Wednesday, 25 February 2026

कुछ विचार ---

 (1) ब्रह्म ह्त्या ........

(2) जीव की अंतिम नियति ही है ..... पूर्ण समर्पण .......
(3) संक्षिप्त में कुछ विचार ......
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(1) ब्रह्म हत्या ......
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ब्रह्महत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है| मेरी अल्प और सीमित समझ से ब्रह्महत्या के दो अर्थ हैं ..... एक तो अपने स्वयं में अन्तस्थ परमात्मा को विस्मृत कर देना, और दूसरा है किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा की ह्त्या कर देना|
श्रुति भगवती कहती है कि अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर देना भी उसका हनन यानि ह्त्या है| सांसारिक उपलब्धियों को हम अपनी महत्वाकांक्षा, लक्ष्य और दायित्व बना लेते हैं| पारिवारिक, सामाजिक व सामुदायिक सेवा कार्य भी हमें करने चाहियें क्योंकि इनसे पुण्य मिलता है, पर इनसे आत्म-साक्षात्कार नहीं होता|
हमारे कूटस्थ ह्रदय में सच्चिदानन्द ब्रह्म यानि स्वयं भगवान बैठे हुए हैं| हम संसार की हर वस्तु की ओर ध्यान देते हैं पर परमात्मा की ओर नहीं| हम कहते हैं कि हमारा यह कर्तव्य बाकी है और वह कर्तव्य बाकी है पर सबसे बड़े कर्तव्य को भूल जाते हैं कि हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है| बच्चों की शिक्षा, बच्चों को काम पर लगाना, व्यापार की सँभाल करना आदि आदि में ही जीवन व्यतीत हो जाता है| जो लोग कहते हैं कि हमारा समय अभी तक नहीं आया है, उनका समय कभी आयेगा भी नहीं|
भगवान को भूलना भी ब्रह्म-ह्त्या का पाप है| आजकल गुरु बनने और गुरु बनाने का भी खूब प्रचलन हो रहा है| गुरु पद पर हर कोई आसीन नहीं हो सकता| एक ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय और परमात्मा को उपलब्ध महापुरुष ही गुरु हो सकता है जिसे अपने गुरु द्वारा अधिकार मिला हुआ हो|
सार कि बात यह कि भगवान को भूलना भी ब्रह्महत्या है, और भगवान को भूलने वाले ब्रह्महत्या के दोषी हैं जो सबसे बड़ा पाप है|
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(2) जीव की अंतिम नियति ही है --- पूर्ण समर्पण .......
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मनुष्य योनी में जीव का जन्म होता ही है पूर्ण समर्पण का पाठ सीखने के लिए| अन्य सब बातें इसी का विस्तार हैं| यह एक ही पाठ प्रकृति द्वारा निरंतर सिखाया जा रहा है| कोई इसे देरी से सीखता है, कोई शीघ्र| जो नहीं सीखता है वह इसे सीखने को बाध्य कर दिया जाता है|
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लोकयात्रा के लिए हमें जो देह रूपी वाहन दिया गया है वह नश्वर और अति अल्प क्षमता से संपन्न है| बुद्धि भी अति अल्प और सिमित है, जो कुबुद्धि ही है| चित्त नित-नूतन वासनाओं से भरा है| अहंकार महाभ्रमजाल में उलझाए हुए है| मन अति चंचल और लालची है| ये सब मिलकर इस मायाजाल में फँसाए हुए है जिसे तोड़ने का पूर्ण समर्पण के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग ही नहीं है| हमें आता जाता कुछ नहीं है पर सब कुछ जानने का झूठा भ्रम पाल रखा है|
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(3) संक्षिप्त में कुछ विचार .......
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माता पिता परमात्मा के अवतार हैं, उनका पूर्ण सम्मान करें|
प्रातः और सायं विधिवत साधना करनी चाहिए| निरंतर प्रभु का स्मरण रहे|
गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का नित्य पाठ करना चाह्हिए|
कुसंग का सर्वदा त्याग|
कर्ताभाव से मुक्ति|
किसी भी प्रकार के नशे का त्याग|
सात्विक भोजन|
एकाग्रता से अनन्य भक्ति|
वैराग्य और एकांत का अभ्यास|
भगवान का अनन्य भक्त ही ब्राह्मण है| हर श्रद्धालु क्षत्रिय है|
सिर्फ नाम या वस्त्र बदलने से कोई विरक्त नहीं होता|
वैराग्य प्रभु कि कृपा से ही प्राप्त होता है|
गुरुलाभ भी भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है|
संन्यास मन की अवस्था है|
तामसिक साधनाओं से बचें|
साधना के फल का भगवान को अर्पण|
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ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||
२५ फरवरी २०१६

आसुरी आत्माएं कभी कभी बहुत परेशान करती हैं। भगवान उनसे हमारी रक्षा भी करते हैं।

आज प्रातःकाल उठते ही प्रेरणा मिली कि मैं आज प्राण-तत्व, आकाश-तत्व और परमशिव के बारे में कुछ लिखूं| पर ज्यों ही लिखने को उद्यत हुआ तब सूक्ष्म जगत में भटक रही एक-दो नरपिशाच रही आसुरी प्रेतात्माओं की स्मृति आ गयी जिन्होनें तुरंत आकर मेरे दिमाग में एक ऐसा विक्षेप डाल दिया कि मैं विषय से भटक गया और उपरोक्त विषयों पर कुछ भी लिखना असंभव हो गया| साधना के मार्ग पर देवता भी मिलते हैं और असुर भी जिनसे रक्षा गुरु महाराज के रूप में जगन्माता ही करती हैं|

मेरा सौभाग्य देखिये कि यहाँ से सैंकड़ों मील दूर वर्तमान में नर्मदा तट के पास प्रवास कर रहे एक सिद्ध सन्यासी महात्मा जी का अपने आप ही एक घंटे पूर्व एक विडिओ कॉल आया जिसमें उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष लगभग एक घंटे तक उपदेश और सत्संग लाभ देकर मेरे उद्वेलित मन को तो शांत किया ही, मानस में छिपे हुए सारे अव्यक्त प्रश्नों का उत्तर भी दे दिया| अब कोई जिज्ञासा या ऐसी बात नहीं रही है जो कोई रहस्य हो|
अभी तो परमात्मा का ध्यान करने की प्रेरणा मिल रही है| फिर कभी सार की बात लिखूंगा|
ॐ तत्सत् ! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! श्रीगुरवे नमः !
कृपा शंकर
२५ फरवरी २०१९

Tuesday, 24 February 2026

हमारा शिव-संकल्प, अंतर्दृष्टि, प्राण-तत्व और गुरुकृपा ..... ये साधन हैं, जिनकी सहायता से परमशिव का ध्यान किया जाता है ---

 हमारा शिव-संकल्प, अंतर्दृष्टि, प्राण-तत्व और गुरुकृपा ..... ये साधन हैं, जिनकी सहायता से परमशिव का ध्यान किया जाता है| परमशिव एक अनुभूति है जो परमात्मा की परमकृपा से उनके द्वारा भेजे हुए सद्गुरु के मार्गदर्शन से होती है| गुरु का भौतिक देहधारी होना आवश्यक नहीं है| सूक्ष्म जगत की महान आत्मायें भी गुरु रूप में मार्ग-दर्शन कर सकती हैं|

प्राण का घनीभूत रूप कुंडलिनी महाशक्ति है| कुंडलिनी महाशक्ति और परमशिव का मिलन 'योग' है|
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जब हृदय में भगवान से परमप्रेम (भक्ति) और उन्हें पाने की अभीप्सा जागृत होती है, तब सद्गुरु लाभ होता है| भगवान श्रीकृष्ण स्वयं परात्पर गुरु रूप में निष्ठावान साधकों का मार्गदर्शन और रक्षा कर रहे हैं| भगवद्गीता के रहस्य उन्हीं की कृपा से समझ में आ सकते हैं, अन्यथा नहीं| वे हमारे अंतर में सर्वदा बिराजमान हैं| उनका आभास उनकी परमकृपा से ही होता है| हमारे हिमालय जैसे बड़े बड़े पाप भी उनके विराट कृपासिंधु में छोटे-मोटे महत्वहीन कंकर-पत्थर से अधिक नहीं हैं| सब कर्मफलों से मुक्ति और आगे की गतियाँ उनकी कृपा से होती हैं| वे ही परमब्रह्म हैं, वे ही जगन्माता हैं|
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ब्रह्मरंध्र से परे अनंत महाकाश है| उस से भी बहुत परे श्वेत क्षीरसागर है जहाँ भगवान नारायण, परमशिव के रूप में बिराजमान हैं| उनके दर्शन एक विराट पंचकोणीय श्वेत नक्षत्र के रूप में होते हैं| वे पंचमुखी महादेव हैं| उनके संकल्प से ही यह सारी सृष्टि निर्मित हुई और चलायमान है| गीता में उस लोक के बारे में कहा गया है ....
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः| यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम||"
श्रुति भगवती कहती है .....
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः| तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति||"
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उन परमात्मा की परमकृपा मुझ अकिंचन पर और हम सब पर सदा बनी रहे|
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च| नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते||
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व| अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः||"
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ नमः शिवाय! ॐ ॐ ॐ!!
कृपा शंकर
२४ फरवरी २०२०

Monday, 23 February 2026

हरियाणा की बर्बादी ---

 हरियाणा की बर्बादी

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हरियाणा में आरक्षण के आन्दोलन के नाम पर जो हुआ है उससे मैं सिहर गया हूँ, मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि ऐसा आत्मघाती विध्वंश और विनाश भारत के लोग कर सकते है| यह भारत को एक गृहयुद्ध में धकेलने और भारत को सीरिया, इराक और लीबिया बनाने की तैयारी थी|
पुलिस थानों और रेलवे स्टेशनों को जला दिया गया, रेल के इंजन जला दिए गए, रेल की पटरियाँ उखाड़ दी गईं, बसों को जला दिया गया, अन्य जातियों की दुकानों को लूट कर जला दिया गया, और दिल्ली का पानी बंद कर दिया गया| टीवी पर अब बर्बादी के जो दृश्य दिखाए जा रहे हैं उन्हें देखकर कोई भी काँप जाएगा| पूरा प्रशासन विफल हो गया था| आन्दोलनकारी लोग सेना तक से भी लड़ने और मरने मारने को तैयार हो गए थे|
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धिक्कार है ऐसे आन्दोलनों पर, ऐसी बहादुरी पर और ऐसे आरक्षण पर| यह पूरे भारतवासियों के माथे पर एक कलंक था| पूरा भारत इस पर शर्मसार है|
धिक्कार है जातिगत आरक्षण पर| यह पूरे भारत को बर्बाद कर देगा|
देश में आरक्षण हो सिर्फ .......
(१) अपंगों और अनाथों के लिए,
(२) देश पर शहीद होने वालों के बच्चों के लिए|
अन्य किसी के लिए भी नहीं| गरीबों को आर्थिक सहायता दो, आरक्षण नहीं| गरीबी को महिमान्वित मत करो|
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ऐसे आन्दोलन देश में अन्यत्र भी चलाने के प्रयास हुए जो ईश्वर की कृपा से सफल नहीं हुए| मेरी आस्था उन राजनीतिकों से उठ गयी है जो सता के लिए देश की ह्त्या करने को तैयार हैं|
अब तो सिर्फ भगवान ही मालिक है|
(इस तरह के आन्दोलन पूर्व में भी हुए हैं जैसे तमिलनाडु में हिंदी के विरोध में, आंध्रप्रदेश में पृथक आंध्र के विरोध में, और राजस्थान में गुर्जर आरक्षण के लिए)
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ॐ शिव शिव शिव शिव शिव ||
24 फरवरी 2016

श्रीमयी के विवाह का निमंत्रण

 वैवाहिक निमंत्रण

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हमारे आराध्य देव भगवान शिव, कुलदेवी, पितृगणों, और गुरु परम्परा के गुरुओं के आशीर्वाद व आत्मीयजनों की शुभ कामनाओं से हमारी --
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स्वस्तिमयी हृदयकणिका सौभाग्यकांक्षिणी पुत्री --- श्रीमयी --- का मंगल परिणयोत्सव ....
चैत्र कृष्ण तृतीया सोमवार दिनांक ९ मार्च २०१५ को शुभ लग्नानुसार वेद मन्त्रों व मंगल गीतों के साथ धरा, अम्बर, वरुण, पवन एवं अग्नि की साक्षी में स्वस्तिमय हृदयांश चिरंजीवी --- शेखर --- के साथ संपन्न होगा|
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इस अवसर पर शहनाई की मंगलमय मधुर ध्वनी और वेदमंत्रों के मध्य नव युगल की नूतन अंकुरित सुरभित मंगलमय शुभ आकांक्षाओं व अभिलाषाओं को अपने स्नेहाशीषों की निर्मल वर्षा से अभिसिंचित कर हमें अनुगृहित करें|
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२४ फरवरी से नित्य नियमित रूप से मध्याह्न में हमारे घर पर मंगल गीतों के गायन हमारे घर-परिवार, कुटुम्ब-कबीले की परमस्नेही मातृशक्ति द्वारा हो रहे हैं|
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माता पिता की भावनाएँ .......
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रणत भँवर रा लाडला गौरीपुत्र गणेश, रिद्धि सिद्धि सहित पधारियो ब्रह्मा विष्णु महेश|
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हमारी लाडली के मामा आयेंगे भात चूनरी लायेंगे,
आप सब के साथ मिलकर हम भी मंगल गीत गायेंगे|
कुम्भकार के चाक से कलशपूजन भी होगा,
गृहस्थी की नींव का गुरुमंत्र यह होगा|
सौलह श्रृंगार के साथ होगी मेंहदी की भी रीत,
हमारी लाडली की हथेली पर उकरेगी पिया की प्रीत|
विवाह पूर्व ही होगा हल्द हाथ और बान,
आपके आगमन से बढ़ जाएगा हमारा मान|
विवाह की पूर्वसंध्या पर लाड चाव संगीत होगा,
ढोल नगाड़े गीत नृत्य से चिर स्मरणीय दिवस होगा|
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फूलों की वादियों ने सुनी ह्रदय की बात,
आप अवश्य पधारना संग खुशियों की सौगात|
इस मधुरिम बेला पर आपके आशीष से जीवन पुष्प खिलेगा,
प्रसन्नता हम सब को होगी हमें गौरव व संबल मिलेगा|
तारों की छांव में जब लाडली विदा होगी,
जन्म से लेकर अब तक की स्मृति आँखों में होगी|
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संसार की रीति का मुझको करना होगा निर्वाह,
हंसती खेलती वह सुख से रहे यही हमारे ह्रदय की चाह|
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सस्नेह दर्शनाभिलाषी ----
कृपा शंकर
संतोष
२४ फरवरी २०१५
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विवाह स्थल : गाड़िया सभागार (टाउन हॉल) झुंझुनू (राजस्थान).

हृदय में परमात्मा हो तो मनुष्य विपरीततम परिस्थितियों में भी महानतम कार्य कर सकता है ---

हृदय में परमात्मा हो तो मनुष्य विपरीततम परिस्थितियों में भी महानतम कार्य कर सकता है ---

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(संशोधित व पुनःप्रेषित लेख) --- दो तीन वर्ष पूर्व मैनें इंदौर की प्रातःस्मरणीया, भगवान् शिव की मानसपुत्री, शिवकन्या महारानी अहिल्याबाई होलकर के बारे में कुछ साहित्य पढ़ा था जिससे मैं अत्यधिक प्रभावित हुआ था| इनके गौरव और महानता के बारे में जितना लिखा जाए उतना ही कम है| आज अंतर्प्रेरणा से अपने दो वर्ष पुराने एक लेख को संशोधित कर पुनर्प्रेषित कर रहा हूँ| . व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विकटतम कष्ट और प्रतिकूलताओं के पश्चात् भी इन्होने महानतम कार्य किये| इतने महान कार्य कि जिनकी तुलना नहीं की जा सकती| इनका विवाह मल्हार राव होलकर के बेटे खाण्डेराव के साथ हुआ था जिनकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी| इनके एकमात्र पुत्र मालेराव भी जीवित नहीं रहे| इनकी एकमात्र कन्या बालविधवा हो गयी और पति की चिता में कूद कर स्वयं के प्राण त्याग दिए| अपने श्वसुर मल्हारराव होलकर की म्रत्यु के समय ये मात्र ३१ वर्ष की थी और राज्य संभाला| अपने दुर्जन सम्बन्धियों व कुछ सामंतों के षडयंत्रों और तमाम शोक व कष्टों का दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए इन्होने अपने राज्य का कुशल संचालन किया| अपना राज्य इन्होने भगवान शिव को अर्पित कर दिया और उनकी सेविका और पुत्री के रूप में राज्य का कुशल प्रबंध किया| राजधानी इंदौर उन्हीं की बसाई हुई नगरी है| जीवन के सब शोक व दु:खों को शिव जी के चरणों में अर्पित कर उनके एक उपकरण के रूप में निमित्त मात्र बन कर जन कल्याण के व्रत का पालन करती रही| उनके सुशासन से इंदौर राज्य ऐश्वर्य और समृद्धि से भरपूर हो गया|

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अहिल्याबाई ने सोमनाथ मंदिर के भग्नावशेषों के बिलकुल निकट एक और सोमनाथ मंदिर बनवाकर प्राण प्रतिष्ठा करा कर पूजा अर्चना और सुरक्षा आदि की व्यवस्था की| वाराणसी का वर्तमान विश्वनाथ मन्दिर, गयाधाम का विष्णुपाद मंदिर आदि जो विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा विध्वंश हो चुके थे, इन्हीं के प्रयासों से पुनर्निर्मित हुए| हज़ारों दीन दुखियारे बीमार और साधू लोग इन्हें करुणामयी माता कह कर पुकारते थे| सेंकडों असहाय लोगों और साधू संतों को अन्न वस्त्र का दान इनकी नित्य की दिनचर्या थी| पूरे भारतवर्ष में अनगिनत मंदिर, सडकें, धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, सदावर्त, तालाब और नदियों के किनारे पक्के घाट इन्होने बनवाए| नर्मदा तट पर पता नहीं कितने तीर्थों को वे जागृत कर गईं| महेश्वर तीर्थ इन्हीं के प्रयासों से धर्म और विद्द्या का केंद्र बना| अमरकंटक में यात्री निवास और जबलपुर में स्फटिक पहाड़ के ऊपर श्वेत शिवलिंग स्थापित कराया| परिक्रमाकारियों के लिए व्यवस्थाएं कीं| ओम्कारेश्वर में ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति की| वहां प्रतिदिन पंद्रह हज़ार आठ सौ मिटटी के शिवलिंग बना कर पूजे जाते थे, फिर उनका विसर्जन कर दिया जाता था| बदरीनाथ के मार्ग में एक गाँव आता है जिसका नाम गोचर है| वहाँ की भूमि को खरीद कर उन्होंने गायों के चरने के लिए छोड़ दिया|
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यहाँ दो शब्द उनके श्वसुर मल्हार राव के बारे में भी लिखना उचित रहेगा| छत्रपति शिवाजी के पोते साहू जी ने एक चित्तपावन ब्राह्मण विश्वनाथ बालाजी बाजीराव (प्रथम) को पेशवा नियुक्त किया| एक बार बालाजी बाजीराव वेश बदल कर बिना सुरक्षा व्यवस्था के तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़े| मार्ग के एक गाँव में उनको मुगलों के जासूसों ने पहचान लिया और उनकी हत्या के लिए बीस मुग़ल सैनिक पीछे लगा दिए|
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मल्हार राव ने कुछ भैंसे पाल रखीं थीं और उस गाँव में दूध बेच कर गुजारा करते थे| वे मुग़ल जासूस भी उन्हीं से दूध खरीदते थे| उनकी आपसी बातचीत से मल्हार राव को सब बातें स्पष्ट हो गईं| उनकी देशभक्ति जागृत हो गयी और चुपके से उन्होंने पेशवा को ढूंढकर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी| यही नहीं पेशवा को एक संकरी घाटी में से सुरक्षित निकाल कर भेज दिया और उनकी तलवार खुद लेकर उन बीस मुगलों को रोकने खड़े हो गए| उस तंग घाटी से एक समय में सिर्फ एक ही व्यक्ति निकल सकता था| ज्यों ही कोई मुग़ल सैनिक बाहर निकलता, मल्हार राव की तलवार उसे यमलोक पहुंचा देती| उन्होंने पांच मुग़ल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया| इसे देख बाकी पंद्रह मुग़ल सैनिक गाली देते हुए बापस लौट गए| उन्होंने मल्हार राव के घर को आग लगा दी, उसके बच्चों और पत्नी की हत्या कर दी व भैंसों को हाँक कर ले गए|
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मल्हार राव, पेशवा बाजीराव के दाहिने हाथ बन कर उनके साथ हर युद्ध में रहे| समय के साथ बाजीराव विश्व के सफलतम सेनानायक बने| उन्होंने अनेक युद्ध लड़े और कभी भी पराजित नहीं हुए| वे महानतम हिन्दू सेनानायकों में से एक थे| उन्होंने कभी पराजय का मुंह नहीं देखा| उनकी असमय मृत्यु नहीं होती तो भारत का इतिहास ही अलग होता| पेशवा बाजीराव ने वर्तमान इंदौर क्षेत्र का राज्य मल्हार राव होलकर को दे दिया था जहाँ की महारानी परम शिवभक्त उनकी पुत्रवधू अहिल्याबाई बनी|
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हमें गर्व है ऐसी शासिका पर| दुर्भाग्य से भारत में धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ऐसे महान व्यक्तियों के इतिहास को नहीं पढाया जाता| भारत के अच्छे दिन भी लौटेंगे| इस लेख को लिखने के पीछे यही स्पष्ट करना था की यदि ह्रदय में भक्ति और श्रद्धा हो तो व्यक्ति कैसी भी मुसीबतों का सामना कर जीवन में सफल हो सकता है| २३ फरवरी २०१५

Sunday, 22 February 2026

'सत्संग' की मेरी अवधारणा ----

'सत्संग' की मेरी अवधारणा ----

कुसंग के सर्वदा त्याग और सत्संग की महिमा से हमारे ग्रन्थ भरे पड़े हैं| पर आज के परिप्रेक्ष्य में सत्संग को परिभाषित करना भी अत्यंत आवश्यक है| सामान्य भाषा में सत्संग का अर्थ होता है -- 'सत्य' का संग| पर 'सत्य' क्या है इसकी भी स्पष्ट अवधारणा होनी चाहिए| 'सत्य' अपने आप में इतना विराट है कि उस के अर्थ को सीमित करना असम्भव है| यह एक कटोरी में महासागर को भरने के प्रयास जैसा है| सीमित बुद्धि से इसे समझने का प्रयास भी कनक कसौटी पर हीरे को कसना है|
पर क्या 'सत्य' वास्तव में अपरिभाष्य है?
इसकी अनुभूति की जा सकती है, इसकी झलक पाई जा सकती है; ऐसा मेरा अनुभव है| शब्दों में ही व्यक्त करना चाहें तो असम्भव है| अधिक से अधिक इतना ही कह सकते हैं कि भगवान ही एकमात्र सत्य हैं| भगवान को भी 'सच्चिदानंद' से अधिक और कुछ कहना कम से कम मेरे लिए तो सम्भव नहीं है| मैं ना तो भगवान को सीमित कर सकता हूँ और ना ही गुरु तत्व को|
दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि इस सृष्टि में 'निराकार' कुछ भी नहीं है| सब कुछ 'साकार' है| जो भी सृष्ट हुआ है वह साकार है| जो साधक अपने को निराकार के साधक कहते हैं वे भी या तो भ्रूमध्य में प्रकाश, किसी पवित्र मन्त्र, या अपने गुरु के भौतिक स्वरुप का ध्यान करते हैं| यह भी साकारता ही है, इसमें निराकारता कहाँ हुई? परमात्मा की सर्वव्यापकता का आभास और उस में समर्पण भी साकारता ही है| सृष्टि निरंतर परिवर्तनशील है| विचार और चेतना भी परिवर्तित होती रहती है| अतः जो भी साकार है वह भी परिवर्तनशील है|
अतः कुछ ना कुछ या किसी ना किसी रूप में परमात्मा की साकारता की भी परिकल्पना करनी ही होगी और उस का नित्य निरंतर संग भी करना होगा|
मेरे विचार से यही 'सत्संग' है|
जो भी इससे परे ले जाए वह चाहे कोई व्यक्ति हो या कोई विचार, उसका संग ही कुसंग है जो सर्वदा त्याज्य है|
अब मैं मेरी व्यक्तिगत बात करूँगा जिसमें मेरी चिंतनधारा को व्यक्त करने का प्रयास है| यह कोई अहंकार की यात्रा नहीं है| इसका कोई उद्देष्य नहीं है|
जैसे नदी बहती है, फूल खिल कर अपनी सुगंध फैलाते हैं व प्रकृति अपना कार्य करती है --- उसका कोई उद्देष्य नहीं है| यह उसका स्वभाव है| वैसे ही प्रेम मेरा स्वभाव है जो व्यक्त हुए बिना नहीं रह सकता| मेरे लिए प्रभु के प्रेम में मग्न रहना ही 'सत्संग' है| इससे परे और कुछ भी मेरे लिए नहीं है|
मैं उन सब को नमन करता हूँ जो भगवान को प्रेम करते है| मैं उन के चरणों का सेवक मात्र हूँ, उस से अधिक कुछ भी नहीं|
परमात्म रूप में व्यक्त आप सब को मेरा प्रणाम| ॐ ॐ ॐ ||
२२ फरवरी २०१४