Sunday, 1 November 2026

(१) दूसरों से सम्मान की अपेक्षा सबसे बड़ा धोखा है, इससे बचकर रहो। (२) अंतगति सो मति सो गति।

 (१) दूसरों से सम्मान की अपेक्षा सबसे बड़ा धोखा है, इससे बचकर रहो।

(२) अंतगति सो मति सो गति।
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अपनी पढ़ाई-लिखाई, धन-संपत्ति और पद का अभिमान, यहाँ तक कि पुण्य का अभिमान भी पतन का सबसे बड़ा कारण है। गीता में भगवान कहते हैं ---
"अमानित्वम् अदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥१३:७॥"
"इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च |
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३:८॥"
"असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु |
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||१३:९॥"
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यमराज को सामने देखकर बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। कहते हैं कि यमराज के भैंसे के गले की घंटी की कर्कश ध्वनि सुनकर पूरे जीवन की तस्वीर सामने आ जाती है। इतने में यमराज प्राण हर लेते हैं। इसलिए ईश्वर का स्मरण हर समय रखो। ये पंक्तियाँ पढ़कर (यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो) कृपा कर के गीता के आठवें अध्याय "अक्षरब्रह्म योग" का स्वाध्याय आज से ही कीजिये, बार बार करते रहिए जब तक याद न हो जाये।
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नर्क अनेक हैं और अनेक तरह के हैं। स्वर्ग की कामना भी एक नर्क ही है। ईश्वर की कृपा से एक नर्क की यात्रा मैंने भी की है, इससे स्वर्ग जाने की कामना का कभी जन्म ही नहीं हुआ। इन से परे केवल परमब्रह्म परमात्मा की ही सोचिये।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१ नवंबर २०२६

Wednesday, 14 October 2026

शक्ति का स्थूल और सूक्ष्म रूप ---

 शक्ति का स्थूल और सूक्ष्म रूप ---

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बचपन से ही धार्मिकता के संस्कार तो पूर्व जन्म से ही थे। किशोरावस्था से ही ईश्वर की उपासना अकिंचन-भाव से होती थी। कालांतर में यह अकिंचन भाव ही सर्वस्व-भाव बन गया। जीवन की युवावस्था के आरंभ में अंधकार का एक काल आया। युवावास्था के आरंभ में ही मैंने जीवन में अनेक विसंगतियाँ, अभाव और अन्याय देखे थे, जिनका परिणाम यह हुआ कि मैं मार्क्सवाद के घने अंधकार से घिर कर नास्तिक हो गया। यह जीवन का एक अंधकारमय काल था।
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मेरे साथ सूक्ष्म जगत के संपर्क की अनेक ऐसी अलौकिक असामान्य दिव्य घटनाएँ घटित हुईं हैं जिन पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा। अतः उनकी चर्चा मैं नहीं करूंगा। लगता है पूर्व जन्म में कुछ अच्छे कर्म किए थे, जिनके फल मिलने आरंभ हो गये। पूर्व जन्म की कुछ स्मृतियाँ जागृत हुईं। सूक्ष्म जगत में पूर्व जन्म के जो गुरु थे उनकी भी कृपा हुई। उनकी कृपा से ही जीवन का अंधकार दूर होना आरंभ हो गया। आत्मा की शाश्वतता, कर्मफल, और पुनर्जन्म के सत्य का बोध भी अपने अनुभवों से हुआ।
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आध्यात्म के इस मार्ग पर जब पदार्पण किया तब साधना का आरंभ मैंने गुरु के आदेशानुसार "अजपा-जप" से किया। फिर उनके आदेशानुसार ही ज्योतिर्मय-ब्रह्म का ध्यान आरंभ किया। यह करते करते गुरु-कृपा से एक तीसरी चीज और जुड़ गई, वह था प्रणव मंत्र का श्रवण। जो बाद में बिना प्रयास के स्वतः ही होने लगा। ये तीनों चीजें आपस में जुड़कर एक हो गईं। निराशा के भी अनेक क्षण आए लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। एक दिन ध्यान करते करते गुरु कृपा से कूटस्थ में ब्रह्म-ज्योति के दर्शन हुए। धीरे-धीरे वह ब्रह्म-ज्योति भी साधना का भाग हो गई। गुरु के आदेशानुसार फिर हठयोग की कुछ मुद्राओं, आसनों, व प्राणायामों आदि का अभ्यास किया। खेचरी मुद्रा मुझे सिद्ध नहीं हुई। तब अर्ध-खेचरी से ही काम चलाने लगा। सन १९८१ के दिसंबर माह में मुझे सूक्ष्म जगत से ही क्रियायोग की दीक्षा प्राप्त हुई। विधिवत दीक्षा सन १९८५ में ली।
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गीता में भगवान कहते हैं --
"त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः॥४:२०॥"
अर्थात् -- जो पुरुष, कर्मफलासक्ति को त्यागकर, नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है॥
"निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥४:२१॥"
अर्थात् -- जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है, जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है, ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है॥
"यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥४:२२॥"
अर्थात् -- यदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला, द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित, सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बंधता है॥
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मेरा अनुभव कहता है कि एक साधक को सर्वप्रथम ईश्वर की शक्ति के स्थूल रूप की साधना द्वारा अनुभूति प्राप्त करनी चाहिए। ईश्वर की शक्ति का स्थूल रूप -- श्वास-प्रश्वास है। हर सांस के साथ ईश्वर का स्मरण हो। उस समय चेतना कूटस्थ में हो। यह साधना अजपा-जप या हंस-गायत्री द्वारा सम्पन्न होती है।
तत्पश्चात् -- शक्ति के सूक्ष्म रूप का ध्यान होता है जो प्राण-तत्व पर होता है। प्राण-तत्व का घनीभूत रूप ही कुंडलिनी महाशक्ति है। इस विषय की सार्वजनिक चर्चा का निषेध है क्योंकि इस साधना में यम-नियमों का पालन अनिवार्य है। बिना यम नियमों के पालन के प्राण-तत्व की सूक्ष्म साधना से मस्तिष्क के विकार हो सकते हैं, जो इस जन्म में ठीक नहीं होते। उन्हें ठीक करने के लिए नया जन्म ही लेना पड़ता है।
गीता के इस विषय पर गीता का एक कूट श्लोक है --
"अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥४:२९॥"
अर्थात् -- अन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं, प्राण और अपान की गति को रोककर, वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं॥
गीता में इस विषय पर और भी संकेत हैं ---
"स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥५:२७॥"
अर्थात् -- बाह्य विषयों को बाहर ही रखकर नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके॥"
"यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥५:२८॥"
अर्थात् -- जिस पुरुष की इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयत हैं, ऐसा मोक्ष परायण मुनि इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह सदा मुक्त ही है॥
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उपरोक्त साधनाओं में सिद्ध गुरु का मार्ग दर्शन अनिवार्य है। श्रुति भगवती कहती है कि गुरु वही हो सकता है जो श्रौत्रीय हो यानि जिसे श्रुतियों का ज्ञान हो, और जो ब्रह्मनिष्ठ हो ---
"परीक्ष्य लोकान्‌ कर्मचितान्‌ ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन |
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्‌ समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्‌ ||"
(मुण्डक. १:२:१२)
अतः किसी ब्रह्मनिष्ठ और श्रौत्रीय गुरु से ही मार्गदर्शन प्राप्त करें।
ॐ तत् सत् !!
कृपा शंकर
१४ अक्तूबर २०२६
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पुनश्च: -- शक्ति का स्थूल रूप शरीर में - श्वास है। शक्ति का सूक्ष्म रूप शरीर में - प्राण है। श्वास का ज्ञान किये बिना प्राण का बोध नहीं किया जा सकता। श्वासों की उपासना करके ही धीरे धीरे शाश्वत परमप्राण (महाप्राण) की अनुभूति होती है।
साधना का परम लक्ष्य है कुंडलिनी महाशक्ति का परमशिव से मिलन। जो श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम हैं, तंत्र में वे ही परमशिव हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। दोनों एक हैं। जो शिव हैं वे ही विष्णु हैं, और जो विष्णु हैं वे ही शिव हैं।
"ॐ शिवाय विष्णु रूपाय शिव रूपाय विष्णवे ।
शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः ॥
यथा शिवमयो विष्णुरेवं विष्णुमयः शिवः ।
यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्तिरायुषि ॥
यथाऽन्तरं न भेदाः स्युः शिवराघवयोस्तथा ॥"

Tuesday, 13 October 2026

जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ ---

 जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ ---

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दोष हमारी डुबकी में है, महासागर में नहीं| जब हमें महासागर में मोती ही ढूँढने हैं तो वे समुद्र तट की रेत में लात मारने से नहीं मिलेंगे| उसके लिए समुद्र की गहराई में डुबकी लगानी होगी| जो गहरे पानी में उतरेंगे उन्हें ही मोती मिलेंगे, न कि ऊपरी सतह पर तैरने वालों को| यदि मोती नहीं मिलते हैं तो इसमें सागर का क्या दोष है? दोष तो डुबकी में है|
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परमात्मा को उपलब्ध होने के लिए भी स्वयं को गहराई में उतरना होगा| कोई दूसरा हमारे लिए यह कार्य नहीं कर सकता| किसी के पीछे पीछे भागने से कुछ नहीं होने वाला| मात्र प्रवचन सुनने, मात्र ग्रंथों का अध्ययन करने या ऊँची ऊँची दार्शनिक बातों से कुछ नहीं होगा| आहुती स्वयं की ही देनी होगी|
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ॐ तत्सत् | ॐ ॐ ॐ ||
कृपा शंकर
१३ अक्टूबर २०१६

Sunday, 11 October 2026

पितृ विसर्जन

 तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः !!

सर्वपितृ अमावस्या के दिन आत्म-प्रेरणा से आज सम्मानपूर्वक सब पितरों की विदाई (पितृ विसर्जन) कर दी। कोई बड़ा आडंबर नहीं किया, श्रद्धाभाव से घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर सरसों के तेल का चौमुखी दीया जला कर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके एक लोटे जल में थोड़े से काले तिल मिलाकर पित्तरों को अर्घ्य दिया; और दोनों हाथ उठाकर पितरों से अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगते हुए उन्हें आदरपूर्वक विदा किया। जैसी भी प्रेरणा मिली, वैसा ही किया। इससे अधिक का ज्ञान भी तो नहीं है।

गरबा नृत्य ---

 गरबा नृत्य ---

भगवती महाकाली और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना का नृत्य है जो एक दीपक (गर्भ दीप) जलाकर उसके चारों ओर किया जाता है। इसमें पूर्ण भक्तिभाव से केवल भजन ही गाये जाते हैं। इसका आरंभ 15 वीं शताब्दी में हरिवंश पुराण में वर्णित 'ताल रासक' एवं 'दंड रासक' से मिली प्रेरणा से हुआ। इसका वर्तमान स्वरूप तो एक विकृति मात्र है।

Sunday, 4 October 2026

अति उलझन भरे प्रश्न और विचार --- .

 अति उलझन भरे प्रश्न और विचार ---

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हमने नहीं, अपितु धर्म ने हमें धारण कर रखा है, तभी हमारा अस्तित्व है। जिस दिन धर्म हमें छोड़ देगा, उस दिन हमारा कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। सत्य ही धर्म है। भगवान सत्यनारायण हैं। ॐ ॐ ॐ !!
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सन २०१४ में जब माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी भारत के प्रधानमंत्री बने, उस समय हमें अपार प्रसन्नता हुई थी। उस समय उनके भाषणों और हाव-भाव से हमें लगा था कि वे भीमराव रामजी सकपाल के भक्त एक अंबेडकरवादी हैं, और गांधी-भक्त होने का दिखावा कर रहे हैं। वे हीन भावना से ग्रस्त एक व्यक्ति लगे जो एक झूठी उच्चता का दिखावा कर रहे थे। तत्कालीन परिस्थितियों में उनसे श्रेष्ठतर कोई अन्य व्यक्ति प्रधानमंत्री पद की शोभा भी नहीं बढ़ा सकता था। अतः हमने उन्हें स्वीकार किया।
उन्होंने कुछ अभूतपूर्व कार्य बड़ी कुशलता से किए जिन्हें करने का साहस अब तक कोई भी प्रधानमंत्री नहीं कर पाया था। उन्होंने --
(१) देश को आतंकवाद से मुक्त कराया।
(२) देश की सशस्त्र सेनाओं के मनोबल को बढ़ाया, और सशस्त्र सेनाओं को सशक्त किया।
(३) देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया।
(४) कश्मीर को धारा ३७० से मुक्त किया।
(५) राम मंदिर के निर्माण में आ रही बाधाओं को दूर किया।
(६) भारत का और भारतीयों का सम्मान पूरे विश्व में बढ़ाया।
(७) नए संसद भवन, और नये सरकारी कार्यालयों का निर्माण कर हजारों करोड़ रुपये बचाए जो किराये के रूप में दिये जा रहे थे।
(८) चीन और पाकिस्तान के मन में एक भय उत्पन्न किया। एक लघु युद्ध में पाकिस्तान को परास्त किया।
(९) पाकिस्तान को तो एक भिखारी देश बना दिया।
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उनकी उपलब्धियां अभूतपूर्व थीं। इतना ही नहीं, वे अविकल्पनीय थे। उनसे श्रेष्ठतर किसी दूसरे प्रधानमंत्री की हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। लेकिन धीरे-धीरे उनके मानस में छिपा हुआ पिछड़ावाद और घोर जातिवाद निकलकर सामने आने लगा।
वे राम का नाम लेकर सत्ता में आए थे, उन्होंने अपनी छवि एक धर्मनिष्ठ की बनाई थी लेकिन वे तो सकपाल के भक्त एक अंबेडकरवादी नास्तिक निकले।
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भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामप्रसाद मुखर्जी ने की थी, बाद में उसका नाम "भारतीय जनता पार्टी" बना। यह दल पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मुख्य विचार -- "एकात्म मानववाद (Integral Humanism) और अंत्योदय पर आधारित था, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की बात करता है। उनके अनुसार मानव -- तन, मन, बुद्धि और आत्मा का समुच्चय है। व्यक्ति और समाज का विकास इन चारों के समग्र संतुलन से ही संभव है। अंत्योदय की विचारधारा के अनुसार समाज की पंक्ति में सबसे नीचे और पीछे खड़े व्यक्ति का विकास पहले होना चाहिए। आर्थिक प्रगति का पैमाना सबसे ऊंचे व्यक्ति की आय नहीं, बल्कि सबसे गरीब व्यक्ति की स्थिति होनी चाहिए। उन्होने शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार माना। उनका मानना था कि शिक्षा का व्यापार नहीं होना चाहिए और यह समाज द्वारा प्रबंधित व निःशुल्क होनी चाहिए।
चिति और विराट -- हर राष्ट्र की एक सांस्कृतिक-राष्ट्रीय मूल चेतना होती है जिसे उन्होंने 'चिति' कहा। इसके साथ समाज की शक्ति 'विराट' मिलकर देश को समृद्ध बनाती है।
धर्म और समाज -- धर्म वह है जो समाज को जोड़कर रखता है और व्यवस्थित करता है। संघर्ष की बजाय समन्वय ही जीवन का आधार होना चाहिए। यह भारतीय जनता पार्टी की मूल विचारधारा थी।
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लेकिन दुर्भाग्य से भारतीय जनता पार्टी -- पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा दिखाये गये मार्ग को छोड़कर भीमराव रामजी सकपाल उर्फ बाबा साहब अम्बेडकर के मार्ग पर चल पड़ी है अतः हमारा भाजपा में रहना असंभव है। हम भाजपा का त्याग इसी क्षण कर रहे हैं। रा.स्व.से.संघ की विचारधारा -- हिन्दू राष्ट्र को संगठित करना है। लेकिन अभी वर्गभेद और वर्गसंघर्ष द्वारा हिन्दू राष्ट्र को विघटित किया जा रहा है। धर्म का कहीं नाम ही नहीं लिया जा रहा है, अतः रा.स्व.से.संघ से जुड़े रहना भी असंभव है। सघ की स्थापना और प्रचार-प्रसार के पीछे भी एक ब्राह्मणत्व था, जिसका किसी भी जाति से कोई संबंध नहीं था। ब्राह्मणत्व है सर्वव्यापी निरंतर विस्तृत हो रहे ब्रह्म की अवधारणा। जो सर्वव्यापी है, और जिसका निरंतर विस्तार हो रहा है, वह ब्रह्म है। जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्राह्मण है।
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जो ब्राह्मण जाति है, उसका सन १९४७ के बाद तीन बार नर-संहार हो चुका है। सबसे पहिले महाराष्ट्र में, फिर तमिलनाडु में, और फिर कश्मीर में। इसकी न तो कभी जांच हुई और न कभी कोई FIR लिखी गई। इतिहास में पहिले भी अनेक बार ब्राह्मणों का नरसंहार हो चुका है। ब्राह्मणों को अपना धर्म नहीं छोडना चाहिए। ब्राह्मणों के विरुद्ध बहुत कुछ पढ़ाया जा रहा है, जो उनके विरुद्ध घृणा और हिंसा को जन्म देगा।
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ब्राह्मण का धर्म है -- संध्या गायत्री, प्राणायाम और ब्रह्म का ध्यान। जब तक सृष्टि है तब तक ब्राह्मणत्व रहेगा, जब यह समाप्त होगा तो सृष्टि भी समाप्त हो जाएगी। परमात्मा को सब कुछ समर्पित कर के ब्रह्ममय होकर रहें। ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ ॥
कृपा शंकर
१ अक्तूबर २०२६

मैं भाजपा और संघ से तटस्थ व उदासीन क्यों हो गया हूँ ?

 भारतीय जनता पार्टी जब तक आदरणीय डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी और पं.दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों पर चल रही थी तब तक मैं भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी का कट्टर समर्थक था। अब जब से पार्टी ने उन्हें छोड़कर भीमराव रामजी सकपाल उर्फ डॉ.भीमराव रामजी अंबेडकर का अनुसरण करना आरंभ कर दिया है जिन्हें वे बाबा साहब डॉ.अंबेडकर कहते हैं; मैं तटस्थ हो गया हूँ, और कोई अन्य विकल्प देख रहा हूँ।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मैं पिछले ६४ वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ। इस संगठन का उद्देश्य हिन्दू राष्ट्र को संगठित करना है। लेकिन जिस तरह से SC/ST Act व UGC के काले क़ानूनों के द्वारा हिंदुओं में वर्गभेद उत्पन्न कर उन्हें वर्गसंघर्ष द्वारा तोड़ा जा रहा है, वह भी संघ समर्थितों द्वारा; मैं संघ से भी निराश होकर तटस्थ हो गया हूँ, और अन्य दूसरा विकल्प ढूंढ रहा हूँ।
फिर संघ ने अंबेडकर, फुले, राम मोहन रॉय, व पेरियार जैसों को आदर्श पुरुष बना रखा जो घोर हिन्दू द्रोही थे। ३ अक्टूबर २०२६