योगोदय (Yogodaya)
स्वयं के आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति ही इस ब्लॉग का एकमात्र उद्देश्य है |
Saturday, 27 June 2026
आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं।
आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं। सभी श्रद्धालुओं को नमन। हनुमान जी का प्राकट्य हमारे निज जीवन में हो, तभी इस उत्सव की सार्थकता है। श्रीहनुमान जी हमारी चेतना में हैं, कहीं बाहर नहीं। यह उत्सव प्रतिवर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा १ अप्रैल २०२६ को प्रातः ७ बजकर ६ मिनट से २ अप्रैल को प्रातः ७ बजकर ४१ मिनट तक थी। उदया तिथि के चलते हनुमान जयंती का उत्सव २ अप्रैल २०२६ को मनाया जा रहा है।
अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है ----
जिसके हृदय में परमात्मा को उपलब्ध होने की भूख-प्यास और तड़प है, व अपनी सारी वेदनाओं के पश्चात भी जिसे परमात्मा से परमप्रेम है, वही वास्तविक भक्त है; अन्य सब लाभार्थी व्यापारी हैं, जिनके लिए अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए परमात्मा की भक्ति एक व्यापार है।
सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।
सांसारिक मान-सम्मान और प्रसिद्धि की कामना, व वासनात्मक विचारों का कण मात्र भी अवशेष --- हमारी जड़ता और आध्यात्मिक अवनति की निशानी है।
सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --
सब तरह के कर्मफलों, पाप-पुण्य, व सांसारिकता से मुक्ति का एकमात्र उपाय -- "निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन" --
एक बहुत पुरानी स्मृति ---
एक बहुत पुरानी स्मृति है। सन २००१ की बात है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कच्छल द्वीप पर एक असामान्य रूप से अति विशाल और बहुत ही ऊँचे वृक्ष को देखा, जिस पर एक लता भी चढ़ी हुई थी| वृक्ष की जितनी ऊँचाई थी, लिपटते-लिपटते वहीं तक वह लता भी पहुँच गई थी| जीवन में पहली बार ऐसे उस दृश्य को देखकर परमात्मा और जीवात्मा की याद आ गई, और एक भाव-समाधि लग गई| वह बड़ा ही शानदार दृश्य था जहाँ मुझे परमात्मा की अनुभूति हुई| प्रभु को समर्पित होने से बड़ी कोई उपलब्धी नहीं है| जीवात्मा जब परमात्मा से लिपटी रहती है, तब वह भी परमात्मा से एकाकार होकर उसी ऊँचाई तक पहुँच जाती है| परमात्मा को हम कितना भी भुलायें, पर वे हमें कभी भी नहीं भूलते| सदा याद करते ही रहते हैं| उन्हें भूलने का प्रयास भी करते हैं तो वे और भी अधिक याद आते हैं| वास्तव में वे स्वयं ही हमें याद करते हैं| कभी याद न आए तो मान लेना कि -- "हम में ही न थी कोई बात, याद न तुम को आ सके।" ७ अप्रेल २०२६
हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।
जिनकी आस्था -- ईश्वर के अवतारों, आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, पुनर्जन्म व अहिंसा में है, मैं उन्हे ही हिन्दू कहता हूँ। हिन्दू शब्द का अर्थ है -- जो हिंसा से दूर है (यहाँ हिंसा का अर्थ लोभ व अहंकार से है जो हिंसा के एकमात्र कारण हैं)।