Tuesday, 2 June 2026

भगवान की भक्ति से क्या मिलेगा? --- -- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख) .

 भगवान की भक्ति से क्या मिलेगा? --- -- (संशोधित व पुनःप्रेषित लेख)

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इस प्रश्न का सर्वोत्तम उत्तर तो भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के ९वें अध्याय में दिया है।
इस प्रश्न के उत्तर रामचरितमानस व भागवत में भी अनेक प्रसंगों में दिये हुए हैं।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् - मैं समस्त भूतों में सम हूँ; न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय; परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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लेकिन व्यावहारिक बात तो यह है कि --
"भगवान की भक्ति में सिर्फ भगवान ही मिलेंगे, भौतिक/सांसारिक दृष्टि से कुछ भी नहीं मिलेगा। जो कुछ स्वयं के पास में है, वह भी छीन लिया जाएगा। सारी विषय-वासनाएँ और कामनाएँ समाप्त हो जायेंगी, और इस दुनियाँ के भोग हमारे लायक नहीं रहेंगे।"
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जिन्हें कुछ सांसारिक सामान चाहिए वे भगवान की भक्ति नहीं करें, क्योंकि भगवान एक स्वार्थी प्रेमी हैं, वे हमारा १००% (शत-प्रतिशत) प्रेम मांगते हैं। उनके यहाँ ९९.९९% भी नहीं चलेगा। हम उन्हें अपना शत-प्रतिशत देंगे तभी वे आएंगे।
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ईसाईयों के ग्रन्थों में भी यही बात कही गई है --
"For unto every one that hath shall be given, and he shall have abundance: but from him, that hath not shall be taken away even that which he hath. (Matthew 25:29 KJV).
(दुर्भाग्य से पश्चिमी जगत ने इस बात को नहीं माना, और अपने स्वयं के ही अर्थ लगा लिए)
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झूठे वैराग्य और झूठी भक्ति का ढोंग हमें भगवान से दूर करता है। अपने शब्दों या अभिनय के द्वारा एक झूठे वैराग्य और झूठी भक्ति का प्रदर्शन -- सबसे बड़ा छल और धोखा है, जो हम स्वयं के साथ करते हैं। हम किसी को प्रभावित करने के लिए दिखावा करते हैं, यह एक बहुत बड़ा और छिपा हुआ दुःखदायी अहंकार है। किसी को प्रभावित करने से क्या मिलेगा? कुछ भी नहीं, सिर्फ अहंकार की ही तृप्ति होगी। महत्वपूर्ण हम नहीं, भगवान हैं, जो हमारे ह्रदय में हैं।
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हम अपने रूप, गुण, धन, विद्या, बल, पद, यौवन और व्यक्तित्व का भी बहुत अधिक दिखावा कर के दूसरों को हीन और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं। यह भी स्वयं को धोखा देना, और भगवान का अपमान करना है।
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वर्णाश्रम धर्म का पालन करके भी यदि प्रभु में प्रेम नहीं हुआ तो क्या लाभ?
और प्रभु में प्रेम हो गया तो वर्णाश्रम धर्म का पालन न हुआ तो क्या हानि?
आप सब में परमात्मा को नमन !!
कृपा शंकर
२ जून २०२२

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो या कोई भी आस्था --- उसके औचित्य का एक ही मापदंड है -- "परमात्मा की अनुभूति" ---

कोई भी आध्यात्मिक साधना हो या कोई भी आस्था --- उसके औचित्य का एक ही मापदंड है -- "परमात्मा की अनुभूति"। आप किसी भी मार्ग पर चल रहे हों, यदि आपको दिव्य प्रेम, आनंद, और परमात्मा की निरंतर अनुभूति होती है तो वह मार्ग सही है; अन्यथा गलत। हमारा लक्ष्य केवल परमात्मा है।

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एक बार परमात्मा की गहनतम अनुभूति हो जाये तब न तो कोई गुरु है और न कोई शिष्य। न कोई भूतकाल है और न वर्तमान। उस समय हम कालातीत हैं। अपना सम्पूर्ण विलय परमात्मा में कर दें। जो हमें परमात्मा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे और मार्ग बताए, उस महापुरुष का स्वागत है। लेकिन किसी का भी साथ शाश्वत नहीं है। यहाँ कोई अन्य नहीं है। केवल परमात्मा ही सत्य है, हम उसके साथ एक हैं। अन्य कोई नहीं है, हम भी नहीं। कालातीत परम चेतना को ही कूटस्थ कहते हैं। हम कूटस्थ चैतन्य में रहें।
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ध्यानस्थ होते ही हमारी चेतना सूक्ष्म जगत में चली जाती है। ध्यान के जिस आसन पर हम बैठते हैं, वह हमारा राजसिंहासन है। ध्यानस्थ होने पर सूक्ष्म जगत के सारे अनंत आकाश, सारे ब्रह्मांड, सारी आकाश-गंगाएँ, सारे चाँद, तारे, नक्षत्र और सारी सृष्टि -- हमारे साथ एक हो जाती हैं। जो कुछ भी सृष्ट हुआ है, और जो कुछ भी सृष्ट होना है, वह सम्पूर्ण अस्तित्व हम हैं। हमारे से पृथक कुछ भी नहीं है। परमात्मा के प्रेम और आनंद के रूप में हम व्यक्त होते हैं। समस्त सृष्टि हमारा परिवार, और समस्त ब्रह्मांड हमारा घर है। हम अनंत असीम सर्वत्र हैं। हम और हमारे प्रभु एक हैं। ॐ तत् सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जून २०२६

Saturday, 30 May 2026

कुर्द जाति क्या मूल रूप से हिन्दू है?

 कुर्द जाति क्या मूल रूप से हिन्दू है? क्या ये महाराजा विक्रमादित्य के कृत-सैनिक हैं? फारसी का कुर्द शब्द क्या संस्कृत के कृत शब्द का अपभ्रंस है?

विकिपीडिया के अनुसार कुर्द (کورد) या कुर्द लोग, पश्चिम एशिया से एक ईरानी जातीय समूह है। वे कुर्दिस्तान के मूल निवासी हैं, जो दक्षिणपूर्वी तुर्की, उत्तर-पश्चिमी ईरान, उत्तरी इराक और उत्तरपूर्वी सीरिया में फैला एक भौगोलिक क्षेत्र है। इनका कोई देश नहीं है। इनके बारे में जानने की जिज्ञासा है।
पुनश्च: ---
मुझे लगता है कि महाराजा विक्रमादित्य का साम्राज्य पश्चिम में फारस, अरब और रोम तक था। उत्तर में पूरा मध्य एशिया, और पूरा शिविर (जिसे हम साइबेरिया कहते हैं उसे रूसी भाषा में "Сибирь" सिबिर कहते हैं) था। पूर्व में विएतनाम तक, और दक्षिण में मलेशिया और इन्डोनेशिया तक था।
कुछ वर्षों पूर्व ईरान में हुई एक खुदाई में महाराजा विक्रमादित्य की मूर्ति मिली थी जिसमें वे एक घोड़े पर बैठे हुए हैं, धोती पहिन रखी है, कमर में तलवार लटकी हुई है। यह समाचार मैंने कहीं पढ़ा था। यह भी पढ़ा था कि उनकी मृत्यु फारस (वर्तमान ईरान) में हुई थी। यह भी पढ़ा था कि उनके साथ जो सैनिक थे वे वही रह गये। वे कृत (सेवा निवृत) थे। समय के साथ उन्हें इस्लाम अपनाना पड़ा, और वे ही "कुर्द" कहलाये। उनमें कुछ यजीदी भी हैं। लेकिन मूल रूप से सभी हिन्दू थे।
यह अनुसंधान का विषय है, मुझे इस बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। आप सभी को धन्यवाद॥
३१ मई २०२५

Wednesday, 20 May 2026

ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है --- .

ब्रह्मज्ञान का अभाव इस संसार में हमारी दुर्गति का मुख्य कारण है ---
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ब्रह्मज्ञान ही हमारी वास्तविक शक्ति है। ब्रह्मज्ञ होने पर असत्य और अंधकार की शक्तियाँ हमारा कुछ भी अहित नहीं कर सकतीं। हम ब्रह्ममय हों, यही समष्टि की सबसे बड़ी सेवा है।
ब्रह्मज्ञान के लिए सर्वप्रथम तो परमात्मा से प्रार्थना करें, फिर किन्हीं श्रौत्रीय (जिन्हें श्रुतियों यानि वेदों का ज्ञान हो) और ब्रहमनिष्ठ महात्मा (जिनकी पूर्ण निष्ठा ब्रह्म में हो) से मार्गदर्शन प्राप्त कर उनके सान्निध्य में उनके द्वारा बताई हुई विधि से वैदिक साधना का आरंभ करें।
यदि ऐसे आचार्य नहीं भी मिलते हैं तो दक्षिणामूर्ति रूप में भगवान शिव, और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण तो हैं ही। उन्हें गुरु मान कर उपनिषदों व श्रीमद्भगवद्गीता में बताई हुई साधना का आरंभ करें। फिर वे लौकिक सद्गुरु की उचित व्यवस्था भी कर देंगे। लौकिक रूप से एक ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय आचार्य ही सद्गुरु हो सकता है। अन्य कोई नहीं।
ब्रह्मज्ञान ही भूमाविद्या है। ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार ने अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को ब्रह्मज्ञान का जो उपदेश दिया था, उसका नाम उन्होने भूमा-विद्या रखा।
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भगवान विष्णु या भगवान शिव की निरंतर विस्तृत हो रही ज्योतिर्मय सर्वव्यापक अनंतता का ही कूटस्थ-चैतन्य में ध्यान करें। साधनाकाल में अपने इस नश्वर देह को भूल जाएँ। परमात्मा की ज्योतिर्मय अनंतता ही हमारा शरीर है, और हम परमात्मा के साथ एक हैं। ध्यान साधना में अकिंचन-भाव को भूल जाएँ, और सर्वदा सर्वस्व-भाव में ही स्थित रहें।
मेरुदंड सर्वदा उन्नत और ठुड्डी भूमि के सामानांतर रहे। पूर्ण खेचरी या अर्ध-खेचरी मुद्रा में ध्यानस्थ होने से पूर्व कुछ देर तक प्राणायाम करें, फिर "अजपा-जप" से आरंभ करें। तत्पश्चात मूर्धा में प्रणव मंत्र का जप करें। भगवान की कृपा फलीभूत हुई तो सारा मार्गदर्शन और साधना में सफलता भी प्राप्त हो जाएगी। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१९ मई २०२६

Tuesday, 19 May 2026

एक-दो बातें हैं जो मुझे विचलित कर देती हैं।

 एक-दो बातें हैं जो मुझे विचलित कर देती हैं।

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पहली बात तो भाषा की है। मैं सरल से सरल हिन्दी भाषा में लिखता हूँ, इस से अधिक सरल भाषा नहीं हो सकती, फिर भी अनेक लोग मुझसे शिकायत करते हैं कि मेरी भाषा उन्हें समझ में नहीं आती। यदि समझ में नहीं आती तो भाषा का अध्ययन करो, अपना शब्द-कोष बढ़ाओ।
सड़क छाप भाषा का प्रयोग कर मैं अपना स्तर नीचा नहीं कर सकता। जो मेरी हिन्दी भाषा को नहीं समझते, उन्हें हिन्दी भाषा का ज्ञान ही नहीं है। वे मुझे नहीं पढ़ें।
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मैं जिन विषयों पर लिखता हूँ, यदि वे किसी को अच्छे नहीं लगते तो वे मुझे प्रतिबंधित (Restrict) या अवरुद्ध (Block) कर दें। मैं अपने स्वभाव के अनुकूल और आत्म-संतुष्टि के लिए लिखता हूँ, किसी आर्थिक लाभ के लिए नहीं।
आध्यात्म में भक्ति और वेदान्त की बातें मुझे बहुत प्रिय हैं इसलिए मैं गीता और उपनिषदों की बातें सरल से सरल भाषा में लिखता रहता हूँ। अपना स्तर इससे अधिक नीचे नहीं गिरा सकता।
विश्व के अनेक देशों की मैंने खूब यात्राएं की हैं, और विदेशों में खूब रहा हूँ। पहले उनके बारे में खूब लिखता था; अब उनके बारे में लिखना पूरी तरह बंद कर दिया है। अब लिखूँगा तो केवल आध्यात्म पर ही लिखूँगा, अन्यथा कुछ भी नहीं लिखूँगा। सभी को नमन !!
कृपा शंकर
19 मई 2024

Saturday, 16 May 2026

मैं तो फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल कैसा? तुम तो महक हो, तुम्हें अभी हवाओं में समाना है .....

मैं तो फूल हूँ, मुरझा गया तो मलाल कैसा?
तुम तो महक हो, तुम्हें अभी हवाओं में समाना है .....
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किसी को किसी के प्रति भी द्वेष नहीं रखना चाहिए| राग और द्वेष ये दो ही पुनर्जन्म यानि इस संसार में बारम्बार आने के कारण हैं| जिससे भी हम द्वेष रखते हैं, अगले जन्म में उसी के घर जन्म लेना पड़ता है| जिस भी परिस्थिति और वातावरण से हमें द्वेष हैं वह वातावरण और परिस्थिति हमें दुबारा मिलती है| बुराई का प्रतिकार करो, युद्धभूमि में शत्रु का भी संहार करो पर ह्रदय में घृणा बिलकुल भी ना हो| परमात्मा को कर्ता बनाकर सब कार्य करो| कर्तव्य निभाते हुए भी अकर्ता बने रहो| सारे कार्य परमात्मा को समर्पित कर दो, फल की अपेक्षा या कामना मत करो|
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ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ मई २०१९

अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से कीजिए ---

 अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से कीजिए। वैसे तो पूरी गीता ही योग शास्त्र है, लेकिन उसके १५ वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" के आरंभिक ६ श्लोकों में योग-साधना के सारे सूत्र समाहित हैं। लेकिन वे भगवान की कृपा से ही समझ में आ सकते हैं। उन्हें बौद्धिक रूप से समझने मात्र का ही नहीं, निज जीवन में अवतरित कीजिए।

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मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह सबसे पहिले दूसरों की कमी देखता है। मेरे में लाख कमियाँ होंगी, लेकिन उनसे किसी अन्य की कोई हानि नहीं होगी, अतः मेरी कमियों की चिंता छोड़ दें, उनके लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ, कोई अन्य नहीं। अपनी स्वयं की कमियों को दूर करने का प्रयास करें। मेरे में लाखों कमियाँ हैं, लेकिन मैं हर समय ईश्वर की चेतना में रहता हूँ, यही मेरा एकमात्र गुण है। मैं स्वयं को सदा ईश्वर के सन्मुख पाता हूँ। मेरी बुराई करने से मेरी बुराइयों के अतिरिक्त किसी को कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि देखना है तो ईश्वर में स्वयं को देखो।
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भगवान कहते हैं --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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अपने भाष्य में आचार्य शंकर कहते हैं कि "संसार से विरक्त हुए पुरुष को ही भगवान का तत्त्व जानने का अधिकार है, अन्य को नहीं"। उनका युग दूसरा था। उस समय समाज में इतने अभाव और कष्ट नहीं थे, जितने अब हैं। इसलिए परमात्मा की कृपा भी इस युग में शीघ्र ही हो जाती है।
१६ मई २०२३