Sunday, 18 January 2026

आध्यात्म में कुछ पाने या प्राप्ति की कामना एक मरीचिका है ---

आध्यात्म में कुछ पाने या प्राप्ति की कामना एक मरीचिका है। जो कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है, वह तो हम "स्वयं" हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर मार्ग-दर्शन सब को प्राप्त होता है। कोई यदि यह कहे कि उसे मार्ग-दर्शन नहीं मिला है तो वह झूठ बोल रहा है। भगवान की कृपा सब पर समान रूप से है।

.
भगवान गीता में कहते हैं --
"अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥८:१४॥"
अर्थात् - हे पार्थ ! जो अनन्यचित्त वाला पुरुष मेरा स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात् सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ॥
(अनन्यचित्त अर्थात् नित्य-समाधिस्थ जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा का स्मरण करता है। सततम् का अर्थ है निरंतरता। नित्यशः का अर्थ है नित्य जीवन पर्यंत। ऐसे व्यक्ति को भगवान की प्राप्ति अनायास ही हो जाती है)
.
यह विषय बहुत अधिक गहन और बहुत अधिक लंबा है जिसका कोई अंत नहीं है। अतः इसका समापन यहीं कर रहा हूँ। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१८ जनवरी २०२२

Friday, 16 January 2026

हमारे अन्नदाता कौन है? ---

 हमारे अन्नदाता कौन है? ---

हमारे अन्नदाता सिर्फ भगवान हैं, और कोई नहीं| किसान सिर्फ एक अन्न-उत्पादक वर्ग है, अन्नदाता नहीं| कितना भी बड़ा किसान हो, वह भगवान का स्थान नहीं ले सकता| देश में उद्योगपतियों के कारण उद्योग-धंधे चल रहे हैं, जिनसे नौकरियाँ मिल रही हैं| वहाँ से मिले वेतन से ही हम बाज़ार से अन्न खरीद पा रहे हैं| हम भी कर दाता है, जिन के पैसों से किसानों को मुफ्त में बिजली, पानी, कर्जमाफी व सब्सिडी मिल रही हैं| बहुत हो गया है, इन अराजक लोगों ने आम जनता को परेशान कर रखा है| इनमें से कोई भी किसान नहीं है, सारे आढ़तिये, दलाल, और राजनीतिक व भाड़े के लोग हैं|

जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम | गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम ---

 "जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम | गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम ||"

जो जाति परमात्मा की है, वह जाति ही मेरी है| जैसे विवाह के बाद स्त्री का वर्ण, गौत्र और जाति वही हो जाती है जो उसके पति की होती है, वैसे ही परमात्मा को समर्पित हो जाने के बाद मेरा वर्ण, गौत्र और जाति वह ही है जो सर्वव्यापी परमात्मा की है| मैं 'अच्युत' हूँ|
जातिवाद सबसे बड़ा धोखा है| मैं किसी भी जाति, सम्प्रदाय, या उनकी किसी संस्था से सम्बद्ध नहीं हूँ| सब संस्थाएँ, सब सम्प्रदाय व सब जातियाँ मेरे लिए हैं, मैं उन के लिए नहीं| मैं असम्बद्ध, अनिर्लिप्त, असंग, असीम, शाश्वत आत्मा हूँ जो इस देह रूपी वाहन पर यह लोकयात्रा कर रहा हूँ| मेरा ऐकमात्र शाश्वत सम्बन्ध सिर्फ परमात्मा से है जो सदा रहेगा| जिस नाम से मेरे इस शरीर की पहिचान है, उस शरीर का नाम इस जन्म में कृपा शंकर है| पता नहीं कितने जन्म लिए हैं और पता नहीं कब कितने नाम तत्कालीन घर वालों ने रखे होंगे|
यथार्थ में परमात्मा के सिवाय न मेरी कोई माता है, और न कोई पिता है, और परमात्मा के सिवाय मेरी कोई जाति नहीं है| परमात्मा की अनंतता में जहाँ अनाहत नाद गूंज रहा है, वहीं मेरा घर है, वहीं मुझे विश्राम मिलता है| वहीं मैं हूँ| ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१६ जनवरी २०२०

Thursday, 15 January 2026

हम सब का जीवन उत्तरायण, धर्मपरायण और राममय बने ---

 ज्योतिषियों के अनुसार इस बार मकर-संक्रांति १५ जनवरी २०२४ को है। हम सभी को मकर संक्रान्ति, लोहिड़ी और पोंगल की अनंत मंगलमय शुभ कामनाएँ॥ हम सब का जीवन उत्तरायण, धर्मपरायण और राममय बने।

>>>
आप आज चाहे इस पृथ्वी के किसी भी स्थान पर हों, देवाधिदेव महादेव भगवान शिव का ध्यान करेंगे, और घर बैठे बैठे गंगा-स्नान का पुण्य लाभ भी प्राप्त करेंगे। मकर संक्रांति पर सूर्य उत्तरायण होता है, इसलिए इस समय किए गए ध्यान, जप, पुण्य और दान का फल अनंत होता है।
>>>
भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र अमर वाणी से इस लेख का आरंभ कर रहा हूँ, जो आपका मंगल ही मंगल करेगी और आपके जीवन को धन्य भी कर देगी ---
"यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्युक्तस्य योगिनः॥"
>>>
मकर संक्रांति के दिन गंगा-स्नान का बहुत महत्व है। आज अभी इसी समय हम गंगा जी में स्नान करेंगे। उसकी विधि बताता हूँ ---
"ज्ञान संकलिनी तन्त्र" के अनुसार इड़ा भगवती गंगा है, पिंगला यमुना नदी है, और उनके मध्य में सुषुम्ना सरस्वती है। इस त्रिवेणी का संगम तीर्थराज है जहाँ स्नान करने से सर्व पापों से मुक्ति मिलती है।
> वह तीर्थराज त्रिवेणी प्रयाग का संगम कहाँ है ?
> वह स्थान -- तीर्थराज त्रिवेणी का संगम हमारे भ्रूमध्य में है।
अपनी चेतना को भ्रूमध्य में और उससे ऊपर रखना ही त्रिवेणी संगम में स्नान करना है।
>>>
भूमि पर एक ऊनी कंबल का आसन बिछा कर मेरुदण्ड को उन्नत रखते हुए पूर्व या उत्तर दिशा में मुख रखते हुए पद्मासन या सिद्धासन में बैठ जाएँ। किसी भी परिस्थिति में कमर सीधी हो अन्यथा कोई लाभ नहीं होगा। जिनकी कमर झुक गई है उन्हें दुबारा जन्म लेना होगा, इस जन्म में उन्हें सिद्धि नहीं मिल सकती। वे पूर्ण भक्ति से भगवान का नाम जप करें,। कमर सीधी रखने में यदि कोई कठिनाई है तो नितंबों के नीचे एक पतली गद्दी लगा लें। जो भूमि पर नहीं बैठ सकते, वे भूमि पर ऊनी कंबल बिछा कर उस पर एक बिना हत्थे की कुर्सी रखकर उस पर बैठें। कमर किसी भी परिस्थिति में सीधी हो।
>>>
अजपा-जप (हंसःयोग/हंसवतिऋक) द्वारा सर्वव्यापी ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में देवाधिदेव महादेव भगवान शिव का ध्यान भ्रूमध्य में करें। मानसिक रूप से मूर्धा में प्रणव का मानसिक जप व श्रवण करें। यह आपका पवित्र गंगा जी में स्नान है। आपको पवित्र गंगा जी में स्नान का पुण्य लाभ हो रहा है।
>>>
नित्य रात्रि को सोने से पूर्व भगवान का ध्यान कर के निश्चिन्त होकर जगन्माता की गोद में सो जाएँ।
>>>
दिन का प्रारम्भ परमात्मा के प्रेम रूप पर ध्यान से करें।
>>>
पूरे दिन परमात्मा को अपनी स्मृति में रखें। यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः मानसिक स्मरण प्रारम्भ कर दें। उन्हें ही अपने जीवन का केंद्र-बिन्दु और कर्ता बनाएँ। स्वयं एक निमित्त मात्र होकर साक्षी भाव में जीयें।
>>>
आज मकर-संक्रांति का दिन सम्पूर्ण समष्टि के लिए कल्याणकारी और ,मंगलमय हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१५ जनवरी २०२४

Monday, 12 January 2026

सभी मित्रों से एक प्रश्न .....

 सभी मित्रों से एक प्रश्न .....

.
जब अच्छे कर्मों का फल मिलता है तब तो हम कहते हैं कि भगवान की कृपा से ऐसा हुआ| पर जब बुरे कर्मों का फल मिलता है तब हम इसे भगवान की कृपा क्यों नहीं मानते ? तब हम इसे अपना दुर्भाग्य क्यों मानते हैं?
.
उपरोक्त प्रश्न का उत्तर मेरी बुद्धि से तो यही हो सकता है कि हमारी बुद्धि और मन दोनों ही परमात्मा को अर्पित नहीं हैं, तभी ऐसा विचार मन में आया| यदि हम अपने मन और बुद्धि दोनों को ही परमात्मा को समर्पित कर दें तब ऐसा प्रश्न ही नहीं उठेगा| भगवान को प्रिय भी वही व्यक्ति है जिसने अपना मन और बुद्धि दोनों ही भगवान को अर्पित कर दिए हैं|
भगवान कहते हैं ....
"सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः |
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ||१२.१४||
.
इससे पहले भगवान कह चुके हैं ........
"यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते" ||६.२२||
परमात्मा को प्राप्त करके योगस्थ व्यक्ति परमानंद को प्राप्त होकर इससे अधिक अन्य कोई सुख नहीं मानता हुआ भारी से भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है|
.
हम परमात्मा को प्राप्त नहीं हुए इसी लिए दुःखों से विचलित हैं| अन्यथा दुःख और सुख दोनों ही भगवान के प्रसाद हैं| अभ्यास द्वारा हम ऐसी आनंदमय स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं जो सुख और दुःख दोनों से परे है|
भगवान कहते हैं .....
"अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना |
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्" ||८.८||
इसका अति गहन अर्थ जो मुझे समझ में आया है वह है ......
"अभ्यासयोगयुक्त अनन्यगामी चित्तद्वारा दिव्य परम पुरुष का हम चिंतन करें"|
.
Note: ---
विजातीय प्रतीतियों के व्यवधानसे रहित प्रतीतिकी आवृत्तिका नाम अभ्यास है|
वह अभ्यास ही योग है|
जहाँ अन्य कोई नहीं है, वहाँ मैं अनन्य हूँ|
.
"उस अभ्यासरूप योगसे युक्त चित्त द्वारा परमात्मा का आश्रय लेकर, विषयान्तर में न जाकर, गुरु महाराज के उपदेशानुसार कूटस्थ सूर्यमण्डल में जो अनन्य दिव्य परम पुरुष हैं, उन्हीं का अखण्डवृत्ति द्वारा निरंतर ध्यान करते हुए हम उन्हीं को प्राप्त हों| अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है| यही परमात्मा की प्राप्ति है|"
.
मुझे तो मेरे गुरु महाराज का यही आदेश और उपदेश है| बाकी सब इसी का विस्तार है| सब विभूतियाँ परमात्मा की हैं, हमारी नहीं| हम परमात्मा को उपलब्ध हों| इधर उधर फालतू की गपशप में समय नष्ट न कर सदा भगवान का स्मरण करें| दुःख और सुख आयेंगे और चले भी जायेंगे, पर हम उन से विचलित न हों| भगवान में आस्था रखें| वे सदा हमारी रक्षा कर रहे हैं|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ जनवरी २०१८

Sunday, 11 January 2026

राम जन्मभूमि प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव -- (२२ जनवरी २०२४)

 राम जन्मभूमि प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव -- (२२ जनवरी २०२४)

.
धर्म/अधर्म के नाम पर विवाद करने वाले कुछ भी कहें, हम तो पौष शुक्ल द्वादशी विक्रम संवत २०८० (२२ जनवरी २०२४) को पूर्वाह्न ११ बजे से अपराह्न १ बजे तक अनेक संत-महात्माओं व भक्तों के साथ भजन-कीर्तन करेंगे, बड़ी LED स्क्रीन लगाकर अयोध्या के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को देखेंगे, शंख-ध्वनि , घंटानाद , आरती और पौष-बड़ों का प्रसाद वितरित करेंगे। दो अलग अलग स्थानों से निमंत्रण आ चुके हैं, लेकिन हम वहीं जाएँगे जहाँ संत-महात्मा होंगे। सायंकाल दीपोत्सव भी मनाएंगे। रात्रि को भगवान श्रीराम का ध्यान भी करेंगे। पाँच-सौ वर्षों का कलंक दूर हो रहा है। पता नहीं हमारे पूर्वजों की कितनी पीढ़ियाँ इस दिन की प्रतीक्षा में गुजर गईं। वे जहाँ भी हैं, उन्हें आनंद होगा।
.
सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति व सभ्यता का केंद्र अब अयोध्या होगी। अयोध्या की प्रतिष्ठा अब वही होगी जो वेटिकन और मक्का की है। पूरा विश्व "सनातन हिन्दू भारत" की प्रतीक्षा कर रहा है। भगवत्-प्राप्ति और निरंतर भगवत्-चेतना में स्थिति -- हमारा धर्म है। यह उत्सव हमारे धर्म का पुनरोत्थान करेगा।
.
आज का दिन बहुत अधिक शुभ था। कई दिनों के पश्चात आज का मौसम बहुत अच्छा था। खूब धूप निकली, और सर्दी भी कम थी। आध्यात्मिक रूप से भी बहुत शुभ दिन था। जिस भी दिन भगवान की स्मृति बनी रहे वह दिन बहुत अधिक शुभ ​होता है।
"सीताराम चरण रति मोरे। अनुदिन बढ़ऊ अनुग्रह तोरे॥
जेहीं बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहू सो बेगि दास मैं तोरा॥"
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
११ जनवरी २०२४

Saturday, 10 January 2026

आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है। आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है। आत्मस्वरूप का चिंतन न करना बहुत बड़ी हिंसा, निजात्मा का तिरस्कार और आत्म-हत्या है।

 आत्मज्ञान (Self Realization) ही परम धर्म है। आत्मस्वरूप का चिंतन न करना बहुत बड़ी हिंसा, निजात्मा का तिरस्कार और आत्म-हत्या है।

.
इस भौतिक देह के भ्रूमध्य से एक ज्योति निकल कर सारी सृष्टि में फैल जाती है। वह ज्योति सारी सृष्टि में, और सारी सृष्टि उस ज्योति में होती है। उस ज्योति से ही प्रणव का एक मधुर नाद भी निःसृत होता रहता है। वह सर्वव्यापी ज्योति और वह नाद -- मैं स्वयं हूँ, यह नश्वर देह नहीं। उस चेतना में मैं सच्चिदानंद परमब्रह्म के साथ एक होकर रहता हूँ। हरेक सांस के साथ अजपा-जप (हंसवतीऋक/हंसःयोग) चलता रहता है। कुंभक के समय, और जब भी प्रेरणा मिले तब तेलधारा की तरह नादानुसंधान होता रहता है।
.
श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का उनत्तीसवाँ मंत्र एक बहुत ही गोपनीय साधना का संकेत करता है जिसे प्राणक्रिया कहते हैं --
"अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४:२९॥
उपरोक्त विद्या एक गोपनीय विद्या है जिसे आचार्य अपने शिष्य की पात्रता देखकर उसे अपने सामने बैठाकर सिखाता है। यह आत्म-साधना आध्यात्मिक यज्ञ का एक रूप है, जिसे महावतार बाबाजी ने क्रिया-योग का नाम दिया है। यह भी इस जीवन की एक उपलब्धि है।
.
आप सब मेरी ही निजात्मा और मेरे ही प्राण हो। आप सब को नमन॥ ॐ तत्सत्॥
कृपा शंकर
१० जनवरी २०२६