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी व भैंसों को हाँक कर ले गए|
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मल्हार राव, पेशवा बाजीराव के दाहिने हाथ बन कर उनके साथ हर युद्ध में रहे| समय के साथ बाजीराव विश्व के सफलतम सेनानायक बने| उन्होंने अनेक युद्ध लड़े और कभी भी पराजित नहीं हुए| वे महानतम हिन्दू सेनानायकों में से एक थे| उन्होंने कभी पराजय का मुंह नहीं देखा| उनकी असमय मृत्यु नहीं होती तो भारत का इतिहास ही अलग होता| पेशवा बाजीराव ने वर्तमान इंदौर क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी|
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हमें गर्व है ऐसी शासिका पर| दुर्भाग्य से भारत में धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ऐसे महान व्यक्तियों के इतिहास को नहीं पढाया जाता| भारत के अच्छे दिन भी लौटेंगे| इस लेख को लिखने के पीछे यही स्पष्ट करना था की यदि ह्रदय में भक्ति और श्रद्धा हो तो व्यक्ति कैसी भी मुसीबतों का सामना कर जीवन में सफल हो सकता है| २३ फरवरी २०१५

Sunday, 22 February 2026

'सत्संग' की मेरी अवधारणा ----

'सत्संग' की मेरी अवधारणा ----

कुसंग के सर्वदा त्याग और सत्संग की महिमा से हमारे ग्रन्थ भरे पड़े हैं| पर आज के परिप्रेक्ष्य में सत्संग को परिभाषित करना भी अत्यंत आवश्यक है| सामान्य भाषा में सत्संग का अर्थ होता है -- 'सत्य' का संग| पर 'सत्य' क्या है इसकी भी स्पष्ट अवधारणा होनी चाहिए| 'सत्य' अपने आप में इतना विराट है कि उस के अर्थ को सीमित करना असम्भव है| यह एक कटोरी में महासागर को भरने के प्रयास जैसा है| सीमित बुद्धि से इसे समझने का प्रयास भी कनक कसौटी पर हीरे को कसना है|
पर क्या 'सत्य' वास्तव में अपरिभाष्य है?
इसकी अनुभूति की जा सकती है, इसकी झलक पाई जा सकती है; ऐसा मेरा अनुभव है| शब्दों में ही व्यक्त करना चाहें तो असम्भव है| अधिक से अधिक इतना ही कह सकते हैं कि भगवान ही एकमात्र सत्य हैं| भगवान को भी 'सच्चिदानंद' से अधिक और कुछ कहना कम से कम मेरे लिए तो सम्भव नहीं है| मैं ना तो भगवान को सीमित कर सकता हूँ और ना ही गुरु तत्व को|
दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि इस सृष्टि में 'निराकार' कुछ भी नहीं है| सब कुछ 'साकार' है| जो भी सृष्ट हुआ है वह साकार है| जो साधक अपने को निराकार के साधक कहते हैं वे भी या तो भ्रूमध्य में प्रकाश, किसी पवित्र मन्त्र, या अपने गुरु के भौतिक स्वरुप का ध्यान करते हैं| यह भी साकारता ही है, इसमें निराकारता कहाँ हुई? परमात्मा की सर्वव्यापकता का आभास और उस में समर्पण भी साकारता ही है| सृष्टि निरंतर परिवर्तनशील है| विचार और चेतना भी परिवर्तित होती रहती है| अतः जो भी साकार है वह भी परिवर्तनशील है|
अतः कुछ ना कुछ या किसी ना किसी रूप में परमात्मा की साकारता की भी परिकल्पना करनी ही होगी और उस का नित्य निरंतर संग भी करना होगा|
मेरे विचार से यही 'सत्संग' है|
जो भी इससे परे ले जाए वह चाहे कोई व्यक्ति हो या कोई विचार, उसका संग ही कुसंग है जो सर्वदा त्याज्य है|
अब मैं मेरी व्यक्तिगत बात करूँगा जिसमें मेरी चिंतनधारा को व्यक्त करने का प्रयास है| यह कोई अहंकार की यात्रा नहीं है| इसका कोई उद्देष्य नहीं है|
जैसे नदी बहती है, फूल खिल कर अपनी सुगंध फैलाते हैं व प्रकृति अपना कार्य करती है --- उसका कोई उद्देष्य नहीं है| यह उसका स्वभाव है| वैसे ही प्रेम मेरा स्वभाव है जो व्यक्त हुए बिना नहीं रह सकता| मेरे लिए प्रभु के प्रेम में मग्न रहना ही 'सत्संग' है| इससे परे और कुछ भी मेरे लिए नहीं है|
मैं उन सब को नमन करता हूँ जो भगवान को प्रेम करते है| मैं उन के चरणों का सेवक मात्र हूँ, उस से अधिक कुछ भी नहीं|
परमात्म रूप में व्यक्त आप सब को मेरा प्रणाम| ॐ ॐ ॐ ||
२२ फरवरी २०१४

प्रभु से प्रेम कैसे करें ?

 प्रभु से प्रेम कैसे करें ?

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इस प्रश्न का उत्तर मेरी तो सीमित तुच्छ बुद्धि से परे है| मुझे तो लगता है कि प्रेम एक स्थिति है, कोई क्रिया नहीं| यह हो जाता है, किया नहीं जाता| क्या यह किया जा सकता है? यदि हाँ तो कैसे? कृपया मुझे यह बताएँ|
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को माध्यम बना कर सारे संसार को कहा है कि "मद्भक्तः" अर्थात् जो मुझे प्रेम करता है वह मेरा ही स्वरूप होगा। भगवान् ने असीम प्रेम को ही मोक्ष का साधन बतलाया है| पर वह प्रेम क्या है? यही जानना चाहता हूँ| भक्त बनें तो कैसे बनें ?
दूसरा प्रश्न जो मैं पूछना चाहता हूँ वह यह कि भारत में और विश्व में भी अनेक समाज सुधारक हुए है, पर वे कभी आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर नहीं चल पाए| ऐसा क्यों ?
क्या ये दोनों मार्ग अलग है या आत्म-साक्षात्कार ही समाज सेवा है?
अभी अभी एक श्रद्धेय स्वामीजी के लेख का स्वाध्याय कर रहा था। उनके अनुसार इस संसार में जो "हेय-उपादेय" बुद्धि रखेगा वह "अहेय-अनुपादेय" ब्रह्मतत्त्व को कभी पा नहीं सकता। जो "अहेय-अनुपादेय" परमार्थतत्त्व को पकड़ना चाहता है वह "हेय-उपादेय" दृष्टि कर नहीं सकता।
उनकी बात मुझे सही लग रही है| आध्यात्मिक व्यक्ति किसी की निंदा, आलोचना या शिकायत नहीं करते, इसका औचित्य समझने में मुझे कुछ और समय लगेगा|
पर प्रभु के प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति ही इस सृष्टि की सबसे बड़ी सेवा है यह बात समझ में तो आती है पर यह कैसे हो, यह समझ से परे है|
हमारे लिए तो उन का प्रेम ही सब कुछ है| उन में लीन होकर रहना ही हमारा तीर्थ है, वे ही हमारे एकमात्र सम्बन्धी हैं, वे ही हमारे एकमात्र "सखा" मित्र हैं, और उन में तन्मयता ही हमारा जीवन है| वे हमारे इतने समीप हैं की हम उनका बोध ही नहीं कर पाते|
उन से हमारी एकमात्र प्रार्थना है कि वे हमारे प्रेम को अपनी पूर्णता दें| उन की और आप सब की जय हो|
कृपा शंकर
२२ फरवरी २०१४

भगवान नटराज का नृत्य ---

 भगवान नटराज का नृत्य ---

यह अनंत ऊर्जा-खंडों का प्रवाह, और उन से परमाणुओं का सृजन और विसर्जन, -- जिन से उत्पन्न हुई यह समस्त सृष्टि -- भगवान नटराज का नृत्य है|

मूल रूप से किसी भी पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं होता, सब कुछ ऊर्जा है| उस ऊर्जा के पीछे भी एक विचार है, और उस विचार के पीछे एक परम चेतना है| वह परम चेतना और उससे भी परे जो है, वह परमशिव है, जिसके संकल्प से ऊर्जा और प्राणशक्ति का प्राकट्य हुआ| ऊर्जा से भौतिक सृष्टि निर्मित हुई और प्राणशक्ति ने सभी जीवों में प्राणों का संचार किया| और भी अनेक आयामों में अनेक प्रकार की सृष्टियाँ हैं, जिनका बोध हमें नहीं है|
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मनुष्य की अति अल्प और सीमित बुद्धि द्वारा परमात्मा अचिन्त्य और अगम्य है| लेकिन जो परमात्मा में निरंतर विचरण करते हैं, उनके लिए परमात्मा बोधगम्य है|
ॐ तत्सत् !!
२२ फरवरी २०२१

Saturday, 21 February 2026

तृतीय विश्व युद्ध की आहट हो रही है। चाहे सारा ब्रह्मांड टूटकर बिखर जाए, भय की कोई बात नहीं है ---

 तृतीय विश्व युद्ध की आहट हो रही है। चाहे सारा ब्रह्मांड टूटकर बिखर जाए, भय की कोई बात नहीं है। कुछ भी हो सकता है, घबराएँ नहीं। भगवान सदा हमारे साथ हैं। हम अपने धर्म पर अडिग रहें। थोड़े-बहुत धर्म का पालन भी हमारी रक्षा करेगा। भगवान कहते हैं --

"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥२:४०॥"
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अति भयावह वन की घोर अंधकारमय निशा में जब सिंहनी भयानक गर्जना करती है तब सारा वन कांप उठता है। उस डरावने वातावरण में विकराल सिंहनी के समीप खड़ा सिंह-शावक क्या भयभीत होता है? यहाँ जगन्माता स्वयं प्रत्यक्ष हमारे समक्ष खड़ी हैं। उनको अपने हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम दें। हमारी रक्षा होगी।
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"क्या हार में क्या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं
तिल-तिल मिटूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं
चाहे हृदय को ताप दो चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं"
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ फरवरी २०२२

संसार में बुराई की भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भलाई की ---

 संसार में बुराई की भी उतनी ही आवश्यकता है, जितनी भलाई की --

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यदि संसार में सारे प्राणी सज्जन हो जाएँ, या सभी दुर्जन हो जाएँ, तो यह सृष्टि तत्क्षण नष्ट हो जायेगी| संसार में बुराई है इसीलिए अच्छाई भी है| संसार में दुर्जन हैं इसीलिए सज्जन भी हैं जो अच्छे कार्य करते हैं, अन्यथा कोई भी नहीं करेगा|
जो विवेकी हैं वे स्थिर बुद्धि के होते हैं, एक बार जो कार्य आरम्भ करते हैं उसे पूरा कर के ही छोड़ते हैं| जो हमारा उपकार करते हैं, उनके प्रति हमें कृतज्ञ रहना चाहिए| कृतघ्नता बहुत बड़ा पाप है| हमारा व्यवहार सदा मधुर हो यह हमारे चरित्र की शोभा है| सत्य भी कहें तो ऐसे कहें जो दूसरों को प्रिय लगे| किसी के पीछे से उसके बारे में कोई बात नहीं करनी चाहिए| इससे दुर्भावना और शत्रुता फैलती है|
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सबसे बड़ा गुण है ... हमारे हृदय में परमात्मा की चेतना निरंतर बनी रहे| हृदय में परमात्मा होंगे तो सभी कार्य अच्छे ही होंगे|
हरिः ॐ तत् ॐ सत्॥ ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
२१ फरवरी २०१७

Friday, 20 February 2026

कामोत्तेजना से बचने का उपाय :-----

 कामोत्तेजना से बचने का उपाय :-----

युवा साधकों के समक्ष सबसे बड़ी बाधा है ... कामोत्तेजना | यह एक सत्य है जिससे बचने के उपाय भी मनीषियों ने बताए हैं| विपरीत लिंग के व्यक्ति की उपस्थिति में युवा साधक कामोत्तेजित होकर एक उलझन में पड़ जाता है| जब ऐसी स्थिति आ जाये तो घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है|
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आप मेरुदंड सीधा रख कर बड़ी शांति से उड्डियान बन्ध करें यानि फेफड़ों से बलपूर्वक सारी हवा बाहर निकाल कर पेट को अन्दर सिकोड़ लें और ऐसा भाव करें कि जननांगों में एकत्र समस्त ऊर्जा बापस मेरुदंड में जा कर नाभि की ओर उठ रही है| जब साँस लेना आवश्यक हो जाये तो साँस लें और बार बार उड्डियान बन्ध करते रहें| ऐसा तब तक करते रहें जब तक कामोत्तेजना शांत नहीं हो जाए| यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि मनुष्य की नाभि में एक ऐसी शक्ति है जो जननांगों से लौटती हुई ऊर्जा को ह्रदय की ओर प्रेषित कर देती है| यही ऊर्जा एक दिव्य प्रेम और भक्ति में परावर्तित हो जाती है|
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साधक को दिन में तीन-चार बार खाली पेट तीनों बन्ध (मूलबन्ध, उड्डियानबन्ध और जलंधरबन्ध) एक साथ लगाकर अग्निसार क्रिया का अभ्यास करना चाहिए| उपरोक्त अभ्यास आपके ब्रह्मचर्य में तो सहायक होगा ही, आपकी ध्यान साधना और कुंडलिनी जागरण में भी सहायक होगा| कुण्डलिनी के बारे तरह तरह के उलटे सीधे लेख लिखकर अनेक भ्रांतियां फैलाई गयी हैं| कुण्डलिनी शक्ति आपकी प्राण ऊर्जा का ही एक घनीभूत रूप है| जिस ऊर्जा का आपकी बहिर्मुखी इन्द्रियों द्वारा निरंतर क्षय हो रहा है वही ऊर्जा ध्यान साधना में जब आपकी चेतना अंतर्मुखी हो जाती है तब मूलाधार चक्र में प्रकट हो कर ऊर्ध्वमुखी हो जाती है| यही कुण्डलिनी शक्ति है| इसका जागरण ही वीर्य का ऊर्ध्वगमन है| इसका आभास अजपा-जप के साधकों को भी शीघ्र हो जाता है|
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साधक को मांस, मछली, अंडा, मदिरा और गरिष्ट भोजन के आहार का पूर्ण त्याग करना होगा| किसी भी परिस्थिति में कुसंग का पूर्ण त्याग करना होगा| सत्साहित्य और सत्संग के बारे में जितना लिखा जाये उतना ही कम है| उपरोक्त साधना आपको न सिर्फ कामोत्तेजना से मुक्ति दिलाएगी बल्कि जीवन में तनाव को भी कम करेगी| याद रखें कि ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है जो देवताओं को भी दुर्लभ है|
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धन्यवाद ! आप सब में भगवान नारायण को नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
झुंझुनूं (राजस्थान)
February 20, 2013 at 7:33 am.
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पुनश्चः : तीनों बंध (मूल, उड्डियान और जलंधर) और अग्निसार क्रिया, किसी हठयोग शिक्षक से सीखिए| याद रखें कि ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है जो देवताओं को भी दुर्लभ है|

शीघ्र ही आने वाले त्योहार महाशिवरात्रि व होली की शुभ कामनायें .....

 शीघ्र ही आने वाले त्योहार महाशिवरात्रि व होली की शुभ कामनायें .....

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आध्यात्मिक साधना और मंत्र सिद्धि के लिए चार रात्रियों का बड़ा महत्त्व है| ये हैं .... (१) कालरात्रि (दीपावली), (२) महारात्रि (महाशिवरात्रि), (३) मोहरात्रि (जन्माष्टमी). और (४) दारुण रात्रि (होली)| इन रात्रियों को किया गया ध्यान, जप-तप, भजन ... कई गुणा अधिक फलदायी होता है| इस अवसर का लाभ अवश्य उठाना चाहिए| भौतिक देह की चेतना से ऊपर उठने की साधना तो नित्य ही अवश्य करनी चाहिए| आत्म-विस्मृति सब दुःखों का कारण है| इन रात्रियों को अपने आत्म-स्वरुप यानि सर्वव्यापी परमात्मा का ध्यान यथासंभव अधिकाधिक करें| इन रात्रियों में सुषुम्ना नाड़ी में प्राण-प्रवाह अति प्रबल रहता है अतः निष्ठा और भक्ति से की गई साधना निश्चित रूप से सफल होती है| इस सुअवसर का सदुपयोग करें और समय इधर उधर नष्ट करने की बजाय आत्मज्ञान ही नहीं बल्कि धर्म और राष्ट्र के अभ्युदय के लिए भी साधना करें| धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए एक विराट आध्यात्मिक ब्रह्मशक्ति के जागरण की हमें आवश्यकता है| यह कार्य हमें ही करना पड़ेगा| अन्य कोई विकल्प नहीं है|
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इस अवसर पर एक बार गीता के आत्मसंयमयोग का कुछ स्वाध्याय कर लेते हैं| भगवान कहते हैं ....
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः| यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते||६:२२||
भावार्थ : परमात्मा को प्राप्त करके वह योग में स्थित मनुष्य परम आनन्द को प्राप्त होकर इससे अधिक अन्य कोई सुख नहीं मानता हुआ भारी से भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है।
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तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्| स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा||६:२३||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये कि दृड़-विश्वास के साथ योग का अभ्यास करते हुए सभी सांसारिक संसर्ग से उत्पन्न दुखों से बिना विचलित हुए योग समाधि में स्थित रहकर कार्य करे।
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सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः| मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ||६:२४||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये मन से उत्पन्न होने वाली सभी सांसारिक इच्छाओं को पूर्ण-रूप से त्याग कर और मन द्वारा इन्द्रियों के समूह को सभी ओर से वश में करे।
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शनैः शनैरुपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया| आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ||६:२५||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये क्रमश: चलकर बुद्धि द्वारा विश्वास-पूर्वक अभ्यास करता हुआ मन को आत्मा में स्थित करके, परमात्मा के चिन्तन के अलावा अन्य किसी वस्तु का चिन्तन न करे।
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यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ | ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ||६:२६||
भावार्थ : मनुष्य को चाहिये स्वभाव से स्थिर न रहने वाला और सदा चंचल रहने वाला यह मन जहाँ-जहाँ भी प्रकृति में जाये, वहाँ-वहाँ से खींचकर अपनी आत्मा में ही स्थिर करे।
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प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ | उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌ ||६:२७||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य का मन जब परमात्मा में एक ही भाव में स्थिर रहता है और जिसकी रज-गुण से उत्पन्न होने वाली कामनायें भली प्रकार से शांत हो चुकी हैं, ऎसा योगी सभी पाप-कर्मों से मुक्त होकर परम-आनन्द को प्राप्त करता है।
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः| सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते||६:२८||
भावार्थ : इस प्रकार योग में स्थित मनुष्य निरन्तर योग अभ्यास द्वारा सभी प्रकार के पापों से मुक्त् होकर सुख-पूर्वक परब्रह्म से एक ही भाव में स्थिर रहकर दिव्य प्रेम स्वरूप परम-आनंद को प्राप्त करता है।
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सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि| ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः||६:२९||
भावार्थ : योग में स्थित मनुष्य सभी प्राणीयों मे एक ही आत्मा का प्रसार देखता है और सभी प्राणीयों को उस एक ही परमात्मा में स्थित देखता है, ऎसा योगी सभी को एक समान भाव से देखने वाला होता है।
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यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति| तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति||६:३०||
भावार्थ : जो मनुष्य सभी प्राणीयों में मुझ परमात्मा को ही देखता है और सभी प्राणीयों को मुझ परमात्मा में ही देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता हूँ और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता है।
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सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः| सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ||६:३१||
भावार्थ : योग में स्थित जो मनुष्य सभी प्राणीयों के हृदय में मुझको स्थित देखता है और भक्ति-भाव में स्थित होकर मेरा ही स्मरण करता है, वह योगी सभी प्रकार से सदैव मुझमें ही स्थित रहता है |
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आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन| सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः||६:३२||
भावार्थ : हे अर्जुन! योग में स्थित जो मनुष्य अपने ही समान सभी प्राणीयों को देखता है, सभी प्राणीयों के सुख और दुःख को भी एक समान रूप से देखता है, उसी को परम पूर्ण-योगी समझना चाहिये।
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आप सब को नमन और महाशिवरात्रि व होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
ॐ तत्सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० मार्च २०२०

यह सृष्टि भगवान की है, उनकी प्रकृति अपने नियमों के अनुसार इस संसार को चला रही है ---

 यह सृष्टि भगवान की है, उनकी प्रकृति अपने नियमों के अनुसार इस संसार को चला रही है| प्रकृति के नियमों के अनुसार ही यह सृष्टि चलती रहेगी, उन नियमों को न जानना हमारी अज्ञानता है| हमारा कर्मयोग है कि जहाँ भी भगवान ने हमें रखा है, वहाँ हम निमित्त मात्र होकर अपने विवेक के प्रकाश में अपना सर्वश्रेष्ठ करते रहें|

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हम अपने पूर्व जन्मों के कर्मफल भोगने के लिए ही इस मनुष्य देह में जन्म लेते हैं, साथ-साथ नए कर्मों को करने का अवसर भी इस मनुष्य देह से ही प्राप्त होता है| प्रारब्ध कर्मफल तो भोगने ही पड़ते हैं, संचित कर्मों से छुटकारा पाने का उपाय भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गीता में बताया गया है| जो भी हमारे प्रारब्ध में है, वह तो होकर ही रहेगा| लगभग ४० वर्ष पूर्व सन १९८१ ई. में ही मैं इस सांसारिक जीवन से विरक्त होकर सन्यास लेना चाहता था, पर उसका योग-संयोग इस जन्म में नहीं था| महामाया ने भटकाये रखा, और प्रारब्ध कर्मों का भोग भोगने के लिए विवश कर दिया| महामाया के समक्ष हम सब विवश हैं --
"ज्ञानिनामपी चेतांसी देवी भगवती ही सा| बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयष्छति||"
मैं जब अधिक ही अपनी पर उतर आया तो भगवती ने स्पष्ट उत्तर मुझे दे दिया कि एक पतंग की तरह तुम उड़ते ही उड़ते रहना चाहते हो, पर यह मत भूलो कि कर्मों की डोर से बंधे हुये हो| यह कर्मों की डोर तुम्हें खींच कर बापस इस संसार में ले आएगी| अतः प्रारब्ध कर्म तो तुम्हें भुगतने ही पड़ेंगे| कोई उपाय नहीं है| साथ-साथ यह निर्देश भी दे दिया कि यदि हो सके तो घर में ही एक अलग कोने की व्यवस्था कर लो जहाँ कम से कम व्यवधान हो, और परमशिव का ध्यान करो|
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गीता में भगवान हमें निमित्त मात्र होकर रहने को कहते हैं ---
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व, जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव, निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११:३३||"
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मेरा अनुभव है कि भगवान ही भक्ति हैं, भगवान ही भक्त हैं, भगवान ही क्रिया और कर्ता हैं| जहां साधक होने का घमंड जन्म लेता है, उसी क्षण पतन होने लगता है| भूल कर भी कभी साधक, उपासक, भक्त या कर्ता होने का मिथ्या भाव मन में नहीं आना चाहिए| मैं यह बात अपनी निज अनुभूतियों से लिख रहा हूँ, कोई मानसिक कल्पना नहीं है| पतन का दूसरा द्वार हमारा लोभ है| एक बार ध्यान करते करते एक भाव-जगत में चला गया, जहाँ कोई अदृश्य शक्ति मुझसे पूछ रही थी कि तुम्हें क्या चाहिए| स्वभाविक रूप से मेरा उत्तर था कि आपके प्रेम के अतिरिक्त मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| मुझे उत्तर मिला कि -- "प्रेम का भी क्या करोगे? मैं स्वयं सदा तुम्हारे समक्ष हूँ, मेरे से अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है|" तत्क्षण मुझे मेरी अभीप्सा (तड़प, अतृप्त प्यास) का उत्तर मिल गया| एक असीम वेदना शांत हुई| अगले ही क्षण मैं फिर बापस सामान्य चेतना में लौट आया| वास्तव में हमें परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं चाहिए| वे हैं तो सब कुछ हैं, उनके बिना कुछ भी नहीं है|
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वे निरंतर हमारे हृदय में हैं| वे निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं| वे सदा हमारे हृदय में हैं| भगवान कहते हैं ---
"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति| भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया||१८:६||"
" उमा दारु जोषित की नाईं| सबहि नचावत रामु गोसाईं||" (श्रीरामचरितमानस)
हम सब कठपुतलियाँ हैं भगवान के हाथों में| कठपुतली में थोड़ा अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार) डाल दिया गया है, जो हमें दुःखी कर रहा है|
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अब और कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा है| अंत में थोड़ा अति-अति संक्षेप में प्राणतत्व और परमशिव का अपना अनुभव भी साझा कर लेता हूँ| परमात्मा का मातृ रूप जिसे हम अपनी श्रद्धानुसार कुछ भी नाम दें, वे भगवती आदिशक्ति -- प्राण-तत्व के रूप में हमारी सूक्ष्म देह के मेरुदंड की सुषुम्ना नाड़ी में सभी चक्रों को भेदते हुए विचरण कर रही हैं| जब तक उनका स्पंदन है, तभी तक हमारा जीवन है| वे ही साधक हैं, और वे ही कर्ता हैं| जिनका वे ध्यान कर रही हैं, उनको मैं मेरी श्रद्धा से परमशिव कहता हूँ, आप कुछ भी कहें| परमशिव एक अनुभूति है जो गहरे ध्यान में इस भौतिक देह के बाहर की अनंतता से भी परे होती है| वह अवर्णणीय है|
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सारी साधना वे जगन्माता, भगवती, आदिशक्ति ही स्वयं कर के परमशिव को अर्पित कर रही हैं| हम तो साक्षीमात्र हैं उस यजमान की तरह जिस की उपस्थिति इस यज्ञ में आवश्यक है| और कुछ भी नहीं| वे ही गुरु रूप में प्रकट हुईं और मार्गदर्शन किया| वे ही इस जीवात्मा का विलय परमशिव में एक न एक दिन कर ही देंगी| और कुछ भी नहीं चाहिए| उन परमशिव और जगन्माता को नमन !!
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च |
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||११:३९||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||११:४०||"
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० फरवरी २०२१

Thursday, 19 February 2026

ॐ तत् सत् ....

 ॐ तत् सत् ....

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भगवान से प्रार्थना करते हुए मैं आशा करता हूँ कि जिस विषय पर लिखने की मुझे अन्तःप्रेरणा मिली है, उसे व्यक्त कर पाऊँगा| यह मेरी एक अनुभूति है कि आत्म-तत्व, परमात्म-तत्व और गुरु-तत्व ... सब एक ही हैं, एक विशिष्ट स्तर पर इनमें कोई भेद नहीं है| आरम्भ में ये सब पृथक पृथक लगते हैं, पर जैसे जैसे ध्यान साधना की गहराई बढ़ती जाती है, इनमें कोई भेद नहीं रहता| सामान्य चेतना में मेरे गुरु मुझसे पृथक हैं. पर ध्यान की गहराई में वे मेरे साथ एक हैं| ऐसे ही सामान्य चेतना में भगवान मुझसे अलग हैं, पर ध्यान की गहराई में वे मेरे साथ एक हैं| कहीं पर भी कोई भेद नहीं रहता|
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अपनी बात को आधार देने के लिए मैं गीता का सहारा लेना चाहता हूँ| गीता में परमात्मा को "ॐ तत् सत्" इन तीन नामों से निर्देशित किया गया है|
"तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः| ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा||१७:२३||
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्| यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्||८:१३||"
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः| प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌||१७:२४||"
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः| दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः||१७:२५||
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते| प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते||१७:२६||
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते| कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते||१७:२७||
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌| असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह||१७:२८||
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"ॐ" "तत्" और "सत्" एक ही हैं पर इनकी अभिव्यक्ति पृथक पृथक है| हिन्दुओं के "ॐ तत् सत्" की नकल कर के ही ईसाईयत में "Father" "Son" and the "Holy Ghost" शब्दों का प्रयोग किया गया है| ये तीनों एक हैं पर इनकी भी अभिव्यक्ति अलग अलग हैं|
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संभवतः मैं अपने भावों को व्यक्त करने में कुछ कुछ अल्प मात्रा में सफल रहा हूँ| परमात्मा स्वयं ही विभिन्न आत्माओं के रूप में लीला करते हैं| स्वयं ही अपनी लीला में अज्ञान में गिरते हैं, और स्वयं ही गुरु रूप में स्वयं को ही मुक्त करने आते है, और स्वयं ही मुक्त होते हैं| गुरु भी वे ही हैं और शिष्य भी वे ही हैं| उनके अतिरिक्त अन्य किसी का कोई अस्तित्व नहीं है|
और भी स्पष्ट शब्दों में "आत्मा नित्यमुक्त है, सारे बंधन एक भ्रम हैं|"
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ फरवरी २०१९

Tuesday, 17 February 2026

भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है। .

 भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है।

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अनेक महान आत्माएँ भारत में जन्म लेना चाहती हैं, लेकिन उन्हें सही माता-पिता नहीं मिलते, जिनके यहाँ वे गर्भस्थ हो सकें। युवाओं को इस योग्य होना पड़ेगा कि वे महान आत्माओं को जन्म दे सकें। अनेक महान आत्माएँ भारत में जन्म लेंगी और भारत का उद्धार करेंगी। उसके लिए यह सर्वोपरि आवश्यक है कि हमारा जीवन परमात्मा को पूर्णतः समर्पित हो। इस विषय पर मैं पहले भी अनेक बार लिख चुका हूँ। इसी क्षण से हम परमात्मा के साथ एक हों।
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परमात्मा हैं, इसी समय, हर समय, यहीं पर और सर्वत्र हैं। हम निःस्पृह, वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर बने रहें। हम उनके साथ एक हैं। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०२५

अजपा जप, हंसयोग, हँसवती ऋक ---

 (जिनकी आस्था हो वे ही मेरे लेखों को पढ़ें, अन्य सब इन्हें गल्प मानकर इन की उपेक्षा कर दें, व अपने अमूल्य समय को नष्ट न करें)

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अजपा-जप :--- यह ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान है। वेदों में इसका नाम हंसवती ऋक है, योग-शास्त्रों में यह हंसयोग है, और सामान्य बोलचाल की भाषा में अजपा-जप कहलाता है। हंस नाम परमात्मा का है। कम से कम शब्दों का प्रयोग यहाँ इस लेख में मैं कर रहा हूँ।
प्रातःकाल उठते ही लघुशंकादि से निवृत होकर, रात्रि में शयन से पूर्व, और दिन में जब भी समय मिले, ध्यान के आसन पर सीधे बैठ जाएँ, मेरूदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में से अनंत की ओर, व मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें। भ्रूमध्य में उन्नत साधकों को एक ब्रह्मज्योति यानि ज्योतिर्मय ब्रह्म के दर्शन होंगे। जिन्हें ज्योति के दर्शन नहीं होते, वे आभास करें कि वहाँ एक परम उज्ज्वल श्वेत ज्योति है। उस ज्योति का विस्तार सारे ब्रह्मांड में कर दें। सारी सृष्टि उस ज्योति में समाहित है, और वह ज्योति सारी सृष्टि में है। वह शाश्वत ज्योति आप स्वयं हैं, यह नश्वर भौतिक देह नहीं।
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अपनी सर्वव्यापकता का ध्यान कीजिये। आप यह शरीर नहीं, वह परम ज्योति हैं। सारा ब्रह्मांड आपके साथ सांसें ले रहा है। जब सांस अंदर जाती है तब मानसिक रूप से सो SSSSSSS का जाप कीजिये। जाव सांस बाहर जाती है तब हं SSSSS का जाप कीजिये।
यह जप आप नहीं, सारी सृष्टि और स्वयं परमात्मा कर रहे हैं। इस साधना का विस्तार ही शिवयोग और विहंगमयोग है। यह साधना ही विस्तृत होकर नादानुसंधान बन जाती है। क्रियायोग में प्रवेश से पूर्व भी इसका अभ्यास अनिवार्य है, नहीं तो कुछ भी समझ में नहीं आयेगा। पुनश्च: कहता हूँ कि "हंस" नाम परमात्मा का है।
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यह लेख केवल परिचयात्मक है। इस अजपा-जप साधना का अभ्यास अन्य कुछ साधनाओं के साथ समर्पित भाव से मैं तो सन १९७९ ई. से कर रहा हूँ। इसका वर्णन अनेक ग्रन्थों में है जिनका स्वाध्याय मैंने किया है। , लेकिन सबसे अधिक स्पष्ट "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवें खंड के मध्य में है। वहाँ इसे अति विस्तार से समझाया गया है। गूगल पर ढूँढने से यह पुस्तक मिल जाएगी। यह खंड मैंने गत वर्ष ही पढ़ा था। फिर भी किसी अनुभवी ब्रहमनिष्ठ आचार्य से मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करें। यह साधना ब्रह्मांड के द्वार साधक के लिए खोल देती है। इस लेख में जो लिखा है वह केवल परिचय मात्र है।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०२५
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पुनश्च: -- कुछ गुरु-परम्पराओं में हंसबीज "सोहं" के स्थान पर "हंसः" का प्रयोग होता है। दोनों का फल एक ही है। अङ्ग्रेज़ी में इसका अनुवाद होगा -- "I am He"। यह साधना आध्यात्म में प्रवेश करवाती है, और सभी उन्नत साधनाओं का आधार है। कम से कम शब्दों में जो लिखा जा सकता है वह मैंने यहाँ लिखा है। इससे अधिक जानने के लिए ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होगा, या किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा से उपदेश लेने होंगे। ॐ तत्सत् !!

हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --

  हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --

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भगवान भुवन भास्कर जब अपने पथ पर अग्रसर होते हैं तब मार्ग में कहीं भी कैसे भी तिमिर का कोई अवशेष मात्र भी नहीं मिलता| हम भी ब्रह्मतेज से युक्त होकर इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे मार्ग में हमारे समक्ष भी कहीं कोई अन्धकार और असत्य की शक्ति टिक ही न सके| हमारे जीवन का केंद्र बिंदु परमात्मा बने, और परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हम में हो|
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जिन के हृदय में इन्द्रीय सुखों की कामना भरी पडी है वे आध्यात्म के क्षेत्र में न आयें, उन्हें लाभ की बजाय हानि ही होगी| साधना में विक्षेप ही सब से बड़ी बाधा है| विक्षेप उन्हीं को होता है जिनके विचार वासनात्मक होते हैं| जिनके हृदय में वासनात्मक विचार भरे पड़े हैं उन्हें किसी भी तरह की ध्यान साधना नहीं करनी चाहिए अन्यथा लाभ की बजाय हानि ही होगी| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| जिन लोगों का मन वासनाओं से भरा पडा है वे बाहर ही रहें, उन्हें भीतर आने की आवश्यकता नहीं है|
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ॐ तत् सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०१७