Wednesday, 18 March 2026

शिवरात्रि की मंगलमय अनंत शुभ कामनाएं ---

 शिवरात्रि की मंगलमय अनंत शुभ कामनाएं ---

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शिवरात्रि तो एक बहाना है, अन्यथा निरंतर सर्वव्यापक सर्वस्व परमशिव की चेतना ही मेरा अस्तित्व है। शिवलिंग उनका प्रतीक चिह्न है। पूरा ब्रह्मांड, सारी सृष्टि, सारा अस्तित्व एक शिवलिंग है। वह परम मंगल और कल्याणकारी परम-चैतन्य जिसमें सब का विलय हो जाता है -- स्थूल जगत का सूक्ष्म जगत में, सूक्ष्म जगत का कारण जगत में, और कारण जगत का सभी आयामों से परे तुरीय चेतना में, -- उस का प्रतीक है शिवलिंग। उसकी अनुभूति कूटस्थ में होती है। उस पर ध्यान से चेतना ऊर्ध्वमुखी होने लगती है। लिंग का शाब्दिक शास्त्रीय अर्थ है -- विलीन होना। शिवत्व में विलीन होने का प्रतीक है शिवलिंग।
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पहले जब मैं अपनी साधना स्वयं करता था, तो तत्व की अनेक बातें लिखता था। लेकिन अब भगवान परमशिव अपनी साधना स्वयं करते हैं, मैं एक निमित्त साक्षी मात्र हूँ, अतः अब कुछ भी नहीं लिखा जाता। एक ही बात लिख सकता हूँ कि -- "शिवो भूत्वा शिवं यजेत्", यानि "शिव बनकर शिव का ध्यान करो"। शिव-तत्व को जीवन में उतार लेना ही शिवत्व को प्राप्त करना है और यही शिव होना है।
(१) शिव का अर्थ है -- कल्याणकारी।
(२) शंभू का अर्थ है — मंगलदायक।
(३) शंकर का अर्थ है — शमनकारी और आनंददायक।
(४) भूतनाथ का अर्थ है -- पञ्च भूतों यानि पञ्च तत्व के अधिपति।
(५) महाकाल का अर्थ है — काल के प्रवर्तक और नियंत्रक। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण -- ये पाँचों मिल कर काल कहलाते हैं। ये काल के पाँच अंग हैं।
(६) शिव परिवार -- शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदीश्वर -- ये पाँचों मिलकर शिव-परिवार कहलाते हैं। नन्दीश्वर साक्षात धर्म हैं।
(७) पंचाक्षरी मंत्र -- 'नम: शिवाय' है। इसके साथ ॐ का संपुट लगता है।
(८) पंचमुखी रुद्राक्ष की माला -- शिव साधना में प्रयुक्त होती है। यह भी अनिवार्य है।
(९) भस्म -- बड़ी पवित्रता से देसी नस्ल की गाय के गोबर से ही तैयार होती है। इसमें और कुछ भी प्रयोग नहीं होता। शिव साधना के किए यह अनिवार्य है।
(१०) परमशिव -- एक अनुभूति है। ब्रह्मरंध्र से परे परमात्मा की विराट अनंतता व उससे परे का सचेतन बोध परमशिव की अनुभूति है। तब साधक स्वयं ही परमशिव हो जाता है। परमशिव की अनुभूति निरंतर होती रहती है।
(११) त्रिपुरारी -- भगवान शिव जीवात्मा को संसारजाल, कर्मजाल और मायाजाल से मुक्त कराते हैं। जीवों के स्थूल, सूक्ष्म और कारण देह के तीन पुरों को ध्वंश कर महाचैतन्य में प्रतिष्ठित कराते है अतः वे त्रिपुरारी हैं।
(१२) दुःखतस्कर -- तस्कर का अर्थ चोर होता है जो दूसरों की वस्तु का हरण कर लेता है। भगवान परमशिव अपने भक्तों के सारे दुःख और कष्ट चुपचाप हर लेते हैं। भक्त को पता ही नहीं चलता। अतः वे दुःखतस्कर हैं।
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परमात्मा के लिए ब्रह्म शब्द का प्रयोग किया जाता है। ब्रह्म शब्द का अर्थ है -- जिनका निरंतर विस्तार हो रहा है, जो सर्वत्र व्याप्त हैं, वे ब्रह्म हैं।
सूक्ष्म देह में सुषुम्ना नाड़ी के भीतर एक शिवलिंग तो मूलाधार चक्र के बिलकुल ऊपर है। उसका रहस्य हर किसी को नहीं बताया जा सकता। कूटस्थ ज्योति भी एक शिवलिंग है, जिसका ध्यान किया जाता है। कूटस्थ-चैतन्य में मानसिक रूप से रहते हुए परमशिव अर्थात ईश्वर की कल्याणकारी ज्योतिर्मय सर्वव्यापकता का ध्यान किया जाता है। सम्पूर्ण अनंतता से परे मेरे उपास्य देव भगवान परमशिव हैं, जिनकी चेतना ही मेरा अस्तित्व है। मेरा समर्पण उन्हीं के प्रति है। जो वे हैं, वो ही मैं हूँ।
पुनश्च शुभ कामनाएँ॥ ॐ ॐ ॐ॥ ॐ नमः शंभवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥ ॐ तत् सत् ॥ ॐ नमः शिवाय॥
कृपा शंकर
१५ फरवरी २०२६

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