दूसरों से भक्ति की अपेक्षा करना — मेरी सबसे बड़ी भूल थी। भगवान की भक्ति वही कर सकता है जिसने अपने पूर्व जन्मों में बहुत सारे पुण्य किये हों, या जिस पर भगवान की कृपा हो। मेरी यह अपेक्षा पूर्णतः गलत है कि सब लोग भगवान की भक्ति करें या भगवान का ध्यान करें। वास्तव में भगवान स्वयं ही अपनी भक्ति स्वयं करते हैं। जिस पर भगवान की कृपा होती है, वही उनका माध्यम यानी निमित्त बन सकता है। भगवान अपनी अनुभूति मातृरूप में भी करवाते हैं, और पितृरूप में भी। माँ अधिक करुणामयी होती है। भगवान के सारे रूप एक उन्हीं के हैं। भगवान स्वयं ही स्वयं का ध्यान करते हैं, उनके सिवाय कोई अन्य है ही नहीं। भगवती के भी विभिन्न रूपों में जिनकी आराधना हम करते हैं, वे सारे रूप भी उन्हीं के हैं। वे ही ज्योतिर्मय ब्रह्म हैं, वे ही परमशिव हैं, वे ही विष्णु और वे ही नारायण हैं। इस विषय पर लिखने और चर्चा के लिए मेरे पास बहुत कुछ है।
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