परमात्मा की चेतना में दिन-रात निरंतर बने रहना ही उच्चतम स्थिति है ---
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सच्चिदानंद परमात्मा ही हमारा स्वरूप है। परमात्मा की चेतना में दिन-रात निरंतर बने रहना ही हमारी साधना, उपासना और आनंद है। इसके लिए इस समय दो ही साधन मुझे दिखाई दे रहे हैं -- "समत्व" और "स्थितप्रज्ञता"।
समत्व ही ज्ञान है। जिसने समत्व को प्राप्त किया, वही ज्ञानी है। समत्व में अधिष्ठित योगी ही समाधिष्ठ है। उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए स्थितप्रज्ञ होना आवश्यक है। इंद्रियों के विषयों से वैराग्य हुए बिना प्रज्ञा स्थिर नहीं हो सकती। सच्चिदानंद परमात्मा की अनुभूतियों के बिना इंद्रियों के विषयों से वैराग्य संभव नहीं है। इसीलिए भगवान हमें समय समय पर अपनी अनुभूतियाँ कराते रहते हैं।
परमात्मा की अनुभूतियाँ होने के पश्चात वैराग्य आवश्यक है। अन्यथा भगवान की इच्छा पर ही दोषारोपण करते करते जीवन निकल जाएगा।
भगवान कहते हैं --
"प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥२:५५॥"
श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है॥
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इस विषय पर गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत अच्छी तरह से समझाया है। वह सब तभी समझ में आएगा, जब हमें भगवान से प्रेम होगा। प्रेम के साथ साथ श्रद्धा-विश्वास और सत्यनिष्ठा भी आवश्यक है। यही हमारी रक्षा करेगा। अन्यथा महाविनाश निश्चित है।
हम अभी इसी समय से स्थितप्रज्ञ होने का उपाय करें, तभी समत्व की स्थिति प्राप्त होगी, और तभी ईश्वर की चेतना में हम स्वयं को प्रतिष्ठित कर पायेंगे।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
८ फरवरी २०२३
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