Friday, 31 July 2026

भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ ---

 भगवती के सौन्दर्य और वैभव की दिव्यता के समक्ष मैं मौन निःशब्द हूँ।

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वेदान्त की अधिष्ठात्री भगवती छिन्नमस्ता का आज अनायास ही आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। उन्होंने कामदेव व उनकी पत्नी रति को अपने पैरों में पटक रखा है, और उन पर खड़ी हैं। यह कामवासना पर विजय का संदेश है। उन्होने अपने स्वयं के सिर को काट रखा है, यह अहंकार पर विजय का संदेश है। उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएँ निकल रही हैं। मध्यम धारा जो सुषुम्ना की प्रतीक है, का पान वे स्वयं कर रही हैं। बाईं ओर डाकिनी शक्ति है जो अत्यधिक भयंकर, विकराल और महाबलशाली है। भगवती के दाहिने ओर वर्णिनी शक्ति है जो है तो महाबलशाली, लेकिन विकराल नहीं है। माँ की साधना का अधिकारी वही है जिसने कामवासना और अहंकार पर विजय प्राप्त कर ली है। माँ की साधना साधक को सर्व सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।
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जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, पता नहीं उनका नाम "काली" क्यों रख दिया? सृष्टि की रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ महाकाली ही है। सृष्टि, स्थिति और संहार उन की एक अभिव्यक्ति मात्र है। यह संहार नकारात्मक नहीं है। यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है। सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता, मात्र रूपांतरित होता है। यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है। माँ प्रेम और करुणामयी है। माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है। उनकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है, वह प्रतीकात्मक है ---
"माँ के विग्रह में चार हाथ है। अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है, और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है। माँ के दो बाएँ हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक हैं। ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं। माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं। यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं। माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं। माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है, क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है। किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है। माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है। उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य की अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं। माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं। माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं। उनकी लाल जिह्वा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं। उनकी लीला में एक पैर भगवान शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है। माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है।"
माँ, मुझे आत्म-विस्मृति रूपी मृत्यु में मत जाने दो। मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए।
कृपा शंकर
१ अगस्त २०२३

संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---

 संसार में जीवन की सारी समस्याओं का निदान ---

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हम संसार में जन्म लेते हैं, तब से भौतिक मृत्यु तक समस्याएँ ही समस्याएँ हमारे समक्ष रहती हैं। जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं है जिसमें समस्याएँ न हों। अपनी किशोरावस्था में मैं समझता था कि मनुष्य की भौतिक दरिद्रता ही जीवन की सबसे बड़ी समस्या है। बाद में युवावस्था में अनुभव किया कि आध्यात्मिक दरिद्रता ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। भौतिक जीवन की इस वृद्धावस्था में मैं यह बात निज जीवन के पूर्ण अनुभव से कहता हूँ कि आध्यात्मिक दरिद्रता ही हमारी सबसे बड़ी समस्या है। उस से बड़ी कोई अन्य समस्या नहीं है।
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इसका कोई सार्वजनिक व सार्वभौमिक निदान नहीं है। हर व्यक्ति को अपना उत्तर स्वयं पाना होता है। पूर्ण निष्ठा से भगवान से प्रार्थना करेंगे तो इस प्रश्न का उत्तर अवश्य मिलेगा कि हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ मार्ग कौन सा है। एक ही मार्ग सबके लिए नहीं हो सकता। हम अपनी पूर्ण निष्ठा से भगवान से मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करें, भगवान से उत्तर अवश्य प्राप्त होगा।
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मेरा निजी व्यक्तिगत मत तो यह है कि हर परिवार में शिवपूजा और गीता पाठ नित्य होना चाहिए। यह उपाय सब के लिए नहीं हो सकता। महात्माओं के मुख से सुना है कि अपनी अपनी कुलदेवी की नित्य आराधना करनी चाहिए। भगवान के अपने अपने इष्ट रूप की नित्य नियमित आराधना और मार्ग-दर्शन की प्रार्थना करें। ३१ जुलाई २०२३

सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?

 प्रश्न : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य कौनसा, क्या व क्यों है, जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं?

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उत्तर : --- सबसे बड़ी सेवा का कार्य जो हम समाज, राष्ट्र, स्वयं, व समष्टि के लिए कर सकते हैं, वह है -- भगवान का ध्यान, ------ क्योंकि इस से हमारे माध्यम से भगवान के प्रकाश यानि सतोगुण की वृद्धि होती है, और तमोगुण का ह्रास होता है।
हमारा उद्गम भगवान से हुआ है, और हमारा लक्ष्य भी भगवान की प्राप्ति है। यह सृष्टि का चक्र है। समाज की सब बुराइयों का कारण हमारे जीवन में तमोगुण की प्रधानता है। भगवान का नित्य नियमित ध्यान ही हमारे जीवन में तमोगुण का ह्रास कर सकता है, सतोगुण में वृद्धि करता है, और अंततः हमें त्रिगुणातीत बनाकर भगवान की प्राप्ति कराता है, जिसे हम आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) कहते हैं।
इस विषय पर श्रीमद्भगवद्गीता में बहुत स्पष्ट और सरल मार्गदर्शन है। सारे निगमागम ग्रंथ भी यही कहते हैं।
इसमें आवश्यकता है भगवान के प्रति परमप्रेम (भक्ति) जागृत करने की, जिसके बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। जब परमप्रेम जागृत हो जाये, तब भगवान का निरंतर स्मरण, नामजप और निदिध्यासन करें। उसके पश्चात ध्यान अपने आप ही होने लगता है। भगवान निश्चित रूप से सब भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं, कहीं भटकने की आवश्यकता नहीं है। भटकाव तभी आता है जब हमारे मन में छल-कपट होता है। भगवान कहते हैं --
"निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥"
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"सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥"
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भगवान ने हम सब को विवेक दिया है, उस विवेक से हम इतना सब तो समझ ही सकते हैं। मैं अपनी बात के समर्थन में उपनिषदों, गीता, व अन्य ग्रन्थों से चाहे जितने संदर्भ दे सकता हूँ, लेकिन उनकी आवश्यकता नहीं है।
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सभी को शुभ कामनाएँ और नमन॥
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ अगस्त २०२२

Wednesday, 29 July 2026

जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए ---

 जातिवाद समाप्त हो सकता है यदि सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख प्रतिबंधित हो जाए .....

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देश और समाज की एकता व सामाजिक सद्भाव के लिए सरकारी कागजों में जाति का उल्लेख अत्यधिक कठोरता से प्रतिबंधित होना चाहिएा जातिवाद देश पर कलंक, और धर्म-विरुद्ध है| हिंदुओं के लिए जातिवाद वेद-विरुद्ध है, इसलिए त्याज्य है|
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जातिवाद का आरंभ उस काल में हुआ था जब भारत पर स्थल मार्ग से अरब, फारस और मध्य एशिया के विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण आरंभ हुए, और जल मार्ग से पूर्तगालियों के| उस से पूर्व कोई जातिवाद नहीं था| उस समय यह अपनी रक्षा के लिए बनाई गई अस्थायी व्यवस्था थी जो दुर्भाग्य से कालांतर में स्थायी हो गई|
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भारत के वर्तमान संविधान में सैंकड़ों जातियों का उल्लेख है और संविधान ही जातियों के आधार पर आरक्षण देकर जातिवाद को बढ़ावा देता है| किसी भी हिन्दू धर्म-ग्रंथ में जातियों का उल्लेख नहीं है| भारत में गुण और कर्मों के आधार पर वर्ण-व्यवस्था मात्र थी जो स्वाभाविक है|
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गीता में भगवान कहते हैं .....
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः|
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्||४:१३||"
अर्थात .... गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है| यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो||.
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मूल मनुस्मृति में कहीं भी जातिप्रथा का उल्लेख नहीं है| जो लोग मनुस्मृति को गालियाँ देते हैं, यह उनकी विकृत और कुटिल मानसिकता है| मनुस्मृति वेदों पर आधारित है जहाँ सिर्फ वर्णों का ही गुण-कर्मों के आधार पर उल्लेख है| मनुस्मृति में कहीं पर भी किसी जाति का उल्लेख नहीं है|
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विदेशी आक्रान्ताओं ने विशेषकर अंग्रेजों ने अपने वेतनभोगी मेक्समूलर जैसे पादरियों से हिंदुओं के धर्मग्रंथों को प्रक्षिप्त और विकृत करवाया, शूद्रों पर अत्याचारों की झूठी कथाएँ लिखवाईं और मूल धर्म-ग्रंथों को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया| भगवान की कृपा से ब्राह्मणों ने उन्हें रट रट कर याद कर लिया, इसलिए धर्म-ग्रंथ बच गए, अन्यथा सारे धर्म-ग्रंथ लुप्त हो जाते|
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ॐ तत्सत ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ जुलाई २०२०

क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?

 क्या कोई ऐसा पुरुष है जो सभी गुणों में श्रेष्ठ हो ?

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ऐसा पुरुष तो देवताओं में भी नहीं मिलेगा जिसमें सारे गुण हों, और कोई अवगुण न हो। एकमात्र ऐसे पुरुष जिन्होंने कभी इस पृथ्वी पर भ्रमण किया है, तो वे भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण ही थे। उनसे श्रेष्ठ कोई दूसरा पुरुष कभी नहीं हुआ। वे ही हमारे एकमात्र आदर्श हो सकते हैं। हम उन्हीं का ध्यान करें, और अपने निज जीवन में अवतरित कर उन्हें व्यक्त करें।
आज के भारत में नराधम राक्षसों ने अधर्म और अनाचार फैला रखा है। हमें आवश्यकता है एक नई व्यवस्था के लिए ब्रह्मतेजोमय भगवन वेदव्यास जैसे व्यक्तित्व की, भगवन राम जैसे शासक की, और देवर्षि नारद जैसे मार्ग दर्शकों की। भगवान भारतभूमि का कल्याण करें। हृदय की यह एक बहुत घनी पीड़ा थी, जो आज व्यक्त हो गई। और लिखने को कुछ नहीं है। भगवान हमारे जीवन में हों, और हर क्षण उनकी अभिव्यक्ति हो।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३० जुलाई २०२२
पुनश्च: -- साथ तो दूर की बात है, जिन के हृदय में भगवान नहीं है, और जिन के हृदय में छल-कपट भरा पड़ा है, ऐसे लोगों का दर्शन होना भी मैं अपना बहुत बड़ा दुर्भाग्य मानता हूँ। अब तो मन में भगवान के सिवाय अन्य कोई विचार आता ही नहीं है।

विराट पुरुष का ध्यान ---

विराट पुरुष का ध्यान : -- समस्त सृष्टि की, और उस से भी परे की, यह विराट अनंतता -- हमारा शरीर है। ये सारी आकाश-गंगाएँ, अपने ग्रहों-उपग्रहों सहित सारे नक्षत्र, हमारी ही विराट देह के भाग हैं। हम यह विराट-पुरुष हैं, कोई भौतिक देह नहीं। उसी विराट-पुरुष का सदा गुरु प्रदत्त विधि से ध्यान करो, उसी की उपासना करो, और उसी में स्थित रहो।

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हंसः योग (अजपा-जप) करते रहो। कुंभक की अवधि में विराट-पुरुष का और भी गहरा ध्यान करो। फिर अनाहत नाद के रूप में प्रणव की ध्वनि के साथ निदिध्यासन करते रहो। अपनी चेतना को भौतिक देह से जितने अधिक समय तक हो सके बाहर ही रखो। बीच बीच में अपने भौतिक शरीर को भी देख लो और यह भाव करो की में यह भौतिक शरीर नहीं, विराट पुरुष हूँ।
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घनीभूत प्राण-ऊर्जा (कुंडलिनी) जागृत हो जाये तो उसे बार-बार परमशिव को अर्पित करते रहो। इस विराटता से परे का अस्तित्व "परमशिव" है। पूर्ण रूपेण परमशिव को समर्पित होकर उनसे एकाकार होना ही हमारी उपासना का लक्ष्य है। साधनाकाल में ब्रह्मचर्य (ब्रह्म जैसे आचार-विचार) अपेक्षित हैं।
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"ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ नमः शिवाय !!
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
३० जुलाई २०२२

आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---

 आने वाली हरियाली तीज की समस्त श्रद्धालु हिन्दू मातृशक्ति को मंगलमय शुभ कामनाएँ और अभिनंदन ---

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श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया, तदानुसार रविवार ३१ जुलाई २०२२ को हरियाली तीज का पर्व है जो पूरे राजस्थान और आसपास के क्षेत्रों में, और पूरे भारत में आप्रवासी राजस्थानी महिलाओं द्वारा बहुत श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। कल द्वितीया यानि ३० जुलाई २०२२ के दिन सिंजारा है। इन पर्वों पर भारत की समस्त मातृशक्ति को हार्दिक अभिनन्दन और शुभ कामनाएँ।
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सभी माताएँ, बहिनें और बेटियाँ मेंहदी अवश्य मंडवाएँ। यदि घर के आसपास सुविधा हो तो झूला भी खूब झूलें। किसी नीम के पेड़ की मोटी डाल पर मोटी मजबूत रस्सी से झूला बंधवायें, और झूले पर बैठने के लिए खाती (बढ़ई) से लकड़ी का एक पाटा बनवा लें। उस पर बैठकर या खड़े होकर अकेले या जोड़े से खूब झूला झूलें -- इसे मारवाड़ी भाषा में पील मचकाना बोलते हैं। घर पर महिलाएं ही मिलकर सामूहिक नृत्य भी खूब करें। नवविवाहित महिलाएँ अपने मायके जाकर यह त्योहार मनाएँ।
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जिन लड़कियों की सगाई हो जाती है, उन्हें अपने होने वाले सास-ससुर से दूज के दिन सिंजारा मिलता है। इसमें मेहँदी, लाख की चूड़ियाँ, कपड़े (लहरिया), मिठाई - विशेषकर घेवर शामिल होता है।
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विवाहित महिलाओं को भी अपने पति, रिश्तेदारों एवं सास-ससुर से उपहार मिलते हैं। पुरुषों को चाहिए कि वे घर की महिलाओं को उनकी मनपसंद मिठाई आदि अवश्य खिलाएँ।
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महिलाओं के मुँह से सामूहिक मंगल गीत बहुत मधुर लगते हैं। राजस्थान में तीज के त्यौहार का विशेष महत्व है। जयपुर में तो यह त्यौहार बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है व राजस्थान के सभी नगरों में तीज की सवारी निकाली जाती है। हर स्थान पर एक सांस्कृतिक वातावरण हो जाता है। अपनी संस्कृति और गौरव को ना भूलें।
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मान्यता है कि भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने बहुत कठोर तप किया था। जब भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तभी से इस व्रत का आरंभ हुआ। तीज माता के रूप में पार्वती की आराधना होती है।
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जय सनातन भारतीय संस्कृति, जय सनातन धर्म, जय माँ भारती॥
कृपा शंकर
२९ जुलाई २०२२