Saturday, 27 June 2026

मोहनदास करमचंद गांधी को "महात्मा गांधी" किसने बनाया?

 


आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं।

आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं। सभी श्रद्धालुओं को नमन। हनुमान जी का प्राकट्य हमारे निज जीवन में हो, तभी इस उत्सव की सार्थकता है। श्रीहनुमान जी हमारी चेतना में हैं, कहीं बाहर नहीं। यह उत्सव प्रतिवर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा १ अप्रैल २०२६ को प्रातः ७ बजकर ६ मिनट से २ अप्रैल को प्रातः ७ बजकर ४१ मिनट तक थी। उदया तिथि के चलते हनुमान जयंती का उत्सव २ अप्रैल २०२६ को मनाया जा रहा है।

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मैं जो कुछ भी लिखने जा रहा हूँ, आज इसे लिखने की मुझे एक आंतरिक अनुमति है। लेकिन इसे वे ही समझ पायेंगे जिन पर भगवान की अनुकंपा है।
श्रीहनुमान जी की अनुभूतियाँ हमें गहरे ध्यान में होती है। जब भी हम सांस लेते हैं, तब हम पाते हैं कि वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य विचरण कर रहे हैं। और भी गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र के ऊपर का आवरण हट जाता है, और सूक्ष्म जगत में ईश्वर की अनंतता से भी परे एक ज्योतिर्मय जगत के दर्शन होते हैं जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
श्रुति भगवती जिसके बारे में कठोपनिषद (२.२.१५) व मुंडकोपनिषद (२.२.१०) में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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उपरोक्त अनुभूतियाँ हमें हनुमान जी की परम कृपा से ही होती हैं जो प्राण-तत्व और वायु-तत्व के देवता हैं। वे हमें भक्ति, शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें निस्वार्थ सेवा और समर्पण सिखाते हैं। वे हमारी हर सांस में जीवित और अमर हैं। उनका निवास मेरे हृदय (विचारों व भावों) में और मेरी साँसों में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। ध्यान में उनकी निरंतर अनुभूति मुझे अपनी चेतना में होती है। मुझे अपना माध्यम बना कर वे भगवान श्रीराम का ध्यान स्वयं करते हैं। यह उनकी परम अनुकंपा है। मैं उन्हें नमन करता हूँ। उन्हीं की परम कृपा मुझे राम जी का बोध कराती है।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥" ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर / २ अप्रेल २०२६

अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है ----

 जिसके हृदय में परमात्मा को उपलब्ध होने की भूख-प्यास और तड़प है, व अपनी सारी वेदनाओं के पश्चात भी जिसे परमात्मा से परमप्रेम है, वही वास्तविक भक्त है; अन्य सब लाभार्थी व्यापारी हैं, जिनके लिए अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है।

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कुछ भी पाने की आकांक्षा एक सूक्ष्म अहंकार है। आध्यात्म में महत्व कुछ होने का है, न कि कुछ पाने का। परमात्मा को अपने समर्पण की पूर्णता पर ही ध्यान दें। किसी भी तरह की कोई अपेक्षा या कामना न रखें। जो कुछ भी पाया जाता है, वह खोया भी जाता है। पाने को अब कुछ भी नहीं होना चाहिये। अनेक जन्मों से संचित पुण्यकर्मफलों का जब उदय होता है तब भगवान की भक्ति जागृत होती है। धन्य हैं वे सब लोग जिनमें भगवान की भक्ति जागृत है।
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हमारे में एक चुम्बकत्व (आकर्षण) है, वह चुम्बकत्व ही हमारे सारे कार्य करेगा। हम सिर्फ अपने समर्पण की पूर्णता पर ही ध्यान दें। हमारे विचारों में स्पष्टता और दृढ़ता हो, व किसी भी तरह का कोई संशय नहीं हो। किसी से कोई अपेक्षा मत रखो। ईश्वर से संवाद हेतु शब्दों की नहीं, भावों की आवश्यकता है। कौन किसके प्रति समर्पित हो? कौन किसको याद करे? कोई अन्य है ही नहीं। हमारा अस्तित्व परमात्मा को समर्पित है। परमात्मा की इस समग्रता को नमन !!
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जिसको भूख लगी है, वही भोजन करेगा, जिसको प्यास लगी है, वही पानी पीयेगा, जिसके हृदय में परमात्मा के लिये घोर अभीप्सा (अतृप्त असीम प्यास) है, वही भक्ति करेगा। अदम्य भयहीन साहस व निरंतर अध्यवसाय के बिना कोई आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती। संसार की उपलब्धियों के लिए जितने साहस और संघर्ष की आवश्यकता है, उस से कहीं बहुत अधिक संघर्ष और साहस आध्यात्मिक जीवन के लिए करना पड़ता है।
आप सब को नमन। आपका जीवन कृतकृत्य व कृतार्थ हो। ॐ शिव !!
कृपा शंकर
३ अप्रेल २०२६

सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।

 सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।

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सारी भागदौड़ और प्रयासों के पश्चात जब भी मैं स्वयं में स्थित होता हूँ, तो पाता हूँ कि जिसे में खोज रहा था, वह तो मैं स्वयं हूँ॥ गीता में भगवान कहते हैं ---
"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि 'यह सब वासुदेव है' ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है; ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है॥
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सारी सृष्टि सारा ब्रह्मांड -- मेरा शरीर है, सारे प्राणी मेरा परिवार हैं। मैं कूटस्थ ज्योतिर्मय ब्रह्म (निरंतर विस्तृत, सर्वव्यापक) परमशिव (परम कल्याणकारी) हूँ, जो इस समय यह एक अति साधारण, सामान्य, अकिंचन मनुष्य बन गया है।
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इस समय मैं एक निमित्त मात्र हूँ, कर्ता तो परमशिव है। मैं जो कुछ भी लिखता हूँ, वह मेरा सत्संग है, जिसका एकमात्र उद्देश्य -- अपने स्वयं, सनातन-धर्म और भारत के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करना है। मैं अपने या किसी अन्य के मनोरंजन के लिए बिल्कुल भी नहीं लिखता। कौन क्या सोचता है यह उसकी समस्या है, मेरी नहीं। ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ अप्रेल २०२६

सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --

 सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --

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जब तक हमारे विचारों व भावों में तमोगुण की प्रधानता है, तब तक ईश्वर के मार्ग पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। कितने भी पूजा-पाठ, जप-तप, यज्ञ-अनुष्ठान, और दान-पुण्य करने का दिखावा कर लें; लेकिन जब तक राग-द्वेष, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, लोभ व अहंकार है, तब तक हमारे पुण्य कुछ भी काम नहीं आयेंगे। इंद्रीय सुखों के प्रति आकर्षण, और सांसारिक सम्बन्धों के प्रति मिथ्या कर्तव्य बोध बड़े भ्रामक हैं। प्रमाद को तो भगवान सनत्कुुमार ने साक्षात मृत्यु बताया है। दीर्घसूत्रता है— शुभ कार्य को आगे टालने की प्रवृत्ति।
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गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्त होने का उपाय बताया है और वह है --
"त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥२:४५॥"
अर्थात् -- "हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व, नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित, योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो॥"
"The Vedic Scriptures tell of the three constituents of life - the Qualities. Rise above all of them, O Arjuna, above all the pairs of opposing sensations; be steady in truth, free from worldly anxieties and centered in the Self."
भगवान हमें निस्त्रैगुण्य यानि त्रिगुणातीत होने को कहते हैं। इसके लिए --
संसार की कामनाओं का त्याग करते हुए हमें --
(१) निर्द्वन्द्व: --- सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय जैसे विपरीत परिस्थितियों (द्वंद्वों) से निर्लिप्त हो जाओ।
(२) नित्यसत्त्वस्थ -- सदा नित्य-निरंतर रहने वाले परमात्मा में स्थित रहो, यानी ज्ञान और शुद्धता (सत्त्वगुण) में स्थित रहो।
(३) निर्योगक्षेम --- न अप्राप्त वस्तु की इच्छा करो (योग) और न ही प्राप्त की रक्षा की चिंता (क्षेम) करो, क्योंकि भगवान् के शरणागत होने पर वे स्वयं योगक्षेम का वहन करते हैं।
(४) आत्मवान --- अपनी आत्मा में स्थित रहो, या परमात्मा के परायण हो जाओ, प्रमादरहित हो जाओ।
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ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
७ अप्रेल २०२६

एक बहुत पुरानी स्मृति ---

 एक बहुत पुरानी स्मृति है। सन २००१ की बात है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कच्छल द्वीप पर एक असामान्य रूप से अति विशाल और बहुत ही ऊँचे वृक्ष को देखा, जिस पर एक लता भी चढ़ी हुई थी| वृक्ष की जितनी ऊँचाई थी, लिपटते-लिपटते वहीं तक वह लता भी पहुँच गई थी| जीवन में पहली बार ऐसे उस दृश्य को देखकर परमात्मा और जीवात्मा की याद आ गई, और एक भाव-समाधि लग गई| वह बड़ा ही शानदार दृश्य था जहाँ मुझे परमात्मा की अनुभूति हुई| प्रभु को समर्पित होने से बड़ी कोई उपलब्धी नहीं है| जीवात्मा जब परमात्मा से लिपटी रहती है, तब वह भी परमात्मा से एकाकार होकर उसी ऊँचाई तक पहुँच जाती है| परमात्मा को हम कितना भी भुलायें, पर वे हमें कभी भी नहीं भूलते| सदा याद करते ही रहते हैं| उन्हें भूलने का प्रयास भी करते हैं तो वे और भी अधिक याद आते हैं| वास्तव में वे स्वयं ही हमें याद करते हैं| कभी याद न आए तो मान लेना कि -- "हम में ही न थी कोई बात, याद न तुम को आ सके।" ७ अप्रेल २०२६

हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।

 जिनकी आस्था -- ईश्वर के अवतारों, आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, पुनर्जन्म व अहिंसा में है, मैं उन्हे ही हिन्दू कहता हूँ। हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।

दूसरे दृष्टिकोण से जिनकी सोच ऊर्ध्वमुखी है, व जो ईश्वर का निरंतर चिंतन करते हैं, वे हिन्दू हैं चाहे वे पृथ्वी के किसी भी भाग पर रहते हैं। ऐसे लोगों का समूह ही हिन्दू राष्ट्र है। ईश्वर का अनुस्मरण करते हुए हम अपने शत्रुओं का बध तो अवश्य करें, लेकिन हमारे मन में किसी भी तरह का क्रोध या घृणा न हो।
यह मेरा दृष्टिकोण है, जो आवश्यक नहीं कि पूर्णतः सही हो। इस विषय पर विद्वान मनीषियों के विचार आमंत्रित हैं। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
९ अप्रेल २०२६