श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान का हरिःहर रूप ---
.
भगवान हरिःहर हैं। हरिः और हर में कोई भेद नहीं है। हरिः — भगवान विष्णु को कहते हैं, और हर — भगवान शिव को। इनमें भेद करना महापाप है। भगवान शिव और भगवान विष्णु एक ही निराकार ब्रह्म (परम सत्य) की दो अभिव्यक्तियाँ हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि पृथक-पृथक।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो अपना विराट, सर्वव्यापी, अनंत दिव्य विश्वरूप दिखाया है, भगवान का वह महाकाल रूप है, जिसमें हम पूर्ण भक्तिभाव से अपनी पृथकता के सम्पूर्ण बोध का समर्पण करते हैं। महाकाल ही शिव हैं। उसी रूप का हम उपासना में ध्यान करते हैं। भगवान विष्णु की पूजा तो उनके सौम्य चतुर्भुज रूप की होती है, लेकिन ध्यान उनके विश्वरूप का ही होता है। इस विश्व रूप में संपूर्ण ब्रह्मांड, देवता, ऋषि, ग्रह-नक्षत्र, और काल (समय) समाहित होता है।
.
गीता में श्रीभगवान ने स्वयं को (महा) काल बताया है --
"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वेयेऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥११:३२॥"
अर्थात् - श्रीभगवान् ने कहा -- "मैं लोकों का नाश करने वाला प्रवृद्ध काल हूँ। इस समय, मैं इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा हैं, वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं रहेंगे॥ (११:३२)"
.
इससे अगले मंत्र में भगवान हमें निमित्त मात्र होने का उपदेश देते हैं --
"तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥११:३३)"
अर्थात् - "इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो॥ (११:३३)"
.
गीता में इससे पहिले भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को रुद्र और शंकर भी बता चुके हैं --
"रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥१०:२३॥"
अर्थात् - " मैं (ग्यारह) रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धनपति कुबेर (वित्तेश) हूँ; (आठ) वसुओं में अग्नि हूँ तथा शिखर वाले पर्वतों में मेरु हूँ॥ (१०:२३)"
.
हरिः (विष्णु) और हर (शिव) सनातन धर्म में एक ही ब्रह्म (सर्वोच्च चेतना) के दो अभिन्न रूप हैं, जिनमें कोई भेद नहीं है। हरि पालनकर्ता हैं तो हर संहारक, जो मिलकर सृष्टि का संतुलन बनाते हैं। दोनों ही भक्तों के पापों का हरण करते हैं। शिव, विष्णु का ध्यान करते हैं और विष्णु, शिव की पूजा करते हैं। हरिः और हर मिलकर एक ही "हरिःहर" रूप बनते हैं, जो समानता का प्रतीक है। भगवान विष्णु के बिना शिव प्रसन्न नहीं होते और शिव के बिना विष्णु की कृपा नहीं मिलती। "हरिः" का अर्थ है दुखों को हरने वाला (विष्णु), और "हर" का अर्थ है बुराइयों का नाश करने वाला (शिव)।
स्कन्द पुराण तो यहाँ तक कहता है -- "ॐ नमः शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे। शिवस्य हृदयं विष्णुं विष्णोश्च हृदयं शिवः॥"
.
कहीं पढ़ा था कि बिहार के सोनपुर में हरिःहर का एक प्रसिद्ध मंदिर भी है, जहां दोनों की एक साथ पूजा की जाती है। भगवान हरिःहर को नमन।
गीता में अर्जुन द्वारा भगवान की स्तुति ---
"त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥११:३८॥"
"वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥११:३९॥"
"नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥११:४०॥"
.
ॐ तत् ॐ सत्॥ ॐ स्वस्ति॥ ॐ नमः शिवाय॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ "ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिव च शिवतराय च।"
कृपा शंकर
१४ फरवरी २०२६
No comments:
Post a Comment