ॐ तत् सत् ....
Thursday, 19 February 2026
ॐ तत् सत् ....
Tuesday, 17 February 2026
भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है। .
भारत ही सनातन धर्म है, और सनातन धर्म ही भारत है। हम अपनी आध्यात्मिक साधना परमात्मा को पूरी तरह समर्पित करने के लिए ही करते हैं। इससे धर्म और राष्ट्र की रक्षा स्वतः ही होती है। यह हमारा सर्वोपरी कर्तव्य और स्वधर्म है।
अजपा जप, हंसयोग, हँसवती ऋक ---
(जिनकी आस्था हो वे ही मेरे लेखों को पढ़ें, अन्य सब इन्हें गल्प मानकर इन की उपेक्षा कर दें, व अपने अमूल्य समय को नष्ट न करें)
हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --
हम स्वयं इतने ज्योतिर्मय बनें कि हमारे समक्ष कोई असत्य का अंधकार टिक ही न सके --
यह "मनुवाद" क्या है ? ---
यह "मनुवाद" क्या है ? --- एक समय था जब साम्यवादी (मार्क्सवादी) लोग किसी को गाली देते तो उसको "प्रतिक्रियावादी", "पूंजीवादी", "फासिस्ट" और "बुर्जुआ" आदि शब्दों से विभूषित करते| ये उनकी बड़ी से बड़ी गालियाँ थीं| किसी की प्रशंसा करते तो उसको "प्रगतिवादी"और 'मानवतावादी" कहते|
ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं ---
ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं| किस तरह के रंग और ध्वनियाँ सुनती हैं इसका बर्णन यौगिक साहित्य में भरा पड़ा है| ये सब आनंददायक होते हैं| साधना में विक्षेप उन्ही साधकों को होता है जिनमें वासनात्मक विचार होते हैं| मेरा तो यह मानना है कि ध्यान उसी को करना चाहिए जिसमें ईश्वर के प्रति प्रेम भरा पडा हो और जो ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| सभी ध्यान साधकों के लिए एक अचूक प्रयोग बता रहा हूँ| पूर्ण प्रभुप्रेम के साथ इसे करने से निश्चित रूप से शीघ्रातिशीघ्र लाभ होगा| शौचादि से निवृत होकर सूर्यनमस्कार और महामुद्रा का अभ्यास कर पंद्रह से बीस बार अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें| फिर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर एक ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन या वज्रासन में बैठ जाएँ| गुरु और परमात्मा को नमन कर कुछ देर अजपा-जप का अभ्यास करें इससे मन शांत हो जायेगा| फिर श्वास-प्रश्वास के साथ निम्न बीज मन्त्रों का जाप प्रत्येक चक्र पर करें ----- मूलाधार पर -- "लं", स्वाधिष्ठान -- "वं", मणिपुर -- "रं", अनाहत -- "यं", विशुद्धि -- "हं", आज्ञा -- "ॐ"| जितनी देर तक कर सकें करें| अंत में आज्ञाचक्र पर ही "ॐ" के साथ रुक जाएँ| श्वास-प्रश्वास सामान्य चलने दें| तीन बार योनिमुद्रा का अभ्यास करें| योनिमुद्रा (ज्योतिमुद्रा) करते समय ओम के जाप के साथ आज्ञाचक्र पर तीब्रतम प्रहार करें| फिर जितना कर सकते हैं उतनी देर तक ॐ की ध्वनी को सुनते हुए ध्यान करें| ध्यान के पश्चत कुछ देर तक अपने आसन पर बैठे रहें| तुरंत न उठें| फिर गुरु और परमात्मा को नमन करते हुए सर्वस्व की मंगलकामना के साथ प्रार्थना करते हुए ही अपना आसन छोड़ें| यदि पूर्णप्रेम के साथ उपरोक्त साधना की जाये तो आमूलचूल आपका व्यक्तित्व सकारात्मक रूप से बदलना आरम्भ हो जाएगा| आपके भाव और विचार भी पवित्र हो जायेंगे| भगवन श्री कृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उनकी शरण लेने पर आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा| जय श्री कृष्ण ! ॐ तत्सत|
कृपा शंकर
Monday, 16 February 2026
हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---
हमारा सारा कार्य भगवान की चेतना में हो, हम निरंतर उन की चेतना में रहें ---
महिषासुर और नरकासुर अपनी मौत खुद मरेंगे .......
१६ फरवरी २०१४ को हमारे शूरवीरों, भक्तों, दानियों, और परिश्रमी उद्योगपतियों की वीर भूमि के नगर झुंझुनू (राजस्थान) में संघ का बहुत ही भव्य पथ संचलन हुआ|
१६ फरवरी २०१४ को हमारे शूरवीरों, भक्तों, दानियों, और परिश्रमी उद्योगपतियों की वीर भूमि के नगर झुंझुनू (राजस्थान) में संघ का बहुत ही भव्य पथ संचलन हुआ|
परमात्मा के ध्यान में समर्पित होकर, मैं अनंत और उस से भी परे हूँ ---
विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी कि अधिष्ठात्री माता सरस्वती को 'बसंत पंचमी' के शुभ अवसर पर नमन ---
ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः !! विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी कि अधिष्ठात्री माता सरस्वती को 'बसंत पंचमी' के शुभ अवसर पर नमन, और सभी का अभिनंदन !!
सुषुम्ना नाड़ी में क्रियायोग -- सरस्वती पूजन है ---
हमारी सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी प्रत्यक्ष सरस्वती है| सुषुम्ना चैतन्य होती है तब कुंडलिनी महाशक्ति जागृत होती है| मेरुदंड के सभी चक्रों को जागृत करती हुई जब कुंडलिनी सहस्त्रार में प्रवेश करती है, तब वहाँ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना -- इन तीनों प्राण-प्रवाहों का संगम होता है| वही ज्ञान-क्षेत्र है, जहाँ से परमात्मा का ज्ञान होना आरंभ होता है| सहस्त्रार में स्थितप्रज्ञ होकर पारब्रह्म परमशिव की उपासना करें| बाकी चिंताओं को छोड़ दें| जो चिंता करनी है वह स्वयं भगवती करेंगी| चिंता करना भगवती का काम है, हमारा नहीं| चेतना को निरंतर आज्ञाचक्र से ऊपर रखें, और सहस्त्रार में तेलधारा की तरह जो मंत्र गूंज रहा है, उसे ही सुनते रहें| सुषुम्ना नाड़ी में क्रियायोग -- सरस्वती पूजन है| आज वसंत पंचमी है और आज सरस्वती माता की पूजाका खास महत्व है|
मेरी ओर से सब निश्चिंत रहें, मेरी किसी से कोई अपेक्षा नहीं है ---
मेरी ओर से सब निश्चिंत रहें। मेरी किसी से कोई अपेक्षा नहीं है। मैं न तो कभी आपसे कोई धन मांगूंगा, न ही अन्य कोई चीज। अतः शंका न करें। मेरी सिर्फ एक ही प्रार्थना है, कि सत्य-सनातन-धर्म और भारत के प्रति आपके हृदय में प्रेम और स्वाभिमान जागृत हो। और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। इतने लेख मेरे माध्यम से इसलिए लिखे जाते हैं, क्योंकि भगवान लिखवाते हैं। मैं अपनी मर्जी से कुछ नहीं लिखता। .
सूक्ष्म जगत ---
सूक्ष्म जगत इस भौतिक जगत से बहुत अधिक विशाल है। जैसे इस अथाह भौतिक जगत की कोई थाह नहीं है, वैसे ही अति-अथाह सूक्ष्म जगत की भी कोई थाह नहीं है। कोई सिद्ध महात्मा ही उसे जान सकता है। सूक्ष्म जगत से आगे के भी कई लोक हैं जिनके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हरेक निष्ठावान भक्त साधक को सूक्ष्म जगत की अनुभूतियाँ अवश्य होती हैं, लेकिन इसकी चर्चा का निषेध है इसलिए वे इस विषय पर कुछ नहीं बोलते।
"आनंद" की अनुभूति का एकमात्र स्त्रोत "परमप्रेम" (भक्ति) है ---
"आनंद" की अनुभूति का एकमात्र स्त्रोत "परमप्रेम" (भक्ति) है ---
Thursday, 12 February 2026
शिवभाव में करें गुरु रूप शिव का ध्यान
शिवभाव में करें गुरु रूप शिव का ध्यान .........