(१) समाज में "वर्ग-संघर्ष" नहीं, "वर्ग-सहयोग", "सामाजिक-समरसता" और "देशभक्ति" की भावना प्रबलतम होनी चाहिये।
(२) भारत में जनतंत्र के स्थान पर राजतन्त्र की स्थापना हो सकती है।
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दुर्भाग्य से भारत में सामाजिक-न्याय के नाम पर सामाजिक एकता को तोड़कर नये वर्ग बना कर उनमें संघर्ष कराया जा रहा है। यह राजनीति बड़ी घातक सिद्ध होगी। मैं इसका विरोध करता हूँ। लोकतन्त्र को भी अपनी समाप्ती के लिए कोई तो बहाना चाहिये। हम अंग्रेजों द्वारा लिखाये गये झूठे इतिहास का शिकार बनते जा रहे हैं।
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मुझे तो भविष्य में राजतंत्र की बापसी दिखायी दे रही है। अपने राज्याभिषेक के समय हिन्दू राजा --- धर्म-रक्षा की प्रतिज्ञा और संकल्प लेते थे। यह कोई गोपनीयता की शपथ मात्र नहीं थी। हिन्दू क्षत्रिय राजाओं का घोषित लक्ष्य ही धर्म-रक्षा करते हुए प्रजा का कल्याण और पालन करना, न्याय स्थापित करना और राज्य में धर्म का संरक्षण करना था। वे स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर प्रजा का कल्याण, सुख, सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध थे। प्रजा की भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि सुनिश्चित करना राजा का सर्वोच्च धर्म माना जाता था।
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मुझे तो यही लगा रहा है कि भविष्य का राजधर्म राजतंत्र ही होगा। बाकी जैसी ईश्वर की इच्छा। हम केवल प्रार्थना ही कर सकते हैं।
"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःख भाग्भवेत्॥" ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हरिः ॐ तत्सत् !!
कृपा शंकर
४ फरवरी २०२६
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