Friday, 6 March 2026

मंदिरों की उपेक्षा न करें, मंदिरों का बहुत अधिक महत्त्व है .....

मंदिरों की उपेक्षा न करें, मंदिरों का बहुत अधिक महत्त्व है .....
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किसी भी मंदिर में जहाँ ठाकुर जी की आरती विधि विधान से होती है वहाँ नियमित रूप से आरती के समय जाने पर ह्रदय में भक्ति निश्चित रूप से जागृत होती है| आरती के समय बजाये जाने वाले घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व शंख आदि की ध्वनि अनाहत चक्र पर चोट करती है| अनाहत चक्र से ही आध्यात्म का आरम्भ होता है और वहीं भक्ति का जागरण होता है| अनाहत चक्र का स्थान है मेरु दंड में ह्रदय की पीछे पल्लों (shoulder blades) के बीच में| जो साधक नियमित रूप से ध्यान करते हैं उन्हें अनाहत चक्र के जागृत होने पर ऐसी ही ध्वनि सुनती है जो ह्रदय में दिव्य प्रेम की निरंतर वृद्धि करती है| उसी ध्वनी की ही नक़ल कर भारत में आरती के समय मंदिरों में घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व टाली आदि बजाने की परम्परा आरम्भ की गयी| मंदिरों में होने वाली घंटा ध्वनि भी अनाहत चक्र को आहत करती है| फिर मंदिरों के शिखर आदि के बनाने की शैली भी ऐसी होती है कि वहाँ दिव्य स्पंदन बनते हैं और खूब देर तक बने रहते है| वहाँ जाते ही शांति का आभास होता है|
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मंदिरों में नियमित जाने से भक्तों का आपस में मिलना जुलना होता है इससे उनमें पारस्परिक प्रेम बना रहता है| मंदिर का शिखर दूर से ही दिखाई देता है अतः इसे ढूँढने में कठिनाई नहीं होती| मंदिर के साथ धर्मशाला भी होती है ताकि आगंतुक वहां विश्राम कर सकें| प्रसाद के रूप में क्षुधा शांति की भी व्यवस्था होती है| अंग्रेजों के शासन से पूर्व मंदिरों के साथ साथ विद्यालय भी होते थे जहां नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा दी जाती थी| अंग्रेजों ने ऐसे सभी विद्यालय नष्ट करवा दिए| मंदिरों के पुजारी व महंत धर्म-प्रचारक होते थे| हिन्दू साधू संतों के हाथ में ही मंदिरों की व्यवस्था होनी चाहिए| उन्हें फिर से धर्म-प्रचार के केन्द्रों के रूप में पुनर्प्रतिष्ठित करना ही पड़ेगा|
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
६ मार्च २०१८

ह्रदय में भगवान की भक्ति जागृत करने का एक अचूक साधन ---

 ह्रदय में भगवान की भक्ति जागृत करने का एक अचूक साधन ---

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कल की प्रस्तुति में मैंने निवेदन किया था कि भगवान के प्रति परमप्रेम और तीब्र अभीप्सा जागृत हो जाने पर जीवन में प्रभु सद्गुरु के रूप में अवश्य आते है| अब प्रश्न यह है कि भक्ति को तीब्र से तीब्र कैसे बनाया जाए|
सत्संग, स्वाध्याय और सात्विक जीवन पद्धति के अतिरिक्त और भी एक बात दिनचर्या में जोड़ दी जाए तो भक्ति अवश्य जागृत होती है|
किसी भी मंदिर में जहां ठाकुर जी की आरती विधि विधान से होती है वहां नियमित रूप से आरती के समय जाने पर ह्रदय में भक्ति निश्चित रूप से जागृत होती है| आरती के समय बजाये जाने वाले घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व शंख आदि की ध्वनि अनाहत चक्र पर चोट करती है| अनाहत चक्र से ही आध्यात्म का आरम्भ होता है और वहीं भक्ति का जागरण होता है| अनाहत चक्र का स्थान है मेरु दंड में ह्रदय की पीछे थोडा सा ऊपर पल्लों (shoulder blades) के बीच में| जो साधक नियमित रूप से ध्यान करते हैं उन्हें अनाहत चक्र के जागृत होने पर ऐसी ही ध्वनि सुनती है जो ह्रदय में दिव्य प्रेम की निरंतर वृद्धि करती है| उसी ध्वनी की ही नक़ल कर भारत में आरती के समय मंदिरों में घंटा, घड़ियाल, नगाड़े व टाली आदि बजाने की परम्परा आरम्भ की गयी| मंदिरों में होने वाली घंटा ध्वनि भी अनाहत चक्र को आहत करती है| फिर मंदिरों के शिखर आदि के बनाने की शैली भी ऐसी होती है कि वहां दिव्य स्पंदन बनते हैं और खूब देर तक बने रहते है| वहां जाते ही शांति का आभास होता है|
मंदिर में आरती के बाद कुछ देर तक ठाकुर जी के सम्मुख मेरु दंड को उन्नत रखते हुए बैठ कर अनाहत चक्र पर द्वादशाक्षरी भागवत मन्त्र का जाप करना चाहिए --- कम से कम एक माला, तीन या अधिक कर सकें तो और भी उत्तम है|
रात्रि को सोने से पूर्व अनाहत चक्र पर खूब गहरा ध्यान या जप कर के ही सोना चाहिए| इससे दुसरे दिन प्रातः उठते समय भक्तिमय चेतना रहती है|
प्रातः उठते ही पुनश्चः खूब देर तक ध्यान व जप करना चाहिए|
बिना तुलसी-चरणामृत लिए प्रातःकाल कुछ भी आहार ग्रहण नहीं करना चाहिए|
पूरे दिन प्रभु का स्मरण रखें| यदि भूल जाएँ तो याद आते ही पुनश्चः प्रारम्भ कर दें|
कभी ऐसे स्थान पर जाएँ जहाँ सरोवर हो या नदी के बहते हुए जल की ध्वनि आ रही हो वहां विशुद्धि चक्र पर (कंठकूप के पीछे गर्दन के मूल में) ध्यान करना चाहिए| इससे विशुद्धि चक्र आहत होता है और चैतन्य के विस्तार की अनुभूति होती है| ऐसे स्थान पर गहरा ध्यान करने पर यह अनुभूति शीघ्र होती है कि आप यह देह नहीं बल्कि सर्वव्यापक चैतन्य हो|
आज्ञाचक्र पर ध्यान करते करते प्रणव की ध्वनि (समुद्र की गर्जना जैसी) सुननी आरम्भ हो जाती है तब उसी पर ध्यान करना चाहिए|
मूलाधारचक्र पर भ्रमर या मधुमक्खियों के गुंजन, स्वाधिष्ठानचक्र पर बांसुरी कि ध्वनि, मणिपुरचक्र पर वीणा की ध्वनि, अनाहतचक्र पर घंटे,घड़ियाल,नगाड़े आदि की मिलीजुली ध्वनि, विशुद्धिचक्र पर बहते जल की ध्वनि, और आज्ञाचक्र पर समुद्र की गर्जना जैसी ध्वनि सुनाई देती है| इन ध्वनियों से इन चक्रों की जागृति भी होती है|
साधना के लिए नीचे से ऊपर की ओर निम्न बीजमंत्रों का क्रमशः जाप करें| नीचे के तीन चक्रों पर कम समय दें और ऊपर के तीन चक्रों पर अधिक|
मूलाधार पर लं लं लं लं लं ......| स्वाधिष्ठान पर वं वं वं वं वं .....| मणिपुर पर रं रं रं रं रं .......| अनाहत पर यं यं यं यं यं .....| विशुद्धि पर हं हं हं हं हं .....| आज्ञाचक्र पर ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ .....| सहस्त्रार में स्थिति सद्गुरु की कृपा से ही होती है|
चक्र जागरण का एकमात्र उद्देश्य है चेतना और भक्ति का विस्तार| कुण्डलिनी जागरण भी स्वतः ही होता है जो आपकी चेतना को ईश्वर की चेतना से संयुक्त कर देता है|
क्रियायोग की साधना द्वारा कुण्डलिनी धीरे धीरे स्वतः ही जागृत होती है और आपकी चेतना को इस भौतिक, प्राणिक और मानसिक स्तर से ऊपर उठा कर आध्यात्मिक बना देती है|
इस साधना में सबसे बड़ी और पूर्ण आवश्यक है --- भक्ति| बिना भक्ति के आप कितनी भी यंत्रवत (mechanical) साधना कर लो, कुछ भी लाभ नहीं होगा|
लोग मुझसे प्रश्न करते हैं कि भक्ति से क्या लाभ होगा? यदि दो पैसे का लाभ हो तो भक्ति करें अन्यथा क्यों समय नष्ट करें| मैं पूरी गारंटी के साथ कहता हूँ कि भगवान की भक्ति से लाभ ही लाभ होगा| अधिकाँश लोगों के लिए ईश्वर तो एक साधन है और संसार साध्य| पर वास्तविकता इससे विपरीत है|
नारद भक्ति-सूत्र में नारद जी कहते हैं कि भगवान के भक्त अपने कुल, जाति का ही गौरव नहीं होते वल्कि पूरे विश्व को ही गौरवान्वित करते हैं| ऐसे दिव्य पुरुष संसार के प्राणियों में दयाभाव व सहिष्णुता बढ़ाकर जगत की वासना को शुद्ध करते हैं|
ऐसे प्राणी धरती पर चलते फिरते भगवान हैं| वे जहां रहते हैं वह स्थान तीर्थ बन जाता है| भक्तों के पितृगण आनंदित होते हैं, देवता नृत्य करते हैं और यह पृथ्वी इनसे सनाथ हो जाती है|
भक्ति के मार्ग में अग्रसर होने के लिए किसी शुभ समय की प्रतीक्षा न करें| अभी इसी समय से बढकर कोई और अच्छा समय है ही नहीं|
अपने जीवन का केंद्रबिंदु परमात्मा को ही बनाएं, जीवन का हर कार्य उसी की प्रसन्नता के लिए करें और उसी को कर्ता, साक्षी और दृष्टा भी बनाएं|
हरि ओम तत्सत्|
६ मार्च २०१३

Wednesday, 4 March 2026

मुक्त और सुखी होने का एक सूक्ष्म सूत्र ---

 भगवान श्रीकृष्ण ने मुक्ति का और सुखी होने का एक सूक्ष्म सूत्र बताया है जो मेरे जैसे अकिंचन पतित व्यक्ति का भी उद्धार कर सकता है (इस के अतिरिक्त मेरे पास और कोई सामान नहीं है) ---

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गीता में अपनी परम कृपा कर के भगवान कहते हैं --
"शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥६:२५॥"
अर्थात् - शनै: शनै: धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा (योगी) उपरामता (शांति) को प्राप्त होवे; मन को आत्मा में स्थित करके फिर अन्य कुछ भी चिन्तन न करे॥
Little by little, by the help of his reason controlled by fortitude, let him attain peace; and, fixing his mind on the Self, let him not think of any other thing.
अपने भाष्य में आचार्य शंकर कहते हैं -- "शनैःशनैः अर्थात् सहसा नहीं क्रम क्रम से उपरति को प्राप्त करे। किसके द्वारा बुद्धि द्वारा। कैसी बुद्धि द्वारा धैर्य से धारण की हुई अर्थात् धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा। तथा मन को आत्मा में स्थित करके अर्थात् यह सब कुछ आत्मा ही है उससे अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, इस प्रकार मन को आत्मा में अचल कर के अन्य किसी वस्तु का भी चिन्तन न करे। यह योग की परम श्रेष्ठ विधि है।
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लगता है भगवान ने यह निम्न सूत्र मेरे लिए ही बताया है। वे ही मेरे परम हितैषी हैं। भगवान आगे कहते हैं --
"यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥६:२६॥"
अर्थात् - यह चंचल और अस्थिर मन जिन कारणों से (विषयों में) विचरण करता है, उनसे संयमित करके उसे आत्मा के ही वश में लावे अर्थात् आत्मा में स्थिर करे॥
When the volatile and wavering mind would wander, let him restrain it and bring it again to its allegiance to the Self.
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भगवान यहाँ सुखी होने उपाय भी बताते हैं ---
"प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥६:२७॥"
अर्थात् - जिसका मन प्रशान्त है, जो पापरहित (अकल्मषम्) है और जिसका रजोगुण (विक्षेप) शांत हुआ है, ऐसे ब्रह्मरूप हुए इस योगी को उत्तम सुख प्राप्त होता है॥
Supreme Bliss is the lot of the sage, whose mind attains Peace, whose passions subside, who is without sin, and who becomes one with the Absolute.
आचार्य शंकर अपने भाष्य में कहते हैं -- "क्योंकि जिसका मन भलीभाँति शान्त है जिसका रजोगुण शान्त हो गया है अर्थात् जिसका मोहादि क्लेशरूप रजोगुण अच्छी प्रकार क्षीण हो चुका है, जो ब्रह्मरूप जीवन्मुक्त अर्थात् यह सब कुछ ब्रह्म ही है ऐसे निश्चय वाला है एवं जो अधर्मादि दोषों से रहित है उस योगी को निरतिशय उत्तम सुख प्राप्त होता है।
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भगवान आगे कहते हैं --
"सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥६:२९॥"
"यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥६:३०॥"
अर्थात् - योगयुक्त अन्त:करण वाला और सर्वत्र समदर्शी योगी आत्मा को सब भूतों में और भूतमात्र को आत्मा में देखता है॥
जो पुरुष मुझे सर्वत्र देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं नष्ट नहीं होता (अर्थात् उसके लिए मैं दूर नहीं होता) और वह मुझसे वियुक्त नहीं होता॥
He who experiences the unity of life sees his own Self in all beings, and all beings in his own Self, and looks on everything with an impartial eye;
He who sees Me in everything and everything in Me, him shall I never forsake, nor shall he lose Me.
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भगवान ही मेरे एकमात्र हितैषी और एकमात्र धन हैं। मुझ गरीब ब्राह्मण के पास अन्य कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब आपको दे रहा हूँ। मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिये, क्योंकि भगवान सदा मेरे साथ हैं। मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि उन्होंने अनायास ही मुझे प्रदान की है।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
४ मार्च २०२३

Monday, 2 March 2026

कुछ संगठनों के बारे में मेरा अनुभव ---

 कुछ संगठनों के बारे में मेरा अनुभव ---

मुझे कुछ सामाजिक, राजनीतक और आध्यात्मिक संगठन बहुत अच्छे लगे जिनसे में जुड़ा, लेकिन मैंने स्वयं को वहाँ के अनुकूल नहीं पाया, इसलिए उनके प्रति कभी समर्पित नहीं हो पाया, और उनसे दूर हट गया। सारी कमियाँ और दोष मैं अपनी स्वयं की अक्षमता को ही देता हूँ। इस विषय पर मैंने अनेक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रबुद्ध विचारकों को भी सुना है। अपनी कमियों, और कटु अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखा है।
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क्षमा-याचना सहित कहना चाहता हूँ कि कोई भी संगठन -- सिद्धांतों, आदर्शों या विचारों से नहीं चलता। वहाँ भी सत्ता के लिए संघर्ष होता है। सत्ता के लिए लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं। आर्थिक प्रलोभन के कारण भी संघर्ष होते हैं।
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कोई संगठन या कोई दल आकर्षित करता है तो उससे जुड़ जाइये। जब तक मन लगे, तब तक उसमें काम कीजिए, उसका प्रचार प्रसार कीजिए। जब उसमें कोई बुराई लगे तब उससे चुपचाप हट जाइए, और अपनी क्षमतानुसार अन्य कार्य कीजिए। किसी तरह की सलाह देना मूर्खता है।
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कोई अन्य काम भी नहीं होता है तो घर पर आराम से रहिए। संगठनों से अब मुझे एलर्जी है। मेरी बिना मांगी सहायता के लिए धन्यवाद जो कभी नहीं चुका पाऊँगा।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपाशंकर
४ मार्च २०२३

Thursday, 26 February 2026

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ........

 ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ........

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'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मेव नापरः' ........ भगवत्पाद जगद्गुरू शंकराचार्य का यह कथन उनका अपना अनुभव है| उन्होंने समाधी की उच्चतम अवस्था में इस सत्य को अनुभूत किया| जिसने इसे अनुभूत किया उसके लिए तो यह सत्य है, और जो सिर्फ बुद्धि से या पूर्वाग्रह से कह रहा है उसके लिए असत्य है|
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आज के भौतिक विज्ञानी कह रहे हैं कि पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं है, यह घनीभुत उर्जा ही है जो अपनी आवृतियों द्वारा पदार्थ के रूप में व्यक्त हो रही है| किस अणु में कितने इलेक्ट्रोन हैं वे तय करते हैं कि पदार्थ का बाह्य रूप क्या हो| अंततः ऊर्जा भी एक विचार मात्र है ---- सृष्टिकर्ता के मन का एक विचार या संकल्प|
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यह बात वैज्ञानिक दृष्टी से तो सत्य है पर जो इसे नहीं समझता उसके लिए असत्य| आज के वैज्ञानिक तो सत्य अपनी प्रयोगशालाओं में सिद्ध कर रहे हैं उसी सत्य को भारतीय ऋषियों ने समाधी की अवस्था में समझा| इस सत्य को आचार्य शंकर ने चेतना के जिस स्तर को उपलब्ध होकर कहा उसे हम चेतना के उस स्तर पर जाकर ही समझ सकते हैं| बुद्धि द्वारा किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकते| धन्यवाद|
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ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||
26 फरवरी 2016

वीर विनायक दामोदर सावरकर के पुण्य दिवस पर समस्त भारत राष्ट्र को नमन व सभी भारतीयों का अभिनन्दन

 "यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी, तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लाऊं कभी|

हे ईश, भारतवर्ष में शत बार मेरा जन्म हो, कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो||
= विस्मिल=
वीर विनायक दामोदर सावरकर के पुण्य दिवस पर समस्त भारत राष्ट्र को नमन व सभी भारतीयों का अभिनन्दन|
भारत की स्वतन्त्रता में वीर सावरकर का योगदान किसी भी अन्य नेता से कम नहीं था| ये निश्चित रूप से कोई महान ऋषि थे जिन्होंने भारत माता को स्वतंत्र कराने के लिए जन्म लिया| भारत माँ के कष्ट इन्होने स्वयं पर लिए और भारत को स्वतंत्र करवाया| ब्रिटिश प्रधानमन्त्री ने भारत की स्वतंत्रता में गाँधी के योगदान को शून्य बताया था| ब्रिटिश पार्लियामेंट में वहां के प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत को हम इसलिए स्वतंत्र कर रहे हैं कि द्वीतिय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजी फौज में इतना दम नहीं है कि भारत पर नियंत्रण कर सके और वहां की भाड़े की हिन्दुस्तानी फौज अँगरेज़ अधिकारियों के आदेश का पालन नहीं कर रही है| द्वीतिय विश्व युद्ध से पहले भारत की सेना में हिन्दुओं की संख्या मात्र 35% थी, बाकि 65%मुस्लमान थे| वीर सावरकर ने पूरे भारत में घूमकर हज़ारों हिन्दू युवकों को फौज में भरती करवाया| इससे संख्या का अनुपात बदल गया और हिन्दू सिपाही 65% से ऊपर पहुँच गए| उनकी योजना थी कि चूंकि हिन्दुओं के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं है और न उनको अस्त्र चलाने आते हैं अतः अधिक से अधिक हिन्दु युवक सेना में भर्ती हों, अस्त्र चलाना सीखें और उन अस्त्रों का मुंह अंग्रेजों की ओर मोड़ दें| नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को उन्होंने ही भारत से बाहर जाकर आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना की प्रेरणा दी| नेताजी भारत छोड़ने से पहले सावरकर जी से मिल कर गए थे| जापान में श्री रास बिहारी बोस ने सारी भूमिका तैयार कर रखी थी| द्वीतिय विश्व युद्ध में अंग्रेजों की फौज की कमर सी टूट चुकी थी| आज़ाद हिन्द फौज से और क्रांतिकारियों से अँगरेज़ बहुत डरे हुए थे| भारत में सिपाहियों ने अँगरेज़ अधिकारियों के आदेश मानना बंद कर दिया था| नौसेना ने विद्रोह कर दिया और अँगरेज़ अधिकारियों को कोलाबा में बंद कर उनके चारों ओर बारूद लगा दी| ये सब परिस्थितियाँ थीं जिनसे भारत स्वतंत्र हुआ| विद्रोही सैनिकों व क्रांतिकारियों को प्रेरणा मिली वीर सावरकर की पुस्तक 1857 का स्वातंत्र्य समर से| 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम का यह सही नाम उन्होंने ही दिया अन्यथा इसे सिपाही विद्रोह कहा जाता था| जब कभी भविष्य में भारत का सही इतिहास लिखा जाएगा तो इन्हें राष्ट्र पुरुष के रूप में याद किया जाएगा| ये भारत के हिन्दुओं का सैन्यीकरण करना चाहते थे, उसी तरह जैसे गुरु गोबिन्दसिह जी ने किया था, पर परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि कर नहीं पाए| वीर सावरकर अमर रहें| भारत माता की जय|
कृपा शंकर
२६ फरवरी २०१३

Wednesday, 25 February 2026

कुछ विचार ---

 (1) ब्रह्म ह्त्या ........

(2) जीव की अंतिम नियति ही है ..... पूर्ण समर्पण .......
(3) संक्षिप्त में कुछ विचार ......
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(1) ब्रह्म हत्या ......
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ब्रह्महत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है| मेरी अल्प और सीमित समझ से ब्रह्महत्या के दो अर्थ हैं ..... एक तो अपने स्वयं में अन्तस्थ परमात्मा को विस्मृत कर देना, और दूसरा है किसी ब्रह्मनिष्ठ महात्मा की ह्त्या कर देना|
श्रुति भगवती कहती है कि अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर देना भी उसका हनन यानि ह्त्या है| सांसारिक उपलब्धियों को हम अपनी महत्वाकांक्षा, लक्ष्य और दायित्व बना लेते हैं| पारिवारिक, सामाजिक व सामुदायिक सेवा कार्य भी हमें करने चाहियें क्योंकि इनसे पुण्य मिलता है, पर इनसे आत्म-साक्षात्कार नहीं होता|
हमारे कूटस्थ ह्रदय में सच्चिदानन्द ब्रह्म यानि स्वयं भगवान बैठे हुए हैं| हम संसार की हर वस्तु की ओर ध्यान देते हैं पर परमात्मा की ओर नहीं| हम कहते हैं कि हमारा यह कर्तव्य बाकी है और वह कर्तव्य बाकी है पर सबसे बड़े कर्तव्य को भूल जाते हैं कि हमें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना है| बच्चों की शिक्षा, बच्चों को काम पर लगाना, व्यापार की सँभाल करना आदि आदि में ही जीवन व्यतीत हो जाता है| जो लोग कहते हैं कि हमारा समय अभी तक नहीं आया है, उनका समय कभी आयेगा भी नहीं|
भगवान को भूलना भी ब्रह्म-ह्त्या का पाप है| आजकल गुरु बनने और गुरु बनाने का भी खूब प्रचलन हो रहा है| गुरु पद पर हर कोई आसीन नहीं हो सकता| एक ब्रह्मनिष्ठ श्रौत्रीय और परमात्मा को उपलब्ध महापुरुष ही गुरु हो सकता है जिसे अपने गुरु द्वारा अधिकार मिला हुआ हो|
सार कि बात यह कि भगवान को भूलना भी ब्रह्महत्या है, और भगवान को भूलने वाले ब्रह्महत्या के दोषी हैं जो सबसे बड़ा पाप है|
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(2) जीव की अंतिम नियति ही है --- पूर्ण समर्पण .......
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मनुष्य योनी में जीव का जन्म होता ही है पूर्ण समर्पण का पाठ सीखने के लिए| अन्य सब बातें इसी का विस्तार हैं| यह एक ही पाठ प्रकृति द्वारा निरंतर सिखाया जा रहा है| कोई इसे देरी से सीखता है, कोई शीघ्र| जो नहीं सीखता है वह इसे सीखने को बाध्य कर दिया जाता है|
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लोकयात्रा के लिए हमें जो देह रूपी वाहन दिया गया है वह नश्वर और अति अल्प क्षमता से संपन्न है| बुद्धि भी अति अल्प और सिमित है, जो कुबुद्धि ही है| चित्त नित-नूतन वासनाओं से भरा है| अहंकार महाभ्रमजाल में उलझाए हुए है| मन अति चंचल और लालची है| ये सब मिलकर इस मायाजाल में फँसाए हुए है जिसे तोड़ने का पूर्ण समर्पण के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग ही नहीं है| हमें आता जाता कुछ नहीं है पर सब कुछ जानने का झूठा भ्रम पाल रखा है|
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(3) संक्षिप्त में कुछ विचार .......
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माता पिता परमात्मा के अवतार हैं, उनका पूर्ण सम्मान करें|
प्रातः और सायं विधिवत साधना करनी चाहिए| निरंतर प्रभु का स्मरण रहे|
गीता के कम से कम पाँच श्लोकों का नित्य पाठ करना चाह्हिए|
कुसंग का सर्वदा त्याग|
कर्ताभाव से मुक्ति|
किसी भी प्रकार के नशे का त्याग|
सात्विक भोजन|
एकाग्रता से अनन्य भक्ति|
वैराग्य और एकांत का अभ्यास|
भगवान का अनन्य भक्त ही ब्राह्मण है| हर श्रद्धालु क्षत्रिय है|
सिर्फ नाम या वस्त्र बदलने से कोई विरक्त नहीं होता|
वैराग्य प्रभु कि कृपा से ही प्राप्त होता है|
गुरुलाभ भी भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है|
संन्यास मन की अवस्था है|
तामसिक साधनाओं से बचें|
साधना के फल का भगवान को अर्पण|
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ॐ नमः शिवाय| ॐ ॐ ॐ ||
२५ फरवरी २०१६