Wednesday, 17 June 2026

लोकेषणा -- एक मरीचिका और भटकाव ही है

लोकेषणा (संसार में यश, प्रसिद्धि और दूसरों से प्रशंसा की चाह) -- एक मरीचिका और भटकाव ही है। इससे अहंकार ही पुष्ट होता है, कोई तृप्ति नहीं मिलती। तृप्ति - सिर्फ भगवान की उपासना में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। सभी विषयों में अनासक्त व्यक्ति ही परम सिद्ध हो सकता है।

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कूटस्थ में भगवान इसी क्षण यहीं हैं, और नित्य हैं। उनके प्रति श्रद्धा, विश्वास, परमप्रेम और अभीप्सा हो तो आगे के सारे द्वार स्वतः ही खुल जाते हैं, कहीं अन्धकार नहीं रहता। सर्वप्रथम हम भगवान को उपलब्ध हों। कूटस्थ में भगवान की उपस्थिति गहनतम प्रेम के साथ हो। अन्य कोई भी आसक्ति व स्पृहा न रहे। भगवान के अतिरिक्त संसार में अन्य कुछ भी प्राप्त करने योग्य नहीं है। भगवान मिल गए तो सब कुछ मिल गया।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१७ जून २०२३

Tuesday, 16 June 2026

हठयोग पर जो भी उपलब्ध साहित्य है उसमें सबसे मुख्य "घेरण्ड संहिता" है ।

 हठयोग पर जो भी उपलब्ध साहित्य है उसमें सबसे मुख्य "घेरण्ड संहिता" है| इस पर प्रामाणिक और सबसे अच्छा ज्ञान "बिहार स्कूल ऑफ योगा" मुंगेर (बिहार) के आचार्य स्वामी निरंजनानन्द ने दिया है| उन्होने घेरण्ड संहिता पर भाष्य और अन्य अनेक प्रामाणिक पुस्तकें लिखी हैं| उनके सन्यासी व अन्य शिष्य हठयोग का प्रामाणिक ज्ञान पूरे विश्व में दे रहे हैं| घेरण्ड मुनि का समय विवादास्पद है| अंग्रेज़ इतिहासकार उन्हें १७वीं शताब्दी का बताते हैं जो अविश्वसनीय है| घेरण्ड संहिता में सात अध्याय हैं जो निम्न विषयों पर प्रकाश डालते हैं .... षट्कर्म, आसन, मुद्रा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान, और समाधि|

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भारत के एक विश्वविख्यात योगाचार्य योग के नाम पर जो भी आसन, प्राणायाम आदि जो कुछ भी सिखा रहे हैं वह घेरण्ड संहिता का ज्ञान है, जिसका श्रेय वे पातंजलि ऋषि को दे रहे हैं| यह असत्य का प्रचार है|
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इसके अतिरिक्त दो और प्रामाणिक ग्रंथ हैं .... 'शिव संहिता" और "हठयोग प्रदीपिका"| ये दोनों ग्रंथ "घेरण्ड संहिता" से भी अधिक प्राचीन हैं| ये दोनों ग्रंथ नाथ संप्रदाय के मुख्य ग्रन्थों में आते हैं| इनमें भी हठयोग का पूरा ज्ञान है| इन ग्रन्थों के आचार्य स्वयं गुरु गोरखनाथ हैं| शिवसंहिता की रचना उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ की है और हठयोगप्रदीपिका की रचना उनके शिष्य स्वात्मारामनाथ की है। 16 जून 2020

ध्यान ---

 

"वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥१०:२२॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
(अर्थात् -- मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में वासव (इन्द्र) हूँ; मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ॥)

ध्यान :--- आज्ञा चक्र में एक प्रकाश की कल्पना करें जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है| पूरा ब्रह्मांड उसी प्रकाश के घेरे में है| फिर यह भाव करें कि "मैं स्वयं ही वह प्रकाश हूँ, यह देह नहीं"।

"परमात्मा की पूर्ण कृपा मुझ पर है| मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व, मेरा सम्पूर्ण प्रेम परमात्मा को समर्पित है| मेरा प्रेम पूरी समष्टि में व्याप्त है| पूरी समष्टि ही मेरा प्रेम है| समस्त प्रेम मैं स्वयं हूँ| जहां भी मैं हूँ, वहीं परमात्मा हैं| परमात्मा सदा मेरे साथ हैं| मेरे से पृथक कुछ भी नहीं है| मैं यह देह नहीं, परमात्मा की सर्वव्यापकता हूँ|".
"मैं ज्योतिषांज्योति हूँ, सारे सूर्यों का सूर्य हूँ, प्रकाशों का प्रकाश हूँ| जैसे भगवान भुवन भास्कर के समक्ष अन्धकार टिक नहीं सकता वैसे ही मेरे परम प्रेम रूपी प्रकाश के समक्ष अज्ञान, असत्य और अन्धकार की शक्तियां नहीं टिक सकतीं|"
"मैं पूर्ण हूँ, सम्पूर्ण पूर्णता हूँ, परमात्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ| मेरी पूर्णता ही सच्चिदानंद है, मेरी पूर्णता ही परमेश्वर है| मैं मेरे प्रियतम प्रभु के साथ एक हूँ|"
शिवोहं शिवोहं शिव शिव शिव !! जय गुरु !! ॐ गुरु !! ॐ ॐ ॐ॥
(अब अजपा-जप की गहन साधना दीर्घकाल यानि खूब देर तक करें।)
कृपा शंकर
१६ जून २०१६

Wednesday, 10 June 2026

भगवान का भक्त कभी नष्ट नहीं होता --

 जीवन में कभी भी विपरीत परिस्थितियाँ और संकट काल अचानक ही आ सकते हैं, जिन में जीवित रहने हेतु भगवान की कृपा होना आवश्यक है। भगवान भी श्रद्धालुओं की ही रक्षा करते हैं, जो उन को अपना मन, बुद्धि, चित्त, और अहंकार समर्पित कर देते हैं। भगवान का भक्त कभी नष्ट नहीं होता --

"क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥९:३१॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
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भगवान की कृपा प्राप्त करनी हो, तो किसी अधिकारी आचार्य से सीख कर साधना करनी आवश्यक है। आने वाले समय में बाढ़, चक्रवात, भूकंप आदि प्राकृतिक आपदायें आ सकती हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ सकता है, तीसरा विश्वयुद्ध आरंभ हो सकता है। ईश्वर की उपासना तो करनी ही पड़ेगी, आज नहीं तो कल। लेकिन आग लगाने पर कुआँ खोदना कितना उपयोगी होगा, उसकी आप कल्पना कर सकते हैं।
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आप सब महान आत्माओं को नमन !! ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१० जून २०२१

Tuesday, 9 June 2026

ब्राह्मण समाज में जागृति और एकता कैसे हो? ---

ब्राह्मण समाज में जागृति और एकता कैसे हो?

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किसी भी पौधे की जड़ों में जल न देकर उसकी पत्तियों में ही जल दिया जाये तो वह पौधा कभी भी वृक्ष नहीं बनेगा। ब्राह्मण समाज की जड़ें धर्म में बहुत गहरी जमी हुई हैं, उन जड़ों की उपेक्षा कर के वर्तमान में ब्राह्मण समाज के लगभग सारे नेता पत्तियों में ही पानी दे रहे हैं।
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ब्राह्मण एकता के नाम पर आजकल -- ब्राह्मण अधिकारियों और राजनेताओं का सार्वजनिक सम्मान किया जाता है। इससे वे अधिकारी और नेता तो अपने अहंकार को तृप्त कर के चले जाते हैं, और समाज के नेताओं के अपने मतलब हेतु अधिकारियों व नेताओं से मधुर संबंध बन जाते हैं। लेकिन इस से समाज को कुछ नहीं मिलता है।
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कभी कभी अच्छे नंबर लाने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित कर दिया जाता है। ठीक है प्रोत्साहन देना चाहिए, लेकिन उन विद्यार्थियों को भी समाज के प्रति कुछ कर्तव्य बोध होना चाहिए, अन्यथा समाज को कोई लाभ नहीं है।
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ब्राह्मण समाज की सबसे बड़ी समस्या है -- नवयुवक/नवयुवतियों में धर्मशिक्षा का अभाव। आज की पीढ़ी को अपने धर्म की शिक्षाओं का ज्ञान नहीं है। इसके लिए छुट्टियों में प्रशिक्षण वर्ग चलाये जाने चाहियें।
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(१) संस्कृत भाषा की शिक्षा बच्चों को दी जाये। बच्चों को संस्कृत का इतना ज्ञान तो हो कि वे "श्री सूक्त" और "पुरुष सूक्त" का शुद्ध उच्चारण सहित पाठ कर सकें, और इसका अर्थ भी समझा सकें।
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(२) सभी युवा किशोरों का सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार करवा कर, उन्हें वैदिक प्राणायाम, और गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाये। गायत्री जप का महत्व भी बताया जाये और विधि-विधान से संध्या कर्म भी सिखाया जाये।
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(३) भगवान से परमप्रेम (भक्ति) प्रत्येक ब्राह्मण को होना चाहिए। भगवान की भक्ति ही ब्राह्मण का मुख्य गुण है। युवकों, युवतियों व सभी जिज्ञासुओं को कोई न कोई साधना/उपासना अवश्य करनी चाहिए।
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स्वनामधान्य भाष्यकार भगवान आचार्य शंकर (आदि शंकराचार्य) भगवती श्रीविद्या के उपासक थे। श्रीविद्या साधना पर ही उनका ग्रंथ "सौन्दर्य लहरी" बहुत प्रसिद्ध है। इस साधना का क्रम होता है। दस महाविद्याओं में से एक किसी की भी साधना से समाज की मानसिक, बौद्धिक, आर्थिक, आध्यात्मिक -- सब तरह की दरिद्रता दूर होगी।
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जिनकी भगवान विष्णु के अवतारों में श्रद्धा है उन्हें, भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण की उपासना करनी चाहिए।
जिनकी श्रद्धा शिव में है उन्हें परमशिव का ध्यान करना चाहिए।
जिनकी श्रद्धा हनुमान जी में है, उन्हें हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए।
गीता का नित्य नियमित पाठ अर्थ समझते हुए करना चाहिए।
कुल मिलाकर बात यह है कि भगवान से परमप्रेम प्रत्येक ब्राह्मण को होना चाहिए। यही एक ब्राह्मण का सबसे बड़ा गुण है। ब्राह्मण समाज समय समय पर आपस में मिलता जुलता रहेगा तो प्रेम भी बना रहेगा।
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ब्राह्मणों ने अपना धर्म छोड़ दिया इसीलिए पूरे हिन्दू जाति की दुर्दशा हो रही है। ब्राह्मण अपने धर्म पर दृढ़ रहेंगे तो पूरे हिन्दू समाज का उत्थान होगा।
सभी को सप्रेम सादर नमन!!
"ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥"
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कृपा शंकर
८ जून २०२२

भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं ---

 भारत का भविष्य "धर्म-सापेक्षता" में है, 'धर्म-निरपेक्षता" में नहीं। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ है -- अधर्म-सापेक्षता। भारत की अस्मिता "सनातन-धर्म" है। भारत कोई भूमि का टुकड़ा मात्र नहीं, एक जीवंत सूक्ष्म सत्ता है। वास्तव में सनातन धर्म ही भारत है, और भारत ही सनातन धर्म है। सनातन धर्म का उत्थान ही भारत का उत्थान है, और सनातन धर्म का पतन ही भारत का पतन है। धर्म का पालन ही धर्म की रक्षा है।

रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ ही भारत के प्राण हैं। भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में जो आश्वासन दिया है, उसी पर आस्था और श्रद्धा-विश्वास के कारण हम जीवित हैं। अन्यथा अब तक जीवित रहने का अन्य कोई कारण नहीं है।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४:७॥"
"परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४:८॥"
"जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥४:९॥"
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥४:११॥"
९ जून २०२५

Saturday, 6 June 2026

शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक

आज ही के दिन ६ जून १६७४ को रायगढ़ में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था जो भारतीय इतिहास की एक गौरवशाली गाथा है| महान विजयनगर साम्राज्य के बाद पहली बार भारत में स्वराज्य की स्थापना हुई| शिवाजी का राज्याभिषेक काशी के वेद-पुराण-उपनिषदों के ज्ञाता पंडित गंगाधर भट्ट द्वारा किया गया| पंडित गंगाधर भट्ट ने शिवाजी की वंशावली के विस्तृत अध्ययन के बाद यह सिद्ध किया के उनका भोंसले वंश मूलतः मेवाड़ के वीरश्रेष्ठ सिसोदिया राजवंश की ही एक शाखा है| शिवाजी मूल रूप से सिसोदिया राजपूत थे| उन के पूर्वज मेवाड़ से महाराष्ट्र जाकर बस गए थे| (नेपाल का राजवंश भी सिसोदिया राजपूत ही है). गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक, क्षत्रिय कुलगौरव, राजाधिराज, योगीराज श्री श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की जय !