Wednesday, 18 March 2026

मोहनदास करमचंद गाँधी की पुण्यतिथि ---

 मोहनदास करमचंद गाँधी की पुण्यतिथि पर मैं गांधी को और पुणे व पुणे के आसपास के उन छः हज़ार से अधिक निर्दोष ब्राह्मणों को श्रद्धांजलि देता हूँ, जिनकी हत्या गाँधीवध की प्रतिक्रया स्वरुप अगले तीन दिनों में कर दी गयी थीं। पुणे की गलियों में चारपाई डालकर सो रहे निर्दोष ब्राह्मणों पर किरोसिन तेल डालकर उन्हें जीवित जला दिया गया। पुणे में ब्राह्मणों को घरों से निकाल निकाल कर सड़कों पर घसीट घसीट कर उनकी सामूहिक हत्याएँ की गईं। उस घटना की कोई जाँच नहीं हुई और घटना को दबा दिया गया। उन ब्राह्मणों का दोष इतना ही था कि नाथूराम गोड़से एक ब्राह्मण थे, और वह भी पुणे के।

.
मोहनदास गांधी पर गोली चली तो उनकी कुछ प्राथमिक चिकित्सा तो अवश्य ही हुई होगी। उनके शव का पोस्ट-मार्टम भी हुआ ही होगा। वे रिपोर्ट्स सार्वजनिक क्यों नहीं की जातीं? मोहनदास गाँधी कांग्रेस को भंग करना चाहते थे जिसके लिए जवाहरलाल नेहरु सहमत नहीं थे। गाँधी जी की आर्थिक नीतियाँ भी नेहरू की नीतियों के विरुद्ध थीं। गाँधी की सुरक्षा व्यवस्था क्यों हटा ली गयी थी? क्या इसीलिए कि वे उस समय किसी के लिए किसी काम के नहीं रह गए थे? नाथूराम गोडसे को पिस्तौल और गोलियाँ किसने दीं? किसने उन्हें हत्या करने के लिए उकसाया? गांधी की ह्त्या के बाद उनके शरीर के पोस्ट-मार्टम की क्या रिपोर्ट थी? ऐसे कई अनुत्तरित प्रश्न हैं|
.
क्या किसी ने एक तीर से कई शिकार तो नहीं किये? गांधी जी को भी मार्ग से हटवा दिया, और आरएसएस पर भी प्रतिबन्ध लगवा दिया, पुणे के राजनीति में सक्रीय ब्राह्मणों को भी मरवा दिया, और हिन्दुओं को भी बदनाम करवा दिया? क्या इसके पीछे कोई बहुत बड़ा षडयंत्र तो नहीं था?
.
गाँधी की नीतियों व विचारों से महर्षि श्रीअरविन्द बिलकुल भी सहमत नहीं थे| उन्होंने गाँधी के बारे में लिखा था कि गाँधी की नीतियाँ एक बहुत बड़े भ्रम और विनाश को जन्म देंगी, जो सत्य सिद्ध हुआ| महर्षि श्रीअरविद के वे लेख नेट पर उपलब्ध हैं| कृपया उन्हें पढ़ें|
.
गाँधी द्वारा आरम्भ खिलाफत आन्दोलन जो तुर्की के खलीफा को बापस गद्दीनशीन करने के लिए था, का क्या औचित्य था? क्या यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा नहीं थी? क्या इससे पकिस्तान की नींव नहीं पड़ी? राजनितिक व सामाजिक रूप से गांधीजी का पुनर्मूल्यांकन क्या आवश्यक नहीं है? गांधीजी भारत के तो नहीं पर पाकिस्तान के राष्ट्रपिता अवश्य थे। पाकिस्तान की नींव ही उनके खिलाफत आन्दोलन से पड़ी।
.
गांधीजी द्वारा किया गया सबसे महान कार्य था -- नेतृत्वहीन भारत का नेतृत्व करना और बिहार में चंपारण का सत्याग्रह। गांधीजी एक राजनेता थे, कोई महात्मा नहीं। उनमें अत्यधिक असामान्य कामुकता जैसी सभी मानवी दुर्बलताएँ थीं। वे हमारे आदर्श नहीं हो सकते। उनको राष्ट्रपिता कहना गलत है, क्या गाँधी से पूर्व भारत एक राष्ट्र नहीं था? आजकल पढ़ाया जाता है कि अंग्रेजों से पूर्व भारत नहीं था, छोटे छोटे राज्य थे। यह गलत है। सम्राट अशोक व समुद्रगुप्त जैसे राजाओं के राज्य में भारत की सीमाएँ अंग्रेजों द्वारा शासित भारत से भी अधिक विशाल थीं।
.
मोहनदास गांधी के पिता करमचंद गांधी ने चार विवाह किये थे। उनकी चौथी पत्नी पुतलीबाई की वे चौथी संतान थे। उनके बचपन का नाम मोनु था। कहते हैं कि उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर के दरबार के दीवान थे। पहली बात तो यह है कि पोरबंदर कोई रियासत नहीं, बल्कि एक छोटा सा ठिकाना था। दीवान उस बाबू को कहते थे जो हिसाब-किताब लिखने वाला मामूली क्लर्क होता था। वहाँ के सारे बड़े व्यापारी मुसलमान थे। अब प्रश्न यह पैदा होता है कि उन्हें पढ़ने के लिए इंग्लैंड किसने व क्यों भेजा? उन्हे दक्षिण अफ्रीका में किसने काम दिलाया?
.
अंग्रेजों ने उन्हें हजारों एकड़ जमीन (दक्षिण अफ्रीका व भारत में) क्यों भेंट की?
अपने से विरुद्ध जाने वाले सभी भारतियों की ज़मीनें अंग्रेज़ लोग छीन लेते थे। फिर गांधी को दक्षिण अफ्रीका और भारत में हजारों एकड़ भूमि क्यों प्रदान की?
क्या वे अंग्रेजों के एक वेतनभोगी एजेंट थे? क्या उनकी अहिंसा भारत के क्रांतिकारियों से अंग्रेजों की रक्षा के लिए थी? उन्हें महात्मा की उपाधि किसने दी? वे इतने अधिक कामुक और परस्त्रीगामी लंपट क्यों थे? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिन के उत्तर अभी आने बाकी हैं।
श्रद्धांजली | वन्दे मातरं | भारत माता की जय |
कृपा शंकर
३० जनवरी २०२६

राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? हमारी जाति और धर्म क्या है?

राष्ट्र की वर्तमान दशा में हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं? हमारी जाति और धर्म क्या है?

.
इस विषय पर मेरी सोच स्पष्ट है। मेरा एकमात्र उत्तर है कि हमें अपने स्वधर्म का सदैव पालन करते रहना चाहिए। धर्म का अर्थ Religion नहीं है। वास्तव में धर्म शब्द का अनुवाद नहीं हो सकता। धर्म धर्म ही रहेगा। वैशेषिक-सूत्रों, महाभारत, मनु-स्मृति, और अन्य अनेक आगम ग्रंथों में में धर्म शब्द की सर्वोच्च व्याख्या की गई है। इस विषय पर मैं अनेक बार लिख चुका हूँ। बार बार लिखना पुनरोक्ति दोष होगा, फिर भी लिख रहा हूँ। हम शाश्वत् आत्मा हैं, आत्मा का स्वधर्म परमात्मा की अभीप्सा, उपासना और पूर्ण समर्पण है। यही हमारा स्वधर्म है।
.
कुछ लोग मुझे जातिवादी कह कर अपने मन की कुंठा को ही व्यक्त करते हैं जो सबसे बड़ा झूठ है। उनको मेरा एक ही उत्तर है -- जब मैं यह शरीर ही नहीं हूँ तो मेरी जाति क्या हो सकती है? ---
"जाति हमारी ब्रह्म है, माता-पिता हैं राम।
गृह हमारा शून्य में, अनहद में विश्राम॥"
.
और मुझे कुछ भी नहीं कहना है। गुरु महाराज ने तो योग और वेदान्त की शिक्षा दी, व उपासना का मर्म समझाया। गुरुकृपा से ही यह समझ पाया हूँ कि इस समय तो परमात्मा को पूर्ण आत्म-समर्पण ही मेरा स्वधर्म है॥ इस जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हो। गुरु महाराज ने परमात्मा का बोध भी अनेक बार बड़े स्पष्ट रूप से कराया है। अतः कोई संशय नहीं है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ शिवोहम् शिवोहम् शिवोहम् !! अहं ब्रह्मास्मि !!
ॐ तत् ॐ सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ फरवरी २०२६

(१) समाज में "वर्ग-संघर्ष" नहीं, "वर्ग-सहयोग", "सामाजिक-समरसता" और "देशभक्ति" की भावना प्रबलतम होनी चाहिये। (२) भारत में जनतंत्र के स्थान पर राजतन्त्र की स्थापना हो सकती है।

 (१) समाज में "वर्ग-संघर्ष" नहीं, "वर्ग-सहयोग", "सामाजिक-समरसता" और "देशभक्ति" की भावना प्रबलतम होनी चाहिये।

(२) भारत में जनतंत्र के स्थान पर राजतन्त्र की स्थापना हो सकती है।
.
दुर्भाग्य से भारत में सामाजिक-न्याय के नाम पर सामाजिक एकता को तोड़कर नये वर्ग बना कर उनमें संघर्ष कराया जा रहा है। यह राजनीति बड़ी घातक सिद्ध होगी। मैं इसका विरोध करता हूँ। लोकतन्त्र को भी अपनी समाप्ती के लिए कोई तो बहाना चाहिये। हम अंग्रेजों द्वारा लिखाये गये झूठे इतिहास का शिकार बनते जा रहे हैं।
.
मुझे तो भविष्य में राजतंत्र की बापसी दिखायी दे रही है। अपने राज्याभिषेक के समय हिन्दू राजा --- धर्म-रक्षा की प्रतिज्ञा और संकल्प लेते थे। यह कोई गोपनीयता की शपथ मात्र नहीं थी। हिन्दू क्षत्रिय राजाओं का घोषित लक्ष्य ही धर्म-रक्षा करते हुए प्रजा का कल्याण और पालन करना, न्याय स्थापित करना और राज्य में धर्म का संरक्षण करना था। वे स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर प्रजा का कल्याण, सुख, सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध थे। प्रजा की भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि सुनिश्चित करना राजा का सर्वोच्च धर्म माना जाता था।
.
मुझे तो यही लगा रहा है कि भविष्य का राजधर्म राजतंत्र ही होगा। बाकी जैसी ईश्वर की इच्छा। हम केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं।
"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्॥" ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
४ फरवरी २०२६

परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---

 परमात्मा में निरंतर रमण करते हुए हम परमात्मा में ही स्थित हों ---

.
पहले मुझे लगता था कि इस तापत्रय-सन्तप्त संसार में मैं अनुपयुक्त हूँ जो किसी गलत स्थान पर आ गया है। लेकिन मेरी सोच गलत थी। भगवान ने अपनी सृष्टि में हमें कहीं भी रखा हो, वे गलत नहीं हो सकते। इस सृष्टि में किसी भी तरह की किसी कामना का होना एक धोखा है, जो हमें सीधे एक भयंकर कष्ट यानि दुःख में डालता है। यहाँ केवल एक गहन अभीप्सा हो परमात्मा के लिये, और उन्हीं में हम निरंतर रमण करें। यही सीखने के लिए हम इस संसार में आते हैं।
.
मैं ही सब की आत्मा हूँ, -- इस भाव का अनंत विस्तार ही -- "अहं ब्रह्मास्मि" है। संसार में हम अपनी प्रशंसा से प्रसन्न न हों, क्योंकि मान-सम्मान पाने की कामना, माया का एक बहुत बड़ा भयंकर जाल है, जिसमें धोखा ही धोखा है। समत्व की उपलब्धि ही ज्ञान है, और समत्व में स्थित व्यक्ति ही ज्ञानी है। गीता के अनुसार समत्व का अर्थ (समत्वं योग उच्यते - २:४८) जीवन की सभी विपरीत परिस्थितियों, में मन को स्थिर और समान बनाये रखना है।
.
अहंकार से प्रेरित इच्छाओं और ममत्व के कारण हमारा व्यक्तित्व विखंडित भी हो सकता है। हमारे समस्त दुःखों का कारण -- राग-द्वेष, अहंकार और कामनायें हैं। वीतराग होकर यानि इन सब को त्याग कर अपनी प्रज्ञा की परमात्मा में निरंतर स्थिति -- स्थितप्रज्ञता है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति ही ब्राह्मी स्थिति यानि ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।
.
मान-सम्मान पाने की कामना एक स्पृहा है जो हमारे मन को अशांत करती है। गीता में भगवान हमें निःस्पृह होने का उपदेश देते हैं --
"विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥२:७१॥"
अर्थात् जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित, ममभाव रहित, और निरहंकार हुआ विचरण करता है, वह शान्ति प्राप्त करता है॥
.
आत्मा में निरंतर रमण करते करते हम आत्मा में ही स्थित होकर आत्माराम
बनें। यही ब्रह्म में विचरण और ब्रह्मचर्य है जो सारे अंधकार को दूर कर आगे के सारे द्वार खोलता है।
ॐ ऐं गुरुभ्यो नमः॥ ॐ शिव !! ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
५ फरवरी २०२६

"निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन्" ---

 उपासना में हम कर्ताभाव से मुक्त होकर एक साक्षीमात्र बनें। साधना तो जगन्माता स्वयं करती हैं और सारे कर्मफल परमशिव को अर्पित करती हैं। एकमात्र कर्ता वे स्वयं हैं। हम तो एक निमित्त मात्र हैं। दूसरे शब्दों में महाकाली सारी साधना स्वयं करते हुए सारे कर्मफल श्रीकृष्ण को अर्पित करती हैं।

गीता के ११वें अध्याय के ३३वें मंत्र में भगवान हमें निमित्त मात्र होने का उपदेश देते हैं जो अति विचारणीय है --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
अर्थात् - " इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
गीता के शंकर भाष्य के अनुसार बायें हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने के कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है (सव्येन वामेनापि हस्तेन शराणां क्षेप्ता सव्यसाची इति उच्यते अर्जुनः)॥ भगवान का यह उपदेश कर्मयोग का सार है जो हमें फल की चिंता और अहंकार से मुक्त कर एक निमित्त मात्र होने का आदेश देता है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ फरवरी २०२६
.
पुनश्च: -- शक्ति के बिना शिव भी शव हैं। यह चित्र भगवती "श्री" का है जिनके बिना शिव भी शव हैं। भगवती को मैं नमन करता हूँ। शिव और शक्ति -- दोनों एक हैं, जिन्हें मैं अपना पूर्ण समर्पण करता हूँ।

आजकल ब्राह्मणों पर हो रहे प्रहार वास्तव में सनातन धर्म पर प्रहार हैं ---

आजकल ब्राह्मणों पर हो रहे प्रहार वास्तव में सनातन धर्म पर प्रहार हैं। ब्राह्मणों की संस्था यदि नष्ट हो गयी तो सनातन धर्म भी नष्ट हो जाएगा। सनातन धर्म यानि हिन्दुत्व को जो नष्ट करना चाहते हैं, वे हैं -- ईसाईयत, इस्लाम, मार्क्सवाद, पूरी पश्चिमी सभ्यता, नास्तिकतावाद और आधुनिकतावाद।

.
पेरियार के अनुयायियों द्वारा तमिलनाडु से सारे ब्राह्मण भगा दिये गये थे, आज बंगाल से भगाये जा रहे हैं। तमिलनाडु की सरकार हिन्दुत्व को ही एक छूत की बीमारी बता रही है। कांग्रेस तो ब्राह्मणद्रोही थी ही, वर्तमान भाजपा सरकार भी ब्राह्मणद्रोही हो गयी है। भाजपा के सबसे अधिक समर्थक ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग हैं।
लेकिन सनातन धर्म को भगवान नष्ट नहीं होने देंगे। सनातन धर्म भारत की अस्मिता है। जितने प्रहार उस पर हो रहे हैं, उसका दस लाखवां भाग जितना आक्रमण भी किसी अन्य सभ्यता पर होता तो वह सभ्यता अब तक नष्ट हो गयी होती।
.
भारत के हिन्दू समाज में ब्राह्मण सबसे अधिक कमजोर, दरिद्र और अति पिछड़ा वर्ग है। सबसे अधिक गरीबी ब्राह्मणों में है। उन्हें नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्हें नष्ट करना भी सबसे आसान है, क्योंकि धर्मशिक्षा के अभाव में वे दिशाहीन हो गये हैं।
कृपा शंकर
८ फरवरी २०२६

आध्यात्म में साधक कौन है? साध्य क्या है? और साधना क्या होती है? ---

 आध्यात्म में साधक कौन है? साध्य क्या है? और साधना क्या होती है?

.
आध्यात्म मेरा प्राण है। निरंतर मेरे अस्तित्व से परमात्मा स्वयं व्यक्त हो रहे हैं। मेरे बारे में कोई कुछ भी सोचे यह उसकी अपनी समस्या है। मेरी प्रथम, अंतिम, और एकमात्र समस्या -- निज जीवन में परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है। यह मेरा व्यक्तिगत मामला है। इसमें न तो मुझे किसी की कोई सलाह चाहिए और न किसी का कोई सहयोग या स्वीकारोक्ति। मैं किसी से कुछ नहीं मांगने वाला अतः यह शंका न करें कि मैं आपसे कुछ मांग लूँगा।
मैं भगवान से भी कुछ मांगने नहीं, उन्हें उनका सारा सामान बापस देने आया हूँ। भगवान को बापस देने के लिए मेरे पास बहुत कुछ है। सबसे बड़ी चीज तो उनका दिया हुआ "अन्तःकरण" (मन बुद्धि चित्त अहंकार) है, फिर ये भौतिक, सूक्ष्म व कारण शरीर, सारी ज्ञानेंद्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ और उनकी तन्मात्राएँ हैं।
.
मैं योगमार्ग के अपने अनुभवों की बात करता हूँ। साधनाकाल के आरंभ में साधक होने का भ्रम था कि इतना जप, इतना तप, इतना ध्यान, और इतनी क्रियाएँ आदि करनी है। यह सब मेरा भ्रम था।
सारी साधनायें तो जगन्माता/भगवती स्वयं घनीभूत प्राण तत्व कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में करती हैं, और साध्य ऊर्ध्वमूल में सच्चिदानंद पुरुषोत्तम/परमशिव हैं। ध्यान और साक्षात्कार उन्हीं का होता है। कैसे होता है? यह विषय गोपनीय है जिसकी चर्चा गुरु-परंपरा के बाहर नहीं होती।
सार की बात यह है कि सारी साधना तो जगन्माता स्वयं करती हैं, और साध्य भगवान परमशिव हैं। हम एक निमित्त साक्षी मात्र हैं।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
८ फरवरी २०२६