Saturday, 11 April 2026

हमें भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं होता? ---

 हमें भगवत्-प्राप्ति यानि आत्म-साक्षात्कार क्यों नहीं होता? ---

.
सरलतम और स्पष्टतम शब्दों में इसका एक ही उत्तर है, और वह यह है कि हमारे में सत्यनिष्ठा (ईमानदारी) की कमी है। अन्य कोई कारण नहीं है। हम स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ (ईमानदार) नहीं हैं। हम स्वयं को ठगना चाहते हैं और स्वयं के द्वारा ही ठगे जा रहे हैं।
किसी भी सांसारिक उपलब्धी के लिए तो हम दिन रात एक कर देते हैं, हाडतोड़ परिश्रम करते हैं, पर जो उच्चतम उपलब्धी है वह हम सिर्फ ऊँची ऊँची बातों के शब्दजाल से ही प्राप्त करना चाहते हैं। वास्तविकता तो यह है कि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। हम सिर्फ सांसारिक सुखों को, सांसारिक उपलब्धियों को, और अधिक से अधिक अपने अहंकार की तृप्ति के लिए ही भगवान की विभूतियों को प्राप्त करना चाहते हैं। हमारे लिए भगवान एक माध्यम यानी साधन मात्र है, पर लक्ष्य यानी साध्य तो संसार है। कोई दो लाख में से एक व्यक्ति ही ऐसा होता है जो परमात्मा को पाना चाहता है। प्राचीन भारत एक अपवाद था। यहाँ की सनातन संस्कृति ही विकसित हुई, परमात्मा यानी ब्रह्म को पाने का ही लक्ष्य बनाकर। यहाँ की संस्कृति में सम्मान हुआ तो ब्रह्मज्ञों का ही।
.
जीवात्मा का उद्गम जहाँ से हुआ है, वहाँ अपने स्त्रोत में उसे बापस तो जाना ही पड़ेगा चाहे लाखों जन्म और लेने पड़े। तभी जीवन चक्र पूर्ण होगा। इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, बहुत सारा सद्साहित्य इस विषय पर उपलब्ध है| अनेक संत महात्मा हैं जो निष्ठावान मुमुक्षुओं का मार्गदर्शन करते रहते हैं। अतः और लिखने की आवश्यकता नहीं है। जब ह्रदय में अहैतुकी परम प्रेम और निष्ठा होती है तब भगवान मार्गदर्शन स्वयं ही करते हैं। पात्रता होने पर सद्गुरु का आविर्भाव भी स्वतः ही होता है।
जब हम अग्नि के समक्ष बैठते हैं तो ताप की अनुभूति अवश्य होती है। कई बार अनुभूति ना होने पर भी ताप तो मिलता ही है। वैसे ही जब भी हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान करते हैं तो उनके अनुग्रह की प्राप्ति अवश्य होती है।
परमात्मा को पाने का मार्ग है अहैतुकी (Unconditional) परम प्रेम। प्रेम में कोई माँग नहीं होती, मात्र शरणागति और समर्पण होता है। प्रेम, गहन अभीप्सा और समर्पण हो तो और कुछ भी नहीं चाहिए। सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है।
.
अपने प्रेमास्पद का ध्यान निरंतर तेलधारा के सामान होना चाहिए| प्रेम हो तो आगे का सारा ज्ञान स्वतः ही प्राप्त हो जाता है और आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं। जो लोग सेवानिवृत है उन्हें तो अधिक से अधिक समय नामजप और ध्यान में बिताना चाहिए। सांसारिक नौकरी में अपना वेतन प्राप्त करने के लिए दिन में कम से कम आठ घंटे काम करना पड़ता है। व्यापारी की नौकरी तो चौबीस घंटे की होती है। कुछ समय भगवान की नौकरी भी करनी चाहिए। जब जगत मजदूरी देता है तो भगवान क्यों नहीं देंगे? उनसे मजदूरी तो माँगनी ही नहीं चाहिए। माँगना ही है तो सिर्फ उनका प्रेम, प्रेम के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं।
प्रेम को ही मजदूरी मान लीजिये| एक बात का ध्यान रखें -- मजदूरी उतनी ही मिलेगी जितनी आप मेहनत करोगे। बिना मेहनत के मजदूरी नहीं मिलेगी। इस सृष्टि में निःशुल्क कुछ भी नहीं है। हर चीज की कीमत चुकानी पडती है।
.
सार :--- हमें परमात्मा की प्राप्ति इसलिए नहीं होती क्योंकि हम परमात्मा को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। हम स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ (ईमानदार) नहीं हैं। अपने अहंकार की तृप्ति के लिए भक्ति का झूठा दिखावा करते हैं। अपनी मानसिक कल्पना से और झूठे शब्द जाल से स्वयं को ठग रहे हैं। हमने परमात्मा को तो साधन बना रखा है, पर साध्य तो संसार ही है।
.
आप सब में हृदयस्थ परमात्मा को बारंबार प्रणाम। आप सब की जय हो।
आप मेरे हृदय का सर्वश्रेष्ठ प्रेम स्वीकार करें।
ॐ तत् सत् | श्रीगुरवे नमः। ॐ नमः शिवाय। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
कृपाशंकर
११ अप्रेल २०२६

निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति मेरा स्वभाव है, अन्यथा मैं अभावग्रस्त हूँ ---

 निरंतर ब्रह्म-चिंतन और भक्ति मेरा स्वभाव है, अन्यथा मैं अभावग्रस्त हूँ।

"शांभवी मुद्रा में पुराण-पुरुष भगवान श्रीकृष्ण स्वयं के पुरुषोत्तम रूप का ध्यान कर रहे हैं। उनसे अन्य इस सम्पूर्ण सृष्टि में कुछ भी नहीं है। सम्पूर्ण विश्व उन्हीं के परम प्रेम की अभिव्यक्ति है।"
मैं एक धर्मनिष्ठ सनातनी हिन्दू हूँ। मुझे मेरी आस्थाओं पर गर्व है। मेरा संकल्प है कि -- "सत्य सनातन धर्म की पुनःप्रतिष्ठा और वैश्वीकरण हो। भारत माँ अपने द्वीगुणित परम वैभव के साथ अखंडता के सिंहासन पर बिराजमान हों। भारत में छाया असत्य का अंधकार सदा के लिए दूर हो।"
भगवान निश्चित रूप से मेरी सुनेंगे। जो मेरे विचारों से सहमत नहीं हैं, वे विष की तरह मुझे छोड़ सकते हैं। ॐ तत् सत् ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ अप्रेल २०२६

मनुष्य देह में हमारा जन्म अपने प्रारब्ध कर्मों का फल भोगने के लिए ही होता है ---

मनुष्य देह में हमारा जन्म अपने प्रारब्ध कर्मों का फल भोगने के लिए , या नए कर्मों की सृष्टि करने के लिए, या सब तरह के कर्मफलों से मुक्त होने के लिए ही होता है| जब तक संचित कर्म अवशिष्ट हैं तब तक बारंबार पुनर्जन्म होता ही रहेगा| इस निरंतर पुनरागमन से मुक्ति के लिए अहंभाव को समर्पित करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है| यह मनुष्य देह, इस देह की कामनापूर्ति के लिए नहीं मिली है| यह एक साधन है जिसका उपयोग परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही करना चाहिए| हमने पूर्वजन्मों में मुक्तिदायक अच्छे कर्म नहीं किये इसीलिये यह जन्म लेना पड़ा| अपनी गुरू परम्परानुसार गुरू प्रदत्त साधना खूब मन लगाकर पूर्ण भक्तिभाव से करें|

ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
११ अप्रेल २०१७

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और भारत की गौरवपूर्ण परम वैभवशाली परम्परानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष का प्रारम्भ है|

 वैज्ञानिक दृष्टिकोण से और भारत की गौरवपूर्ण परम वैभवशाली परम्परानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही नववर्ष का प्रारम्भ है|

इसका प्रारंभ जगन्माता की आराधना से होता है| भगवान श्री राम की आराधना भी इस समय होती है|
आज के ही दिन इस सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की, भगवन श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ, बहुत सारी अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुईं और २०७० वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमादित्य ने हूण और शक आक्रमणकारियों को पराजित कर उन्हें सनातन धर्म में आत्मसात किया|
महाराज विक्रमादित्य का राज्य वर्तमान ईरान, अरब और तुर्की तक था| ईरान में उनकी एक मूर्ती मिली थी जिस में वे धोती पहिने भारतीय वेश-भूषा में एक घोड़े पर सवार हैं| कुछ इतिहासकार कहते हैं कि उनका निधन भी ईरान में हुआ| इराक और तुर्की की कुर्द जाति उनके भारतीय कृत सैनिकों की ही वंशज है| उनका समय भारत का गौरवशाली युग था|
मैं अपने पूर्ण ह्रदय से अपने सभी मित्रों और पाठकों को नववर्ष की शुभ कामनाएँ और मेरा नमस्कार प्रेषित करता हूँ| अपने स्नेह और आशीर्वाद की कृपा मुझ जैसे अकिंचन स्नेहाभिलाषी पर करते रहें|
कृपा शंकर
११ अप्रैल २०१३

Friday, 10 April 2026

माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है ---

सत्रहवीं शताब्दी में बंगाल में एक भक्त कवि हुए हैं जिनका नाम रामप्रसाद सेन था| बँगला भाषा में लिखी उनकी रचनाओं को रामप्रसादी बोलते हैं| उनके भक्त बताते हैं कि जगन्माता नित्य उन्हें काली के रूप में दर्शन देतीं और बात भी करती| उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद करवा कर मैनें कई वर्षों पूर्व अध्ययन भी किया था| उनसे जगन्माता कोई वरदान माँगने के लिए कहतीं तो वे माँ से सिर्फ उनका पूर्ण प्रेम ही माँगते| सदा माँ का उत्तर यही होता कि यदि मैं तुम्हें अपना पूर्ण प्रेम दे दूँगी तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचेगा|

माँ से कुछ माँगना ही है तो सिर्फ प्रेम ही माँगना चाहिए फिर सब कुछ अपने आप ही मिल जाता है| कृपा शंकर
१० अप्रेल २०१९

श्रीराम नवमी की शताधिक मंगलमय शुभकामनाएँ ---

 श्रीराम नवमी की शताधिक मंगलमय शुभकामनाएँ

.
"बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥"
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥
गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥
.
"सियाराम-मय, सब जग जानी, करहूँ प्रणाम, जोरी जुग-पानी॥"
कृपा शंकर
१० अप्रेल २०२२

Thursday, 2 April 2026

भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है ---

भक्ति और सेवा के मार्ग में श्रीहनुमान जी से बड़ा अन्य कोई भक्त या सेवक, भगवान का नहीं है। वे स्वयं प्रत्यक्ष देवता हैं। सफलता उनके पीछे-पीछे चलती है। उन्होंने कभी कोई विफलता नहीं देखी। असत्य और अंधकार की कोई आसुरी शक्ति, उनके समक्ष नहीं टिक सकती। उनसे अधिक शक्तिशाली और ज्ञानी अन्य कोई नहीं है। हनुमान जी की शक्ति ही हम सब की और इस राष्ट्र की रक्षा करेगी।

"अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥"
श्रीहनुमान जी की अनुभूतियाँ हमें गहरे ध्यान में होती है। जब भी हम सांस लेते हैं, तब हम पाते हैं कि वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य विचरण कर रहे हैं। और भी गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र के ऊपर का आवरण हट जाता है, और सूक्ष्म जगत में ईश्वर की अनंतता से भी परे एक ज्योतिर्मय जगत के दर्शन होते हैं जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
श्रुति भगवती जिसके बारे में कठोपनिषद (२.२.१५) व मुंडकोपनिषद (२.२.१०) में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
.
उपरोक्त अनुभूतियाँ हमें हनुमान जी की परम कृपा से ही होती हैं जो प्राण-तत्व और वायु-तत्व के देवता हैं। वे हमें भक्ति, शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें निस्वार्थ सेवा और समर्पण सिखाते हैं। वे हमारी हर सांस में जीवित और अमर हैं। उनका निवास मेरे हृदय (विचारों व भावों) में और मेरी साँसों में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। ध्यान में उनकी निरंतर अनुभूति मुझे अपनी चेतना में होती है। मुझे अपना माध्यम बना कर वे भगवान श्रीराम का ध्यान स्वयं करते हैं। यह उनकी परम अनुकंपा है। मैं उन्हें नमन करता हूँ। उन्हीं की परम कृपा मुझे राम जी का बोध कराती है।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥" ॐ ॐ ॐ !!
.
कृपा शंकर / २ अप्रेल २०२६