परमात्मा के प्रति परमप्रेम, पूर्ण समर्पण, उपासना, और आत्म-साक्षात्कार ही हमारा स्वधर्म है। जैसे चुंबक की सूई का मुंह सदा उत्तर की ओर होता है, वैसे ही हमारे चिंतन की दिशा सदा परमात्मा की ओर ही रहे।
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हमारा दायित्व है कि हम अपनी संतानों में इतना आत्म-विश्वास जागृत करें कि वे बिना किसी भय या संकोच के अपनी कोई भी समस्या या उलझन अपने माता-पिता को बता सकें। सभी से मेरी प्रार्थना है कि वे अपने स्वधर्म का दृढ़ता से पालन करें, और अपने बच्चों को भी सदाचरण और धर्मरक्षा की शिक्षा दें।
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बच्चों को बात-बात पर बुरी तरह मारना-पीटना और डराना-धमकाना नहीं चाहिए। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता, और वे कायर व डरपोक बन जाते हैं। हम यह सुनिश्चित करें कि हमारी संतानें इतनी शक्तिशाली, सामर्थ्यवान, साहसी, व आत्म-विश्वासी हों, कि वे अपने धर्म व स्वयं की रक्षा अधर्मियों से करने में समर्थ हों।
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परमात्मा से प्रेम करो। सुख व आनंद है ही परमात्मा में, अन्यत्र कहीं भी नहीं है। परमात्मा से दूर होने वाले सब दुःखी हैं, कोई सुखी नहीं हैं।
हरिः ॐ तत्सत् !! हर हर महादेव !! महादेव महादेव महादेव !!
कृपा शंकर
२७ अक्टूबर २०२५
जैसे चुंबक की सूई का मुंह सदा उत्तर दिशा की ओर ही रहता है, वैसे ही मेरा चिंतन और ध्यान निरंतर परमात्मा की ओर ही रहता है। मुझे किसी से मार्गदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं है। जहाँ मैं हूँ, वहीं परमात्मा हैं, वहीं सारे तीर्थ हैं, और वहीं सारे संत-महात्मा हैं। बीच बीच में कभी कभी ईश्वर की प्रेरणा से अल्प काल के लिए कहीं अन्यत्र भी चला जाता हूँ। सारा जीवन ईश्वर को समर्पित है। कोई आकांक्षा नहीं है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
ReplyDeleteकृपा शंकर
३० जनवरी २०२६