Thursday, 22 January 2026

पूर्व सोवियत संघ से पृथक हुए चौदह देशों पर क्या रूस पुनश्च: अपना अधिकार कर लेगा ?

 कल रात्री को मैनें निकट भविष्य का एक दृश्य देखा जिसमें रूस ने पूर्व सोवियत संघ से पृथक हुए ---

(१) कॉकेशिया के ३ देशों -- अजरबेजान, आर्मेनिया, और जॉर्जिया;
(२) मध्य-एशिया के ५ देशों -- कजाकस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, और ताजिकिस्तान; व
(३) पूर्वी यूरोप के ६ देशों -- यूक्रेन, बेलारूस, मोल्दोवा, लातविया, लिथुआनिया, और एस्तोनिया;
(कुल १४ देशों) पर अपना अधिकार कर लिया है। इसमें रूस को किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। बड़े आराम से उसने ऐसा कर लिया। पता नहीं ऐसा होगा या नहीं, पर रूस के मनोविज्ञान में यह सुप्त कामना अवश्य है।
रूस को अजरबेजान से पृथक करने वाली पर्वतमाला के आसपास का क्षेत्र कॉकेशिया कहलाता है। अफगानिस्तान व ईरान के उत्तर में पाँच मध्य-एशियाई देश हैं, जो कभी अखंड भारत के भाग थे।
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चीन के निश्चित रूप से कम से कम सात टुकड़े हो जाएँगे। इस के ऊपर एक लेख भी लिख चुका हूँ।
पूरा रूस एक दिन ईसाईयत को त्याग कर सनातन धर्मावलम्बी हो जाएगा।
कृपा शंकर
२२ जनवरी २०२६

Wednesday, 21 January 2026

मेरे जीवन का हर एक क्षण परमात्मा की अभिव्यक्ति है --- .

 मेरे जीवन का हर एक क्षण परमात्मा की अभिव्यक्ति है ---

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मेरे जीवन में आने वाले, और आये हुए हरेक प्रश्न का एक ही उत्तर है; और वह उत्तर है -- "परमात्मा की इच्छा"। इस से अन्य सब उत्तर गलत हैं। मेरे में कभी कोई स्वतंत्र इच्छा न तो थी, न ही है, और न ही कभी होगी। मेरे में कुछ समय के लिए एक विजातीय पश्चिमी आसुरी विचार आ गया था कि मैं "स्वनिर्मित" यानि "Self made" हूँ। यह एक गलत विजातीय विचार था जो मैंने कभी का दूर कर दिया है। मेरे जीवन की सभी समस्याओं, सभी अभावों, प्रचूरता, पीड़ाओं, आनंद, व आस्थाओं का एकमात्र स्त्रोत -- परमात्मा है। परमात्मा ने ही यह जीवन जीया है, और इस शरीर की अंतिम सांस तक वे ही इस शरीर में जीवन जीयेंगे।
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अभी लिखने के लिए और कुछ भी नहीं बचा है। जो कुछ भी मैं लिखना चाहता था, वह सब कुछ लिख चुका हूँ। सम्पूर्ण अस्तित्व परमात्मा है, और परमात्मा को ही यह जीवन समर्पित भाव से व्यक्त कर रहा है। मैं जीवित हूँ, या मैं साँसें ले रहा हूँ, यह मेरा एक मिथ्या भ्रम है। वास्तव में इस शरीर में परमात्मा ही जीवित हैं, और वे ही इस शरीर में साँसे ले रहे हैं। परमात्मा के ही एकमात्र अस्तित्व, उनकी सर्वव्यापक प्रकाशमय अनंतता, और उनके परमप्रेम के प्रति मैं निरंतर सजग हूँ। परमात्मा का अस्तित्व ही मेरा अस्तित्व है, मैं उनसे पृथक नहीं, उनके साथ एक हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२१ जनवरी २०२५

Tuesday, 20 January 2026

अपनी बुद्धि परमात्मा को बापस कर दें ---

 अपनी बुद्धि परमात्मा को बापस कर दें ---

श्रुति भगवती के आदेशानुसार बुद्धिमान् ब्राह्मण को चाहिए कि परमात्मा को जानने के लिए उसी में बुद्धि को लगाये, अन्य नाना प्रकार के व्यर्थ शब्दों की ओर ध्यान न दे, क्योंकि वह तो वाणी का अपव्यय मात्र है|
तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः |
नानुध्यायाद् बहूब्छब्दान्वाची विग्लापन हि तदिति ||बृहद., ४/४/२९)
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नित्य की प्रार्थना --
"वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् | देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम् ||"
"वंशी विभूषित करा नवनीर दाभात्,
पीताम्बरा दरुण बिंब फला धरोष्ठात् |
पूर्णेन्दु सुन्दर मुखादर बिंदु नेत्रात्,
कृष्णात परम किमपि तत्व अहं न जानि ||"
"ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नम:||"
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च,
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः||"
"मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् । यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्||"
"कस्तुरी तिलकम् ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम् ,
नासाग्रे वरमौक्तिकम् करतले, वेणु करे कंकणम् |
सर्वांगे हरिचन्दनम् सुललितम्, कंठे च मुक्तावलि |
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी ||"
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ||"
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कृपा शंकर
२० जनवरी २०२०

निष्काम कर्मयोग ---

निष्काम कर्मयोग ---
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अपने आप को बिना किसी शर्त के व बिना किसी माँग के भगवान के हाथों में सौंप कर निरंतर उनका चिंतन -- निष्काम कर्म है, यही कर्मयोग है और यही ध्यान है| कोई भी कामना कभी तृप्त नहीं करती, कामनाओं से मुक्ति ही तृप्ति है| परमात्मा में स्थित होकर ही तृप्त हो सकते हैं| भगवान के ध्यान में साधक भी वे हैं, साधना भी वे हैं और साध्य भी वे ही हैं| यहाँ तक कि दृष्य, दृष्टी और दृष्टा भी वे ही हैं|
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२० जनवरी २०२०

भारत एक धर्मनिष्ठ राष्ट्र है, जिसका लक्ष्य सनातन काल से ही धर्म की स्थापना रहा है ---

अब समय आ गया है जब धर्मरक्षा हेतु सनातन हिन्दू धर्मावलम्बी अपने धर्म का पालन करें| हिन्दू धर्म, व देवी-देवताओं के अपमान की सजा मृत्यु-दंड हो| हिन्दू आस्थाओं पर अधर्मियों द्वारा निरंतर मर्मांतक प्रहार किए जा रहे हैं, जो अब असह्य हैं|

देश के संविधान से हिन्दू विरोधी धाराएँ हटाई जाएँ| समान-नागरिक-संहिता लागू हो, और जनसंख्या पर नियंत्रण किया जाये| अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक अवधारणाओं को परिभाषित किया जाये|
भारत एक धर्मनिष्ठ राष्ट्र है, जिसका लक्ष्य सनातन काल से ही धर्म की स्थापना रहा है| कृपा शंकर २० जनवरी २०२१

माँ ---

 माँ ---

प्राण-तत्व के रूप में, इस देह की सुषुम्ना नाड़ी में मूलाधार से ब्रह्मरंध्र, व उस से भी परे तक, विचरण कर रही जगन्माता ही मेरे प्राण, और यह जीवन है|
पूरी सृष्टि को उन्होने ही धारण कर रखा है| घनीभूत होकर वे ही कुंडलिनी महाशक्ति हैं| सारी क्रियाएँ वे ही कर रही हैं|
मुझे निमित्त बनाकर, परमशिव का ध्यान भी वे स्वयं ही कर रही हैं| वे ही मेरे गति है| उन माँ भगवती के श्रीचरणों में मैं नतमस्तक हूँ|
२० जनवरी २०२१

Sunday, 18 January 2026

आध्यात्म में कुछ पाने या प्राप्ति की कामना एक मरीचिका है ---

आध्यात्म में कुछ पाने या प्राप्ति की कामना एक मरीचिका है। जो कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है, वह तो हम "स्वयं" हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर मार्ग-दर्शन सब को प्राप्त होता है। कोई यदि यह कहे कि उसे मार्ग-दर्शन नहीं मिला है तो वह झूठ बोल रहा है। भगवान की कृपा सब पर समान रूप से है।

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भगवान गीता में कहते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् - हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
(अनन्यचित्त अर्थात् नित्य-समाधिस्थ जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा का स्मरण करता है। सततम् का अर्थ है निरंतरता। नित्यशः का अर्थ है नित्य जीवन पर्यंत। ऐसे व्यक्ति को भगवान की प्राप्ति अनायास ही हो जाती है)
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यह विषय बहुत अधिक गहन और बहुत अधिक लंबा है जिसका कोई अंत नहीं है। अतः इसका समापन यहीं कर रहा हूँ। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२२