माँ ---
प्राण-तत्व के रूप में, इस देह की सुषुम्ना नाड़ी में मूलाधार से ब्रह्मरंध्र, व उस से भी परे तक, विचरण कर रही जगन्माता ही मेरे प्राण, और यह जीवन है|
पूरी सृष्टि को उन्होने ही धारण कर रखा है| घनीभूत होकर वे ही कुंडलिनी महाशक्ति हैं| सारी क्रियाएँ वे ही कर रही हैं|
प्राण-तत्व के रूप में, इस देह की सुषुम्ना नाड़ी में मूलाधारचक्र से सहसत्रारचक्र, व अनंताकाश से भी परे परमशिव तक, विचरण कर रही जगन्माता ही मेरा प्राण, और यह जीवन है।
ReplyDeleteपूरी सृष्टि को उन्होने ही धारण कर रखा है। घनीभूत होकर वे ही कुंडलिनी महाशक्ति हैं। सारी क्रियाएँ वे ही कर रही हैं। मुझे निमित्त बनाकर, परमशिव का ध्यान भी वे स्वयं ही कर रही हैं। वे ही मेरी गति है। उन माँ भगवती के श्रीचरणों में मैं नतमस्तक हूँ।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ जनवरी २०२६