Friday, 14 August 2026

अखंड भारत दिवस : 14 अगस्त

 अखंड भारत दिवस : 14 अगस्त |

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भारतवर्ष का अखंड होना उसकी नियति है| श्रीअरविन्द के शब्दों में भारतवर्ष एक भूमि का टुकड़ा, मिटटी, पहाड़, और नदी नाले नहीं है| न ही इस देश के वासियों का सामूहिक नाम भारत है| भारतवर्ष एक जीवंत सत्ता है| भारतवर्ष हमारे लिए साक्षात माता है जो मानव रूप में भी प्रकट हो सकती है| वर्तमान में भारतवर्ष के अनेक टुकड़े हो गए हैं जिनमें से सबसे बड़ा टुकड़ा India है, फिर बाकि अनेक| पर भारत की आत्मा एक है अतः भारत का अखंड होना निश्चित है| भारतवर्ष दो विपरीत ध्रुवों के समन्वय का देश है| भारतीय मानस आध्यात्मिक, नीतिपरक, बौद्धिक और कलात्मक है|
भारत का पतन इसलिए हुआ कि लोगों का जीवन अधार्मिक, अहंकारी, स्वार्थपरक और भौतिक हो गया| एक ओर अत्यधिक बाह्याचार, कर्मकांड, यंत्रवत भक्तिभावरहित पूजापाठ में हम लोग भटक गए, दूसरी ओर अत्यधिक पलायनवादी वैराग्य वृत्ति में उलझ गये, जिसने समाज की सर्वोत्तम प्रतिभाओं को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया| जो लोग आध्यात्मिक समाज के अवलम्ब और ज्योतिर्मय जीवनदाता बन सकते थे वे समाज के लिए मृत हो गए| फिर हमें कोई सही मार्गदर्शक नहीं मिले|
श्रीमद् भगवद्गीता हमारी राष्ट्रीय धरोहर है अतः इससे प्रेरणा लेकर हमें शक्ति की साधना और देशभक्ति की भावना बढानी चाहिए| केवल भारत की आत्मा ही इस देश को एक कर सकती है| भारत की आत्मा को व्यक्त करने और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने के लिए --------- हमें राष्ट्रभाषा के रूप में संस्कृत को अपनाना होगा और वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बनाना होगा|
आओ हम सब दृढ़ निश्चय कर यह संकल्प करें कि भारत माँ अपने परम वैभव के साथ अखण्डता के सिंहासन पर बैठ रही है और अपने भीतर और बाहर के शत्रुओं का विनाश कर रही है| भारतवर्ष अखंड होगा, होगा, और होगा| धर्म की पुनर्स्थापना होगी और अन्धकार, असत्य व अज्ञान की शक्तियों का नाश होगा| वन्दे मातरम| भारत माता की जय|
सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।१।।
शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ।।२।।
कोटि-कोटि कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले,
के बॉले माँ तुमि अबले,
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।३।।
तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदय़े तुमि माँ भक्ति,
तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे। वन्दे मातरम् ।।४।।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।५।।
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।६।।
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हमारी अखंडता का संकल्प सांस्कृतिक है, न कि सैन्य|
भारतवर्ष का अखंड होना उसकी नियति है|

भारत पुनश्च: अखंड होगा ---

 सन १९४७ में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट एवं ट्रूमेन, ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल और एटली, सोवियत संघ के तानाशाह स्तालिन, तथा भारत के मोहनदास गांधी, जवाहर लाल नेहरू, और मुहम्मद अली जिन्ना ने मिलकर पाकिस्तान नाम का एक अलग मजहबी स्टेट बना दिया जो अब पाकिस्तान एवं बांग्लादेश के रूप में है। लेकिन यह विभाजन स्थायी नहीं है। भारत शीघ्र ही फिर से अखंड होगा। यह मैं अपनी अंतर्चेत्ना से कह रहा हूँ। कब होगा? यह मैं नहीं कह सकता।

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अगले सात वर्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका का विखंडन हो जाएगा। अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था विफल हो जाएगी। वहाँ मंहगाई बढ़नी आरंभ हो चुकी है। दो साल बाद वहाँ असंतोष फ़ेल जाएगा, और सरकार विरोधी प्रदर्शन आरंभ हो जाएँगे। अमेरिका में महाविनाश होगा, जिसमें रूस की बड़ी भूमिका होगी।
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शीघ्र ही कुछ वर्षों में ब्रिटेन पर अफ्रीका और एशिया से आये काले लोगों का राज होगा। अंग्रेज़ उनके गुलाम होंगे।
यूरोप की समृद्धि एशिया और अफ्रीका से लूट-खसोट के धन से थी। अब वे लूट-खसोट नहीं कर सकते। यूरोप के सब देश अगले सात वर्षों में गरीब देश हो जाएँगे।
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पाकिस्तान का चार, और चीन का सात टुकड़ों में बंटना तय है। अगले सात वर्षों में विश्व की अधिकांश जनसंख्या नष्ट हो जाएगी। बहुत कम लोग बचेंगे।
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ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
१४ अगस्त २०२३

क्या यह संसार परमात्मा के मन का एक स्वप्न मात्र है? ---

  क्या यह संसार परमात्मा के मन का एक स्वप्न मात्र है?

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लगता तो ऐसा ही है। परमात्मा से लगातार जुड़े होने के कारण परमात्मा की मादकता (नशा) भी छाने लगी है। अब अच्छा-बुरा जो कुछ भी संसार में हो रहा है, उससे मुझे अब कुछ भी फर्क पड़ना कम होते होते बंद होने लगा है। यह सृष्टि परमात्मा की है, मेरी नहीं। अपनी सृष्टि के लिए परमात्मा स्वयं जिम्मेदार हैं। मेरी ज़िम्मेदारी सिर्फ मेरे अपने विचारों और कर्मों की है। जैसे सिनेमा हॉल में सिनेमा देखते हैं, वैसे ही संसार को निरपेक्ष भाव से देख रहा हूँ।
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मेरी कमियों को दूर करने की, मेरे निर्वाह की, और मुझे अपने साथ एक करने की सारी ज़िम्मेदारी अब स्वयं परमात्मा की है, मेरी नहीं।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥९:२२॥"
अर्थात् -- अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए जो भक्तजन मेरी ही उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं वहन करता हूँ॥
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अपने भाष्य में आचार्य शंकर लिखते हैं कि -- "जो अनन्य भाव से, यानि भगवान को आत्म-रूप से जानते हुए भगवान का निरन्तर चिन्तन करते हैं, भगवान में स्थित उन परमार्थ-ज्ञानियों का योगक्षेम भगवान स्वयं चलाते हैं।
अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति का नाम योग है, और प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम क्षेम है। उनके ये दोनों काम भगवान स्वयं करते हैं। अनन्यदर्शी भक्त अपने लिये योग-क्षेम सम्बन्धी चेष्टा नहीं करते। वे जीने और मरने में भी अपनी वासना नहीं रखते। केवल भगवान् ही उनके अवलम्बन रह जाते हैं। अतः उनका योगक्षेम स्वयं भगवान् ही चलाते हैं।"
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सच्चिदानंद परमात्मा के सान्निध्य का नशा बड़ा आनंददायक है। संसार के सब नशे उस के सामने बेकार हैं।
ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
१४ अगस्त २०२३

Wednesday, 12 August 2026

सनातन धर्म और भारत, - की रक्षा होगी, वे विजयी बन कर उभरेंगे --- .

 सनातन धर्म और भारत, - की रक्षा होगी, वे विजयी बन कर उभरेंगे ---

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जब धर्म और राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में हो, तब व्यक्तिगत मोक्ष की कामना पाप है। आध्यात्म -- सुख-भोग में नहीं है। स्वर्ग और मोक्ष-प्राप्ति हेतु की गई साधना में मेरी दृष्टि से कुछ भी आध्यात्मिक नहीं है, केवल स्वार्थ है। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जो साक्षात परमब्रह्म हैं, उन्होने बंदीगृह में ही जन्म क्यों लिया? महलों में जन्म लेने से उन्हें कौन रोक सकता था? वे तो स्वयं नारायण थे। वे एक संदेश देना चाहते थे, जो उन्होने सफलतापूर्वक दिया।
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हमारे अस्तित्व में परमात्मा होंगे तो उनकी शक्ति से धर्म व राष्ट्र की रक्षा अवश्य होगी। जब धर्म नहीं रहेगा तो राष्ट्र भी नहीं रहेगा, और राष्ट्र नहीं रहेगा तो धर्म भी नहीं बचेगा। अपना सम्पूर्ण अस्तित्व परमात्मा को समर्पित करें, उन्हें जीवन में अवतरित करें, उन्हें कर्ता बनाएँ और अपने माध्यम से उन्हें कार्य करने दें। यही सबसे बड़ी सेवा है जो हम समष्टि की कर सकते हैं। फिर परमात्मा ही हमारे माध्यम से कार्य करेंगे। हम तो उन के उपकरण मात्र बनें, यही हमारा धर्म है। जीवन में ईश्वर का साक्षात्कार ही सत्य सनातन धर्म है, जिस की सर्वाधिक अभिव्यक्ति भारत में हुई है।
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भारत के उत्थान का अर्थ है -- सनातन धर्म का उत्थान। भारत की महानता का अर्थ है -- सनातन धर्म की महानता। सनातन धर्म सत्य है क्योंकि यह अपने उपासकों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार परमात्मा से कराता है। सत्य का वास्तविक आग्रह यही धर्म करता है। सत्य ही परमात्मा है। ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१२ अगस्त २०२१

साधना में सफलता -- भगवान की विशेष परम कृपा पर ही निर्भर है।

साधना में सफलता -- भगवान की विशेष परम कृपा पर ही निर्भर है। यह कोई mechanical नहीं है। हम भगवान पर कोई अहसान यानि उपकार नहीं कर रहे हैं कि हमने इतने जप-तप, पूजा-पाठ और पुरश्चरण आदि किए हैं, अतः हमारी मांगें पूरी करो। हम भगवान से मांग नहीं, विनम्र प्रार्थना ही कर सकते हैं।

भगवान की कृपा प्रत्यक्ष भी हो सकती है और गुरु के माध्यम से भी हो सकती है। भगवान से कोई मांग करनी ही नहीं चाहिए। उनके प्रेम के अलावा अन्य कुछ मांगना भी नहीं चाहिए। उनको सब पता है कि हमारी क्या आवश्यकता है।
हमारे शास्त्र परमप्रेम और शरणागति की बात कहते हैं। प्रेम में कोई मांग या शर्त नहीं होती। मांग और शर्त तो व्यापार में होती है। अतः हमारी भक्ति Unconditional हो।


गुरु का उपकार उतारने का एक ही तरीका है कि हम आत्म-साक्षात्कार द्वारा मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि परमात्मा को स्वयं में पूर्ण रूप से अवतरित/व्यक्त करें।

 गुरु का उपकार उतारने का एक ही तरीका है कि हम आत्म-साक्षात्कार द्वारा मनुष्य जीवन की उच्चतम उपलब्धि परमात्मा को स्वयं में पूर्ण रूप से अवतरित/व्यक्त करें।

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गुरु का एक ही लक्ष्य होता है कि शिष्य को परमात्मा की प्राप्ति हो। गुरु के उपदेशों का पालन ही गुरु की वास्तविक सेवा है। गुरुकृपा से ही साधना के गूढ़ से गूढ़ रहस्य अनावृत होते हैं। उन्हीं की कृपा से भक्ति की जागृति और ज्ञान का उदय होता है। उन्हीं की कृपा से प्राणवायु का सुषुम्ना में प्रवेश, कुंडलिनी जागरण, चक्रभेद, नाद, कूटस्थ ब्रह्मज्योति, सूक्ष्म जगत, अनंताकाश और परमशिव आदि का अनुभूतिजन्य ज्ञान और भगवत्-प्राप्ति होती है।
हम अपने सद्गुरु और परमात्मा के साथ एक हों। कहीं कोई भेद न रहे।
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ॐ तत्सत् !! ॐ गुरु !! जय गुरु !!
कृपा शंकर
१२ अगस्त २०२१

Sunday, 9 August 2026

समस्त मातृशक्ति का 'तीज' के त्यौहार पर अभिनन्दन ---

आज श्रावण शुक्ल तृतीया है| महिलाओं के लिए यह अति पावन पर्व है|

कल #सिंजारा था| विवाहिता और अविवाहिता महिलाओं व कन्याओं ने कल हाथों में मेंहदी रचाई और रूप निखारा| उनके लिए पक्वान्न बनाये गए, उन्हें मिठाइयां और उपहार दिए गए|
आज सायंकाल #तीज की सवारी निकलेगी| महिलाएँ तीज के रूप में गौरी (पार्वती) की पूजा करेंगी|
अनेक जन्मों की तपस्या के उपरांत शिव को पति के रूप में पाकर पार्वती ने आज पतिगृह में प्रवेश किया था| जटाजूटधारी भस्म रचाए शिव को जिनका कोई रहने का ठिकाना नहीं, बैल की सवारी, भूत-प्रेत व विचित्र आकृति वाले गणों का साथ, पाकर भी पार्वती ने कभी कोई शिकायत नहीं की| उनका दाम्पत्य जीवन आदर्श था| तभी उनके गणेश व कार्तिकेय जैसे दिव्य बालक हुए|
उपरोक्त कथा चाहे प्रतीकात्मक हो पर हज़ारों वर्षों से समाज को प्रेरणा देती आई है|
यह महिलाओं के लिए सुयोग्य पति की प्राप्ति और सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए पार्वती पूजन का दिवस है| हमाँरी शुभ कामना और प्रार्थना है कि सभी महिलाओं का दाम्पत्य जीवन सुखी हो|
इस समय जब प्रकृति चारों तरफ हरियाली की चादर सी बिछा देती है तो प्रकृति की इस छटा को देखकर मन पुलकित होकर नाच उठता है। जगह-जगह झूले पड़ते हैं। स्त्रियों के समूह गीत गा-गाकर झूला झूलते हैं। पुनश्चः समस्त मातृशक्ति का अभिनन्दन व शुभ कामनाएँ|
९ अगस्त २०१३