Monday, 29 June 2026

हमें उन्हीं देवी/देवताओं की ही उपासना करनी होगी जिन्होंने शत्रुओं के विनाश के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं ---

 वर्तमान विकट समय में जब भारत की अस्मिता (सत्य_सनातन_हिन्दू_धर्म) पर मर्मांतक प्रहार हो रहे हैं, हमें उन्हीं देवी/देवताओं की ही उपासना करनी होगी जिन्होंने शत्रुओं के विनाश के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण कर रखे हैं|

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हमें सर्वप्रथम स्वयं की दुर्बलताओं को दूर करना होगा, तभी हम समाज व राष्ट्र की दुर्बलताओं को दूर कर पायेंगे| हमें उन देवी/देवताओं की तरह ही बल और बुद्धि से सम्पन्न होना होगा| धर्म तभी हमारी रक्षा करेगा जब हम धर्म की रक्षा करेंगे| हमारी उपासना सनातन_हिन्दू_धर्म व भारत की रक्षा के लिए हो|

भगवान क्या खाते हैं ?? इसका उत्तर भगवान स्वयं देते हैं ----

भगवान क्या खाते हैं ?? इसका उत्तर भगवान स्वयं देते हैं --
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"पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥९:२६॥"
अर्थात् - जो भक्त मुझे पत्र, पुष्प, फल, और जल आदि कुछ भी वस्तु भक्तिपूर्वक देता है, उस प्रयतात्मा, शुद्धबुद्धि भक्त के द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पण किये हुए वे पत्र पुष्पादि मैं (स्वयं) खाता हूँ, अर्थात् ग्रहण करता हूँ।
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भक्तों को अपुनरावृत्तिरूप अनन्त फल मिलता है। भगवान बड़े भोले हैं, उन्हें हम प्रेम से जो भी अर्पण करते हैं, उसे ही वे खा लेते हैं। वास्तव में हम जो कुछ भी खाते हैं, वह सब भगवान ही खाते हैं, जिससे समस्त सृष्टि का भरण-पोषण होता है। भगवान स्वयं वेश्वानर के रूप में उसे ग्रहण कर जठराग्नि द्वारा चार प्रकार के अन्नों (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) को पचाते हैं --
"अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१५:१४॥"
अर्थात् - "मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ॥"
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हम जहाँ भोजन करते हैं, वहाँ का स्थान, वायुमण्डल, दृश्य तथा जिस आसन पर बैठकर भोजन करते हैं, वह आसन भी शुद्ध और पवित्र होना चाहिये। भोजन करते समय प्राण जब अन्न ग्रहण करते हैं, तब वे शरीर के आसपास के परमाणुओं को भी खींचते/ग्रहण करते हैं। हम भगवान को क्या खिलाते हैं, उसी के अनुसार मन बनेगा। भोजन बनाने वाले के भाव, विचार भी शुद्ध और सात्त्विक होने चाहियें।
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भोजन से पूर्व हाथ पैर मुख पवित्र जल से साफ कर के बैठिए। दायें हाथ में जल लेकर मानसिक रूप से गीता के इस मंत्र से आचमन करें ---
"ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥४:२४॥"
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आचमन के पश्चात पहले ग्रास के साथ मानसिक रूप से मंत्र "ॐ प्राणाय स्वाहा" अवश्य कहें। प्रत्येक ग्रास को चबाते समय मानसिक रूप से भगवन्नाम-जप करते रहना चाहिए। भोजन करते समय मानसिक रूप से भगवन्नाम-जप करते रहने से अन्नदोष दूर हो जाता है।
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यदि आप भगवती अन्नपूर्णा के भक्त है तो उपरोक्त सब विधियों के साथ साथ आरंभ में भगवती अन्नपूर्णा का मंत्र भी मानसिक रूप से पूर्ण भक्ति-भाव से अवश्य कहना चाहिए --
"अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे।
ज्ञान वैराग्य सिध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति॥"
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ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
३० जून २०२२

जहाँ स्वयं का बल नहीं चलता, वहाँ परमात्मा की शरण लेनी ही पड़ती है ---

 जहाँ स्वयं का बल नहीं चलता, वहाँ परमात्मा की शरण लेनी ही पड़ती है ---

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यह त्रिगुणात्मिका प्रकृति बड़ी विकट है, लेकिन इसके नियामक तो भगवान स्वयं हैं। हमारी पात्रता होगी तो वे कृपा कर के हमें प्रकृति के बंधनों से मुक्त कर सकते हैं। भगवान स्वयं कहते हैं --
(१) "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥१८:६१॥" (श्रीमद्भगवद्गीता)
अर्थात् - हे अर्जुन (मानों किसी) यन्त्र पर आरूढ़ समस्त भूतों को ईश्वर अपनी
माया से घुमाता हुआ (भ्रामयन्) भूतमात्र के हृदय में स्थित रहता है॥
(यहाँ हृदय का अर्थ हमारी चिंतनधारा यानि विचार और भाव हैं। हम चाहें तो ईश्वर से दूर भी जा सकते हैं, और उनके समीप भी आ सकते हैं।)
(२) "उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥" (रामचरितमानस)
अर्थात् - (शिवजी कहते हैं) हे उमा ! स्वामी श्री रामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं।
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मेरे अपने निजी जीवन में मेरी रक्षा मेरे पूर्व जन्मों के गुरुओं की परम कृपा, और संस्कारों से हुई है। उनका मार्गदर्शन मुझे अभी भी प्राप्त है। पूर्व जन्म के गुरुओं ने ही आध्यात्म के मार्ग पर मेरा मार्गदर्शन किया है, और सब तरह के संशयों का निवारण भी किया है। अभी भी उनकी कृपा की अनुभूतियाँ मुझे कभी कभी होती हैं। कुछ निषेधात्मक कारणों से इस विषय पर इससे अधिक लिखना मना है। पूर्व जन्म के अनेक दृश्य मेरी स्मृति में अब भी कभी कभी आ जाते हैं।
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अपने विगत जीवन के कर्मों का प्रारब्ध फल भुगतने के लिए मेरा जन्म जिस नगर में हुआ, वह नगर और वहाँ का समाज अति घोर तामसी था, और अभी भी है। वर्तमान में अपने प्रारब्धानुसार वहीं रहना पड़ रहा है। जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ तमोगुण अधिक है, फिर कुछ-कुछ रजोगुण है; सतोगुण तो बहुत दुर्लभ है। मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा, यह मेरा प्रारब्ध, और एक वास्तविकता है।
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मेरी बात कोई सुने या न सुने, लेकिन सत्य तो कहूँगा ही। यदि हम चाहते हैं कि हमारी संस्कृति और धर्म की रक्षा हो तो --
(१) संस्कृत भाषा हमें बचपन से ही अपने बालकों को सिखानी पड़ेगी। भविष्य में यही हमारी सदा रक्षा करेगी।
(२) आध्यात्मिक संस्कार अपने बालकों में देने पड़ेंगे।
(३) समाज के ब्राह्मणों में ब्राह्मणत्व के संस्कारों को पुनर्जागृत करना होगा। ब्राह्मणों को निःशुल्क गुरुकुल शिक्षा, और उनकी आजीविका की व्यवस्था करनी होगी। ब्राह्मण बचेगा तभी सनातन धर्म बचेगा; अन्यथा समाज और राष्ट्र नष्ट हो जायेंगे।
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आध्यात्म का पश्चिमीकरण हो रहा है, यह बहुत अधिक घातक है। हमें अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। मुझे पता है कि मेरी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज़ है जिसे कोई नहीं सुनेगा। लेकिन फिर भी मुझे जो सत्य लगता वह तो कहूँगा ही।
धर्म वह है जिसे धारण किया जाता है। उसके दस लक्षण "मनु-स्मृति" में दिये हुए हैं। धर्म वह है जिससे अभ्युदय, और निःश्रेयस की सिद्धि होती है। यह सत्य-सनातन-धर्म है। अन्य सब रिलीजन, मज़हब और पंथ है।
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इस जीवन में मैंने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा समुद्री मार्ग से की है। पनामा को छोड़कर दक्षिण-अमेरिकी महाद्वीप, व पूर्वी अफ्रीका महाद्वीप के देशों को छोड़कर विश्व के लगभग सभी महत्वपूर्ण देशों की यात्रा मैंने की है। अपने पूरे अनुभव के साथ कह रहा हूँ कि "सत्य सनातन धर्म", और "संस्कृत भाषा" में ही भारत का भविष्य है। ये ही भारत की अस्मिता हैं, और इन्हीं के कारण भारत, भारत है।
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सांसारिक दृष्टि से असहाय हूँ, लेकिन परमात्मा में मेरी पूर्ण श्रद्धा है। अब उन्हीं का आश्रय ले रहा हूँ। मेरी श्रद्धा, एक सत्यनिष्ठ धर्मसापेक्ष भारत का निर्माण करेगी, जिसकी राजनीति सत्य सनातन धर्म होगी। असत्य का अंधकार स्थायी नहीं हो सकता। आत्मा की शाश्वतता, पुनर्जन्म, कर्मफलों का सिद्धान्त, और ईश्वर के अवतार सत्य हैं। सब कुछ परमात्मा को समर्पित है। मेरा अपना कुछ भी नहीं है। जो इस जन्म में नहीं कर पाया, वह अगले जन्मों में होगा।
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जीवन में सच्चिदानंद परमात्मा की प्राप्ति सभी को हो। सभी का कल्याण हो।
ॐ तत्सत्॥ ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
३० जून २०२5

स्वयं भगवान विष्णु ही यह विश्व बन गये हैं ---

 स्वयं भगवान विष्णु ही यह विश्व बन गये हैं। विष्णु-सहस्त्रनाम का आरंभ ही इसे सिद्ध करता है। "ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः। भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः॥ पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः। अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च॥"

यह सम्पूर्ण विश्व और यह सृष्टि साक्षात परमात्मा है। यह परमात्मा की इच्छा है कि वे स्वयं को कैसे व्यक्त करें। हमारा कार्य उनमें पूर्ण समर्पण और उनके प्रकाश में सतत वृद्धि करना है, जो हम निरंतर करते रहेंगे।
उनके प्रति हमारा समर्पण पूर्ण हो। किसी भी कामना का जन्म न हो।
ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
३० जून २०२५

भगवान का कोई भरोसा नहीं है, उनकी पकड़ बड़ी मजबूत है ---

 भगवान का कोई भरोसा नहीं है। उनकी पकड़ बड़ी मजबूत है। कभी भी किसी भी समय अचानक हमें पकड़ लेते हैं। उनकी पकड़ से बचना असंभव है। अच्छा है वे स्वयं ही पकड़ते हैं, कोई अन्य नहीं। बुरा तो तब लगता है जब वे छोड़ कर चले जाते हैं, और मिलते नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उनका भी मन हमारे बिना लगता नहीं है। थोड़ी देर बाद फिर बापस आ जाते हैं। अब से प्रयास यही करेंगे कि वे कहीं जाये नहीं।

पुनश्च: (बाद में जोड़ा हुआ) --
भगवान की माया हमें "आवरण" और "विक्षेप" के रूप में भ्रमित करती है। भगवान की माया वहीं काम करती है, जहां तमोगुण होता है। थोड़ा सा भी तमोगुण हमारे भीतर है तो "विक्षेप" वहाँ आए बिना नहीं रहता। भगवान त्रिगुणातीत हैं, अतः उनके ध्यान और उपासना से ही उनकी कृपा होती है। उनकी कृपा जहाँ होती है वहाँ उनकी माया का प्रभाव नहीं होता।
जीवन का प्रथम उद्देश्य/लक्ष्य भगवत् प्राप्ति है। सर्वप्रथम भगवान को उपलब्ध हों, फिर उस चेतना में अपने लौकिक कार्य करते हुए संसार में विचरण करें।
🕉🕉🕉 ॐ तत्सत् !!

Saturday, 27 June 2026

मोहनदास करमचंद गांधी को "महात्मा गांधी" किसने बनाया?

 


आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं।

आज श्रीहनुमान-जयंती है इसे श्रीहनुमान-जन्मोत्सव या श्रीहनुमान प्राकट्योत्सव भी कहते हैं। सभी श्रद्धालुओं को नमन। हनुमान जी का प्राकट्य हमारे निज जीवन में हो, तभी इस उत्सव की सार्थकता है। श्रीहनुमान जी हमारी चेतना में हैं, कहीं बाहर नहीं। यह उत्सव प्रतिवर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष चैत्र मास की पूर्णिमा १ अप्रैल २०२६ को प्रातः ७ बजकर ६ मिनट से २ अप्रैल को प्रातः ७ बजकर ४१ मिनट तक थी। उदया तिथि के चलते हनुमान जयंती का उत्सव २ अप्रैल २०२६ को मनाया जा रहा है।

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मैं जो कुछ भी लिखने जा रहा हूँ, आज इसे लिखने की मुझे एक आंतरिक अनुमति है। लेकिन इसे वे ही समझ पायेंगे जिन पर भगवान की अनुकंपा है।
श्रीहनुमान जी की अनुभूतियाँ हमें गहरे ध्यान में होती है। जब भी हम सांस लेते हैं, तब हम पाते हैं कि वे कुंडलिनी महाशक्ति के रूप में मूलाधारचक्र से सहस्त्रारचक्र के मध्य विचरण कर रहे हैं। और भी गहरे ध्यान में सहस्त्रारचक्र के ऊपर का आवरण हट जाता है, और सूक्ष्म जगत में ईश्वर की अनंतता से भी परे एक ज्योतिर्मय जगत के दर्शन होते हैं जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता कहती है --
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
श्रुति भगवती जिसके बारे में कठोपनिषद (२.२.१५) व मुंडकोपनिषद (२.२.१०) में कहती है --
"न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥"
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उपरोक्त अनुभूतियाँ हमें हनुमान जी की परम कृपा से ही होती हैं जो प्राण-तत्व और वायु-तत्व के देवता हैं। वे हमें भक्ति, शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करते हैं। वे हमें निस्वार्थ सेवा और समर्पण सिखाते हैं। वे हमारी हर सांस में जीवित और अमर हैं। उनका निवास मेरे हृदय (विचारों व भावों) में और मेरी साँसों में है, अन्यत्र कहीं भी नहीं। ध्यान में उनकी निरंतर अनुभूति मुझे अपनी चेतना में होती है। मुझे अपना माध्यम बना कर वे भगवान श्रीराम का ध्यान स्वयं करते हैं। यह उनकी परम अनुकंपा है। मैं उन्हें नमन करता हूँ। उन्हीं की परम कृपा मुझे राम जी का बोध कराती है।
"मनोजवं मारुततुल्यवेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं, श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥" ॐ ॐ ॐ !!
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कृपा शंकर / २ अप्रेल २०२६