श्री श्री लाहिड़ी महाशय नाभी क्रिया को अत्यंत महत्व देते थे।मनु संहिता में है; "धर्म के चार चरण हैं और,इसीलिए,सत्य के भी चार चरण हैं।"
लाहिड़ी महाशय ने इसे इस प्रकार समझाया;
धर्म चार चरणों में विभाजित है:
1 खेचरी मुद्रा
2 अनाहत ग्रन्थि का भेदन
3 मणिपुर ग्रन्थि का भेदन
4 मूलाधार ग्रन्थि का भेदन ।
ललिता सहस्त्रनाम में भी है;
मुलाधारैकनीलया ब्रम्हग्रन्थिविभेदिनी ।
मणिपुरान्तरूदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ।।
आज्ञाचक्रान्तरलस्था रुद्रग्रंथिविभेदिनी ।
आदि शंकराचार्य जी ने भी सौंदर्य लहरी में उपरोक्त का दृष्टान्त दिया है।
स्पष्ट है कि ग्रन्थिविभेदन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ग्रंथि सुषुम्ना में प्राण प्रवाह को बाधित करती है।ये ग्रन्थियां इड़ा एवम् पिंगला के संगम बिंदु पर बनती हैं।
तीन प्रमुख नाड़ियों(इडा,पिंगला,सुषुम्ना) तथा चक्रों का वृहद वर्णन कालांतर में करेंगे। यहाँ हम नाभी क्रिया को समझेंगे जो हमारी क्रिया साधना का महत्वपूर्ण अंग है।मणिपुर चक्र पर प्राण और अपान वायु एक दूसरे को पार करते हैं,परिणाम स्वरूप ऊर्जा का उलझाव,गुत्थी या ग्रन्थि बन जाती है।मणिपुर ग्रन्थि को नाभी क्रिया से भेदना आवश्यक है जिससे कुण्डलिनी जागरण निर्बाध हो सके।
नाभी क्रिया की विधि-
1-अपने ध्यान आसन पर बैठें।बन्द आखों से भ्रूमध्य पर एकाग्र हों।श्वास-प्रश्वास को भूल जाएं।
2- अब प्रत्येक चक्र पर ॐ का जप करें,क्रमशः ऊपर जाना है;
मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपुर,अनाहत,विशुद्ध,बिंदु तथा अंत में भ्रूमध्य।
4-जब बिंदु से भ्रूमध्य की ओर जाएं तब धीरे धीरे सिर को नीचे झुकाएं;ठुड्डी को कण्ठ से स्पर्श करवाएं(सहज तथा बिना दबाव के)।
4-अब हांथों को जोड़ें;अंगुलियां एक दूसरे को जकड़े हुए तथा अंगूठे परस्पर मिले हुए।हथेलियाँ नीचे की ओर स्वतः हो जायेंगीं।
5-अब अंगूठों से नाभि पर हल्की हल्की ठोकर लगाएं।ठोकर देते समय अंगूठों को 1 या 1.5 इंच से अधिक दूर न ले जाएं।आपकी ठोकर भी मृदु हो तथा गति भी 1 सेकंड में 2 हो।गति सुविधानुसार कम या अधिक कर सकते हैं।ठोकरों की संख्या 50-100 हो।प्रत्येक ठोकर के साथ ॐ का मानसिक जप करें।ऐसा करने से समान वायु उदर के मध्य भाग में संग्रहित होती है।इस समय नाभि एवम् भ्रूमध्य आपस में जुड़े हैं,ऐसा भाव हो।
6-अब सर को धीरे धीरे ऊपर उठाते हुए सामान्य स्थिति में ले आएं।ऐसा करते समय एकाग्रता भ्रूमध्य से बिंदु होते हुए सीधे मणिपुर चक्र पर लाना है।
7-अब हाथों को खोल कर पीठ की ओर ले जाएं।पुनः हाथों को पूर्ववत बांध लें।
8-अब मणिपुर चक्र पर ॐ जप के साथहल्की हल्की ठोकर लगाएं।संख्या 25 से 75 हो।
9-जब यह पूर्ण हो तब हाथों को सामान्य करते हुए ध्यान मुद्रा में ले आएं।
10-अब भ्रूमध्य पर एक बार ॐ का जप करें फिर मेडुला पर तथा उतरते हुए 5,4,3,2,1,प्रत्येक चक्र पर एक बार ॐ का जप करें।
इस पूरी प्रक्रिया को 4 बार दोहराएं।
नावी क्रिया में ॐ की हल्की ठोकर तथा श्वास का कोई सम्बन्ध नही है।
साथ ही ठोकरों की संख्या तथा आगे-पीछे संख्या का अनुपात भी निश्चित नही है।आप इस अनुपात को बराबर भी रख सकते हैं।ठोकर की गति भी आप अपनी सुविधानुसार तेज या धीमी कर सकते हैं।
कुछ उन्नत साधक हाथों का प्रयोग ही नही करते तथा पूरी नाभी क्रिया मानसिक रूप से ही करते हैं।धीरे धीरे साधक को ज्ञात हो जाता है कि उसके लिए क्या उचित होगा।
बिंदु 6 पर जब आप सर को सामान्य स्थिति में लाएं तो कुछ और पीछे जाएं जैसे की छत की ओर देखने का प्रयास है।ऐसा करने से नाभी चक्र की स्पष्ट अनुभूति होगी।
18 अक्तूबर 2015