Wednesday, 28 January 2026

Dr. Gupta says, No one must die of cancer except out of carelessness;

 Dr. Gupta says, No one must die of cancer except out of carelessness;

(1). First step is to stop all sugar intake, without sugar in your body, cancer cell would die a natural death.
(2). Second step is to blend a whole lemon fruit with a cup of hot water and drink it for about 1-3 months first thing before food and cancer would disappear, research by Maryland College of Medicine says, it's 1000 times better than chemotherapy.
(3). Third step is to drink 3 spoonfuls of organic coconut oil, morning and night and cancer would disappear, you can choose any of the two therapies after avoiding sugar. Ignorance is no excuse; I have been sharing this information for over 5 years. Let everyone around you know.God bless.
"Dr. Guruprasad Reddy B V, OSH STATE MEDICAL UNIVERSITY MOSCOW, RUSSIA🏖🚥🚦
Encouraged each person receiving this newsletter to forward it to another ten people, certainly at least one life will be saved ... I've done my part, I hope you can help do your part. thanks!✍
Drinking hot lemon water can prevent cancer. Don't add sugar. Hot lemon water is more beneficial than cold lemon water.
Both yellow n purple sweet potato have good cancer prevention properties. ✍
01.✍ Often taking late night dinner can increase the chance of stomach cancer
02. ✍Never take more than 4 eggs per week
03. ✍Eating chicken backside can cause stomach cancer
04.✍ Never eat fruits after meal. Fruits should be eaten before meals
05. ✍Don't take tea during menstruation period.
06.✍ Take less soy milk, no adding sugar or egg to soy milk
07.✍ Don't eat tomato with empty stomach
08.✍ Drink a glass of plain water every morning before food to prevent gall bladder stones
09.✍ No food 3 hrs before bed time
10.✍ Drink less liquor or avoid, no nutritional properties but can cause diabetes and hypertension
11. ✍Do not eat toast bread when it is hot from oven or toaster
12.✍ Do not charge your handphone or any device next to you when you are sleeping
13.✍ Drink 10 glasses of water a day to prevent bladder cancer
14. ✍Drink more water in the day time, less at night
15.✍ Don't drink more than 2 cups of coffee a day, may cause insomnia and gastric
16.✍ Eat less oily food. It takes 5-7 hrs to digest them, makes you feel tired
17.✍ After 5pm, eat less
18.✍ Six types of food that makes you happy: banana, grapefruit, spinach, pumpkin, peach.
19.✍ Sleeping less than 8 hrs a day may deteriorate our brain function. Taking Afternoon rest for half an hour may keep our youthful look.
20.✍ Cooked tomato has better healing properties than the raw tomato.
Hot lemon water can sustain your health and make you live longer!
Hot lemon water kills cancer cells ✍
Add hot water to 2-3 slices of lemon. Make it a daily drink
The bitterness in hot lemon water is the best substance to kill cancer cells.✍
Cold lemon water only has vitamin C, no cancer prevention.✍
Hot lemon water can control cancer tumor growth. ✍
Clinical tests have proven hot lemon water works. ✍
This type of Lemon extract treatment will only destroy the malignant cells, it does not affect healthy cells.✍
Next... citric acid and lemon polyphenol in side lemon juice, can help reduce high blood pressure,✍ effective prevention of deep vein thrombosis, improve blood circulation✍, and reduce blood clots.✍
No matter how busy you are, please find the time to read this, then tell others to spread the love!✍
♦After reading, share with others to spread the love! To take good care of their own health!✍🤝
.
(Received by mail . Copy/Pasted)

परमात्मा हमारी श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा और अनुभूति हैं ---

परमात्मा हमारी श्रद्धा, विश्वास, निष्ठा और अनुभूति हैं| जैसे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई सूर्योदय में विश्वास करता है या नहीं, सूर्योदय तो होगा ही| वैसे ही परमात्मा का अस्तित्व किसी के विश्वास/अविश्वास पर निर्भर नहीं हैं|

परमात्मा अपरिभाष्य हैं| परमात्मा को किसी परिभाषा में नहीं बाँध सकते| परमात्मा को परिभाषित करने का प्रयास वैसे ही है जैसे कनक-कसौटी पर हीरे को कसने का प्रयास| परमात्मा हमारा अस्तित्व है, जिसे जाने बिना जीवन में हम अतृप्त रह जाते हैं| उसे जानने का प्रयास ही स्वयं को जानने का प्रयास है|
कृपा शंकर
२८ जनवरी २०२०

Monday, 26 January 2026

अपने हर दिन का प्रारम्भ भगवान के ध्यान से कीजिये ---

 सबसे महत्वपूर्ण निवेदन जो मैं सब से करना चाहता हूँ, जिसके सामने अन्य सब बातें गौण हैं, वह यह है .....

अपने हर दिन का प्रारम्भ भगवान के ध्यान से कीजिये, और रात को सोने से पूर्व भी भगवान का गहनतम ध्यान कर के सोयें| दिन में हर समय भगवान की स्मृति बनाए रखें| कभी भूल जाएँ तो याद आते ही फिर स्मरण प्रारम्भ कर दें| हर कार्य भगवान की प्रसन्नता के लिए ही करें और भगवान को ही स्वयं के माध्यम से कार्य करने दें| जीवन में तृप्ति और पूर्ण संतोष इसी से मिलेगा|
ॐ ॐ ॐ !!
२७ जनवरी २०१९

निजी अनुभवों पर आधारित मेरे जीवन के निष्कर्ष ---

  निजी अनुभवों पर आधारित मेरे जीवन के निष्कर्ष ---

(१) सृष्टिकर्ता को जानने की मनुष्य की जिज्ञासा शाश्वत है, वह सभी युगों में थी, अभी भी है और भविष्य में भी सदा रहेगी| जन्म-जन्मान्तरों में भटकता हुआ प्राणी अंततः यह सोचने को बाध्य हो जाता है कि मैं क्यों भटक रहा हूँ, मैं कौन हूँ, और मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? तब मनुष्य के जीवन की दिशा बदलने लगती है|
.
(२) मनुष्य की चेतना कभी तो बहुत अधिक उन्नत हो जाती है, और कभी बहुत अधिक अधम हो जाती है, इसके पीछे कोई न कोई अतिमानसी अज्ञात ज्योतिषीय कारण है जिसके आधार पर युगों की रचना हुई है| जैसे हमारा पृथ्वी ग्रह अपने उपग्रह चन्द्रमा के साथ सूर्य की परिक्रमा करता है, वैसे ही अपना यह सूर्य भी निश्चित रूप से पृथ्वी आदि अपने सभी ग्रहों के साथ सृष्टि में किसी ना किसी बिंदु (विष्णु नाभि) की परिक्रमा अवश्य करता है| जब अपना सूर्य उस बिंदु के निकटतम होता है वह सत्ययुग का चरम होता है, और उस बिन्दु से दूरी कलियुग का चरम होता है| यह क्रम सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है| सृष्टि में कुछ भी अव्यवस्थित नहीं है, सब कुछ व्यवस्थित है, पर हमारी चेतना में हमें उसका ज्ञान नहीं है| काश! हमें वह ज्ञान होता!
.
(३) जिस कालखंड में मनुष्य की जैसी समझने की बौद्धिक क्षमता होती है और जैसी चेतना होती है उसी के अनुसार प्रकृति जिसे हम जगन्माता भी कह सकते हैं, वैसा ही ज्ञान और वैसे ही ग्रंथ हमें उपलब्ध करवा देती है| जब मनुष्य की चेतना उच्चतम स्तर पर थी तब वेद थे, जिनमे समस्त ज्ञान था| वे प्राचीन भारत में कभी लिखे नहीं गए थे| हर पीढ़ी में एक वर्ग उन्हें कंठस्थ रखकर अगली पीढ़ी को प्रदान कर देता था| जब मनुष्य की स्मृति मंद हुई तब ही वे लिखे गए|
फिर उनके ज्ञान को समझाने के लिए पुराणों की रचना हुई| उनका उद्देश्य वेदों के ज्ञान को ही बताना था| पुराणों के शब्दों का अर्थ लौकिक नहीं, आध्यात्मिक है| उनका आध्यात्मिक अर्थ बताने वाले आचार्य मिलने अब दुर्लभ हैं, अतः वे ठीक से समझ में नहीं आते|
फिर मनुष्य की चेतना और भी नीचे गिरी तो आगम ग्रंथों की रचना हुई, जिन्होंने हमारी आस्था को बचाए रखा|
जब हमारे धर्म और संस्कृति पर आतताइयों के मर्मान्तक प्रहार हुए तब एक भक्तिकाल आया और अनगिनत भक्तों ने जन्म लिया| उन्होंने भक्ति द्वारा हमारी आस्थाओं की और धर्म की रक्षा की|
अब मुझे लगता है कि जितना पतन हो सकता था उतना हो चुका है, और अब आगे उत्थान ही उत्थान है| इसका प्रमाण है कि पिछले कुछ वर्षों से पूरे विश्व में 'गीता' क्रमशः बहुत अधिक लोकप्रिय हो रही है| उपनिषदों के ज्ञान को जानने की जिज्ञासा भी पूरे विश्व में बढ़ रही है| परमात्मा को जानने की जिज्ञासा, योग साधना, ध्यान और भक्ति का प्रचार प्रसार भी निरंतर हो रहा है|
रूस जैसे पूर्व साम्यवादी देशों में जहाँ साम्यवाद जब अपने चरम पर था तब भगवान में आस्था रखना भी अपनी मृत्यु को निमंत्रित करना था| पर अब वहाँ की स्थिति उस से विपरीत है| अब से पचास वर्ष पूर्व जब साम्यवाद अपने चरम शिखर पर था, उस समय में मैं रूस में लगभग दो वर्ष रहकर एक प्रशिक्षण ले रहा था| चीन, उत्तरी कोरिया, युक्रेन, लाटविया, रोमानिया आदि पूर्व साम्यवादी देशों का भ्रमण भी मैं कर चुका हूँ| विश्व के अनेक देशों की मैं यात्राएँ कर चुका हूँ, और पूरी पृथ्वी की परिक्रमा भी एक बार की है| अतः पूरे अधिकार से यह बात कह रहा हूँ कि अब आने वाला समय बहुत अच्छा होगा, सनातन धर्म की सारे विश्व में पुनर्स्थापना होगी, और असत्य व अन्धकार की शक्तियाँ क्षीण होंगी|
.
(४) यह सृष्टि, ज्ञान रूपी प्रकाश और अज्ञान रूपी अन्धकार के संयोग से बनी है अतः कुछ न कुछ अज्ञान रूपी अन्धकार तो सदा ही रहेगा| हमारा कार्य उस प्रकाश में वृद्धि करना है|
.
(५) हमारे जीवन का प्रथम, अंतिम और एकमात्र उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है| जब तक हम ईश्वर को यानि परमात्मा को प्राप्त नहीं करते तब तक इस दुःख रूपी महासागर के जीवन में यों ही भटकते रहेंगे|
.
ये मेरे अनुभवजनित दृढ़ निजी विचार हैं, अतः जिनके विचार मुझ से नहीं मिलते उन्हें आहत और उत्तेजित होने की आवश्यकता नहीं है| मैं मेरे विचारों पर दृढ़ हूँ| भगवान सदा मेरे साथ हैं|
सभी को मेरी शुभ कामनाएँ और नमन ! ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२६ जनवरी २०१८

मैं आप सब का सेवक हूँ ---

मैं आप सब का सेवक हूँ। आप को इसका पता नहीं चलता, लेकिन आप सब के साथ मेरा सत्संग निरंतर होता रहता है। मैं आप सब के साथ एक हूँ। आप सब के आध्यात्मिक कल्याण के लिए भगवान से निरंतर प्रार्थना करता रहता हूँ। मेरी एक ही प्रार्थना है कि सब के हृदयों में भगवान की भक्ति (परमप्रेम) जागृत हो, भगवान का प्राकट्य सभी के हृदयों में हो, और सभी को भगवत्-प्राप्ति हो। भगवान की छवि सदा हमारे समक्ष कूटस्थ में रहे। हम उनके एक उपकरण/निमित्त मात्र हैं। वे ही हमारा अस्तित्व हैं।
ॐ स्वस्ति ! ॐ ॐ ॐ !! ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!

कृपा शंकर
२६ जनवरी २०२४

Friday, 23 January 2026

उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है --

 उन सब महान आत्माओं का स्वागत है जिन्होंने आत्म-साक्षात्कार यानि भगवत्-प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है। निज जीवन में धर्म की रक्षा होगी तो राष्ट्र में भी होगी। असत्य और अंधकार की शक्तियों का निरंतर प्रतिकार करें। जितना हो सके उतना अधिक से अधिक समय परमब्रह्म परमात्मा के चिंतन, मनन, निदिध्यासन और ध्यान में व्यतीत करें। यह सबसे बड़ी सेवा है जो हम अपने राष्ट्र और समष्टि के लिए कर सकते हैं।

.
बौद्धिक धरातल पर आध्यात्म में किसी भी तरह का कोई संशय मुझे नहीं है, सिर्फ एक तड़प है परमात्मा को समर्पित होने की। जो भी करना है वह वे ही करेंगे। मैं तो एक निमित्त मात्र उपकरण हूँ। दक्षिणामूर्ति भगवान शिव और जगद्गुरू भगवान श्रीकृष्ण को नमन !!
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१ जनवरी २०२६

अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है ---

 अब से यह अवशिष्ट जीवन पूरी तरह परमात्मा को समर्पित है। किसी भी तरह का कोई कण मात्र भी संशय नहीं है। अपने भूत और भविष्य को तो तो मैं बदल नहीं सकता अतः उनका चिंतन ही छोड़ दिया है। वर्तमान में निरंतर कूटस्थ-चैतन्य में परमात्मा की चेतना में रहूँ, यही मेरा प्रयास है, और यही सदा रहेगा।

.
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान द्वारा दिये गये अनेक शाश्वत वचनों में से ये दो हैं जो हर समय मेरी चेतना में रहते हैं --
(१) "मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥१८:५८॥"
अर्थात् -- मच्चित्त होकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (सर्वदुर्गाणि) को पार कर जाओगे; और यदि अहंकारवश (इस उपदेश को) नहीं सुनोगे, तो तुम नष्ट हो जाओगे॥
(२) "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥१८:६६॥"
अर्थात् -- सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, तुम शोक मत करो॥
.
सभी सिद्धांतों, नियमों व हर तरह के साधन विधानों से ऊपर उठकर हमें शरणागति द्वारा स्वयं का समर्पण परमात्मा को कर देना चाहिए। आप सब में परमब्रह्म को नमन करता हूँ। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
२ जनवरी २०२६