Saturday, 16 May 2026

अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से कीजिए ---

 अपने दिन का आरंभ भगवान के ध्यान से कीजिए। वैसे तो पूरी गीता ही योग शास्त्र है, लेकिन उसके १५ वें अध्याय "पुरुषोत्तम योग" के आरंभिक ६ श्लोकों में योग-साधना के सारे सूत्र समाहित हैं। लेकिन वे भगवान की कृपा से ही समझ में आ सकते हैं। उन्हें बौद्धिक रूप से समझने मात्र का ही नहीं, निज जीवन में अवतरित कीजिए।

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मनुष्य का स्वभाव होता है कि वह सबसे पहिले दूसरों की कमी देखता है। मेरे में लाख कमियाँ होंगी, लेकिन उनसे किसी अन्य की कोई हानि नहीं होगी, अतः मेरी कमियों की चिंता छोड़ दें, उनके लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ, कोई अन्य नहीं। अपनी स्वयं की कमियों को दूर करने का प्रयास करें। मेरे में लाखों कमियाँ हैं, लेकिन मैं हर समय ईश्वर की चेतना में रहता हूँ, यही मेरा एकमात्र गुण है। मैं स्वयं को सदा ईश्वर के सन्मुख पाता हूँ। मेरी बुराई करने से मेरी बुराइयों के अतिरिक्त किसी को कुछ भी नहीं मिलेगा। यदि देखना है तो ईश्वर में स्वयं को देखो।
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भगवान कहते हैं --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
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अपने भाष्य में आचार्य शंकर कहते हैं कि "संसार से विरक्त हुए पुरुष को ही भगवान का तत्त्व जानने का अधिकार है, अन्य को नहीं"। उनका युग दूसरा था। उस समय समाज में इतने अभाव और कष्ट नहीं थे, जितने अब हैं। इसलिए परमात्मा की कृपा भी इस युग में शीघ्र ही हो जाती है।
१६ मई २०२३

श्रीविद्या, अद्वैत-वेदान्त, और पुरुषोत्तम-योग ---

 श्रीविद्या, अद्वैत-वेदान्त, और पुरुषोत्तम-योग ---

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दण्डीस्वामी महात्माओं के सत्संग में उनके श्रीमुख से सुना है कि "श्रीविद्या" की दीक्षा अंतिम दीक्षा होती है, उसके पश्चात कोई अन्य दीक्षा नहीं होती। आचार्य शंकर "श्रीविद्या" के उपासक थे। उन्होने इस पर "सौन्दर्य लहरी" नामक ग्रंथ भी लिखा है। उन्हे अद्वैत-वेदान्त दर्शन का आचार्य कहा जाता है जो गलत है। अद्वैत वेदान्त दर्शन के आचार्य तो ऋषि गौड़पाद थे जो आचार्य गोविंद भगवत्पाद के गुरु थे। उन्होंने १२ मंत्रों के अथर्ववेदीय "मांडूक्य उपनिषद" की व्याख्या अपने २१५ मंत्रों के ग्रंथ "माण्डूक्यकारिका" में की है। अद्वैत वेदान्त दर्शन का यह सर्वोच्च प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें जागृत स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं को मिथ्या मानकर आत्मा की तुरीयअवस्था को सर्वोच्च सत्य बताया गया है।
अपने परम गुरु ऋषि गौड़पाद को सम्मान देते हुए "मांडूक्यकारिका" पर आचार्य शंकर ने सबसे पहिला भाष्य लिखा था। तत्पश्चात अन्य भाष्यों की रचना उनसे हुई।
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पुरुषोत्तम योग --- कर्ताभाव से मुक्त होने पर "पुरुषोत्तम-योग" ही सर्वोच्च योग है, जो श्रीमद्भगवद्गीता का सार है। उससे उच्चतर या श्रेष्ठतर कोई अन्य योग नहीं है। लेकिन इसका अभ्यास वे ही कर पाते हैं जो कर्ताभाव से मुक्त होते हैं। जब तक कर्ताभाव है, तब तक किसी भी परिस्थिति में यह योग सिद्ध नहीं हो सकता। यह क्रियायोग का अगला भाग है। यह योग भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा से ही समझ में आ सकता है और वे ही इसमें एकमात्र कर्ता होते हैं। मुझे भी इसका ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण की परमकृपा से ही हुआ है। उनकी कृपा होने पर यह अपने आप ही समझ में आ जाता है। भगवान कहते हैं --
"ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥१५:१॥"
"अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः।
अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥१५:२॥"
"न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥१५:३॥"
"ततः पदं तत्परिमार्गितव्य यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥१५:४॥"
"निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥१५:५॥"
"न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥१५:६॥"
ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
१६ मई २०२६

Wednesday, 13 May 2026

सीता नवमी की शुभ कामनाएँ ---

 सीता नवमी की शुभ कामनाएँ ---

"उद्भव स्थिति संहार कारिणीं क्लेश हारिणीम्| सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं राम वल्लभाम्||"
आज वैशाख शुक्ल नवमी को सीतानवमी है जिसे "जानकी नवमी" भी कहते हैं| आज ही के दिन माँ सीता का प्राकट्य हुआ था| आज ही के दिन पुष्य नक्षत्र में राजा जनक ने संतान प्राप्ति की कामना से यज्ञ की भूमि तैयार करने के लिए भूमि जोती थी और उसी समय उन्हें पृथ्वी में दबी हुई एक बालिका मिली थी| जोती हुई भूमि को तथा हल की नोक को सीता कहते हैं| यही वजह थी कि उनका नाम सीता रखा गया| यह स्थान बिहार के सीतामढी जिले में पुनौरा धाम कहलाता है|
"जनकसुता जगजननी जानकी| अतिसय प्रिय करुणानिधान की||
ताके जुग पदकमल मनावउं| जासु कृपा निर्मल मति पावउँ||" १३ मई २०१९

Monday, 11 May 2026

जिसने मुझे मेरे होने का बोध कराया, वे ही मेरे परमात्मा हैं, और वे ही यह "मैं" हूँ ---

 जिसने मुझे मेरे होने का बोध कराया, वे ही मेरे परमात्मा हैं, और वे ही यह "मैं" हूँ। मैं यह देह नहीं, मेरे प्रियतम, सर्वव्यापी मेरे प्रभु के साथ एक हूँ।

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कभी एकांत में ब्रह्ममुहूर्त के समय बिलकुल अकेले में ध्यान करें। सहस्त्रारचक्र पर ओंकार का मानसिक जप करते हुए इस भौतिक देह से बाहर आ जाएँ। शरीर की ओर न देखें। शरीर से बाहर रहते हुए ही खूब देर तक ध्यान करें, तभी परमशिव की अनुभूति होगी। जब आनंद आ जाये, जब तृप्ति हो जाये, तब बापस इस शरीर में लौट आओ। .
यह भाव हर समय बना रहे कि भगवान निरंतर हमारे साथ हैं| वे एक पल के लिए भी हमारे से दूर नहीं हो सकते| यह अपने आप में ही एक बहुत बड़ी साधना है| भगवान हैं, यहीं पर है, सर्वत्र हैं, इसी समय हैं, सर्वदा हैं, वे ही सब कुछ हैं, और सब कुछ वे ही हैं| वे ही हमारे हृदय में धडक रहे हैं, वे ही इन नासिकाओं से सांसें ले रहे हैं, इन पैरों से वे ही चल रहे हैं, इन हाथों से वे ही हर कार्य कर रहे हैं, इन आँखों से वे ही देख रहे हैं, इस मन और बुद्धि से वे ही सोच रहे हैं, हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व वे ही हैं| सारा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि वे ही हैं| वे परम विराट और अनंत हैं| हम तो निमित्त मात्र, उन के एक उपकरण मात्र हैं| भगवान स्वयं ही हमें माध्यम बना कर सारा कार्य कर रहे हैं| कर्ता हम नहीं, स्वयं भगवान हैं|
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सारी महिमा भगवान की है| भगवान ने जहाँ भी रखा है और जो भी दायित्व दिया है उसे हम नहीं, स्वयं भगवान ही कर रहे हैं| वे ही जगन्माता हैं, वे ही परमपुरुष हैं| हम उन के साथ एक हैं| कहीं कोई भेद नहीं है| ॐ तत्सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
११ मई २०२०

सनातन-धर्म ही भारत राष्ट्र का सत्व, मर्म, मूलाधार और प्राण है।

 सनातन-धर्म ही भारत राष्ट्र का सत्व, मर्म, मूलाधार और प्राण है। सनातन-धर्म के बिना भारत का कोई अस्तित्व नहीं है। सनातन-धर्म ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का भविष्य है। सनातन-धर्म की निश्चित रूप से पुनर्प्रतिष्ठा और वैश्वीकरण होगा।

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हम सब जो भी आध्यात्मिक साधना करते हैं, उस से सनातन-धर्म की रक्षा होती है। जीवन की सत्य, सनातन और सर्वोत्कृष्ट अभिव्यक्ति धर्म है, और यह सनातन-धर्म ही हमारी रक्षा करेगा। हमें भी उसकी रक्षा करनी होगी।
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हम सनातन काल से ही सदा वीर, तेजस्वी और पराक्रमी रहे हैं। हमारा लक्ष्य - परमात्मा है। सनातन-धर्म की रक्षा हेतु भारत को एक हिन्दू-राष्ट्र बनाना अपरिहार्य है।
ॐ तत्सत् !! जय हिन्दू राष्ट्र !! 🙏🌹🕉🕉🕉🌹🙏
कृपा शंकर
११ मई २०२२

Sunday, 10 May 2026

हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ?

 हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ?

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देश, धर्म, समाज, राष्ट्र, मानवता और पूरी सृष्टि की सेवा में विषम से विषम परिस्थितियों में हम अपने जीवन में सर्वश्रेष्ठ क्या कर सकते हैं ? यह प्रश्न सदा मेरे चैतन्य में रहा है| इसके समाधान हेतु अध्ययन भी खूब किया, अनेक ऐसी संस्थाओं से भी जुडा रहा जो समाज-सेवा का कार्य करती हैं| अनेक धार्मिक संस्थाओं से भी जुड़ा पर कहीं भी संतुष्टि नहीं मिली| कई तरह की साधनाएँ भी कीं, अनेक तथाकथित धार्मिक लोगों से भी मिला पर निराशा ही हाथ लगी| धर्म और राष्ट्र से स्वाभाविक रूप से खूब प्रेम रहा है| धर्म के ह्रास और राष्ट्र के पतन से भी बहुत व्यथा हुई है| सदा यही जानने का प्रयास किया कि जो हो गया सो तो हो गया उसे तों बदल नहीं सकते पर इसी क्षण से क्या किया जा सकता है जो जीवन मे सर्वश्रेष्ठ हो और सबके हित में हो|
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ध्यान-साधना में विस्तार की अनुभूतियों ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि मैं यह शरीर नहीं हूँ| ईश्वर के दिव्य प्रेम, आनंद और उसकी झलक अनेक बार मिली| यह अनुभूति भी होती रहती है कि स्वयं के अस्तित्व की एक उच्चतर प्रकृति तो एक विराट ज्योतिर्मय चैतन्य को पाने के लिए अभीप्सित है पर एक निम्न प्रकृति बापस नीचे कि भौतिक, प्राणिक और मानसिक चेतना की ओर खींच रही है| आत्मा की अभीप्सा तो इतनी तीब्र है वह परमात्मा के बिना नहीं रह सकती पर निम्न प्रकृति उस ओर एक कदम भी नहीं बढ़ने देती|
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यह भी जीवन मे स्पष्ट हो गया कि उस परम तत्व को पाना ही सबसे बड़ी सेवा हो सकती है जो की जा सकती है| गहन ध्यान में मैं यह शरीर नहीं रहता बल्कि मेरी चेतना समस्त अस्तित्व से जुड़ जाती है| यह स्पष्ट अनुभूत होता रहता है कि हर श्वाश के साथ मैं उस चेतना से एकाकार हो रहा हूँ और हर निःश्वाश के साथ वह चेतना अवतरित होकर समस्त सृष्टि को ज्योतिर्मय बना रही है| उसी स्थिति मे बना रहना चाहता हूँ पर निम्न प्रकृति फिर नीचे खींच लाती है| ईश्वर से प्रार्थनाओं के उत्तर मे जो अनुभूतियाँ मुझे हुई उन्हें व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूँ|
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सबसे पहिले तों यह स्पष्ट किया गया गया है कि जो भी साधना हम करते हैं वह स्वयं के लिए नहीं बल्कि भगवान के लिए है| उसका उद्देश्य सिर्फ उनकी इच्छा को कार्यान्वित करना है| मोक्ष की कामना सबसे बड़ा बंधन है| उसकी कोई आवश्यकता नहीं है| आत्मा तों नित्य मुक्त है| बंधन केवल भ्रम हैं| ईश्वर को पूर्ण समर्पण करणा होगा| सारी कामना, वासना, माँगें, राय और विचार सब उसे समर्पित करने होंगे तभी वह स्वयं सारी जिम्मेदारी ले लेगा| कर्म-फल ही नहीं कर्म भी उसे समर्पित करने होंगे| समूचे ह्रदय और शक्ति के साथ स्वयं को उसके हाथों मे सौंप देना होगा| कर्ता ही नहीं दृष्टा भी उसे ही बनाना होगा, तभी वह सारी कठिनाइयों और संकटों से पार करेगा| सारे कर्म तो स्वयं उनकी शक्ति ही करती है और उन्हें ही अर्पित करती हैं| किसी भी तरह का सात्विक अहंकार नहीं रखना है| इससे अधिक व्यक्त करने की मेरी क्षमता नहीं है|
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सार की बात जिससे अधिक व्यक्त करना मेरी क्षमता से परे है वह यह कि स्वयं को ईश्वर का एक उपकरण मात्र बनाकर उसके हाथ मे सौंप देना है| फिर वो जो भी करेगा वही सर्वश्रेष्ठ होगा| यही सबसे बड़ा कर्तव्य और सबसे बड़ी सेवा है|
ॐ तत्सत् ! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
१० मई २०१२

भगवान एक छोटे और भोले-भाले बालक की तरह ही लगते हैं। पता नहीं वे इतनी बड़ी सृष्टि कैसे चला लेते हैं ?

 भगवान एक छोटे और भोले-भाले बालक की तरह ही लगते हैं| पता नहीं, वे इतनी बड़ी सृष्टि कैसे चला लेते हैं? उनको डांट भी दो तो वे बुरा नहीं मानते, और लौट कर फिर बापस हँसते हुए आ जाते हैं| उन पर तरस भी आता है और उन से पूरा प्रेम भी बना रहता है| भाव जगत में वे हर बात का उत्तर भी देते हैं| कम से कम मुझे तो उनसे पूरी संतुष्टि है| एक बड़े काम की रहस्यमय बात भी उन्होने आज बताई है| उनके सर्वव्यापी ब्रह्मरूप से तो मुझे भाव जगत में उनका बालरूप ही अधिक अच्छा लगता है| भगवान उसी रूप में अच्छे लगते हैं जिनसे मित्रतावश लड़ाई-झगड़ा भी कर सकें, और जिन के साथ खेल भी सकें| उनके साथ एकत्व नहीं, उनका मित्र रूप चाहिए| ब्रह्मभाव में तो कभी भी स्थित हो सकते हैं पर उन का मित्रभाव बड़ा दुर्लभ है| आगे अब जैसी उनकी इच्छा॥ ११ मई २०२१