Friday, 26 June 2026

सत्य की विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही देवयान मार्ग (मोक्ष का मार्ग) प्रशस्त होता है ---

 "सत्यमेव जयते नानृतम् सत्येन पन्था विततो देवयानः"

(सत्य की विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही देवयान मार्ग (मोक्ष का मार्ग) प्रशस्त होता है। (मुंडकोपनिषद ३.१.६.)
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केवल १२ मंत्रों का यह अथर्ववेदीय उपनिषद सबसे छोटा उपनिषद है लेकिन ज्ञान का भंडार है। यह मुख्य उपनिषदों में आता है। इसमें अंगिरा ऋषि द्वारा शौनक ऋषि को दिया गया ब्रह्मविद्या का उपदेश है। इसी को आधार बनाकर आचार्य गौड़पाद ने "मांडूक्यकारिका" नामक ग्रंथ की रचना की, जो अद्वैत वेदान्त दर्शन का सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रंथ है। आचार्य शंकर ने सबसे पहिला भाष्य ही मुंडकोपनिषद पर लिखा था।
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मुंडकोपनिषद -- ज्ञान और आध्यात्मिकता का वह स्वर्ण-भंडार है जो सांसारिक मोह-माया से मन का 'मुंडन' कर सत्य का दर्शन कराता है। इसकी साधना से सत्य का बोध होता है। दो पक्षियों का दृष्टांत मुंडकोपनिषद (मंत्र 3.1.1) में एक प्रसिद्ध रूपक के रूप में दिया गया है, जो जीव और ईश्वर के संबंधों को समझाता है। एक ही वृक्ष (देह) पर दो पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) साथ-साथ बैठे हैं। इनमें से एक पक्षी (जीव) उस पेड़ के फल (संसार के सुख-दुःख) खाता है और मोहित रहता है, जबकि दूसरा पक्षी (परमात्मा) बिना फल खाए बस शांत भाव से देखता और साक्षी बना रहता है। जब जीव मोह त्याग कर उस दूसरे साक्षी पक्षी को देखता है, तब वह सभी शोकों से मुक्त हो जाता है।
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मुंडकोपनिषद का मुख्य सार -- "ब्रह्म ही सत्य" है। जैसे जलती हुई अग्नि से हज़ारों चिंगारियां निकलती हैं, वैसे ही इस परम ब्रह्म से ही सम्पूर्ण जीव, जगत और तत्व निकलते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं। जिस प्रकार नदियाँ अपना नाम और रूप त्याग कर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष नाम और रूप से मुक्त होकर परमब्रह्म में एकाकार हो जाते हैं। ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
२६ मई २०२६
पुनश्च: --जो मुमुक्षु इसी जीवन में परमात्मा का बोध करना चाहते हैं, उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के साथ साथ मुंडकोपनिषद का स्वाध्याय भी करना चाहिए।

निज चेतना में यदि कुछ उपलब्ध होने को है तो वह "तुरीयातीत अवस्था" है ---

 निज चेतना में यदि कुछ उपलब्ध होने को है तो वह "तुरीयातीत अवस्था" है, जिसमें साधक का पृथक अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाता है, और वह ईश्वर के साथ एक होता है। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, के पश्चात तुरीय अवस्था आती है, जिसमें साधक एक साक्षीमात्र हो जाता है, और उसका मन पूर्णतः शांत हो जाता है।

तुरीय से भी परे की अवस्था को "तुरीयातीत" कहते हैं। इस स्थिति में 'साक्षीभाव' भी मिट जाता है, और अनंत परमात्मा से भेद भी पूरी तरह समाप्त हो जाता है। यह हमारा मूल स्वभाव है, जिसमें केवल अद्वैत का अनुभव होता है। यह हमारा स्वभाव है जो हमें जीवनमुक्त बना देता है। यह वीतरागता और स्थितप्रज्ञता के बाद की स्थिति है।
ॐ तत् ॐ सत् ॥ ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२७ मई २०२६

परमात्मा से हमारा क्या संबंध है?

 यह प्रश्न ही असंगत यानी गलत है। संबंध वहीं होता है जहां कोई भेद होता है। यहाँ तो कोई भेद ही नहीं है, अतः संबंध होने या न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। परमात्मा ही हमारा एकमात्र अस्तित्व है। यह बात मैं नहीं कह रहा, बल्कि श्रुति भगवती स्वयं सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद (६.२.३) में कह रही है --

"तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत। तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेति तदपोऽसृजत। तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥६.२.३॥"
परमात्मा के मन में एक संकल्प उत्पन्न हुआ कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ -- "एकोऽहं बहु स्याम्"; उसी संकल्प का परिणाम यह सृष्टि है। एक ही परमात्मा सभी जीवों और संसार में व्याप्त है। वह स्वयं ही यह सृष्टि बन गया है।
(यह बात विष्णुसहस्त्र्नाम के आरंभ में भी कही गयी है -- "ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः। भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः। अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥)
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सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद का उपरोक्त श्लोक उद्दालक ऋषि द्वारा अपने पुत्र श्वेतकेतु को प्रदान की गई शिक्षा का भाग है। संपूर्ण सृष्टि एक ही मूल कारण से उत्पन्न हुई है। ब्रह्मांड की पहली अभिव्यक्ति 'तेज' (ऊष्मा) के रूप में हुई और उससे 'जल' (अपः) की उत्पत्ति हुई।
इसी उपनिषद में ब्रह्मविद्या के प्रथम आचार्य भगवान सनतकुमार द्वारा अपने प्रिय शिष्य देवर्षि नारद को दी गयी "भूमा विद्या" का भी उल्लेख सूत्र रूप में है। ब्रह्मज्ञान को ही वैदिक युग में भूमाविद्या कहते थे।
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अब वापस अपनी मूल बात पर आता हूँ। जब हम स्वयं ही परमात्मा के मन की कल्पना हैं, तो यह बात असंगत है कि हमारा परमात्मा से क्या संबंध है। परमात्मा स्वयं ही यह सृष्टि बन गया है। अब एक बात स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि अब अपने शरीर की इस वृद्धावस्था में -
(१) मैंने परमात्मा के अतिरिक्त अन्य सब विषयों पर सोचना ही बंद कर दिया है।
(२) मैं उसी व्यक्ति से मिलता हूँ जिसके हृदय में परमात्मा के प्रति कूट कूट कर प्रेम भरा पड़ा है। अन्य किसी से मिलने पर बड़ी पीड़ा होती है।
(३) पता नहीं कौन सा क्षण अंतिम हो, अतः कूटस्थ (कालव्यापी परम आत्म-चैतन्य) में परमात्मा को ही स्थापित कर रखा है। कूटस्थ-चैतन्य का ही साथ शाश्वत है, अन्य सब गौण है।
हरिः ॐ तत् सत् !! ॐ स्वस्ति !!
कृपा शंकर
२७ मई २०२६

प्रश्नोपनिषद के ऊपर एक लघु चर्चा ---

 प्रश्नोपनिषद के ऊपर एक लघु चर्चा ---

अथर्ववेद के ब्राह्मण भाग के अंतर्गत प्रश्नोपनिषद पर थोड़ी आध्यात्मिक चर्चा करेंगे। कुछ दिनों पूर्व मांडूक्योपनिषद की चर्चा की गई थी। मांडूक्योपनिषद का ही विस्तार प्रश्नोपनिषद है। इस पर अनेक विस्तृत भाष्य हैं। मैं आचार्य शंकर के भाष्य की सहायता लेता हूँ समझने के लिए, क्योंकि बौद्धिक रूप से यह मेरे अधिक अनुकूल है।
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ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमा चभिर्यजत्राः।
स्थिरैरस्तुष्टुवा सस्तनभिर्व्य शेम देवहितं यदायुः॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
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विषय से हटकर यह बता देना चाहता हूँ कि प्राण-तत्व, कुंडलिनी महाशक्ति, और परमब्रह्म परमात्मा को हम कुछ वर्षो की नियमित कठोर ध्यान-साधना के उपरांत हरिःकृपा से अनुभूत करने लगते हैं। ये अनुभूति के विषय हैं। कुछ वर्षों की साधना के उपरांत इनका आभास नित्य होने लगता है। उस समय प्रश्नोपनिषद का स्वाध्याय हमारी साधना को और भी अधिक दृढ़ बनाता है। अतः यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण उपनिषद है। ऋषियों द्वारा पूछे गए उनके छह प्रश्न और महर्षि पिप्पलाद द्वारा दिये गए उनके उत्तरों का स्वाध्याय हमारी साधना में बहुत अधिक सहायक होगा। जहां तक मैं जानता हूँ, प्राण-तत्व पर इतनी गहन और विस्तृत चर्चा अन्यत्र कहीं भी, कभी भी नहीं हुई है।
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सतयुग में एक बार भारत के छह महान ऋषि एक साथ उस समय के महानतम ब्रह्मज्ञ महर्षि पिप्पलाद के पास गये और परब्रह्म के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की। महर्षि पिप्पलाद ने उनकी बात बड़े ध्यान से सुनी, और उनसे एक वर्ष तक वहीं रहकर कठोर तपस्या करने को कहा। साथ में यह भी कहा कि एक वर्ष तक की आपकी कठोर तपस्या के उपरांत ही मैं यह विचार करूंगा कि आपको कुछ बताया जाये या नहीं।
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उन सब ऋषियों ने महर्षि पिप्पलाद के आश्रम में एक वर्ष तक गहन तपस्या की। एक वर्ष पूर्ण होने पर उन सब ऋषियों की तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि पिप्पलाद ने उन सब को अपने पास बुलाया और कुछ भी प्रश्न पूछने को कहा।
उन छः ऋषियों ने एक-एक प्रश्न (कुल छः प्रश्न) महर्षि पिप्पलाद से किए। वे सभी प्रश्न आध्यात्मिक दृष्टि से बड़े गूढ़ हैं। महर्षि पिप्पलाद ने उन सब प्रश्नों का उत्तर बड़ी गहनता से दिया, और बड़े प्रेम से उन सब ऋषियों को अपने आश्रम से विदा किया। वे सारे प्रश्न और महर्षि पिप्पलाद द्वारा दिये गए उत्तर प्रश्नोपनिषद में हैं।
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यह सब जानने के लिए स्वयं आपको उपनिषदों का स्वाध्याय करना होगा। कहीं पर कुछ पूछना है तो भगवान शिव (दक्षिणामूर्ति) से अपने मौन में ही पूछिए। भगवान शिव से उनका उत्तर आपको उनके मौन में ही मिलेगा।
उपनिषदों का स्वाध्याय ईशावास्योपनिषद से आरंभ कीजिये। फिर अपनी रुचि के अनुसार स्वाध्याय कीजिये। अंत में बृहदारण्यकोपनिषद का स्वाध्याय कीजिये। वहाँ महर्षि याज्ञवलक्य के उपदेश आपको ज्ञान के महाअरण्य में ऐसा उलझा देंगे कि आपका बाहर निकलना बड़ा कठिन होगा। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२८ मई २०२६
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पुनश्च: ----- भगवती का आदेश है कि मैं और भी अधिक गहन और दीर्घ काल तक साधना करूँ। माँ का आदेश मानना ही होगा। अतः में अनुपलब्ध रहूँ, तो यह जगन्माता के आदेश की पालना ही होगी। मैं सदा आपके साथ हूँ। एक पल के लिए भी आपसे पृथक नहीं हूँ।

जो सर्वात्म-भाव में हैं, वे ईश्वर के साथ एक हैं ---

 अब तक आप के हृदय में ईश्वर के प्रति एक परमप्रेम जागृत हो गया होगा, जिसमें आप उनके सौन्दर्य, माधुर्य और परमप्रेम में डूब गये होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ है तो यह एक अति गंभीर चिंता का विषय है। आप प्रयासपूर्वक निरंतर उनके प्रेमसिंधु में डूबे रहें, यही उनकी बड़ी से बड़ी उपासना है। आपके और उनके बीच में केवल प्रेम का रस रहना चाहिए, अन्य कुछ भी नहीं। उस प्रेमरस में पूरी तरह डूब जाएँ, कहीं कोई भेद न रहे। गीता में भगवान कहते हैं --

"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥७:१९॥"
अर्थात् -- बहुत जन्मों के अन्त में (किसी एक जन्म विशेष में) ज्ञान को प्राप्त होकर कि यह सब वासुदेव है ज्ञानी भक्त मुझे प्राप्त होता है ऐसा महात्मा अति दुर्लभ है।
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भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, न तो कोई उनका प्रिय है और न अप्रिय। लेकिन जो उनको प्रेम से भजते हैं, भगवान उनमें हैं, और वे भी भगवान में हैं --
"समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥९:२९॥"
अर्थात् - मैं समस्त भूतों में सम हूँ, न कोई मुझे अप्रिय है और न प्रिय, परन्तु जो मुझे भक्तिपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें और मैं भी उनमें हूँ॥
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"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है, और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
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"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
अर्थात् - जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ; हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से, मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं॥
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हम सर्वात्मभाव में भगवान के साथ एक है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२९ मई २०२६

आजकल ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत अधिक भेदभाव, अन्याय और दुष्प्रचार हो रहा है।

 आजकल ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत अधिक भेदभाव, अन्याय और दुष्प्रचार हो रहा है। दुर्भाग्य से यह सत्य है। ईसाई मज़हब के प्रचारकों ने सनातन हिन्दू धर्म को नष्ट करने के लिए सर्वप्रथम ब्राह्मणों की संस्था को समाप्त करने की पूरी चेष्टा की, और अभी भी कर रहे हैं। उन्होंने हिन्दू धर्मग्रन्थों को प्रक्षिप्त किया, ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत अधिक दुष्प्रचार किया, और बहुत बड़ी संख्या में ब्राह्मणों की हत्याएँ की। उनके द्वारा लिखे गए झूठे इतिहास को अब भी पढ़ाया जाता है। इतना अधिक असत्य फैलाया गया है, और अभी भी फैलाया जा रहा है, जिसका दुष्परिणाम ब्राह्मणों के विरुद्ध हो रहा अत्याचार है।

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ब्राह्मणों को अपने धर्म पर दृढ़ रहते हुए अपना आत्म-सम्मान बनाए रखना चाहिए। ब्राह्मण होने की सार्थकता ब्रह्मज्ञ होने में है। हर ब्राह्मण ब्रह्मविद् हो। परमब्रह्म परमात्मा की उपासना हरेक ब्राह्मण का धर्म है। वे पृथ्वी पर चलते-फिरते देवता हैं। पृथ्वी उन्हें पाकर सनाथ हो जाती है। वे याचक बनकर न रहें। अपने देवत्व को याद रखें और अपने धर्म पर अडिग रहें।
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जहाँ कोई उनका अपमान करे, वहाँ न जाएँ। किसी को ब्राह्मण से देवकार्य न कराना हो तो वे किसी पादरी या मौलवी से करवा लेंगे। सबका सम्मान करते हुए आत्मसम्मान और पूर्ण सत्यनिष्ठा से ब्राह्मण अपना जीवनयापन करें।
"नमो ब्रह्मण्य देवाय गो-ब्राह्मण हिताय च।
जगत् हिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
कृपा शंकर / ३० मई २०२६

ब्राह्मण एक विशेष रचना है भगवान की ---

 ब्राह्मण एक विशेष रचना है भगवान की ---

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भगवान ने "ऊँ", "तत्", और "सत्" ये अपने तीन नाम बताए हैं। और यह भी बताया है कि इनसे उन्होंने "ब्राह्मण", "वेद", और "यज्ञ" की रचना की है। सृष्टि के त्वरित विकास के लिए भगवान ने ब्राह्मण की एक विशेष रचना की है।
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मैं जो लिख रहा हूँ, यह भगवान का आश्वासन है। ब्राह्मण अपना धर्म न छोड़ें। ब्राह्मण का सर्वोपरी धर्म है —"ब्रह्म का अनुसंधान"। आप ब्रह्मज्ञ होंगे तो देवता भी आपके समक्ष झुकेंगे। गीता में भगवान कहते हैं --
"ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥१७:२३॥"
अर्थात् -- 'ऊँ, तत् सत्' ऐसा यह ब्रह्म का त्रिविध निर्देश (नाम) कहा गया है; उसी से आदिकाल में (पुरा) ब्राहम्ण, वेद और यज्ञ निर्मित हुए हैं॥
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भगवान ने ब्राह्मण के ये स्वभाविक कर्म बतलाए हैं ---
"शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥१८:४२॥"
अर्थात् -- शम, दम, तप, शौच, क्षान्ति, आर्जव, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिक्य - ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं॥
Serenity, self-restraint, austerity, purity, forgiveness, as well as uprightness, knowledge, wisdom and faith in God -- these constitute the duty of a spiritual Teacher.
मन का निग्रह करना, इन्द्रियों को वशमें करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतर से शुद्ध रहना; दूसरों के अपराध को क्षमा करना; शरीर, मन आदि में सरलता रखना; वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; यज्ञविधि को अनुभव में लाना; और परमात्मा, वेद आदि में आस्तिक भाव रखना -- ये सब-के-सब ब्राह्मण के स्वभाविक कर्म हैं।
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इस विषय पर एक विस्तृत लेख पहिले भी लिखा था। अब उसकी आवश्यकता नहीं है। हमारे शास्त्रों के अनुसार ब्राह्मण का उच्चतम कर्तव्य -- "ब्रह्म का अनुसंधान" यानि "संध्या, गायत्री, प्राणायाम व सविता देव की भर्गः ज्योति का गहनतम ध्यान" है। इस विषय पर मैंने खूब स्वाध्याय किया है। यदि किसी को कण मात्र भी संशय है तो मनुस्मृति, उपनिषदों, वैशेषिक-सूत्रों व महाभारत का स्वाध्याय करें। क्षत्रिय राजाओं के राज्य में राजा का राज्याभिषेक तभी होता था जब वह धर्मरक्षा की प्रतिज्ञा करता था। धर्म की रक्षा करना सभी वर्णों का परमधर्म है। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३१ मई २०२६