Thursday, 19 February 2026

ॐ तत् सत् ....

 ॐ तत् सत् ....

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भगवान से प्रार्थना करते हुए मैं आशा करता हूँ कि जिस विषय पर लिखने की मुझे अन्तःप्रेरणा मिली है, उसे व्यक्त कर पाऊँगा| यह मेरी एक अनुभूति है कि आत्म-तत्व, परमात्म-तत्व और गुरु-तत्व ... सब एक ही हैं, एक विशिष्ट स्तर पर इनमें कोई भेद नहीं है| आरम्भ में ये सब पृथक पृथक लगते हैं, पर जैसे जैसे ध्यान साधना की गहराई बढ़ती जाती है, इनमें कोई भेद नहीं रहता| सामान्य चेतना में मेरे गुरु मुझसे पृथक हैं. पर ध्यान की गहराई में वे मेरे साथ एक हैं| ऐसे ही सामान्य चेतना में भगवान मुझसे अलग हैं, पर ध्यान की गहराई में वे मेरे साथ एक हैं| कहीं पर भी कोई भेद नहीं रहता|
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अपनी बात को आधार देने के लिए मैं गीता का सहारा लेना चाहता हूँ| गीता में परमात्मा को "ॐ तत् सत्" इन तीन नामों से निर्देशित किया गया है|
"तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः| ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा||१७:२३||
"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्| यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्||८:१३||"
"तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः| प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्‌||१७:२४||"
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः| दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः||१७:२५||
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते| प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते||१७:२६||
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते| कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते||१७:२७||
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌| असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह||१७:२८||
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"ॐ" "तत्" और "सत्" एक ही हैं पर इनकी अभिव्यक्ति पृथक पृथक है| हिन्दुओं के "ॐ तत् सत्" की नकल कर के ही ईसाईयत में "Father" "Son" and the "Holy Ghost" शब्दों का प्रयोग किया गया है| ये तीनों एक हैं पर इनकी भी अभिव्यक्ति अलग अलग हैं|
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संभवतः मैं अपने भावों को व्यक्त करने में कुछ कुछ अल्प मात्रा में सफल रहा हूँ| परमात्मा स्वयं ही विभिन्न आत्माओं के रूप में लीला करते हैं| स्वयं ही अपनी लीला में अज्ञान में गिरते हैं, और स्वयं ही गुरु रूप में स्वयं को ही मुक्त करने आते है, और स्वयं ही मुक्त होते हैं| गुरु भी वे ही हैं और शिष्य भी वे ही हैं| उनके अतिरिक्त अन्य किसी का कोई अस्तित्व नहीं है|
और भी स्पष्ट शब्दों में "आत्मा नित्यमुक्त है, सारे बंधन एक भ्रम हैं|"
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ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१९ फरवरी २०१९

Tuesday, 17 February 2026

भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है। .

 भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है।

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अनेक महान आत्माएँ भारत में जन्म लेना चाहती हैं, लेकिन उन्हें सही माता-पिता नहीं मिलते, जिनके यहाँ वे गर्भस्थ हो सकें। युवाओं को इस योग्य होना पड़ेगा कि वे महान आत्माओं को जन्म दे सकें। अनेक महान आत्माएँ भारत में जन्म लेंगी और भारत का उद्धार करेंगी। उसके लिए यह सर्वोपरि आवश्यक है कि हमारा जीवन परमात्मा को पूर्णतः समर्पित हो। इस विषय पर मैं पहले भी अनेक बार लिख चुका हूँ। इसी क्षण से हम परमात्मा के साथ एक हों।
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परमात्मा हैं, इसी समय, हर समय, यहीं पर और सर्वत्र हैं। हम निःस्पृह, वीतराग व स्थितप्रज्ञ होकर ब्राह्मी-स्थिति में निरंतर बने रहें। हम उनके साथ एक हैं। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०२५

अजपा जप, हंसयोग, हँसवती ऋक ---

 (जिनकी आस्था हो वे ही मेरे लेखों को पढ़ें, अन्य सब इन्हें गल्प मानकर इन की उपेक्षा कर दें, व अपने अमूल्य समय को नष्ट न करें)

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अजपा-जप :--- यह ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान है। वेदों में इसका नाम हंसवती ऋक है, योग-शास्त्रों में यह हंसयोग है, और सामान्य बोलचाल की भाषा में अजपा-जप कहलाता है। हंस नाम परमात्मा का है। कम से कम शब्दों का प्रयोग यहाँ इस लेख में मैं कर रहा हूँ।
प्रातःकाल उठते ही लघुशंकादि से निवृत होकर, रात्रि में शयन से पूर्व, और दिन में जब भी समय मिले, ध्यान के आसन पर सीधे बैठ जाएँ, मेरूदण्ड उन्नत, ठुड्डी भूमि के समानान्तर, दृष्टिपथ भ्रूमध्य में से अनंत की ओर, व मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें। भ्रूमध्य में उन्नत साधकों को एक ब्रह्मज्योति यानि ज्योतिर्मय ब्रह्म के दर्शन होंगे। जिन्हें ज्योति के दर्शन नहीं होते, वे आभास करें कि वहाँ एक परम उज्ज्वल श्वेत ज्योति है। उस ज्योति का विस्तार सारे ब्रह्मांड में कर दें। सारी सृष्टि उस ज्योति में समाहित है, और वह ज्योति सारी सृष्टि में है। वह शाश्वत ज्योति आप स्वयं हैं, यह नश्वर भौतिक देह नहीं।
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अपनी सर्वव्यापकता का ध्यान कीजिये। आप यह शरीर नहीं, वह परम ज्योति हैं। सारा ब्रह्मांड आपके साथ सांसें ले रहा है। जब सांस अंदर जाती है तब मानसिक रूप से सो SSSSSSS का जाप कीजिये। जाव सांस बाहर जाती है तब हं SSSSS का जाप कीजिये।
यह जप आप नहीं, सारी सृष्टि और स्वयं परमात्मा कर रहे हैं। इस साधना का विस्तार ही शिवयोग और विहंगमयोग है। यह साधना ही विस्तृत होकर नादानुसंधान बन जाती है। क्रियायोग में प्रवेश से पूर्व भी इसका अभ्यास अनिवार्य है, नहीं तो कुछ भी समझ में नहीं आयेगा। पुनश्च: कहता हूँ कि "हंस" नाम परमात्मा का है।
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यह लेख केवल परिचयात्मक है। इस अजपा-जप साधना का अभ्यास अन्य कुछ साधनाओं के साथ समर्पित भाव से मैं तो सन १९७९ ई. से कर रहा हूँ। इसका वर्णन अनेक ग्रन्थों में है जिनका स्वाध्याय मैंने किया है। , लेकिन सबसे अधिक स्पष्ट "तपोभूमि नर्मदा" नामक पुस्तक के पांचवें खंड के मध्य में है। वहाँ इसे अति विस्तार से समझाया गया है। गूगल पर ढूँढने से यह पुस्तक मिल जाएगी। यह खंड मैंने गत वर्ष ही पढ़ा था। फिर भी किसी अनुभवी ब्रहमनिष्ठ आचार्य से मार्गदर्शन अवश्य प्राप्त करें। यह साधना ब्रह्मांड के द्वार साधक के लिए खोल देती है। इस लेख में जो लिखा है वह केवल परिचय मात्र है।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०२५
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पुनश्च: -- कुछ गुरु-परम्पराओं में हंसबीज "सोहं" के स्थान पर "हंसः" का प्रयोग होता है। दोनों का फल एक ही है। अङ्ग्रेज़ी में इसका अनुवाद होगा -- "I am He"। यह साधना आध्यात्म में प्रवेश करवाती है, और सभी उन्नत साधनाओं का आधार है। कम से कम शब्दों में जो लिखा जा सकता है वह मैंने यहाँ लिखा है। इससे अधिक जानने के लिए ग्रन्थों का स्वाध्याय करना होगा, या किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा से उपदेश लेने होंगे। ॐ तत्सत् !!

हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --

  हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --

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भगवान भुवन भास्कर जब अपने पथ पर अग्रसर होते हैं तब मार्ग में कहीं भी कैसे भी तिमिर का कोई अवशेष मात्र भी नहीं मिलता| हम भी ब्रह्मतेज से युक्त होकर इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे मार्ग में हमारे समक्ष भी कहीं कोई अन्धकार और असत्य की शक्ति टिक ही न सके| हमारे जीवन का केंद्र बिंदु परमात्मा बने, और परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हम में हो|
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जिन के हृदय में इन्द्रीय सुखों की कामना भरी पडी है वे आध्यात्म के क्षेत्र में न आयें, उन्हें लाभ की बजाय हानि ही होगी| साधना में विक्षेप ही सब से बड़ी बाधा है| विक्षेप उन्हीं को होता है जिनके विचार वासनात्मक होते हैं| जिनके हृदय में वासनात्मक विचार भरे पड़े हैं उन्हें किसी भी तरह की ध्यान साधना नहीं करनी चाहिए अन्यथा लाभ की बजाय हानि ही होगी| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| जिन लोगों का मन वासनाओं से भरा पडा है वे बाहर ही रहें, उन्हें भीतर आने की आवश्यकता नहीं है|
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ॐ तत् सत्॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ ॐ ॐ॥
कृपा शंकर
१८ फरवरी २०१७

यह "मनुवाद" क्या है ? ---

 यह "मनुवाद" क्या है ? --- एक समय था जब साम्यवादी (मार्क्सवादी) लोग किसी को गाली देते तो उसको "प्रतिक्रियावादी", "पूंजीवादी", "फासिस्ट" और "बुर्जुआ" आदि शब्दों से विभूषित करते| ये उनकी बड़ी से बड़ी गालियाँ थीं| किसी की प्रशंसा करते तो उसको "प्रगतिवादी"और 'मानवतावादी" कहते|

फिर समय आया जब कोंग्रेसी लोग किसी को गाली देते तो उसको "साम्प्रदायिक" कहते| किसी की प्रशंसा में उनका सबसे बड़ा शब्द था ... "धर्मनिरपेक्ष"|
भारतीय जनसंघ (वर्तमान भाजपा) वाले जब साम्यवादियों को गाली देते तो "पंचमांगी" कहते, जो उनकी बड़ी से बड़ी गाली थी|
फिर एक शब्द चला ..... "समाजवादी" जिसको कभी कोई परिभाषित नहीं कर पाया| जहाँ तक मुझे याद है इस शब्द को लोकप्रिय डा.राममनोहर लोहिया ने किया था, फिर श्रीमती इंदिरा गाँधी को भी यह अत्यंत प्रिय था, जिन्होंने संविधान संशोधित कर भारत को समाजवादी धर्मनिरपेक्ष देश घोषित कर दिया| आजकल समाजवादी बोलते ही श्री मुलायम सिंह यादव की छवि सामने आती है| फिर और भी कई वाद चले जैसे "राष्ट्रवाद", "बहुजन समाजवाद" आदि|
पर आजकल एक नई गाली और एक नया वाद चला है और वह है ..... "मनुवाद"|
आजकल चाहे "बहुजन समाजवादी" हों या कांग्रेसी हों, किसी की भी बुराई करते हैं तो उसे "मनुवादी" कहते हैं|
मैं मनुस्मृति को पिछले पचास वर्षों से पढ़ता आया हूँ| उस पर लिखे अनेक विद्वानों के भाष्य भी पढ़े हैं| मनुस्मृति भारत में हज़ारों वर्षों तक एक संविधान की तरह रही है| मुझे तो उसमें कहीं कोई बुराई नहीं दिखी| वह तो सृष्टि के आदि से है| हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए अंग्रेजों ने उसमें कई बातें प्रक्षिप्त कर दी थीं| पर उन प्रक्षिप्त अंशों को निकाला जा रहा है| मनु महाराज तो एक क्षत्रिय राजा थे जिन्होंने एक नई सर्वमान्य व्यवस्था दी जो हज़ारों वर्षों से हैं| उसमें कहीं भी कोई जातिवाद या भेदभाव वाली बात नहीं है|
पता नहीं आजकल के इन तथाकथित राजनयिकों को मनुस्मृति का अध्ययन किये बिना ही उसमें क्या "जातिवाद" या "सम्प्रदायवाद" दिखाई दे रहा है जो किसी की निंदा करने के लिए "जातिवादी" "साम्प्रदायिक" और "मनुवादी" कहते हैं|
मंचस्थ विद्वतजनों से निवेदन है कि "मनुवाद" का अर्थ बताने की कृपा करें|
सादर धन्यवाद|
जय श्रीराम जय श्रीराम जय श्रीराम!
१८ फरवरी २०१६

ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं ---

ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं| किस तरह के रंग और ध्वनियाँ सुनती हैं इसका बर्णन यौगिक साहित्य में भरा पड़ा है| ये सब आनंददायक होते हैं| साधना में विक्षेप उन्ही साधकों को होता है जिनमें वासनात्मक विचार होते हैं| मेरा तो यह मानना है कि ध्यान उसी को करना चाहिए जिसमें ईश्वर के प्रति प्रेम भरा पडा हो और जो ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| सभी ध्यान साधकों के लिए एक अचूक प्रयोग बता रहा हूँ| पूर्ण प्रभुप्रेम के साथ इसे करने से निश्चित रूप से शीघ्रातिशीघ्र लाभ होगा| शौचादि से निवृत होकर सूर्यनमस्कार और महामुद्रा का अभ्यास कर पंद्रह से बीस बार अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें| फिर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर एक ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन या वज्रासन में बैठ जाएँ| गुरु और परमात्मा को नमन कर कुछ देर अजपा-जप का अभ्यास करें इससे मन शांत हो जायेगा| फिर श्वास-प्रश्वास के साथ निम्न बीज मन्त्रों का जाप प्रत्येक चक्र पर करें ----- मूलाधार पर -- "लं", स्वाधिष्ठान -- "वं", मणिपुर -- "रं", अनाहत -- "यं", विशुद्धि -- "हं", आज्ञा -- "ॐ"| जितनी देर तक कर सकें करें| अंत में आज्ञाचक्र पर ही "ॐ" के साथ रुक जाएँ| श्वास-प्रश्वास सामान्य चलने दें| तीन बार योनिमुद्रा का अभ्यास करें| योनिमुद्रा (ज्योतिमुद्रा) करते समय ओम के जाप के साथ आज्ञाचक्र पर तीब्रतम प्रहार करें| फिर जितना कर सकते हैं उतनी देर तक ॐ की ध्वनी को सुनते हुए ध्यान करें| ध्यान के पश्चत कुछ देर तक अपने आसन पर बैठे रहें| तुरंत न उठें| फिर गुरु और परमात्मा को नमन करते हुए सर्वस्व की मंगलकामना के साथ प्रार्थना करते हुए ही अपना आसन छोड़ें| यदि पूर्णप्रेम के साथ उपरोक्त साधना की जाये तो आमूलचूल आपका व्यक्तित्व सकारात्मक रूप से बदलना आरम्भ हो जाएगा| आपके भाव और विचार भी पवित्र हो जायेंगे| भगवन श्री कृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उनकी शरण लेने पर आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा| जय श्री कृष्ण ! ॐ तत्सत|

कृपा शंकर

१८ फरवरी २०१३

Monday, 16 February 2026

हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---

 हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---

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कर्ता भाव से मुक्त होकर, यदि मैं इस सम्पूर्ण सृष्टि को भी नष्ट कर दूँ, तो भी किसी भी प्रकार के पाप का मैं भागी नहीं हो सकता। भगवान कहते हैं --
"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१८:१७॥"
अर्थात् - जिस पुरुष में अहंकार का भाव नहीं है और बुद्धि किसी (गुण दोष) से लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न मरता है और न (पाप से) बँधता है॥
He who has no pride, and whose intellect is unalloyed by attachment, even though he kill these people, yet he does not kill them, and his act does not bind him.
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पुरुषोत्तम भगवान विष्णु या शिव का ध्यान करते करते जिस ज्योतिर्मय सूर्यमण्डल का आभास होता है उसे निरंतर अपनी चेतना में रखें। वह परमज्योति ही हमारा कवच है जिसने हमें हर समय घेर रखा है। उसकी उपस्थिति भगवान की उपस्थिति है, जो हर समय हमारे साथ हैं। उसे कभी न भूलें और जब भी अवसर मिले उसमें से निःसृत हो रही प्रणव की ध्वनि को सुनते रहें।
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सहस्त्रारचक्र से ऊपर अनंताकाश से भी परे एक सूर्यमंडल है जो ध्यान में दृष्टिगोचर होता है। हर समय उसे अपनी चेतना में रखें। अभ्यास करते करते वह प्रत्यक्ष हो जाएगा। सारी सृष्टि भगवान के आधीन है, वे सब नियमों से ऊपर हैं, यानि सारे नियमों के नियंता वे ही हैं। वे भूतकाल को भविष्यकाल, और भविष्यकाल को भूतकाल में भी बदल सकते हैं। हमें भी हर समय भक्ति यानि परमप्रेमपूर्वक भगवान को ही समर्पित होकर रहना चाहिए।
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संसार में हम भगवान को व्यक्त करते हैं, अतः उनके अतिरिक्त किसी अन्य के आधीन नहीं हैं। भगवान को ही समर्पित होकर रहें व उन्हें अपने माध्यम से सारा कार्य करने दें। किसी भी तरह की आकांक्षा यानि कामना का जन्म न हो। क्योंकि कामना ही कर्म-बंधन है। हर समय उनका स्मरण रखें, यह भगवान का ही आदेश है --
"तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥८:७॥"
इसलिए, तुम सब काल में मेरा निरन्तर स्मरण करो; और युद्ध करो मुझमें अर्पण किये मन, बुद्धि से युक्त हुए निःसन्देह तुम मुझे ही प्राप्त होओगे।।
Therefore meditate always on Me, and fight; if thy mind and thy reason be fixed on Me, to Me shalt thou surely come.
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जिधर भी हमारी दृष्टि जाए उधर भगवान ही दृष्टिगत हों । भगवान कहते हैं --
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता।।
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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और कुछ भी लिखने में असमर्थ हूँ। समस्त सृष्टि में व्यक्त हो रहे परमात्मा को नमन !!
ॐ तत्सत् !!
१७ फरवरी २०२३

महिषासुर और नरकासुर अपनी मौत खुद मरेंगे .......

भारत की बर्बादी और भारत के टुकड़े करने के लिए प्रयासरत लोग ही आज के महिषासुर और नरकासुर हैं| ये असत्य और अन्धकार की शक्तियाँ हैं|
ये लोग जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय दिल्ली में वर्ष २००९ से महिषासुर शहादत दिवस और गौमांस भोज यानि beef festival आयोजित कर रहे हैं|
हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में नरकासुर जयंती मना रहे है|
हैदराबाद के ही एक विश्वविद्यालय में असुर सप्ताह मनाया जा रहा है|
ये सारे विश्वविद्यालय भारत के करदाताओं के रुपयों से चल रहे हैं|
विधि की विडम्बना देखिये कि आतंकवादियों और अपराधियों की पूजा की जा रही है| लगता है वोट बैंक की राजनीति देश को खा जायेगी और धर्मनिरपेक्ष शक्तियाँ देश को अराजकता में धकेल देंगी|
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देश में चुन चुन कर राष्ट्रवादी लोगों की हत्याएं हो रही हैं| अकेले केरल राज्य में ही संघ के सैंकड़ों कार्यकर्ताओं की ह्त्या हो चुकी है जिसे भारत की मिशनरियों व वामपंथियों द्वारा संचालित मीडिया नहीं बताती| सारी मिडिया और राजनीति हिन्दू द्रोह पर आधारित है|
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पर यही वर्ष 2016 भविष्य का एक निर्णायक वर्ष होगा| जैसी अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ बन रही हैं वे एक भयानक उथल-पुथल और विनाश का संकेत दे रही हैं| देश में जो हो रहा है उस पर तो सबकी निगाह है पर बाकि विश्व भी एक आत्मघाती विनाश की ओर बढ़ रहा है|
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यह संसार हमारे विचारों से बना है| हमारे विचार ही घनीभूत होकर चारों ओर प्रकट हो रहे हैं| घृणा, ईर्ष्या-द्वेष, अहंकार और असत्य विनाशकारी परिणाम लायेंगे ही| एक अघोषित विश्वयुद्ध वैसे तो चल ही रहा है पर घोषित विश्वयुद्ध भी कभी भी छिड़ सकता है|
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अब तक कुछ विवेक ने विनाश से विश्व को बचा रखा है, पर अब वह विवेक क्षीण हो रहा है| मध्यपूर्व में जैसी परिस्थितियाँ बन रही हैं वे निश्चित रूप से भयावह हैं| अमेरिका जैसा युद्धप्रिय देश अपने जनमानस के दबाव में कहीं भी युद्ध छेड़ने की स्थिति में नहीं है| पर वह दूसरों से युद्ध करवाएगा|
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भारत को दबाने के लिए वह पाकिस्तान को सैनिक सहायता दे रहा है| पूरे विश्व पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए वह कभी भी मध्यपूर्व में युद्ध प्रारम्भ करवा सकता है| अमेरिका के इशारे पर सऊदी अरब एक बहुत बड़े सैन्य अभ्यास की तैयारी कर रहा है जिसके लिए वह कई मित्र देशों की सेनाओं को अपने यहाँ एकत्र कर रहा है| इस सैनिक अभ्यास के बाद उसकी मंशा सीरिया पर आक्रमण कर असद सरकार को हटाना है|
इसका मतलब होगा सीरिया में रूस व ईरान से सीधा युद्ध| ईरान कभी भी नहीं चाहेगा कि असद सरकार हटे, अतः वह सऊदी अरब सरकार से युद्ध करना पसंद करेगा|
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ईरान जिस दिन परमाणु अस्त्रों को बनाने की स्थिति में होगा उसी दिन ईरान पर इजराइल द्वारा अणुबमों से आक्रमण पक्का है| ईरान ने यह घोषित कर रखा है कि इजराइल को नष्ट करना उसका धार्मिक दायित्व है| इजराइल को भी आत्मरक्षा करनी है| अतः दुनिया के मानचित्र पर या तो इजराइल रहेगा या ईरान|
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इसी तरह यदि अमेरिका के इशारे पर तुर्की ने बास्फोरस और दर्रा-दानियल का मार्ग बंद कर दिया तो तुर्की पर रूस द्वारा आक्रमण पक्का है| दुनियाँ में वामपंथ सिर्फ भारत में ही बचा है| रूस और चीन ने इसके खूनी शिकंजे से स्वयं को मुक्त कर दिया है| मिशनरियों ने अपनी पूरी शक्ति भारत की अस्मिता को नष्ट करने में लगा रखी है क्योंकि विश्व में अब अन्यत्र कहीं भी उनकी पूछ नहीं है|
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पर ये असत्य और अन्धकार की शक्तियाँ अधिक टिकने वाली नहीं हैं| तृतीय विश्वयुद्ध भी सुनिश्चित है और विश्व का विनाश भी| पर आने वाला समय भारत के लिए अच्छा होगा|
ॐ इति|
१६ फरवरी २०१६

१६ फरवरी २०१४ को हमारे शूरवीरों, भक्तों, दानियों, और परिश्रमी उद्योगपतियों की वीर भूमि के नगर झुंझुनू (राजस्थान) में संघ का बहुत ही भव्य पथ संचलन हुआ|

१६ फरवरी २०१४ को हमारे शूरवीरों, भक्तों, दानियों, और परिश्रमी उद्योगपतियों की वीर भूमि के नगर झुंझुनू (राजस्थान) में संघ का बहुत ही भव्य पथ संचलन हुआ|

पूरे झुंझुनू जिले से हज़ारों स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में दंड सहित आए| तीन घोष वाद्य साथ में थे| लगभग तीन किलोमीटर लम्बे मार्ग पर पथ संचलन हुआ| आधा किलोमीटर से अधिक लम्बी तो स्वयंसेवकों की पंक्तियाँ ही थीं| पूरे मार्ग पर अति भव्य पुष्प वर्षा हुई| हजारों माताओं ने भोजन के पैकेट बनाकर बाहर से आये स्वयंसेवकों के लिए भिजवाये|
पूरा नगर भगवा हो गया| क्षेत्र की सुप्त हिन्दू चेतना पुनश्चः जागृत हुई|
सभी नागरिकों को अपने हिन्दू होने पर गर्व हुआ|
इस जिले झुंझुनूं ने भारतीय सेना को सर्वाधिक सैनिक दिए हैं| सभी युद्धों में सबसे अधिक सैनिक भी इसी जिले के ही वीर गति को प्राप्त हुए हैं|
भारत के दो तिहाई उद्योगपति भी इसी क्षेत्र के हैं| यहाँ की भूमि ने बहुत बड़ी संख्या में वीरों दानियों और भक्तों को जन्म दिया है|
जय सनातन संस्कृति ! जय भारत ! जय श्री राम !
१६ फरवरी २०१४
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संशोधन :----- कल 16 फरवरी को हमारे नगर का संघ संचलन पूरे पाँच किलोमीटर से भी अधिक लम्बे मार्ग पर चला और संचलन की लम्बाई एक किलोमीटर से भी अधिक थी, यानि सबसे आगे की पंक्ति से सबसे पीछे की पंक्ति के बीच एक किलोमीटर तक स्वयंसेवक ही स्वयंसेवकों की वाहिनियाँ घोष के साथ पूर्ण गणवेश में कदम से कदम मिलाकर चल रही थीं| प्रचल: से पूर्व अनेक वाहिनियाँ पूर्ण गणवेश में और आकर जुड़ गयी थीं|
पूरा नगर उमड़ पड़ा था और हजारों माताओं बहिनों ने पाँच किलोमीटर लम्बे मार्ग पर अपने लाडलों का स्वागत पुष्पवर्षा से किया| तीन हज़ार माताओं ने अपने घरों से लाकर बाहर से आने वालों के लिए भोजन की व्यवस्था की|
मैं प्रथम वाहिनी में आगे था अतः पीछे की ओर मुड़ कर देखने का अवसर ही नहीं मिला| जिस संचलन को को आधा किलोमीटर लम्बा समझ रहा था व एक किलोमीटर लम्बा था|
दस वर्ष के बच्चों से लेकर 70 वर्ष तक के प्रोढ़ इस सञ्चलन में थे| मेरी स्वयं की आयु
66 वर्ष है पर इस संचलन में युवाओं सा उत्साह था| पूरे पाँच किलोमीटर तक कदम से कदम मिलाकर चलने में कोई जोर नहीं आया|
क्षेत्र के सभी साधू संत भी आशीर्वाद देने आये| इन तपस्वी संतों की उपस्थिति और आशीर्वाद से हमारे संकल्प को और भी बल मिला कि हम निश्चित रूप से विजयी होंगे और भारत माँ को अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बैठायेंगे और सनातन धर्म की पूरे विश्व में पुनर्स्थापना करेंगे| (१७ फरवरी २०१४)

परमात्मा के ध्यान में समर्पित होकर, मैं अनंत और उस से भी परे हूँ ---

स्वयं परमात्मा ही मेरे अस्तित्व हैं| मैं इस हाड़-मांस के पुतले शरीर का वंदी नहीं हूँ| मैं मेरे इष्टदेव के साथ एक हूँ, कहीं कोई भेद नहीं है| भगवान कहते हैं :---
"अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते|
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः||१०:८||
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्|
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च||१०:९||
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्|
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते||१०:१०||
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः|
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता||१०:११||"
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मेरी आस्था अब सिर्फ परमात्मा पर ही रह गई है, स्वयं की बुद्धि, विवेक और बल पर तो बिलकुल भी नहीं| मैं परमात्मा को ब्रह्म, परमशिव, वासुदेब या अन्य किसी भी नाम से कहूँ, चेतना में उनकी अवधारणा स्पष्ट है| किसी भी तरह का कोई संशय नहीं है|
ध्यान-साधना का विषय -- परमात्मा स्वयं ज्योतिर्मय आकाश-तत्व के रूप में, व उस से भी परे हैं, और कर्ता -- प्राण-तत्व के रूप में भी वे स्वयं ही हैं|
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सत्य-असत्य क्या है? यह जानने की मेरी क्षमता नहीं है, लेकिन अंतर्चेतना कहती है -- "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः|" वे ही सत्य हैं, और वे ही मेरे जीवन हैं| उनसे अन्य कुछ भी नहीं है।
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२१

विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी कि अधिष्ठात्री माता सरस्वती को 'बसंत पंचमी' के शुभ अवसर पर नमन ---

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः !! विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी कि अधिष्ठात्री माता सरस्वती को 'बसंत पंचमी' के शुभ अवसर पर नमन, और सभी का अभिनंदन !!

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बसंत पंचमी के दिन वीर बालक हकीकत राय का पुण्य स्मरण और श्रद्धांजली|
बसंत पंचमी के दिन भगवान श्रीराम भीलनी शबरी की कुटिया में पधारे थे|
कुछ लोक-कथाओं के अनुसार बालक भगवान श्रीकृष्ण ने बसंत पंचमी के दिन बालिका भगवती श्रीराधा जी का शृंगार किया था, इसीलिए बसंत पंचमी के दिन से प्रकृति अपना शृंगार कर के स्वयं को संवारती है| इस दिन से प्रकृति का कण-कण खिल उठता है, और सरसों के पीले-पीले फूलों से आच्छादित धरती की छटा देखते ही बनती है|
बसंत पंचमी के दिन ही राजा भोज का जन्मदिवस था, जिस पर वे एक बहुत बड़ा उत्सव मनाते हुए अपनी प्रजा के लिए प्रीतिभोज आयोजित करते थे|
बसंत पंचमी के ही दिन ही पृथ्वीराज चौहान ने तवे पर हुई चोट और चंदबरदाई के संकेत से अनुमान लगाकर जो बाण मारा, वह मोहम्मद ग़ोरी के सीने में जा धंसा था| इसके बाद चंदबरदाई और पृथ्वीराज ने भी एक दूसरे के पेट में छुरा भौंककर आत्मबलिदान दे दिया था|
१८१६ ई.की बसंत पंचमी के दिन गुरु रामसिंह कूका का जन्म हुआ था| उनके ५० शिष्यों को १७ जनवरी १८७२ को मलेरकोटला में अंग्रेजों ने तोपों के मुंह से बांधकर उड़ा दिया, और बचे हुए १८ शिष्यों को फांसी दे दी| उन्हें मांडले की जेल में भेज दिया गया जहाँ घोर अत्याचार सहकर १८८५ में उन्होने अपना शरीर त्याग दिया|
बसंत पंचमी को गंगा माता का अवतरण हुआ था| इस दिन गंगा स्नान करने का भी महत्व है|
वसन्त पंचमी के ही दिन हिन्दी साहित्य की अमर विभूति महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का जन्म २८-०२-१८९९ को हुआ था| श्रद्धा से लोग उन्हें 'महाप्राण' कहते थे|
माघ के महीने में हुई वर्षा को भी शुभ माना जाता है| कहते हैं कि माघ के माह में हुई वर्षा के जल की एक-एक बूंद अमृत होती है|
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माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ‘बसंत पंचमी’, 'श्रीपंचमी' और 'सरस्वती पूजा' के रूप में देशभर में मनाया जाता है| इस दिन से बसंत ऋतु का आगमन और शरद ऋतु की विदाई होती है|
चालीस-पचास वर्षों पूर्व तक इस दिन प्रायः सभी मंदिरों में भजन-कीर्तन होते थे, गुलाल लगाई जाती थी और पुष्प-वर्षा होती थी| अब तो श्रद्धालु इसे सरस्वती पूजा के रूप में ही मनाते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन विद्या और बुद्धि की देवी माँ सरस्वती अपने हाथों में वीणा, पुस्तक व माला लिए अवतरित हुई थीं| माँ सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है| ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं| संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं|
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भारत के विभाजन से पूर्व लाहौर में वीर बालक हकीकत राय की स्मृति में बसंत पंचमी के दिन एक मेला भरता था, वहीं जहाँ वीर बालक हकीकत राय ने धर्म-रक्षार्थ अपने प्राण दिये थे| अब लाहौर में बसंत पंचमी के दिन पतंगें उड़ाई जाती हैं|
बसंत पंचमी का दिन पतझड़ के बाद नए फूल खिलने की शुरुआत करता है, लेकिन इस दिन एक फूल बिना खिले ही मुरझा गया| इसी दिन धर्मांधों ने १४ वर्ष की आयु के मासूम हकीकत राय की नाजुक गर्दन धड़ से अलग कर दी| हक़ीक़त राय के हाथ में भगवद्गीता थी, उसे हर तरह के प्रलोभन और भय दिये गए, लेकिन उसने अपनी गर्दन कटवाना स्वीकार किया पर अपना धर्म नहीं छोड़ा| एक मदरसे मे पढता था वह वीर बालक| एक दिन साथ के कुछ मुस्लिम बच्चे उसे चिढ़ाने के लिए हिंदू देवी दुर्गा को गाली देने लगे| उस सहनशील बालक ने कहा अगर यह सब मैं बीबी फातिमा के लिए कहूँ तो तुम्हे कैसा लगेगा? इतना सुन कर हल्ला मच गया कि हकीकत ने गाली दी| बात बड़े काजी तक पहुँची| फ़ैसला सुनाया गया -- इस्लाम स्वीकार कर लो या मरो। उस बालक ने कहा मैंने गलत नही कहा मैं इस्लाम नही स्वीकार करूँगा। उसके पास भगवद्गीता थी जिसमें उसने पढ़ा था कि आत्मा अमर है| यह गीता का ज्ञान ही उसका संबल था| बाद में यह मामला स्यालकोट के शासक अमीर बेग की अदालत में पहुँचा। हकीकत राय ने दोनों जगह सही बात बता दी। मुल्लाओं की राय ली गई तो उन्होंने कहा कि हकीकत राय के मन में इस्लाम के अपमान का विचार आया, इसीलिए उसे मृत्युदण्ड दिया जाए| लाहौर के सूबेदार की कचहरी में भी यही निर्णय बहाल रहा| तब मुल्लाओं ने कहा कि हकीकत राय इस्लाम धर्म ग्रहण कर ले तो उसके प्राण बच सकते हैं| माता-पिता और पत्नी ने इसे मान लेने का अनुरोध किया, पर हकीकत राय इसके तैयार नहीं हुए| हकीकत राय का जन्म १७२४ ई. में स्यालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था| उनके पिता का नाम भागमल खत्री था| हकीकत राय बचपन से ही बड़ी धार्मिक प्रवृत्ति के थे| उनकी माता गौराँ देवी अत्यंत धार्मिक स्त्री थीं| हकीकत राय की सगाई बटाला के कादी हट्टी मुहल्ला के रहने वाले उप्पल गौत्र के किशन सिंह खत्री की बेटी लक्ष्मी के साथ हुई थी| कुछ इतिहासकार उसका नाम सावित्री भी बताते हैं| उनकी अभी शादी नहीं हुई थी इसलिए लक्ष्मी अपने मायके में ही रह रही थी| जब हकीकत राय की हत्या की खबर बटाला पहुंची तो सारे शहर में शोक की लहर फैल गई| लक्ष्मी ने सती होने की इच्छा व्यक्त की| परिवार द्वारा काफी मनाने के बावजूद वो नहीं मानी और शहर से बाहर एक स्थान पर आकर सती हो गई| लाहौर से दो मील पूर्व की ओर हकीकत राय की समाधि बनी हुई थी जहाँ विभाजन से पूर्व हर वर्ष मेला भरा करता था| बसंत पंचमी के दिन भारी संख्या में लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए नतमस्तक होते हैं| पुनश्च: सभी को शुभ कामनाएँ|
जय सनातन वैदिक संस्कृति| जय भारत| जय माँ सरस्वती| जय श्री राम|
१६ फरवरी २०२१

सुषुम्ना नाड़ी में क्रियायोग -- सरस्वती पूजन है ---

 हमारी सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी प्रत्यक्ष सरस्वती है| सुषुम्ना चैतन्य होती है तब कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होती है| मेरुदंड के सभी चक्रों को जागृत करती हुई जब कुंडलिनी सहस्त्रार में प्रवेश करती है, तब वहाँ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना -- इन तीनों प्राण-प्रवाहों का संगम होता है| वही ज्ञान-क्षेत्र है, जहाँ से परमात्मा का ज्ञान होना आरंभ होता है| सहस्त्रार में स्थितप्रज्ञ होकर पारब्रह्म परमशिव की उपासना करें| बाकी चिंताओं को छोड़ दें| जो चिंता करनी है वह स्वयं भगवती करेंगी| चिंता करना भगवती का काम है, हमारा नहीं| चेतना को निरंतर आज्ञाचक्र से ऊपर रखें, और सहस्त्रार में तेलधारा की तरह जो मंत्र गूंज रहा है, उसे ही सुनते रहें| सुषुम्ना नाड़ी में क्रियायोग -- सरस्वती पूजन है| आज वसंत पंचमी है और आज सरस्वती माता की पूजाका खास महत्व है|

ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ब्रह्मणे नमः !! ॐ ॐ ॐ !! कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२१

मेरी ओर से सब निश्चिंत रहें, मेरी किसी से कोई अपेक्षा नहीं है ---

मेरी ओर से सब निश्चिंत रहें। मेरी किसी से कोई अपेक्षा नहीं है। मैं न तो कभी आपसे कोई धन मांगूंगा, न ही अन्य कोई चीज। अतः शंका न करें। मेरी सिर्फ एक ही प्रार्थना है, कि सत्य-सनातन-धर्म और भारत के प्रति आपके हृदय में प्रेम और स्वाभिमान जागृत हो। और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। इतने लेख मेरे माध्यम से इसलिए लिखे जाते हैं, क्योंकि भगवान लिखवाते हैं। मैं अपनी मर्जी से कुछ नहीं लिखता। .

भ्रूमध्य स्वर्ग का द्वार, व आज्ञाचक्र का भेदन स्वर्ग में प्रवेश है। अशांत मन सब बुराइयों की जड़ है। परमात्मा हमारे साथ एक हैं। यश और प्रसिद्धि की कामना -- एक सूक्ष्म अहंकार है जो बड़े बड़े साधकों को पथभ्रष्ट कर देता है। जब भी ऐसी कोई चाह जगे, तब सावधान हो जाओ। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। . एक बार गहरे ध्यान में गुरु जी ने यह बात स्पष्ट रूप से चित्त में बैठा दी थी कि तुम जहाँ भी साधना में लोभ करोगे या तुम्हें साधना का अहंकार हो जाएगा, उसी क्षण तुम भटक जाओगे| उन की कृपा से पूरी बात समझ में आ गई| जैसे साँप-सीढ़ी के खेल में साँप के मुंह में आते ही पतन हो जाता है, वैसे ही लोभ और अहंकार पतन के गर्त में धकेल देते हैं| लोभ और अहंकार से बचने का उपाय है --- स्वयं कर्ता मत बनो, भगवान को ही कर्ता बनाओ, और साधना का फल भी उन्हीं को तुरंत समर्पित कर दो। ॐ गुरु !! जय गुरु !! कृपा शंकर १६ फरवरी २०२१

सूक्ष्म जगत ---

 सूक्ष्म जगत इस भौतिक जगत से बहुत अधिक विशाल है। जैसे इस अथाह भौतिक जगत की कोई थाह नहीं है, वैसे ही अति-अथाह सूक्ष्म जगत की भी कोई थाह नहीं है। कोई सिद्ध महात्मा ही उसे जान सकता है। सूक्ष्म जगत से आगे के भी कई लोक हैं जिनके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हरेक निष्ठावान भक्त साधक को सूक्ष्म जगत की अनुभूतियाँ अवश्य होती हैं, लेकिन इसकी चर्चा का निषेध है इसलिए वे इस विषय पर कुछ नहीं बोलते।

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गुरु की आज्ञा से हम भ्रूमध्य पर ध्यान करते हैं, जहाँ गहराई से दीर्घ समय तक ध्यान करते करते प्रणव से लिपटी हुई एक ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है। इसे कूटस्थ कहा जाता है। इस की चेतना को कूटस्थ चैतन्य कहते हैं।
ध्यान उस ब्रह्मज्योति का ही किया जाता है जिसे "ज्योतिर्मय ब्रह्म" भी कहते हैं। ध्यान में आँखों का दृष्टि-पथ तो भ्रूमध्य ही रहता है, लेकिन समर्पण ज्योतिर्मय-ब्रह्म यानि कूटस्थ को ही होता है।
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कुंडलिनी-जागरण कोई बड़ी बात नहीं है, यह एक सामान्य सी घटना है जो सभी साधकों के साथ होती है। कुंडलिनी जागरण से हमारी आध्यात्मिक समझ बढ़ जाती है, परमात्मा की अनुभूतियाँ होने लगती हैं, और हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। इससे अधिक कुछ भी नहीं है। जब हमारी इंद्रियों की बहिर्मुखी प्राण-ऊर्जा ध्यान की शक्ति से घनीभूत होकर अंतर्मुखी हो जाती है, तब वह घनीभूत प्राण-ऊर्जा मूलाधारचक्र से सुषुम्ना में विचरण करने लगती है। यही कुंडलिनी जागरण है। यह भी एक गोपनीय विषय है जिस पर इससे अधिक सार्वजनिक चर्चा नहीं की जा सकती। यहाँ वही लिखेंगे जिसकी हमें अनुमति है।
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जिस ज्योतिर्मय ब्रह्म का हम ध्यान करते हैं, वह ज्योति जब सहस्त्रारचक्र में प्रकट होती है तब उसके ध्यान को श्रीगुरुचरणों का ध्यान कहते हैं। सहस्त्रार में स्थिति ही श्रीगुरुचरणों में आश्रय है। सहस्त्रार में श्रीगुरुचरण रूपी ज्योति का ध्यान करते करते एक दिन हमें अनंतता की अनुभूति होने लगती है। तब से हमें अनंतता के विस्तार का ही ध्यान करना चाहिए। हम स्वयं वह अनंतता हैं, यह भौतिक शरीर नहीं। उस अनंतता का ध्यान करते करते एक दिन हम पाएंगे कि हम ब्रह्मरंध्र के मार्ग से इस भौतिक शरीर से बाहर आ गए हैं। यह हमारा सूक्ष्म जगत में प्रवेश है।
स्वयं को इस शरीर से बाहर जब पायें तब ध्यान कूटस्थ ज्योति पर ही रहे। कूटस्थ ज्योति तब अनंताकाश से भी बहुत ऊपर यानि अनंतता से भी बहुत परे दिखाई देगी। स्वयं की पृथकता के बोध को उसमें समर्पित करें। उसका आलोक अपने लौकिक सूर्य से भी अधिक होगा। अपने सूर्य का आलोक बहुत उष्ण है जबकी कूटस्थ सूर्य का आलोक बहुत सुहावना होता है।
वहाँ के बारे में अब इस समय अधिक नहीं लिखूँगा क्योंकि मैं एक अकिंचन साधक मात्र हूँ, कोई सिद्ध नहीं। सूक्ष्म जगत की मुझे बहुत अनुभूतियाँ हैं, लेकिन इस समय लिखने की अनुमति नहीं है। जब भी कभी अनुमति होगी तब लिखूँगा।
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मेरा समर्पण परमशिव को है। उन से मैं प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे अपने साथ एक बनाकर ही रखें। कहीं कोई पृथकता नहीं हो। यह सारा जीवन परमशिव की उपासना में ही व्यतीत हो जाए। अभी तो कोई अभिलाषा नहीं है, भविष्य में भी कभी किसी आकांक्षा का जन्म न हो। सभी का मंगल हो। ॐ स्वस्ति !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२३

"आनंद" की अनुभूति का एकमात्र स्त्रोत "परमप्रेम" (भक्ति) है ---

 "आनंद" की अनुभूति का एकमात्र स्त्रोत "परमप्रेम" (भक्ति) है ---

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यह भक्ति ही हमें तृप्त और मुक्त करती है। अन्य सभी आभासीय अनुभूतियाँ हमें दुःख और पीड़ा देती हैं। "ख़ुशी" और "आनंद" में बहुत अंतर है। "ख़ुशी" वह है जो हमें किसी बाहरी वस्तु को प्राप्त करने से होती है। अंततः यह दुःखदायी होती है। "आनंद" तो हम स्वयं हैं। यह हमारा स्वभाव है। भगवान को सच्चिदानंद कहा गया है। भगवान की चरम अनुभूति हमें सच्चिदानंद के रूप में होती है। इसे कोई भी हम से नहीं छीन सकता।
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इस विषय को समझने के लिए हमें कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीयोपनिषद का स्वाध्याय करना होगा। अनेक स्वनामधन्य आचार्यों के भाष्य इस पर उपलब्ध हैं। इस उपनिषद के स्वाध्याय और कृष्ण यजुर्वेद में बताई गई साधना विधियों के अभ्यास से सच्चिदानंद परमात्मा की प्राप्ति निश्चित रूप से की जा सकती है।
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१६ फरवरी २०२३

Thursday, 12 February 2026

शिवभाव में करें गुरु रूप शिव का ध्यान

 शिवभाव में करें गुरु रूप शिव का ध्यान .........

भावजगत में सम्पूर्ण समष्टि के साथ स्वयं को एकाकार करें| आप यह देह नहीं बल्कि परमात्मा की अनंतता और उनका सम्पूर्ण प्रेम हैं| शिवनेत्र होकर कूटस्थ में सर्वव्यापी सद्गुरु रूप शिव का ध्यान करें|
निष्ठावान मुमुक्षु का सारा मार्गदर्शन निश्चित रूप से भगवान स्वयं करते हैं और उसकी रक्षा भी होती है| आपकी सारी जिज्ञासाओं के उत्तर और सारी समस्याओं का समाधान परमात्मा में ही मिलेगा|
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ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ गुरु ! ॐ शिव ॐ शिव ॐ शिव ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपाशंकर
१३ फरवरी २०१६