Sunday, 4 October 2026

अति उलझन भरे प्रश्न और विचार --- .

 अति उलझन भरे प्रश्न और विचार ---

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हमने नहीं, अपितु धर्म ने हमें धारण कर रखा है, तभी हमारा अस्तित्व है। जिस दिन धर्म हमें छोड़ देगा, उस दिन हमारा कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। सत्य ही धर्म है। भगवान सत्यनारायण हैं। ॐ ॐ ॐ !!
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सन २०१४ में जब माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी भारत के प्रधानमंत्री बने, उस समय हमें अपार प्रसन्नता हुई थी। उस समय उनके भाषणों और हाव-भाव से हमें लगा था कि वे भीमराव रामजी सकपाल के भक्त एक अंबेडकरवादी हैं, और गांधी-भक्त होने का दिखावा कर रहे हैं। वे हीन भावना से ग्रस्त एक व्यक्ति लगे जो एक झूठी उच्चता का दिखावा कर रहे थे। तत्कालीन परिस्थितियों में उनसे श्रेष्ठतर कोई अन्य व्यक्ति प्रधानमंत्री पद की शोभा भी नहीं बढ़ा सकता था। अतः हमने उन्हें स्वीकार किया।
उन्होंने कुछ अभूतपूर्व कार्य बड़ी कुशलता से किए जिन्हें करने का साहस अब तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं कर पाया था। उन्होंने --
(१) देश को आतंकवाद से मुक्त कराया।
(२) देश की सशस्त्र सेनाओं के मनोबल को बढ़ाया, और सशस्त्र सेनाओं को सशक्त किया।
(३) देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया।
(४) कश्मीर को धारा ३७० से मुक्त किया।
(५) राम मंदिर के निर्माण में आ रही बाधाओं को दूर किया।
(६) भारत का और भारतीयों का सम्मान पूरे विश्व में बढ़ाया।
(७) नए संसद भवन, और नये सरकारी कार्यालयों का निर्माण कर हजारों करोड़ रुपये बचाए जो किराये के रूप में दिये जा रहे थे।
(८) चीन और पाकिस्तान के मन में एक भय उत्पन्न किया। एक लघु युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया।
(९) पाकिस्तान को तो एक भिखारी देश बना दिया।
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उनकी उपलब्धियां अभूतपूर्व थीं। इतना ही नहीं, वे अविकल्पनीय थे। उनसे श्रेष्ठतर किसी दूसरे प्रधानमंत्री की हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनके मानस में छिपा हुआ पिछड़ावाद और घोर जातिवाद निकलकर सामने आने लगा।
वे राम का नाम लेकर सत्ता में आए थे, उन्होंने अपनी छवि एक धर्मनिष्ठ की बनाई थी लेकिन वे तो सकपाल के भक्त एक अंबेडकरवादी नास्तिक निकले।
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भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामप्रसाद मुखर्जी ने की थी, बाद में उसका नाम "भारतीय जनता पार्टी" बना। यह दल पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मुख्य विचार -- "एकात्म मानववाद (Integral Humanism) और अंत्योदय पर आधारित था, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की बात करता है। उनके अनुसार मानव -- तन, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति और समाज का विकास इन चारों के समग्र संतुलन से ही संभव है। अंत्योदय की विचारधारा के अनुसार समाज की पंक्ति में सबसे नीचे और पीछे खड़े व्यक्ति का विकास पहले होना चाहिए। आर्थिक प्रगति का पैमाना सबसे ऊंचे व्यक्ति की आय नहीं, बल्कि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति होनी चाहिए। उन्होने शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार माना। उनका मानना था कि शिक्षा का व्यापार नहीं होना चाहिए और यह समाज द्वारा प्रबंधित व निःशुल्क होनी चाहिए।
चिति और विराट -- हर राष्ट्र की एक सांस्कृतिक-राष्ट्रीय मूल चेतना होती है जिसे उन्होंने 'चिति' कहा। इसके साथ समाज की शक्ति 'विराट' मिलकर देश को समृद्ध बनाती है।
धर्म और समाज -- धर्म वह है जो समाज को जोड़कर रखता है और व्यवस्थित करता है। संघर्ष की बजाय समन्वय ही जीवन का आधार होना चाहिए। यह भारतीय जनता पार्टी की मूल विचारधारा थी।
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लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय जनता पार्टी -- पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दिखाये गये मार्ग को छोड़कर भीमराव रामजी सकपाल उर्फ बाबा साहब अम्बेडकर के मार्ग पर चल पड़ी है अतः हमारा भाजपा में रहना असंभव है। हम भाजपा का त्याग इसी क्षण कर रहे हैं। रा.स्व.से.संघ की विचारधारा -- हिन्दू राष्ट्र को संगठित करना है। लेकिन अभी वर्गभेद और वर्गसंघर्ष द्वारा हिन्दू राष्ट्र को विघटित किया जा रहा है। धर्म का कहीं नाम ही नहीं लिया जा रहा है, अतः रा.स्व.से.संघ से जुड़े रहना भी असंभव है। सघ की स्थापना और प्रचार-प्रसार के पीछे भी एक ब्राह्मणत्व था, जिसका किसी भी जाति से कोई संबंध नहीं था। ब्राह्मणत्व है सर्वव्यापी निरंतर विस्तृत हो रहे ब्रह्म की अवधारणा। जो सर्वव्यापी है, और जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है, वह ब्रह्म है। जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्राह्मण है।
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जो ब्राह्मण जाति है, उसका सन १९४७ के बाद तीन बार नर-संहार हो चुका है। सबसे पहिले महाराष्ट्र में, फिर तमिलनाडु में, और फिर कश्मीर में। इसकी न तो कभी जांच हुई और न कभी कोई FIR लिखी गई। इतिहास में पहिले भी अनेक बार ब्राह्मणों का नरसंहार हो चुका है। ब्राह्मणों को अपना धर्म नहीं छोडना चाहिए। ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत कुछ पढ़ाया जा रहा है, जो उनके विरुद्ध घृणा और हिंसा को जन्म देगा।
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ब्राह्मण का धर्म है -- संध्या गायत्री, प्राणायाम और ब्रह्म का ध्यान। जब तक सृष्टि है तब तक ब्राह्मणत्व रहेगा, जब यह समाप्त होगा तो सृष्टि भी समाप्त हो जाएगी। परमात्मा को सब कुछ समर्पित कर के ब्रह्ममय होकर रहें। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
१ अक्तूबर २०२६

मैं भाजपा और संघ से तटस्थ व उदासीन क्यों हो गया हूँ ?

 भारतीय जनता पार्टी जब तक आदरणीय डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी और पं.दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों पर चल रही थी तब तक मैं भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी का कट्टर समर्थक था। अब जब से पार्टी ने उन्हें छोड़कर भीमराव रामजी सकपाल उर्फ डॉ.भीमराव रामजी अंबेडकर का अनुसरण करना आरंभ कर दिया है जिन्हें वे बाबा साहब डॉ.अंबेडकर कहते हैं; मैं तटस्थ हो गया हूँ, और कोई अन्य विकल्प देख रहा हूँ।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मैं पिछले ६४ वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ। इस संगठन का उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र को संगठित करना है। लेकिन जिस तरह से SC/ST Act व UGC के काले क़ानूनों के द्वारा हिंदुओं में वर्गभेद उत्पन्न कर उन्हें वर्गसंघर्ष द्वारा तोड़ा जा रहा है, वह भी संघ समर्थितों द्वारा; मैं संघ से भी निराश होकर तटस्थ हो गया हूँ, और अन्य दूसरा विकल्प ढूंढ रहा हूँ।
फिर संघ ने अंबेडकर, फुले, राम मोहन रॉय, व पेरियार जैसों को आदर्श पुरुष बना रखा जो घोर हिन्दू द्रोही थे। ३ अक्टूबर २०२६

अब नेहरू-गांधी का युग समाप्त हो गया है।

 अब नेहरू-गांधी का युग समाप्त हो गया है। आजकल अंबेडकर का जमाना है। जीवन में सफलता के लिए उनकी पूजा आजकल की जाती है। कल को कोई और आ जाएगा।

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एक बहुत प्रसिद्ध बंगाली लेखक हुआ करते थे जिनका नाम नीरद चंद्र चौधरी (१८९७-१९९९) था। उनका शरीर भारतीय था लेकिन आत्मा विशुद्ध अंग्रेज थी। वे १०१ वर्ष की आयु पाकर ऑक्सफोर्ड, इंग्लैंड में मरे। वे बहुत बड़े विद्वान थे जिन्हें स्वयं के भारतीय होने पर शर्म आती थी। बंगाली लोग उन्हें "भूरा साहब" बोलते थे। उनकी अंग्रेजी और बंगाली में लिखी पुस्तकें बड़ी जबरदस्त होती थीं। एक बार पढ़ना शुरू करते ही अंत तक पूरी पढ़नी पड़ती थी। वे भारत में अंग्रेजी शासन और पश्चिमी सभ्यता के प्रबल प्रशंसक, समर्थक और प्रेमी थे। उनके द्वारा लिखी कुछ पुस्तकें मैंने भी पढ़ी हैं जो अब लगभग विस्मृत हो गई हैं।
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वे नीरद चन्द्र चौधरी -- मोहनदास करमचंद गांधी के बहुत बड़े आलोचक थे। उनके अनुसार --- "मोहनदास गांधी इस पृथ्वी पर सबसे अधिक सफल फर्जी आदमी थे।"
उन्होंने गांधी को सिर्फ मैट्रिक पास बताया था। गांधी की आगे की पढ़ाई को उन्होंने फर्जी बताया। मेरे पास उनकी लिखी हुई कोई पुस्तक अब इस समय तो नहीं है, लेकिन उनका साहित्य पढ़ा है। उन्होंने लिखा था, तो यह सत्य ही होगा।
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गांधी ने बैरिस्टर की कोई पढ़ाई नहीं की थी। उन्होंने थर्ड डिवीजन से सन १८८७ में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। उस जमाने में ब्रिटेन में बैरिस्टर बनने की कोई परीक्षा नहीं होती थी। उन्होंने एक बैरिस्टर के यहाँ नौकरी की और Bar Council का सदस्य होने के लिए आवेदन किया। उसके लिए उन्हें लंदन से मैट्रिक पास करने को कहा गया। पहले प्रयास में वे फेल हुए, और दूसरे प्रयास में थर्ड डिवीजन से पास हुए। उन्हें एक बैरिस्टर के साथ काम करने के लिए असिस्टेंट बैरिस्टर का लाइसेंस मिला। इसके बाद उन्होंने कोई पढ़ाई नहीं की, और अंग्रेजी फौज में भर्ती होकर दक्षिण अफ्रीका चले गए। वहाँ के Boar युद्ध में लड़े, और सार्जेंट के पद पर उन्नत हुए।
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अब मैं अपने अध्ययन से लिख रहा हूँ। सन १९०५ में जापान ने रूस पर आक्रमण कर युद्ध में रूस को हराकर, रूस से कोरिया और मंचूरिया छीन लिया। रूस की बहुत बुरी पराजय हुई। सुदूर-पूर्व का भी बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र रूस से जापान ने छीन लिया। सैन्ट पीटर्सबर्ग से रूसी नौसेना को भेजा गया जो अफ्रीका का चक्कर लगाकर सुंडा-जलडमरूमध्य और चीन सागर होते हुई जापान सागर में आई। वहाँ जापान ने आक्रमण कर त्सुशीमा-जलडमरूमध्य में सारी रूसी नौसेना को डुबो दिया। रूसी नौसेना का एक भी जीवित व्यक्ति नहीं बचा, रूस की पूरी हार हुई।
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भारत में इसकी बहुत बड़ी प्रतिक्रिया हुई कि जब जापान जैसा एक छोटा सा देश रूस जैसे शक्तिशाली देश को हरा सकता है तब हम भारतीय भी ब्रिटेन को हरा सकते हैं। भारत में क्रांतिकारियों के आक्रमण प्रबल होने लगे। तब अंग्रेजों को एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता हुई जो अंग्रेजों के पक्ष में अहिंसा अहिंसा कह कर भारतीय क्रांतिकारियों की धार को मंद कर सके।
उन्होने इसके लिए गांधी को चुना। गांधी को इंग्लैंड बुला कर ट्रेनिंग दी गई कि कैसे कपड़े पहिनने हैं, क्या बोलना है, आदि आदि। इस तरह पूरा प्रशिक्षण देकर गांधी को भारत भेजा गया। वे बापस दक्षिण अफ्रीका गए और वहाँ से ९ जनवरी १९१५ को भारत आए। इससे पूर्व उन्हें दक्षिण अफ्रीका में खूब जमीन और धन दिया गया। वे विशुद्ध रूप से एक वेतनभोगी अङ्ग्रेज़ी एजेंट थे। उनके साथ दो अंग्रेज़ लेखक और एक अन्य अंग्रेज़ अधिकारी रहता। हिन्दी के खरीदे हुए लेखक और अनुवादक भी रहते।
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गांधी को सबसे पहिले बिहार के चंपारण जिले में भेजा गया जहां से उनसे चंपारण का किसान आंदोलन करवाया गया जो पूरी तरह सफल तो होना ही था। उसकी सफलता से गांधी एक राष्ट्रीय नेता बने। आगे का इतिहास सभी को पता है।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
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(अब मैं लिखते लिखते थक गया हूँ। इस उम्र में अब और लिखना संभव नहीं है। हाथ मुंह धोकर अब संध्या भी करनी है। आगे की बातें आप सब को मालूम है।) ३ अक्टूबर २०२६

Tuesday, 29 September 2026

दुर्गावाहिनी और राष्ट्र सेविका समिति द्वारा की जाने वाली प्रार्थनाएं -----

 (दुर्गावाहिनी संगठन की बहिनों द्वारा की जाने वाली नित्य प्रार्थना)

"अये देवी दुर्गे महाशक्ति रुपे, महामंगले वत्सले मातृभूमे |
त्वमेका भवानी त्वमेका शरण्या, विधात्र्ये शिवाये नमस्ते नमस्ते ||
त्वया प्रेरिताः स्मो वयं वीरबालाः, शुभं कर्म कर्तुम विजेतुं रणं च |
स्वदेशे विदेशे सुकार्य विकिर्य, सदाचार वृत्ति वयं स्थापयाम ||
श्रुति शीलतामानति सत्प्रवृतिम्, दयाभावनामेकतामात्मशक्तिम् |
इमः साधिकः यच्छ चास्मतकृते त्वं, यतो भारते सन्तु नार्यम् समर्थः ||
सदा रक्षीतुम् हिन्दूधर्म वरेण्यं, निहंतुं खलां साधुवृत्तं च पातुम् |
समुन्नेतुमेतद् वरं हिन्दूराष्ट्रं, जये पुण्यभूमे शुभे देहि शक्तिम् ||"
दुर्गा माता की जय ! भारत माता की जय !
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(राष्ट्रसेविका समिति की बहिनों द्वारा की जाने वाली नित्य प्रार्थना)
"नमामो वयं मातृभूः पुण्यभूस्त्वाम् , त्वया वर्धिताः संस्कृतास्त्वत्सुताः |
अये वत्सले मङ्गले हिन्दुभूमे, स्वयं जीवितान्यर्पयामस्त्वयि ।।१।।
नमो विश्वशक्त्यै नमस्ते नमस्ते, त्वया निर्मितं हिंदुराष्ट्रं महत् |
प्रसादात्तवैवात्र सज्जाः समेत्य, समालंबितुं दिव्यमार्गं वयम् ।।२।।
समुन्नामितं येन राष्ट्रं न एतत् , पुरो यस्य नम्रं समग्रं जगत् |
तदादर्शयुक्तं पवित्रं सतीत्वम् , प्रियाभ्यः सुताभ्यः प्रयच्छाम्ब ते ।।३।।
समुत्पादयास्मासु शक्किं सुदिव्याम् , दुराचार-दुर्वृत्ति-विध्वंसिनीम्
पिता-पुत्र-भ्रातृंश्च भर्तारमेवम् , सुमार्गं प्रति प्रेरयन्तीमिह ।।४।।
सुशीलाः सुधीराः समर्थाः समेताः, स्वधर्मे स्वमार्गे परं श्रद्धया |
वयं भावि-तेजस्वि-राष्ट्रस्य धन्याः, जनन्यो भवेमेति देह्याशिषम् ।।५।।
।। भारत माता की जय ।।

सुख और आनंद में क्या अंतर है?

 किसी मित्र ने पूछा है कि सुख और आनंद में क्या अंतर है? उसी के उत्तर में यह लिखा है ---

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जो भौतिक, प्राणिक, व मानसिक स्तर पर है, वह सुख है। जो आत्मा के स्तर पर है, वह आनंद है।
"ख" शब्द आकाश-तत्व है। "खं" ब्रह्म को कहते हैं। ब्रह्म सर्वव्यापी है। जो ब्रह्म के जितना समीप है, वह उतना ही सुखी है। जो ब्रह्म से जितना दूर है, वह उतना ही दुःखी है। ब्रह्म से एक होने की अनुभूति आनंद है।
🕉️ नमो नारायण!!
२९ सितंबर २०२४

Tuesday, 25 August 2026

अगले दो-तीन वर्षों में अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था विफल हो जायेगी, और अमेरिका एक महाशक्ति नहीं रहेगा।

 अगले दो-तीन वर्षों में अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था विफल हो जायेगी, और अमेरिका एक महाशक्ति नहीं रहेगा।

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वर्तमान में अमेरिका केवल दो कारणों से महाशक्ति है -- (१) अस्त्र-शस्त्रों का व्यापार। (२) अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर से भुगतान।
अब अमेरिकी अस्त्र-शस्त्रों का आकर्षण कम होता जा रहा है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर से भुगतान अगले दो वर्षों में पचास प्रतिशत से भी कम हो जायेगा। एक दशक पश्चात लगभग समाप्त हो जायेगा। ये दोनों कारण अमेरिका (USA) का आर्थिक महत्व घटा देंगे। भारत से अमेरिका को प्रतिभा-पलायन भी समाप्त हो जायेगा।
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पुनश्च: --- भारत ने अमेरिका की गूगल, अमेजन, मेटा, और एपल जैसी कंपनियों पर आज से digital tax लगा दिया है। ये कंपनियाँ भारत से प्रति वर्ष करोड़ों-अरबों रुपये कमाती थीं, लेकिन tax के नाम पर एक पैसा भी भारत को नहीं देती थी। अब भारत में अपनी कमाई का tax उन्हें भारत को ही देना होगा। अब तक वे भारत को कोई कर नहीं दे रही थीं। अब से ऐसा नहीं चलेगा।
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समाचार यह भी आ रहा है कि भारत कोकाकोला और पेप्सी आदि पर भी प्रतिबंध लगाने जा रहा है।
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कृपा शंकर
२६ अगस्त २०२५

Sunday, 23 August 2026

श्री अरविन्द के शब्दों में कितना बड़ा सत्य छिपा पड़ा है|

 श्री अरविन्द के शब्दों में कितना बड़ा सत्य छिपा पड़ा है| भारत की वर्तमान समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए अरविन्द के इन शब्दों को समझना आवश्यक है|

" Spirituality is India's only politics, the fulfillment of the Sanatan Dharma its only Swaraj. I have no doubt we shall have to go through our parliamentary period in order to get rid of the notion of western democracy by seeing in practice how helpless it is to make nations blessed."
------ Sri Aurobindo ------
"If Thou art, then Thou knowest my heart. Thou knowest that I do not ask for Mukti, I do not ask for anything which others ask for. I ask only for strength to uplift this nation, I ask only to be allowed to live and work for this people whom I love and to whom I pray that I may devote my life."
---------- Sri Aurobindo ------
"When therefore it is said that India shall rise, it is the Sanatan Dharma that shall rise. When it is said that India shall be great, it is the Sanatan Dharma that shall be great. When it is said that India shall expand and extend herself, it is the Sanatan Dharma that shall expand and extend itself over the world. It is for the Dharma and by the Dharma that India exists."
--------- Sri Aurobindo ---------