उपासना में हम कर्ताभाव से मुक्त होकर एक साक्षीमात्र बनें। साधना तो जगन्माता स्वयं करती हैं और सारे कर्मफल परमशिव को अर्पित करती हैं। एकमात्र कर्ता वे स्वयं हैं। हम तो एक निमित्त मात्र हैं। दूसरे शब्दों में महाकाली सारी साधना स्वयं करते हुए सारे कर्मफल श्रीकृष्ण को अर्पित करती हैं।
गीता के ११वें अध्याय के ३३वें मंत्र में भगवान हमें निमित्त मात्र होने का उपदेश देते हैं जो अति विचारणीय है --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३॥"
अर्थात् - " इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥"
गीता के शंकर भाष्य के अनुसार बायें हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने के कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है (सव्येन वामेनापि हस्तेन शराणां क्षेप्ता सव्यसाची इति उच्यते अर्जुनः)॥ भगवान का यह उपदेश कर्मयोग का सार है जो हमें फल की चिंता और अहंकार से मुक्त कर एक निमित्त मात्र होने का आदेश देता है।
ॐ तत् सत् !! ॐ ॐ ॐ !!
कृपा शंकर
७ फरवरी २०२६
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