Sunday, 26 July 2026

स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---

 स्वयं भगवान का आदेश है, जिसे हम कभी भी नहीं भूलें ---

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"यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥९:२७॥"
यानि -- हे कौन्तेय ! तुम जो कुछ कर्म करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ हवन करते हो, जो कुछ दान देते हो और जो कुछ तप करते हो, वह सब तुम मुझे अर्पण करो॥
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हमारे जीवन की सारी विषमताओं का कारण हमारा लोभ और अहंकार हैं। हम चाहे कितना भी जप-तप व पूजा-पाठ कर लें, लेकिन बिना वीतराग और स्थितप्रज्ञ हुए, कोई भी परमात्मा को उपलब्ध नहीं हो सकता। आध्यात्मिक मार्ग पर वीतरागता हमारी पहली उपलब्धि है, तत्पश्चात स्थितप्रज्ञता। यह कोई मनोरंजन का विषय नहीं है। हम यहाँ परमात्मा का चिंतन कर रहे हैं।
ॐ तत्सत्। ॐ ॐ ॐ।।
कृपा शंकर
27 जुलाई 2025

Saturday, 25 July 2026

मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...

 मुक्त-चयन (Free Choice) और नियति (Destiny) ...

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निम्न पंक्तियाँ मैं अपने अनुभव से लिख रहा हूँ| यह आवश्यक नहीं है कि ये सत्य ही हों| मेरा आंकलन भी गलत हो सकता है|
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सनातन हिन्दू धर्म में पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष) को मानव जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य बताया गया है| माता-पिता, आचार्यों और शास्त्रों के उपदेशानुसार आचरण भी पुरुषार्थ है|
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लेकिन इस जीवन का मेरा अनुभव यह कहता है कि जीवन में हमारे साथ वही होता है जो हमारी नियति में है| हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता| हमारी महत्वाकांक्षायें कभी पूरी नहीं होतीं| होता वही है जैसी परिस्थितियाँ हमारे चारों ओर होती हैं, और जैसी हमारी समझ और मस्तिष्क यानि दिमाग की क्षमता होती है| जितनी अधिक आकांक्षाएँ हमारे में होती हैं, उतनी ही अधिक हमारे जीवन में कुंठायें होती हैं| पुरुषार्थ भी तभी होता है जब वह हमारे भाग्य यानि नियति में लिखा हो, अन्यथा नहीं|
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हमारे पास एक ही स्वतंत्र चयन (free choice) है कि हम परमात्मा को प्रेम करें या नहीं| अन्य सब तरह के पुरुषार्थ की बात एक आदर्श लुभावनी मीठी-मीठी अव्यवहारिक कल्पना मात्र ही है| हम अपने कर्मफलों को भोगने के लिए ही आते हैं| बहुत ही कम विकल्प/अवसर, और उनका उपयोग करने की क्षमता हमें जीवन में मिलती हैं| होता वही है जैसी सृष्टिकर्ता की इच्छा होती है|
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आप सब महान आत्माओं को नमन !! आप के विचार आमंत्रित हैं|
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२०

"भक्ति" के बिना ये चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मेरे लिए तो बेकार हैं क्योंकि ये मुझे अपने प्रियतम से नहीं मिला सकते|

 "भक्ति" के बिना ये चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) मेरे लिए तो बेकार हैं क्योंकि ये मुझे अपने प्रियतम से नहीं मिला सकते|

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भक्ति भी वही जिसे भक्ति-सूत्रों में नारद जी, और गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताई है| हमें तो अपने प्रियतम से अभी और इसी समय मिलना है, व किसी भी तरह का विलंब स्वीकार्य नहीं है|
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गीता के अलावा अन्य कोई भी उपदेश अब अच्छे नहीं लगते| समझाने वाले प्रियतम भी सामने ही खड़े हैं पर उन कुहुक-शिरोमणि ने एक पतला धुएं का सा आवरण खड़ा कर रखा है| यह आवरण ही पीड़ा है| इस आवरण को भी निश्चित रूप से वे स्वयं ही कभी तो ध्वस्त करेंगे| २५ जुलाई २०२०

महावतार बाबाजी स्मृति दिवस ....

 महावतार बाबाजी स्मृति दिवस ....

आज से पूरे सौ वर्ष पूर्व २५ जुलाई १९२० को मृत्युंजयी महायोगी महावतार बाबाजी ने स्वामी योगानन्द गिरि (परमहंस योगानंद) को दर्शन दिये और उन्हें धर्म प्रचार के लिए अमेरिका जाने का आदेश दिया| उस दिन से २५ जुलाई को "महावतार बाबाजी स्मृति दिवस" के रूप में मनाया जाता है|
परमहंस योगानन्द से मेरा संबंध यह है कि वे पिछले जन्म में मेरे गुरु थे, इस जन्म में भी हैं, और उन से ही मुझे सारा आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होता है| समय समय पर इस जन्म में उन्होनें मेरी रक्षा भी की है, कई बार सूक्ष्म जगत से अपनी निरंतर उपस्थिती का आभास कराया है, और लगातार मार्गदर्शन कर रहे हैं| गुरु महाराज को नमन !! परमेष्ठि गुरु महावतार बाबाजी को भी नमन !! २५ जुलाई २०२०

मेरा स्वभाव भक्ति-प्रधान है।

 मेरा स्वभाव भक्ति-प्रधान है। भक्ति शब्द का एकमात्र अर्थ है -- भगवान से परम प्रेम। कोई दूसरा अर्थ नहीं है। परमप्रेम में कोई शर्त या माँग नहीं होती, सिर्फ समर्पण होता है।

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भगवान एक अनुभूति है, जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। विष्णु-पुराण में "भगवान" को परिभाषित किया गया है, जिसकी व्याख्या अनेक आचार्यों ने की है।
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जब भगवान से प्रेम होता है, तब सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं। भगवान सब सिद्धांतों से ऊपर हैं। विभिन्न स्वनामधन्य आचार्यों ने सारे सिद्धांत बनाए हैं। भगवान किसी भी सिद्धांत के बंधन में नहीं हैं।
जो परमात्मा को पाने का मार्ग बता दे, और परमात्मा की अनुभूति करा दे, वही सद्गुरु है। शिष्यत्व -- एक सद्गुण है, जिसके बिना शिष्य कोई प्रगति नहीं कर सकता।
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जब भगवान से प्रेम होता है, तब सारे सिद्धांत गौण हो जाते हैं। भक्ति में नियमित निदिध्यासन बहुत आवश्यक है, इसके बिना भक्ति क्षीण होने लगती है। जब एक बर्तन से दूसरे बर्तन में तेल डालते हैं, तब तेल की धार खंडित नहीं होती। उसी तेल की धार की तरह अविछिन्न रूप से भगवान के चिंतन, मनन और श्रवण को निदिध्यासन कहते हैं।
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भगवान के समीप बैठना, उनकी उपासना है। स्वयं की पृथकता के बोध को भूलकर सिर्फ परमात्मा की चेतना में स्थिति ध्यान है। गीता में बताए हुए समत्व में अधिष्ठान, समाधि है।
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और अधिक जानने की आवश्यकता ही नहीं है। भगवान से जब परमप्रेम होता है, तब सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते है, कहीं कोई अंधकार नहीं रहता, सारे दीप अपने आप जल जाते हैं।
ॐ तत्सत् !!
२५ जुलाई २०२२

जिनका बोझ था, उसे वे स्वयं ही उठा रहे हैं ---

 जिनका बोझ था, उसे वे स्वयं ही उठा रहे हैं ---

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समय के साथ साथ सोच विचार भी बदलते रहते हैं। अब मेरी समस्याएँ दूसरी हैं। स्वयं की व्यक्तिगत समस्याएँ भी अनेक हैं, जिन्हें किसी के साथ साझा नहीं कर सकता।
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आध्यात्मिक समस्याएँ अनेक थीं, लेकिन भगवान ने अब अपने ऊपर सारी ज़िम्मेदारी ले ली है। सारी समस्याएँ अब उनकी हो गई हैं। एक ही काम भगवान ने मुझे यह सुनिश्चित करने को सौंपा है कि मेरे हृदय में उनके प्रति भक्ति और समर्पण का भाव जरा सा भी कम न हो। अब क्या करना है? वह मेरे और भगवान के बीच का निजी मामला है। अब से बचा-खुचा जो भी जीवन है, वह प्रियतम परमात्मा को समर्पित है।
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और लिखने के अब कुछ भी नहीं बचा है। मेरा अस्तित्व ही भगवान की अभिव्यक्ति है। जहाँ मैं हूँ, वहीं वे भी हैं। ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२२

उसे लेकर मैं क्या करूँ जो मुझे अमर न बना सके ---

 उसे लेकर मैं क्या करूँ जो मुझे अमर न बना सके ---

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मेरी गति ब्रह्म ही हैं। ब्रह्म बन कर ही मैं ब्रह्म को जान सकता हूँ​। जिन के द्वारा मेरी वाणी बोलती है, जिन के द्वारा मेरी बुद्धि जानती है, जिन के द्वारा मेरी आँखे देखती हैं, जिन के द्वारा मेरे कान सुनते हैं, जो इस देह में साँसें ले रहे हैं, जिन की मैं उपासना करता हूँ, -- वे ही मेरे अवर्णनीय उपास्य परमब्रह्म परमात्मा हैं।
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बृहदारण्यकोपनिषद में महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि दृष्टा का दर्शन, और विज्ञाता का विज्ञान असम्भव है। क्योंकि जिस विज्ञाता के द्वारा यह सब कुछ जाना जाता है, उसे विषयरूप में कैसे जाना जा सकता है? ब्रह्म का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्म के द्वारा ही सब कुछ जाना जा सकता है। विज्ञाता का विषय के रूप में ज्ञान नहीं हो सकता।
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"नेति नेति" की परिणति "मौन" में है और मौन ही सर्वोच्च दर्शन है। पुत्रेषणा, लोकेषणा, और वित्तेषणा का त्याग कर हमें निर्दोष और सरल होकर मौन में रहना चाहिए। अंत में मौन तथा अमौन दोनों से ऊपर उठ कर अपरोक्षानुभूति में लीन हो जाना चाहिए।
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महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मोक्ष हमारा निज-स्वरूप है। वह किसी नयी अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति नहीं है। आत्मज्ञान यानि ब्रह्मज्ञान ही मोक्ष है। आत्मा नित्यमुक्त है। बन्धन और मोक्ष दोनों ही अविद्या हैं।
जब तक जीवात्मा स्वयं को बद्ध मानता है, तब तक उसके लिए मोक्ष-प्राप्ति चरम लक्ष्य है। मोक्ष-प्राप्ति के लिए साधना करना परम आवश्यक है।
अपरोक्षानुभूति से भी आत्म-ज्ञान होता है। अविद्यानिवृत्ति होते ही आत्मतत्त्व अपने शुद्ध चैतन्य और अखण्ड आनन्दस्वरूप में प्रकाशित होता है।
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जो ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है। ब्रह्म की प्राप्ति यहीं, इसी लोक और इसी जन्म में हो सकती है। उस परम तत्त्व को यहीं प्राप्त किया जा सकता है। एक बार हम जीवन्मुक्त हो जायें -- तो प्रिय-अप्रिय, लौकिक सुख-दुःख हमारा स्पर्श भी नहीं कर सकते। हमें अपनी भौतिक देहों से मोह नहीं होना चाहिए, क्योंकि प्रारब्ध कर्मों का क्षय होने पर यह देह अपने आप ही छूट जाएगी। हमारी नियति विदेह और जीवनमुक्त होने की है।
ॐ तत्सत् !! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !!
कृपा शंकर
२५ जुलाई २०२३