ध्यान साधना से साधक को शांति, संतुष्टि और आनंद की अनुभूतियाँ होती हैं| किस तरह के रंग और ध्वनियाँ सुनती हैं इसका बर्णन यौगिक साहित्य में भरा पड़ा है| ये सब आनंददायक होते हैं| साधना में विक्षेप उन्ही साधकों को होता है जिनमें वासनात्मक विचार होते हैं| मेरा तो यह मानना है कि ध्यान उसी को करना चाहिए जिसमें ईश्वर के प्रति प्रेम भरा पडा हो और जो ईश्वर को समर्पित होना चाहते हैं| वासनात्मक विचारों से भरा ध्यान साधक निश्चित रूप से आसुरी शक्तियों का उपकरण बन जाता है| इसीलिए पतंजलि ने यम-नियमों पर इतना जोर दिया है| गुरु गोरखनाथ तो अपने शिष्यों के लिए पूर्ण ब्रह्मचर्य की पात्रता अनिवार्य रखते थे| स्वामी विवेकानंद ने भी ध्यान साधना से पूर्व ब्रह्मचर्य को अनिवार्य बताया है| सभी ध्यान साधकों के लिए एक अचूक प्रयोग बता रहा हूँ| पूर्ण प्रभुप्रेम के साथ इसे करने से निश्चित रूप से शीघ्रातिशीघ्र लाभ होगा| शौचादि से निवृत होकर सूर्यनमस्कार और महामुद्रा का अभ्यास कर पंद्रह से बीस बार अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें| फिर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह कर एक ऊनी कम्बल पर पद्मासन या सिद्धासन या वज्रासन में बैठ जाएँ| गुरु और परमात्मा को नमन कर कुछ देर अजपा-जप का अभ्यास करें इससे मन शांत हो जायेगा| फिर श्वास-प्रश्वास के साथ निम्न बीज मन्त्रों का जाप प्रत्येक चक्र पर करें ----- मूलाधार पर -- "लं", स्वाधिष्ठान -- "वं", मणिपुर -- "रं", अनाहत -- "यं", विशुद्धि -- "हं", आज्ञा -- "ॐ"| जितनी देर तक कर सकें करें| अंत में आज्ञाचक्र पर ही "ॐ" के साथ रुक जाएँ| श्वास-प्रश्वास सामान्य चलने दें| तीन बार योनिमुद्रा का अभ्यास करें| योनिमुद्रा (ज्योतिमुद्रा) करते समय ओम के जाप के साथ आज्ञाचक्र पर तीब्रतम प्रहार करें| फिर जितना कर सकते हैं उतनी देर तक ॐ की ध्वनी को सुनते हुए ध्यान करें| ध्यान के पश्चत कुछ देर तक अपने आसन पर बैठे रहें| तुरंत न उठें| फिर गुरु और परमात्मा को नमन करते हुए सर्वस्व की मंगलकामना के साथ प्रार्थना करते हुए ही अपना आसन छोड़ें| यदि पूर्णप्रेम के साथ उपरोक्त साधना की जाये तो आमूलचूल आपका व्यक्तित्व सकारात्मक रूप से बदलना आरम्भ हो जाएगा| आपके भाव और विचार भी पवित्र हो जायेंगे| भगवन श्री कृष्ण सब गुरुओं के गुरु हैं| उनकी शरण लेने पर आपका कुछ भी अनिष्ट नहीं होगा| जय श्री कृष्ण ! ॐ तत्सत|
कृपा शंकर
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