Wednesday, 18 March 2026

भक्ति — अपने ही पुण्यों का फल है ---

दूसरों से भक्ति की अपेक्षा करना — मेरी सबसे बड़ी भूल थी। भगवान की भक्ति वही कर सकता है जिसने अपने पूर्व जन्मों में बहुत सारे पुण्य किये हों, या जिस पर भगवान की कृपा हो। मेरी यह अपेक्षा पूर्णतः गलत है कि सब लोग भगवान की भक्ति करें या भगवान का ध्यान करें। वास्तव में भगवान स्वयं ही अपनी भक्ति स्वयं करते हैं। जिस पर भगवान की कृपा होती है, वही उनका माध्यम यानी निमित्त बन सकता है। भगवान अपनी अनुभूति मातृरूप में भी करवाते हैं, और पितृरूप में भी। माँ अधिक करुणामयी होती है। भगवान के सारे रूप एक उन्हीं के हैं। भगवान स्वयं ही स्वयं का ध्यान करते हैं, उनके सिवाय कोई अन्य है ही नहीं। भगवती के भी विभिन्न रूपों में जिनकी आराधना हम करते हैं, वे सारे रूप भी उन्हीं के हैं। वे ही ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही विष्णु और वे ही नारायण हैं। इस विषय पर लिखने और चर्चा के लिए मेरे पास बहुत कुछ है।

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साधना करने, व साधक होने का भाव एक भ्रम मात्र ही है। भगवान स्वयं ही स्वयं की साधना करते हैं। हम तो उनके एक उपकरण, माध्यम और निमित्त मात्र हैं। कर्ता तो वे स्वयं हैं। उनकी यह चेतना सदा बनी रहे। फिर भी एक रहस्य अनावृत करना चाहता हूँ कि भगवान आपको भूले नहीं हैं। अपनी सृष्टि के उद्धार हेतु वे निरंतर प्रयासरत हैं। इससे अधिक लिखने का इस समय मुझे आदेश नहीं है।
ॐ तत् सत् ॥
कृपा शंकर
२० फरवरी २०२६

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